सुधार या संहार
सादर हरिस्मरण। आपका कृपापत्र यथासमय मिल गया था। उत्तरमें बहुत विलम्ब हुआ। कृपया क्षमा करें।
हिन्दू-कोड तथा सुधार-सम्बन्धी कानूनोंके सम्बन्धमें आपने अपने जो विचार व्यक्त किये हैं, वे बहुत ठीक हैं। इसके विरोधमें हिन्दू-संस्कृतिके प्रेमियोंको अधिक-से-अधिक प्रचार करना चाहिये। वर्तमान समाचार-पत्रोंमेंसे अधिकांशकी नीति धर्मके विषयमें उदासीन या विद्रोही है। इसीसे ऐसे धर्मविरुद्ध कानून जनताकी जानकारीमें नहीं पहुँच सकते। इस सम्बन्धमें धार्मिक पुरुषोंको प्रयत्नशील होना चाहिये और नये-नये धार्मिक पत्रोंका प्रकाशन करके जनताको स्थितिसे परिचित कराना चाहिये।
आपने नवीन दृष्टिवालोंकी कुछ आपत्तियाँ लिखी हैं। उनके विषयमें मेरे जैसे विचार हैं, नीचे लिखता हूँ—
(१) आर्य-संस्कृति और अन्य संस्कृतियोंमें बहुत अन्तर है। मनुष्य-जीवनमें प्राप्त करनेयोग्य चार पुरुषार्थ माने गये हैं—अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष। आज संसारकी दृष्टि प्रधानतया ‘अर्थ’ और ‘काम’ पर है, परन्तु हमारे शास्त्रोंने धर्म और मोक्षकी प्रधानता बतलायी है। अर्थ और कामको वे धर्मका अनुयायी मानते हैं और उसी अर्थ और कामको मानव-समाजके लिये उपयोगी मानते हैं जो धर्मके अनुकूल हो। अन्य जातियोंमें जो विवाह-विच्छेद और विधवा-विवाह आदि प्रचलित हैं, काम (भोग)-की दृष्टिसे वे अवश्य बड़े उपयोगी जान पड़ते हैं। परन्तु क्या वे जातियाँ भोगप्रवृत्तिको इस प्रकार निरंकुश करके शान्तिका अनुभव कर रही हैं? क्या उनकी भोग और अर्थ-लिप्सा उत्तरोत्तर प्रज्वलित होकर उन्हें अशान्तिकी आगमें जला नहीं रही है? उनका अर्थ और काम भारतीयोंसे बढ़ा हुआ अवश्य है, किन्तु क्या वे उसे पाकर सुखी हैं? यदि उसके कारण उन्हें अशान्ति और प्रतिहिंसा ही हाथ लगी है तो हमें उसकी क्या आवश्यकता है? सच पूछिये तो हमारी आजकी घोर अशान्ति और हिंसा-प्रतिहिंसाका कारण भी केवल धर्मरहित ‘अर्थ-काम’ ही है।
(२) जहाँतक धर्मसे सम्बन्ध है, हमें धर्मशास्त्रकी बातोंको बदलनेका कोई अधिकार नहीं है। बाल-विवाहके द्वारा हमें जो हानियाँ दिखायी देती थीं वह इस व्यवस्थाके कारण नहीं, बल्कि अन्य जातियोंके संसर्गसे देशका वातावरण बदल जानेके कारण थीं। धर्म-दृष्टिसे मनुजीकी व्यवस्था सर्वथा उपयुक्त है। आर्योंने विवाह-सम्बन्धमें पूर्ण पवित्रताका भाव अक्षुण्ण रखनेके लिये ऐसी व्यवस्था की थी। रजस्वला होनेपर बालिकामें कामुकता आ जाती है और वह पुरुषवर्गके प्रति सर्वथा शुद्ध भाव नहीं रख सकती। अब जो सम्बन्ध होता है उसमें बालिका और उसके अभिभावकोंकी दृष्टि वरकी भोग और अर्थ-शक्तिपर रहती है। किन्तु प्राचीन कालमें यह सम्बन्ध धर्म और मोक्षकी सिद्धिके लिये होता था। अब कन्याको एक ‘मित्र’ मिलता है और उस समय ‘आराध्यदेव’ मिलता था। आजकी बालिकाएँ क्या सावित्रीकी तरह एक बार मनसे वरण कर लेनेपर पतिकी अल्पायुका निश्चय हो जानेपर भी उसीको अपना पति बनाना पसन्द कर सकती हैं और राजकन्या होकर सत्यवान्-जैसे वनवासीको वर सकती हैं? उस बाल-विवाहके समय जितनी सती-साध्वी नारियाँ हुई थीं आज वैसी क्यों दिखायी नहीं देतीं? इसके लिये एक दूसरा दृष्टान्त है दत्तक पुत्रका। जो बालक शैशवकालमें गोद लिया जाता है, उसका अपने पोषक माता-पिताओंमें ठीक जन्मदाता माता-पिताओंका-सा भाव रहता है और जो बालक वयस्क होनेपर गोद लिये जाते हैं उनकी दृष्टि गोद लेनेवालोंपर न रहकर उनके धनपर रहती है। यही कारण है कि पूर्वकालमें सती नारियाँ अपने कोढ़ी और भिखमंगे पतिकी भी परिचर्या करती थीं और आजकी सुशिक्षिता देवियाँ विवाह-विच्छेदकी आवश्यकता अनुभव करती हैं! परन्तु किया क्या जाय। विदेशियोंके प्रभावसे देशका वातावरण दूषित हो गया; पुरुष स्वार्थी और भोगी हो गये; इसीसे बेचारी विधवाओंको बड़ा कष्ट होने लगा। नहीं तो, प्राचीन आदर्शके अनुसार तो विधवा एक संन्यासीके समान आदरणीय और पूजनीय हो जाती है। यह विदेशियोंका ही प्रभाव था जिसने उनके जीवनको नष्ट किया और लोगोंको विधवा-विवाह धर्म दिखायी देने लगा। बालिकाका छोटी आयुमें विवाह होनेपर भी तीन या पाँच वर्षमें द्विरागमन होनेसे अल्प-वयस्कताका दोष नहीं रहता था।
(३) अनेकों जातियाँ तो वर्णसंकरता अथवा किन्हीं ऐसे ही कारणोंसे हुई हैं; परन्तु जातियाँ अनेक होनेपर भी वे हैं तो चार वर्णोंके ही अन्तर्गत। विवाह-सम्बन्धको अधिक स्वच्छन्द कर देनेसे भला वर्णधर्मकी कैसे रक्षा होगी? तब तो वर्णसंकरता और भी अधिक बढ़ जायगी। ऐसा करनेसे लोगोंको भोगकी छुट्टी तो मिल जायगी, परन्तु प्राचीन ऋषियोंका जो संयम और पवित्रताका आदर्श है उसे भी अवश्य आघात पहुँचेगा। जिन्हें भारतको पश्चिमके आदर्शपर चलाना है उनकी दृष्टिमें वर्णाश्रम-धर्म भले ही बन्धन हो, परन्तु आर्य-संस्कृतिका तो यही प्राण है। यदि यह नष्ट हो जाता है तो हिन्दू-समाजके संघटनकी विचित्रता ही क्या रहती है? इसीके कारण तो हिन्दूधर्म लाखों वर्ष बीत जानेपर भी अक्षुण्ण बना हुआ है। यदि हमलोग भी अन्य प्राचीन धर्मोंकी तरह सबसे रोटी-बेटीका व्यवहार करनेमें स्वतन्त्र होते तो उन्हींकी तरह आज अस्त हो चुके होते। जो हिन्दू-संस्कृतिको जीवित रखना अनावश्यक समझें वे ही वर्णाश्रम-धर्मके उन्मूलनका विचार कर सकते हैं।
(४) स्त्री-जाति और विधवाओंपर अत्याचार होनेका जो मूल कारण है उसका विचार मैं दूसरे प्रश्नके उत्तरमें कर चुका हूँ। स्त्रियोंको विशेष अधिकार देनेका अर्थ है—उन्हें पुरुषोंसे अलग कर देना। हिन्दू-संस्कृतिने पुरुष और स्त्री दोनोंको मिलाकर एक माना है। अत: पुरुषके अधिकार और सम्पत्तिकी वह पूर्णतया स्वामिनी है, उसे अलग बँटवारा करनेकी आवश्यकता नहीं है। सधवा रहनेपर वह पतिके साथ अभिन्न है और विधवा होनेपर उसके सम्मानपूर्वक निर्वाहका उसके पुत्र एवं अन्यान्य उत्तराधिकारियोंपर पूर्ण दायित्व है। उसे अधिकार देनेका अर्थ है पति और उसके उत्तराधिकारियोंसे उसे स्वतन्त्र कर देना। यह दृष्टिकोण पारस्परिक स्नेहसूत्रके लिये साधक है या बाधक। यह आप स्वयं समझ सकते हैं।
(५) धर्मशास्त्रने युग और कालभेदसे जिन आचरणोंको बदलनेकी आवश्यकता समझी उनके लिये स्वयं ही व्यवस्था कर दी है। उसके लिये किसी कमेटीको परिवर्तन करनेका अधिकार नहीं दिया है। अत: इस प्रकार कानून बनाना सर्वथा धर्मविरुद्ध है।
(६) ऐसे कानूनोंके द्वारा वर्णसंकरता न्याय्य हो जायगी। अब जो लोग समाजकी आँखोंसे छिपकर अथवा कुछ लोगोंकी जानकारीमें भी जो अवैध आचरण करते हैं, उन्हें धर्मदृष्टिसे कोई अच्छा नहीं समझता। आजकल प्रतिष्ठा तो स्वार्थवश पैसेकी की जाती है, उनके आचरणोंकी नहीं। वह भी लोगोंकी दृष्टिमें अधर्म ही है। क्या अधर्मको धर्म मान लेना ही उसके दुष्परिणामसे बचनेका उपाय है? इस प्रकार तो चोरी-व्यभिचार आदि भी कानूनके द्वारा धर्म बनाये जा सकते हैं।
(७) जिनको पिण्डदान नहीं होता वे नरकमें ही जाते हों ऐसी बात नहीं है। स्वयं धर्मवान् होनेपर वे स्वयं भी उत्तम लोक प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु पिण्डदान भी पितरोंकी सद्गतिका एक प्रधान साधन है। उसके द्वारा अधोगतिको प्राप्त हुए पितरोंका भी उद्धार किया जा सकता है। वर्तमान स्प्रिचुअलिस्टोंने इसके प्रत्यक्ष प्रमाण प्राप्त किये हैं। अत: पितरोंकी सद्गतिके लिये इसकी बहुत आवश्यकता है।
(८) वेदोंका मुझे विशेष ज्ञान नहीं है। पर वेदोंमें भी श्राद्धादिका प्रतिपादन अवश्य है। शुक्ल यजुर्वेदकी उत्तर विंशतिमें तो एक ‘पितृसूक्त’ है, उसमें श्राद्धका खूब वर्णन है। पितृतर्पण पंचमहायज्ञोंमें है, जो हिन्दुओंके नित्य कर्मोंके अन्तर्गत है। इससे निश्चय होता है कि वेदोंमें इसका उल्लेख अवश्य है।
इस प्रकार आपकी शंकाओंके विषयमें मैंने संक्षेपमें अपने विचार लिख दिये हैं। आशा है, इनसे आपको कुछ सन्तोष हो सकेगा।