शास्त्रमर्यादाके भंगसे कोई लाभ नहीं
सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपको उक्त देवीजी साक्षात् भक्तिकी मूर्ति प्रतीत होती हैं और आप गुरु-माताके भावसे उनका चरणस्पर्श करना और चरणरज लेना चाहते हैं सो तो ठीक है। परन्तु जब आप उनको गुरु मानते हैं और आपकी उनमें भक्ति है, ऐसा आपका विश्वास है, तब आप उनकी आज्ञा क्यों नहीं मानेंगे? जब आपके द्वारा चरणस्पर्श करनेमें उनको अप्रसन्नता होती है और वे स्पष्टरूपसे आपको ऐसा न करनेका आदेश देती हैं, तब तो आपको उनकी आज्ञा ही माननी चाहिये। आपके मनमें श्रद्धा है तो आप मन-ही-मन उनको प्रणाम कीजिये। इससे कोई आपको नहीं रोक सकता। फिर जब वे कहती हैं कि इसमें उनके पातिव्रतधर्ममें बाधा आती है तब तो आपको बिना विचार उनकी आज्ञा मानकर चरणस्पर्श करनेकी इच्छा ही छोड़ देनी चाहिये। आपका चाहे उनके प्रति कैसा भी गुरु-भाव हो, उनके लिये आप हैं तो पर-पुरुष ही। आपके लिखनेके अनुसार यह ठीक है कि भाई अपनी बड़ी बहिनका और पुत्र अपनी माताका चरणस्पर्श कर सकता है, परन्तु वह तभी, जब कि वैसा कोई शारीरिक सम्बन्ध वास्तवमें हो। फिर वे आपसे उम्रमें भी छोटी हैं। ऐसी हालतमें मेरे खयालमें उनके विचार शास्त्रसम्मत, उचित और माननीय हैं। आपके विचार यद्यपि दूषित बिलकुल नहीं हैं, तथापि केवल भावुकतापूर्ण हैं। अतएव मेरी रायमें आपको सर्वथा उनकी राजीके अनुकूल ही बर्ताव करना चाहिये। इसीमें आपका लाभ है।
मैं तो वर्तमान समयको देखकर और शास्त्रीय मर्यादाकी दृष्टिसे भी यहाँतक कहता हूँ कि किसी बहुत बड़े महात्मा पुरुषका भी चरणस्पर्श किसी सत्-स्त्रीको नहीं करना चाहिये। भक्ति हो तो मन-ही-मन अपनी तमाम वृत्तियोंको लगाकर भी प्रणाम-नमस्कार करनेसे कौन रोकता है। भावुकतावश शास्त्रकी और लोककी आदरणीय मर्यादाका भंग करनेमें कोई लाभ नहीं है, वरं हानिकी ही सम्भावना है। मेरी समझमें गुरुकी शास्त्रविहित आज्ञा माननेमें जितना लाभ है, उतना अन्य क्रियामें नहीं है।