शरणागतिका आदर्श
सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। उत्तर देनेमें बहुत विलम्ब हो गया। कृपया क्षमा करेंगे।
१—अन्त:करणकी शुद्धिका उपाय
आपने अन्त:करण शुद्ध होनेका सुगम उपाय पूछा है। इसके लिये सबसे सुगम उपाय है—भगवान्के नामोंका निरन्तर जप। अन्त:करण अशुद्ध होता है—पाप-वासनाओंसे, आसक्ति, ममता, अहंता आदि दोषोंसे—ये सब अन्त:करणकी मैल हैं। भगवन्नामके पावन जलसे ही यह मैल धुल पाती है। भगवान् सूर्य जिस प्रकार रातके अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार भगवान्का नाम दोष, दु:ख और दुराशाका दलन कर डालता है। तुलसीदासजी कहते हैं—
सहित दोष दुख दास दुरासा।
दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥
जन मन अमित नाम किए पावन।
नाम सकल कलि कलुष नसावन॥
‘नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं।’ इत्यादि।
२—ईश्वरको कैसे पुकारें?
ईश्वरके विरहमें रुदन स्वभावत: होना चाहिये। रोना और हँसना सीखना नहीं पड़ता। अत्यन्त प्रियके विछोहका अनुभव प्राणोंको बरबस रुला देता है। अभी तो हमने संसारके सगे-सम्बन्धियोंको ही प्रिय मान रखा है। धन और भोगोंके प्रति ही हमारा अधिक आकर्षण है। ऐसी दशामें भगवान्के लिये हम व्याकुल कैसे हो सकते हैं? हम जानते हैं और सदा देखते हैं कि धन-भोग क्षणभंगुर हैं—आज हैं, कल नहीं। इसी प्रकार यहाँके सगे-सम्बन्धी, यहाँतक कि यह शरीर भी मृत्युके बाद साथ नहीं देता। सब यहीं रह जाते हैं। जीवको अकेला ही जाना पड़ता है। उस समय भी जीवके नित्य सहचर भगवान् उसके साथ रहते हैं। प्रत्येक समय और प्रत्येक अवस्थामें यदि कोई साथ देता है तो वे हैं परम करुणामय भगवान्। वे सबके घट-घटमें विराज रहे हैं। उनकी दया इतनी है कि वे सबको अपनी शरणमें आनेके लिये स्वयं पुकार रहे हैं, सबको पापों और दु:खोंसे छुटकारा दिलानेकी सान्त्वना दे रहे हैं—
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
एक हम हैं जो भगवान्को पुकारना, उनके लिये रोना तो दूर रहा, उनके प्रिय आह्वानतकको नहीं सुनते या सुनकर भी अनसुना कर देते हैं। जो हमारे आत्माके भी आत्मा हैं, प्राणोंके भी प्राण हैं, जिनसे बढ़कर कोई प्रियतम नहीं है, वे हमसे दूर नहीं हैं। हम उन्हें प्राणमें भी निहार न सकें, अपने प्रेमाश्रुओंसे उनके चरणोंको पखार न सकें—यह कितने दु:खकी बात है। उन्होंने गोपियोंको भी विरह दिया था, इसलिये कि मुझमें उनका निरन्तर प्रेम बढ़ता रहे। हमें भी यह विरह इसलिये मिला है कि हम प्रभुसे मिलनेके लिये रोयें, तड़पें, अश्रुओंके मौक्तिक हारसे उनकी सादर अर्चना करें और पुकारकर कहें—
परमकारुणिको न भवत्पर:
परमशोच्यतमो न हि मत्पर:।
इति विचिन्त्य हरे मयि पामरे
यदुचितं यदुनाथ तदाचर॥
‘हे हरे! आपसे बढ़कर कोई परम दयालु नहीं है और मुझसे बढ़कर कोई शोचनीय नहीं है। यदुनाथ! ऐसा समझकर मुझ पामरके लिये जो उचित हो, वह कीजिये।’
दीर्घाण्यघान्यधिशुचीव भवन्त्यहानि
हानिर्बलस्य शरदीव नदीजलस्य।
दु:खान्यसत्परिभवा इव दु:सहानि
हा! नि:सहोऽस्मिकुरु नि:शरणेऽनुकम्पाम्॥
‘भगवन्! आषाढ़ मासके दिनकी भाँति मेरे पाप बढ़ते चले जाते हैं, शरद्-ऋतुकी नदीके जलकी तरह शारीरिक शक्ति क्षीण होती जा रही है, दुष्टोंद्वारा किये हुए अपमानके समान दु:ख मेरे लिये दु:सह हो गये हैं। हाय! मैं सब तरहसे असमर्थ हूँ, अशरण हूँ; दयामय! मुझपर कृपा कीजिये।’
अज्ञस्तावदहं न मन्दधिषण:
कर्तुं मनोहारिणी-
श्चाटूक्ती: प्रभवामियामिभवतो-
याभि:कृपापात्रताम्।
आर्तेनाशरणेन किन्तु कृपणे-
नाक्रन्दितं कर्णयो:
कृत्वा सत्वरमेहि देहि चरणं
मूर्धन्यधन्यस्य मे॥
‘स्वामिन्! मैं अज्ञानी हूँ, मेरी बुद्धि मन्द है; अत: मैं वैसी मनोहारिणी चिकनी-चुपड़ी बातें नहीं कर सकता, जिनसे आपका कृपापात्र बन सकूँ। मैं तो आर्त हूँ, अशरण हूँ और दीन हूँ; मैंने केवल क्रन्दन किया है। आप इस क्रन्दनपर ही ध्यान देकर शीघ्र दर्शन दीजिये और मुझ भाग्यहीनके मस्तकपर अपने चरणरखिये।’
शरणमसि हरे प्रभो मुरारे
जय मधुसूदन वासुदेव विष्णो।
निरवधिकलुषौघकारिणं मां
गतिरहितं जगदीश रक्ष रक्ष॥
‘हरे! मुरारे! प्रभो! एकमात्र आप ही मेरे आश्रय हैं। मधुसूदन! वासुदेव! विष्णो! आपकी जय हो। नाथ! मुझसे निरन्तर असंख्य पाप होते रहते हैं, मुझे कहीं भी गति नहीं है। जगदीश! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।’
इस प्रकार सच्चे मनसे रोकर, कातर पुकार करनेसे मंगलमय भगवान् अवश्य सुनते हैं।
३—सर्वत्र एवं सबमें ईश्वरको देखनेका उपाय
शास्त्रोंमें सिद्ध है कि भगवान् सर्वत्र हैं, सर्वव्यापक हैं। महात्माओंका भी ऐसा ही अनुभव है। उपनिषदोंमें कहा है— ‘तज्जलानिति शान्त उपासीत।’ अर्थात् परमात्मासे ही जगत्की उत्पत्ति हुई है, उसीमें इसका लय होता है और उसीमें रहकर यह जीवन धारण करता है—इस प्रकारसे शान्तभावसे विचार करे। जो वस्तु जिससे उत्पन्न होकर पुन: उसीमें लीन होती है, वह तद्रूप ही होती है—जैसे घड़ा मिट्टीसे बनता, मिट्टीमें ही रहता और फूटनेपर मिट्टीमें ही लीन होता है; अत: वह मिट्टी ही है। इसी प्रकार जब सब कुछ परमात्मासे ही उत्पन्न होता और उसीमें लीन होता है, तब वह परमात्मासे भिन्न नहीं है। जैसे घड़ा मिट्टीका, कनककुण्डल आदि स्वर्णका रूपान्तर है, उसी प्रकार यह जगत् ब्रह्मका ही रूपान्तर है। तात्पर्य यह है कि परमात्मा ही सब कुछ है। इसीलिये शास्त्र कहते हैं— ‘ब्रह्मैवेदं सर्वम्’, ‘नेह नानास्ति किञ्चन’, ‘वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:।’
भक्तिके सिद्धान्तसे भी सब कुछ भगवान्का ही स्वरूप है; क्योंकि वे ही सबके अन्तरात्मा हैं, समस्त जड-चेतनमें, घट-घटमें व्यापक हैं—‘सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी’, ‘मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।’,‘निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध।’ आदि वचनोंमें इसी सत्यका दर्शन कराया गया है। श्रीमद्भागवतमें कहा है—
खं वायुमग्निं सलिलं महीं च
ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।
सरित्समुद्रांश्च हरे: शरीरं
यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्य:॥
‘आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, प्राणी, दिशाएँ, वृक्ष-वनस्पति, नदी, समुद्र—ये सब-के-सब—भगवान्के शरीर हैं। सभी रूपोंमें स्वयं भगवान् प्रकट हैं—यह सोचकर जड-चेतन जो कोई भी सामने हो उसको अनन्यभावसे प्रणाम करे।’
जब सब कुछ भगवान्में ही है, सब रूपोंमें भगवान् ही प्रकट हैं तथा सबके भीतर भगवान् ही विराजमान हैं, तब कौन-सा ऐसा देश और काल है, जो भगवान्से पृथक् हो। देश और काल भी तो भगवान् ही हैं। ऐसा दृढ़ निश्चय हो जानेपर सबमें सर्वत्र और सर्वदा भगवान्के ही दर्शन होते हैं। ऐसी दृष्टिवाले पुरुषसे भगवान् छिपे नहीं रह सकते। गीतामें वे स्वयं ही कहते हैं—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
४—ईश्वरके अनन्य शरण कैसे हों?
आप लिखते हैं—‘मुझ-जैसा पामर जीव कैसे भगवान्के शरण हो सकता है? इस प्रकार भगवच्छरणागतिकी हार्दिक अभिलाषाका जाग्रत् होना भी भगवान्की ओर जानेमें सहायक होता है। पामर वही है जो भगवान्से विमुख है और साधु वही है, जो भगवान्की ओर सच्चे हृदयसे बढ़ना चाहता है। भगवान् कहते हैं—
‘न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा:।’
‘पापी नराधम मूढ़ मनुष्य मेरी शरणमें नहीं आते।’ अत्यन्त पापी होनेपर भी जो अनन्यभावसे भजनमें लग जाता है, वह साधु ही है—
‘अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: ...........................................॥’
क्योंकि वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है— ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा।’ भगवान् उसके पापोंका नाश करके स्वयं उसे शरणमें ले लेते हैं। ‘सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥’ भगवान्की शरणमें जानेके तीन मुख्य साधन हैं— (१) भगवान्के नामोंका प्रेमपूर्वक जप, (२) बुरे कर्मोंका सर्वथा त्याग, (३) भगवान्की अहैतुकी दयापर पूर्ण विश्वास। यह सब होता रहे तो भगवान् अवश्य और शीघ्र ही अपनाते हैं।
संसारी मनुष्य अपनी इन्द्रियों और शरीरके समस्त अंगोंसे विषयोंका ही स्पर्श तथा अनुभव करता है, किन्तु जो भगवान्के शरणागत हो चुका है उसकी स्थिति कुछ दूसरी ही होती है। उसकी समस्त इन्द्रियोंके विषय केवल भगवान् ही रहते हैं। वह नेत्रोंसे केवल भगवान्की ही झाँकी करना चाहता है और करता भी है। कानोंसे उन्हींका मधुर-मंगलमय नाम, लीला तथा गुणोंकी चर्चा सुनता और सुनना चाहता है। इसी प्रकार प्रत्येक इन्द्रिय तथा प्रत्येक अंगोंसे वह भगवान्की ही प्राप्ति, भगवान्का ही स्पर्श तथा भगवान्की ही सेवा चाहता है। वह अपना सब कुछ भगवान्को अर्पण कर देता है। उसकी अहंता और ममता भी भगवान्के समर्पित हो जाती है। वह भगवान्के हाथोंका यन्त्र बन जाता है। भगवान् जैसे रखें, रहता है; जो करावें, करता है। वह अपने लिये कुछ नहीं सोचता, कुछ नहीं करता। उसकी प्रत्येक चेष्टा भगवान्की इच्छासे ही होती है, भगवान्के लिये ही होती है। सुख हो, दु:ख हो, हानि हो, लाभ हो—उसकी दृष्टिमें सब कुछ भगवत्प्रसाद है। यह स्थिति धीरे-धीरे आती है, किन्तु यही शरणागतिका आदर्श है।