स्वधर्मयुक्त स्वराज
सादर हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। कई कारणोंसे उत्तर लिखनेमें देर हुई, इसके लिये क्षमा करें। आपने लिखा कि ‘इस समय तो तमाम भारतवासियोंको सब कुछ भूलकर स्वराजसाधनामें लग जाना चाहिये। जबतक स्वराज न होगा, तबतक कोई भी धार्मिक या आध्यात्मिक लाभ नहीं हो सकता। कल्याणके द्वारा भी इस समय स्वराज-साधनाकी ध्वनि निकलनी चाहिये’ आदि-आदि।
आपने जिस शुद्ध भावसे यह सलाह दी है, इसके लिये मैं आपका कृतज्ञ हूँ। इस बातको मैं मानता हूँ कि भारतवर्षको राजनीतिक स्वतन्त्रताकी बड़ी आवश्यकता है और वह शीघ्र-से-शीघ्र मिलनी चाहिये तथा यह भी किसी अंशमें सत्य है कि स्वराजके बिना धार्मिक और आध्यात्मिक प्रगति भी रुकती है। अँग्रेजोंकी कूटनीतिसे भारतका बड़ा अहित हुआ है, अत: इनके चंगुलसे छूटना बहुत ही जरूरी है; इसलिये स्वराज-साधनमें जो महानुभाव लगे हुए हैं, उनके प्रति मेरी बड़ी श्रद्धा है। उनके प्रति श्रद्धा रखते हुए तथा आपकी सलाहके लिये आपको धन्यवाद देते हुए ही मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ कि भारतवर्षकी संस्कृतिमें उसके सच्चे ‘स्व’ भगवान् हैं। भगवान्को न भुलाकर भगवान्की सेवाके लिये जो कुछ भी और जितनी कुछ भी लौकिक उन्नति की जाय, सभी श्रेष्ठ है। यही भारतवर्षका स्वधर्म है। असलमें भारतका लक्ष्य यह स्वधर्म है, स्वराज नहीं। मान लीजिये यदि भगवान्के आश्रयरूप धर्मको हमने छोड़ दिया—विधर्मीय और विजातीय संस्कृतिको अपना लिया और उसीकी छत्रच्छायामें स्वराज पाया तो वस्तुत: उसका नाम स्वराज होनेपर भी वह होगा पर-राज्य ही। समाज, स्वदेश, साहित्य, साम्राज्य, स्वराज्य सभीकी उपादेयता है और सभीकी आवश्यकता है, परन्तु है इनके यथार्थ स्वरूपमें ही। ‘कल्याण’ इसी भगवदाश्रयरूप स्वधर्मका प्रचार करना चाहता है और इसीके आधारपर हृदयसे राजनीतिक स्वतन्त्रता भी चाहता है।
हम कुछ भी काम करें, हमारा लक्ष्य होना चाहिये भगवान्। और हमारे सभी कामोंमें भगवान्की सेवाका भाव रहना चाहिये। हमारा कर्तव्य ही है भगवान्की प्रीतिकामनासे कर्म करना। संसारमें हम जो कुछ भी देख रहे हैं, सब भगवान्का ही पसारा है, उन्हींकी लीला है। भगवान् ही इसमें ओतप्रोत हैं, यह समझकर ही हमें स्वराज-साधनामें लगना चाहिये।
इससे आप यह न समझें कि मैं स्वराजका विरोधी हूँ। मैं स्वराजका विरोधी नहीं, मेरा विरोध तो भगवद्-विमुखतासे है। और मैं जब अपने शुद्धभावसे अन्तरात्माका यही आदेश पाता हूँ और इसीमें समाज, देश और विश्वका कल्याण देखता हूँ, तब दूसरी बात कैसे कहूँ। आशा है आप मेरे इस वक्तव्यका सीधा अर्थ ही लेंगे।