स्वाधीनताके नामपर उच्छृंखलता

सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। जहाँतक मेरी समझ है, आप जिस प्रकारकी स्वाधीनता चाहते हैं, वह स्वाधीनता नहीं है, वह तो उच्छृंखलता है। स्वाधीनता मानवताकी रक्षा करती है, मानवको देवत्वमें ले जाती है और उसे कल्याणपथपर आरूढ़ कराके जीवनके परम लक्ष्यतक पहुँचा देती है। परन्तु उच्छृंखलता तो ऐसा धक्‍का लगाती है कि ऊपर उठा हुआ मनुष्य भी नीचे गिर जाता है। मन-इन्द्रियोंपर स्वामित्व हो जाना ही वास्तविक स्वाधीनता है। कड़े-से-कड़े संयम-नियमोंके पालनमें भी मन-इन्द्रिय कभी विद्रोह न करें, परन्तु सुसंस्कृत और सुशिक्षित आज्ञाकारी सेवककी भाँति सुचारुरूपसे आत्माकी प्रत्येक आज्ञाका भलीभाँति अनुसरण करें, तभी मनुष्य स्वाधीन कहला सकता है। ‘व्यक्तिगत स्वातन्त्र्य’ के नामपर शास्त्रकी विधियोंका और संयम-नियमका उल्लंघन करना तो लक्ष्यभ्रष्ट होकर उलटे सर्वथा परतन्त्र बनना है। जो लोग यथेच्छाचारको स्वतन्त्रता कहते और किसी भी नियमको न मानकर मनमाने आचरणको परम पुरुषार्थ समझकर गर्व करते हैं, वे परतन्त्रताकी कठिन बेड़ीसे कभी नहीं छूट सकते। आज हिन्दूजातिमें यह दोष बहुत बड़े रूपमें आ गया है, खास करके सुशिक्षित कहलानेवाले युवक-समुदायमें। इसीसे आज हिन्दूजाति पद-पदपर तिरस्कृत और लांछित हो रही है। इसमें न वीरता है, न बुद्धिमत्ता। मौलाना अबुल कलाम आजाद साहेब काँग्रेसका सभापतित्व करते समय भी नमाजका वक्त होनेपर सारी कार्यवाही बन्द करके नमाज पढ़ने चले जाते थे। उनमें धर्मके नियमकी पाबन्दी है, परन्तु आज सन्ध्या-वन्दनके लिये कौन हिन्दू ऐसा करता है!

खान-पानके कुछ विशेष नियम हिन्दुओंकी परम्परागत निज सम्पत्तिके रूपमें हैं। आज हिन्दू उन्हें उदारताके नामपर तिलांजलि देकर सबकी जूँठन खाने तथा अभक्ष्य भक्षण करनेके लिये ललचा रहे हैं। घरके नियम उन्हें बहुत बुरे मालूम होते हैं, परन्तु इससे क्या कभी प्रेम हो सकता है? पाण्डव-कौरव तो भाई-भाई थे। एक ही घरमें जन्मे और साथ-साथ खा-पीकर बड़े हुए थे; परन्तु दोनोंमें महान् भयंकर युद्ध हुआ। यूरोप-अमेरिकाके लोगोंमें तो साथ खाने-पीनेमें कोई भी परहेज नहीं है; फिर भी उनमें दो महायुद्ध तो हो गये और तीसरेका उद्योगपर्व चल रहा है। प्रेमका सम्बन्ध तो मनसे है। जबतक मनमें भेदज्ञान है—जबतक मन बेमेल है, तबतक बाहरी खान-पानकी एकतासे कुछ भी नहीं हो सकता।

यही बात स्पर्शके सम्बन्धमें है। हिन्दू आचारके अनुसार रजस्वला माताका भी स्पर्श नहीं किया जा सकता; परन्तु इससे माताके प्रति भक्तिमें कोई कमी थोड़े ही आती है। हिन्दू आचारमें अपने ही किसी अंग—जैसे मस्तक, कान आदिका स्पर्श करके पवित्र होना माना जाता है, तो किसी अंगका—गुदा, उपस्थ आदिका स्पर्श करके हाथ धोनेका विधान है। पर इससे क्या उन अंगोंके एक ही शरीरके विभिन्न एक-से-एक बढ़कर प्रिय अवयव होनेमें कभी कोई बाधा आती है? इसी प्रकार अन्त्यज भाई विराट् हिन्दू-शरीरके अत्यावश्यक अभिन्न अवयव हैं। अन्यान्य अंगोंकी भाँति ही परम प्रिय हैं; परन्तु उनका यह प्रेम केवल स्पर्शमें ही नहीं समाया है। आज भी अम्बेदकरी अन्त्यज भाई महात्मा गाँधी-सरीखे अन्त्यज-प्रेमी पुरुषका विरोध करते हैं और कहा जाता है—कहीं तो उनकी कुटियातकपर उन्होंने हमला कर दिया था। असलमें प्रेम मनसे होता है और वही असली प्रेम है। बाहरके व्यवहारमें विषमता और आत्मामें समता अनिवार्य है। क्योंकि आत्मा नित्य सम और एक है तथा व्यावहारिक सृष्टिकी उत्पत्ति ही प्रकृतिके वैषम्यको लेकर हुई है।

जो लोग प्रकृतिके इस वैषम्यको मिटाकर शास्त्रके नियमोंका उल्लंघन कर स्वाधीनताके नामपर स्वेच्छाचार करना चाहते हैं, वे वास्तवमें स्वाधीनताके यथार्थ तत्त्व और महत्त्वको ही नहीं समझते।