सिनेमाके शौकसे सर्वनाश

आपका पत्र मिला। आपको ‘सिनेमाका बहुत शौक है’ तथा आप ‘कलाकी दृष्टिसे अपने बच्चोंको सिनेमाके क्षेत्रमें प्रवेश कराना चाहते हैं’—लिखा सो भाई साहब! आपकी नीयत बुरी न होनेपर भी आपका बिचार मेरी समझसे हानिकारक ही है। अभी हालमें किसी तामिल पत्रके सम्पादकको किसी ‘सिनेमा-स्टार’ के बाबत अश्लील बातें प्रकाशित करनेके अपराधमें मद्रासके चीफ प्रेसिडेन्सी मैजिस्ट्रेटने जुर्मानेका दण्ड देते हुए कहा है—

‘अश्लीलताके प्रचारमें जब सिनेमा-संस्थाके साथ अपराधीकी तुलना की जाती है, तब उसका अपराध उसकी अपेक्षा साधारण-सा प्रतीत होता है। सिनेमा वर्तमान युगका एक अभिशाप है। उसने माननीय कुलोंकी हजारों कुमारियोंको नाचनेवाली वेश्या और लड़कोंको भाँड़ बना दिया है और उन्हें लाज-शर्म तथा सम्मानके गुणोंसे रहित कर दिया है। सिनेमाका शिक्षा तथा नीति-सम्बन्धी जो कुछ भी मूल्य बतलाया जाता है, वह असलमें इसकी बीभत्सताको ढकनेके लिये है। सिनेमा चलानेवालोंको सामाजिक या नैतिक सुधारकी चिन्ता नहीं है, उनका लक्ष्य तो केवल रुपये कमाना है!’

यह सत्य है कि किसी भी ऐसी कलाका सदुपयोग किये जानेसे समाजका लाभ हो सकता है। जो काम लेख और व्याख्यानोंसे नहीं होता, वह चित्रपटोंसे हो सकता है; परन्तु वह होता तभी है, जब संचालकोंका लक्ष्य वैसा हो। आजकल जिस ढंगसे सिनेमाका प्रसार हो रहा है, उससे तो हमारे बालक-बालिकाओंकी मनोवृत्ति बिगड़ती ही जा रही है। जो सम्भ्रान्त कुलकी हिन्दूकन्या अपना स्वरूप-सौन्दर्य दिखलाना महापाप समझती थी, जिसके लिये यह कहा गया है कि स्त्री जब अपने पतिके पास जाय तभी शृंगार करे, अन्य स्थितिमें शृंगार ही न करे। जिनके सौन्दर्यका प्रकाशन उनके शीलका अपमान माना जाता था, आज उन्हीं आर्यकन्याओंके हृदयमें अपने सौन्दर्यका सचित्र विज्ञापन करनेकी लालसा जाग उठी है और आज वे ही सिनेमा-स्टुडियो आदिमें पर-पुरुषोंके साथ मिलने-जुलने तथा तरह-तरहकी भावभंगिमाएँ दिखलाकर अपना शील खोनेमें गौरव मानने लगी हैं! यह सिनेमाओंके प्रसारका ही दुष्परिणाम है। दु:ख तो यह है कि इसीको कलाके क्षेत्रमें प्रगतिके नामसे पुकारा जाता है और क्षमा कीजियेगा आप भी ऐसी ही प्रगतिके भ्रममें पड़कर ऐसी बुरी इच्छा करने लगे हैं।

इधर तो देशमें अन्नके लाले पड़ रहे हैं—लाखों लोग भूखों मर रहे हैं और उधर सिनेमाओंमें जा-जाकर अमीर-गरीब अपना बेहद धन फूँकते हैं और बदलेमें वहाँसे लेकर आते हैं—कुविचार, कुप्रवृत्ति और कुवासनाएँ। फिर उस धनका कितना दुरुपयोग होता है, कितना मांस, अण्डे, मदिरा और फैशनमें खर्च होता है—इसका हिसाब लगाया जाय तो हृदय काँपने लगता है।

साथ ही धार्मिक भावोंके नर-नारियोंको आकर्षित करनेके लिये हमारे देवी-देवताओंकी, हमारे भगवान् राम और कृष्णकी, हमारी जगज्जननी सीता और राधाकी जब छीछालेदर सिनेमाओंमें की जाती है, हमारी उन प्रात:स्मरणीया और पूजनीया देवियोंका स्वाँग धारण करके जब सिनेमाकी वे कथित कुमारियाँ अश्लील गातीं, अर्धनग्न दशामें प्रणय-चेष्टा करती हुई दिखायी जाती हैं, तब तो धर्मभीरु हिन्दूका खून खौल उठता है। परन्तु हम सब कुछ सह रहे हैं और अपने-आपको शौकसे नरक-कुण्डमें ढकेलकर सुखका सपना देख रहे हैं। मेरी आपको जोरसे सलाह है कि आप सिनेमाका शौक छोड़ दीजिये और अपने बालक-बालिकाओंको उस घृणित क्षेत्रमें प्रवेश करानेकी कल्पनातकको पाप समझकर त्याग दीजिये। आप-जैसे अन्यान्य पिताओंसे भी मेरा यही नम्र निवेदन है।

कड़े शब्द लिखे गये हों तो कृपया क्षमा करें। मेरा हेतु अच्छा है, शब्द चाहे कड़े हों—असलमें कड़वी दवा पिये बिना जोरकी बुखार रुकती भी नहीं।

बुरे लगें हितके बचन, हिये बिचारो आप।

कड़वी भेषज बिनु पिये, मिटै न तनकी ताप॥