सुधारके नामपर संहार
सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने हमारे लिये लिखा कि ‘आपलोग समाज-सुधारके विरोधी हैं, हजारों वर्षोंकी पुरानी लकीरके फकीर बने हुए उसी गन्दगीमें फँसे रहना चाहते हैं, यह आपकी इच्छा है; पर आप दूसरे लोगोंको, जो उस गन्दगीसे निकलना चाहते हैं, उसमें क्यों रोक रखना चाहते हैं। इस स्वतन्त्रताके युगमें दकियानूसी विचारोंको लादे रखना मूर्खताके सिवा और क्या है।’
इसका उत्तर यह है कि सुधारके हम भी पक्षपाती हैं। जहाँ-जहाँ बुराई आयी हो, वहाँसे उसे अवश्य हटाना चाहिये। परन्तु कोई बात पुरानी है, इसीलिये बुरी है और उसे नष्ट करना ही सुधार है, ऐसा मानना हमारी समझसे एक बड़ी भ्रान्ति है। सबसे बड़ा सुधार है—अपने मानस रोगोंको मिटाना। हम दूसरोंका सुधार करने जाते हैं, मनमें गन्दे विचारोंको भरकर। तब हम उनको क्या देंगे? हमारे अन्दर जो गन्दगी भरी है, उसीका वितरण करेंगे। सबसे पहले हमें करना चाहिये—आत्मसुधार। आत्मसुधारका अर्थ है अपने मनमें दैवी सम्पत्तिको भरना और फिर प्रत्यक्ष क्रियाके द्वारा उसका सर्वत्र वितरण करना। याद रखना चाहिये—भाषणकी अपेक्षा क्रियाकी शक्ति प्रबल होती है और उसकी आवाज भी कहीं ऊँची तथा गहरी होती है। आज लोग सुधारके नामपर उन्मत्त हैं। आपने सुधारोंकी जो सूची दी है, वह तो वस्तुत: संहार है, सुधार नहीं। आपकी सूचीकी कुछ प्रधान बातें ये हैं—‘जाति-पाँति मिटा दी जाय; अन्तर्राष्ट्रीय विवाह हो; विवाहके बन्धनोंको ढीला किया जाय, यदि विवाह न होकर स्वेच्छानुकूल स्त्री-पुरुष प्राकृतिक रूपसे मिलें तो और भी श्रेष्ठ; यज्ञोपवीत नहीं पहना जाय; हिन्दू-मुसलमानकी पृथक्ता बतलानेवाले चिह्न जैसे चोटी आदि हैं, वे न रखे जायँ; स्त्रीको तलाकका अधिकार हो; पूजा-पाठ बन्द कर दिया जाय; तीर्थोंको न माना जाय; शास्त्रोंको न माना जाय; सत्य-अहिंसादिकी अपेक्षा तुरन्त फल देनेवाली कपट, घृणा, द्वेष, असत्य तथा हिंसाकी क्रियाओंको आजके पीड़ित समाजमें प्रधानता दी जाय; कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) भावोंका खूब प्रचार हो; रूसके आदर्शानुसार भगवान्को न माना जाय; क्रान्ति और संघर्षको जीवनका प्रकाश बनाया जाय और पुरोहित तथा धनिक वर्गका समूल उच्छेद हो।’
हम तो इनमेंसे अधिकांश बातोंको प्रत्यक्ष संहार मानते हैं। सुधारके नामपर यदि इस संहारको अपनाया गया तो इससे भारतीय संस्कृतिकी जड़ ही कट जायगी। इस मानेमें हमें लकीरके फकीर तथा गन्दगीमें फँसे रहनेवाले बतलाया जाय तो हमें सहर्ष स्वीकार है। हम ऐसे सुधारमें महान् हानि समझते हैं इसलिये दूसरे लोगोंको भी इसके न माननेके लिये कहते हैं और ऐसा करना अपना धर्म समझते हैं।
स्वतन्त्रताका अर्थ उच्छृंखलता नहीं है, स्वतन्त्रता तो संयम सिखाती है। जहाँ मनमाना आचरण करनेमें स्वतन्त्रता मानी जाती है, वहाँ तो उच्छृंखल यथेच्छाचार है और ऐसी उच्छृंखलताका तो नाश ही समाजके लिये कल्याणकारी है!
हम तो प्रत्येक क्रियाको इस कसौटीपर तौलना चाहते हैं कि उसके परिणाममें कर्ताका तथा दूसरोंका अहित है या हित। ‘जिस क्रियाका परिणाम अपना तथा दूसरोंका हित है, वह पुण्य है; और जिसका परिणाम अपना तथा दूसरोंका अहित है, उसका नाम पाप है।’ पाप-पुण्यकी इस परिभाषाके अनुसार सत्य-अहिंसादिका आचरण और भगवान्की सत्ताको मानना आवश्यक होता है। भगवान्को माने बिना तथा सत्य-अहिंसादि दैवी गुणोंका आचरण किये बिना ऐसी क्रिया हो ही नहीं सकती, जिसका निश्चित परिणाम दूसरोंके लिये और फलत: अपने लिये कल्याणकारी हो। स्वतन्त्रताके नामपर चलनेवाली उच्छृंखलता, सुधारके नामपर होनेवाला संहार और क्रान्तिके नामपर विस्तार पानेवाली भ्रान्ति तो पुण्यके नामपर पापको ही प्रश्रय देती है और उसीके आचरणमें प्रवृत्त करती है, जिसका निश्चित फल अकल्याण या दुर्गति है।
जहाँ सुधारकी आवश्यकता हो, वहाँ सुधार अवश्य करना चाहिये; परन्तु पुरानी वस्तुमात्रको ही विष समझना तो बहुत बड़ी भूल है। इस भूलसे भगवान् सबको सदा बचाते रहें।