संन्यासी और स्त्री
सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। संन्यासके सम्बन्धमें कुछ लिखनेका मेरा अधिकार नहीं है। सर्वत्यागी विद्वान् संन्यासी ही संन्यास-धर्मका निरूपण कर सकते हैं और असलमें वह होता है उनके आदर्श आचरणोंके द्वारा। तथापि जहाँतक मैंने देखा है शास्त्रोंमें कहीं भी ऐसी विधि नहीं पायी जाती कि ‘संन्यासीको स्त्रियोंके साथ रहना, उनसे एकान्तमें मिलना या हँसना-बोलना चाहिये।’ बल्कि ऐसे वचन मिलते हैं कि ‘जिस घरमें कोई स्त्री अकेली हो, उस घरसे संन्यासी भिक्षा भी न ले।’ स्त्रियोंको साथ रखना और उनसे हँसना-बोलना तो दूर रहा—पाषाण और काष्ठकी बनी हुई स्त्री-प्रतिमाको देखना और स्पर्श करना भी संन्यासीके लिये निषिद्ध है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके एक बड़े श्रद्धालु सदाचारी भक्त थे छोटे हरिदास। वे एक दिन माधवी नामकी एक वृद्धा भक्त महिलासे महाप्रभुके लिये चावल माँग लाये। जब महाप्रभुको इस बातका पता लगा तो उन्होंने हरिदासको अपने आश्रमसे निकलवा दिया। हरिदासके प्रति महाप्रभुका बड़ा स्नेह था और सम्भवत: उस स्नेहकी प्रेरणासे ही उन्होंने हरिदासकी धर्मच्युतिको सहन न करके उसे इतना कड़ा दण्ड दिया। महाप्रभुका वियोग हरिदासके लिये असह्य था, इसलिये उन्होंने प्रयाग पहुँचकर त्रिवेणीकी धारमें अपनेको बहा दिया। महाप्रभु स्त्रीदर्शनतकका संन्यासीके लिये निषेध करते थे।
एकान्तमें स्त्री-पुरुषका साथ रहना अग्नि और घृतके साथ रखनेकी भाँति कभी खतरेसे खाली नहीं है। बड़े-बड़े त्यागी, सदाचारी पुरुषोंका चित्त डोल जाता है, फिर साधारण मनुष्यकी तो बात ही क्या है। केवल गेरुआ धारण करनेसे ही किसीकी इन्द्रियाँ मर गयी हों, ऐसा नहीं माना जा सकता। अतएव संन्यासीको अपने स्वरूप और धर्मकी रक्षाके लिये विशेषरूपसे सावधान रहकर स्त्रीके प्रत्येक प्रकारके संसर्गसे अपनेको सदा बचाना चाहिये। और स्त्रियोंका भी यह कर्तव्य है कि वे संन्यासी वेश देखकर कभी यह न मान लें कि ये तो शुकदेव ही है। कमजोरियोंसे सर्वथा छूटे हुए महापुरुष तो कोई बिरले ही होते हैं। और जो ऐसे महापुरुष होते हैं, वे भी (लोकसंग्रहकी दृष्टिको लेकर ही सही) शास्त्रमर्यादाका त्याग करके कभी स्त्रियोंको साथ नहीं रखते। अतएव स्त्रियोंको किन्हीं भी संन्यासीके पास, चाहे वे कितने ही बड़े महात्मा माने जाते हों, न तो एकान्तमें जाना चाहिये, न उनके किसी भी अंगका—विशुद्ध भक्तिसे ही—स्पर्श करना चाहिये और उनसे हँसी-ठठोली तो भूलकर भी नहीं करनी चाहिये। जो संन्यासी हैं, उनको तो विशेष ध्यान रखना चाहिये। अपने संन्यासीके वेषकी और आश्रमकी रक्षा प्राणपणसे करनी चाहिये। यदि इतना भी नहीं करते बनता तो फिर संन्यास-ग्रहणकी ही क्या आवश्यकता थी। नास्तिकोंकी भाँति यह कभी नहीं सोचना चाहिये कि मायामय जगत्के मायामय कार्योंसे आत्माका कोई सरोकार नहीं, इसलिये हम कुछ भी करें, हमपर कोई बन्धन नहीं होगा। यह सत्य है कि आत्मा नित्य मुक्त है और बन्धनसे परे है; परन्तु जबतक अज्ञानका बन्धन वर्तमान है, तबतक मायामय कहनेमात्रसे कर्म-बन्धनसे छुटकारा नहीं मिल सकता। कर्मानुसार फल बाध्य होकर भोगना ही पड़ेगा और जबतक इन्द्रिय-भोगमें रसानुभूति होती है, चित्तमें भोगकी चाह और सिद्धि-असिद्धिमें सुख-दु:ख होता है, इन्द्रिय-भोगोंके लिये चोरी, छिपाव तथा असत्यका आचरण भी होता है, तबतक अज्ञानका बन्धन कट गया है, ऐसी बात मानना तो घोर अज्ञान है। जिनका अज्ञानका परदा फट जाता है, वे तो जान-बूझकर भोगासक्त कभी होते नहीं, शास्त्रविरुद्ध आचरण करते नहीं। और जो भोगासक्त होकर शास्त्रविरुद्ध आचरण करते हैं वे अज्ञानसे मुक्त हुए नहीं। याद रखिये, अपने अज्ञानको स्वीकार करना बुरा नहीं है; बुरा तो है अज्ञानान्धकारमें पड़े होनेपर भी अपनेको ज्ञानस्वरूप मानना। यह और भी घोर अन्धकार है। आजकल प्राय: यही हो रहा है, इसीसे साधु-संन्यासियोंमें इतना अनाचार, अत्याचार और व्यभिचार फैला है। ऐसे आचरणोंवाले साधु-संन्यासियोंके कारण धर्म और भगवान्के प्रति जनताकी अश्रद्धा बढ़ती है।
अतएव जनताकी भगवान् तथा परमार्थके मार्गमें श्रद्धा रहे, इसके लिये भी साधु-संन्यासियोंका—जो परमात्माके मूर्तिमान् स्वरूप माने जाते हैं, आचरण परम पवित्र और शास्त्रानुकूल आदर्श होना चाहिये। आपके पत्रमें लिखी सब बातोंका उल्लेख करना उचित नहीं मालूम हुआ; संक्षेपमें आपकी शंकाओंका उत्तरमात्र दे दिया है, इससे कोई लाभ उठा सकें तो मैं अपनेको धन्य समझूँगा।—शेष भगवत्कृपा।