संयुक्त परिवारमें लाभ है
आपका पत्र मिला। आपके प्रेमभरे परिवारको कुछ लोग नष्ट-भ्रष्ट करना चाहते हैं, यह दु:खकी बात है। आप दोनों भाइयोंका परस्पर बड़ा प्रेम है और आपलोग रामायण-पाठ तथा श्रीठाकुरजीकी पूजा किया करते हैं, सो बड़े ही आनन्दका विषय है। आपके छोटे भाईके पुत्र लोगोंके बहकावेमें आकर अनाचार कर रहे हैं, परिवारको हानि पहुँचाते हैं और अलग होना चाहते हैं—यह उनकी भूल है। उनको प्रेमसे समझानेकी कोशिश कीजिये। समझ जायँ तो अच्छी बात है नहीं तो उन्हें अलग कर दीजिये। जो साथ नहीं रहना चाहेंगे उन्हें जबरदस्ती आप कैसे रखेंगे। भगवान्से प्रार्थना कीजिये कि वे उनको सद्बुद्धि दें। शोभा, सुन्दरता और लाभ तो परिवारके संयुक्त बने रहनेमें ही है। पर यदि किसी प्रकार भी यह सम्भव न हो तो नित्यका दु:ख मिटानेके लिये उन्हें अलग कर देना ही श्रेयस्कर है। उन भाईसे भी हमारा अनुरोध है कि वे शान्तिपूर्वक सारी स्थितिपर विचार करें। यदि उन्हें किसी बातसे असन्तोष हो तो उसे प्रकट करके शान्ति तथा प्रेमके साथ उसका निराकरण करा लें। अलग होनेमें तो हानि ही है।