संकटसे बचनेका साधन
सप्रेम हरिस्मरण। आपका लिखना यथार्थ है। संसार अनित्य और परिवर्तनशील है। यह सतत परिवर्तनके प्रवाहमें—दूसरे शब्दोंमें मृत्युके प्रवाहमें बह रहा है। जो इस क्षण है, वह दूसरे क्षण नहीं है। यह परिवर्तन-प्रवाह अनादिकालसे है और अनन्तकालतक चलता रहेगा। संसारका यही स्वरूप है; परन्तु युगपरिवर्तनादिके मुख्य और ऐसे ही अवान्तर कालमें जब विशेषरूपसे परिवर्तन होते दिखायी देते हैं, तब लोकसमूह घबरा उठता है। इस समय कुछ ऐसा ही काल उपस्थित है। भाव-विचार, राज्य-साम्राज्य, व्यवहार-बर्ताव, स्थिति-परिस्थिति, विद्या-बुद्धि, संस्कृति-सभ्यता, धनी-गरीब, उच्च-नीच और छोटे-बड़े सभीमें आज भयानक परिवर्तन हो रहा है। इस परिवर्तन-चक्रमें जो लोकदृष्टिमें दु:खकी स्थितिसे निकलकर सुखकी स्थितिमें पहुँचते हैं, उनके लिये तो कुछ भी कहना नहीं है; परन्तु जो सुखकी स्थितिसे दु:खकी स्थितिमें जा पड़ते हैं, उनको स्वाभाविक ही महान् मानसिक और शारीरिक क्लेशों और संकटोंका सामना करना पड़ता है। इन क्लेशों और संकटोंसे बचनेका उपाय है परिवर्तन-चक्रके द्वारा सुखके स्थानमें पहुँचना और उसके दो निश्चित और अमोघ साधन हैं—१. ईश्वरकी प्रार्थना, २. गरीब और उत्पीड़ितोंकी ईश्वर-बुद्धिसे निष्काम सेवा।
जहाँतक हो सके, आप इन दो कामोंमें अपने मन, तन तथा धनको लगाइये। इससे आपका मंगल होगा। आपका ही क्यों, यदि विश्वासपूर्वक सर्वत्र ‘भगवत्प्रार्थना’ और श्रद्धाके साथ ‘सेवा’ होने लगे तो इस महान् परिवर्तनकालमें भी लोग बड़े-बड़े संकटोंसे अनायास ही बच सकते हैं। विशेष भगवत्कृपा।