उपयोगितावाद

प्रिय महोदय! सादर हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद! आपने गाय-बैलोंकी रक्षाका आधार उनकी उपयोगिताको ही माना है। ‘गाय दूध देती है, उसके बछड़े बैल बनकर खेती और बोझ ढोनेके काममें आते हैं; अतएव उनकी रक्षा आवश्यक है। इस उपयोगिताको ध्यानमें रखकर ही उनकी रक्षाको धर्म और हिंसाको पाप माना जाता है। बकरीके बच्चे विशेषत: उसके नर-बच्चे मनुष्यके लिये वैसे उपयोगी नहीं हैं। अत: उनकी रक्षा क्यों की जाय?’ यह आपका प्रश्न है।

किसी भी जीवका क्या उपयोग है, यह उसके निर्माता ही जान सकते हैं। जिन परमेश्वरने विविध जीवोंकी तथा सम्पूर्ण जगत‍्की सृष्टि की है, वे ही सबका उपयोग जानते हैं। कौन जीव कब उत्पन्न हो, कबतक रहे और कब उसका उपयोग समाप्त होकर उसका अन्त हो जाय—ये सभी बातें परमेश्वरके ज्ञानमें हैं; अत: वे ही जीवके स्रष्टा, पालक और संहारक हैं। जो जन्म देता है, वही मार भी सकता है। दूसरेको क्या अधिकार है कि वह दूसरोंकी वस्तु नष्ट करे। उपयोगिताकी दृष्टिसे ही यदि रक्षा की जाय तो जीर्ण रोगीका पालन अनावश्यक होगा। बूढ़े माता-पिताकी भी रक्षा आवश्यक नहीं मानी जायगी तथा बूढ़ी गाय और बैलको मार डालनेमें कोई दोष नहीं समझा जायगा। यह उपयोगितावाद भारतीय दृष्टि नहीं है, पाश्चात्य पद्धति है। इसलिये वहाँके लोग मांसके लिये गौ आदि पशुओंका वध कर डालते हैं।

भारतीय दृष्टिकोण दूसरा है। यहाँ यह नहीं सोचा जाता कि दूसरे जीव हमारे लिये कितने उपयोगी हैं। अपितु यह सोचा जाता है कि दूसरे लोगों या जीवोंके लिये हम कितने उपयोगी हो सकते हैं। इसीलिये भारतसम्राट् दिलीपने एक गायकी प्राणरक्षाके बदले अपने शरीरको निर्जीव मांसपिण्डकी भाँति सिंहको समर्पित कर दिया—

उपानयत् पिण्डमिवामिषस्य।

स्वार्थमूलक प्रवृत्ति तो प्राणिमात्रमें समान है। मनुष्यकी यही विशेषता है कि वह धर्म कर सकता है। उसके कर्म यज्ञार्थ हो सकते हैं। स्वयं किसीसे सेवा या स्वार्थसाधन न कराकर सदा दूसरोंकी सेवा और सहायता करना परोपकार अथवा यज्ञ है। सबमें भगवद्दृष्टि रखकर सबकी सेवाको भगवान‍्की सेवा मानकर सदा परहित-साधनमें संलग्न रहना ही मानवताका उच्चतम आदर्श है। ऐसे व्यवहारसे मानव देव बनता है। नर नारायणका सखा बन जाता है। नारायणस्वरूप हो जाता है। और इसके विपरीत स्वार्थमूलक आसुरी वृत्तियोंको प्रश्रय देनेवाला मानव दानव हो जाता है, मानवताके बहुत नीचे गिर जाता है।

जो विश्वनियन्ता परमेश्वरके लिये उपयोगी हो, उसके बनाये हुए विश्वके संरक्षणमें जिसका उपयोग हो सके, वही वस्तुत: उपयोगी है और यही सच्चा उपयोगितावाद है। इसमें स्वार्थ हेय है और परार्थ एवं परमार्थ ध्येय। मनुष्य जब यह सोचता है कि अमुक जीव उपयोगी है या नहीं, तब वह अपनेको ही सामने रखता है। तात्पर्य यह कि जो मेरे अपने लिये उपयोगी है, उन्हींका यहाँ रहना सार्थक है। इसीलिये एक स्वार्थान्ध मनुष्य दूसरे मनुष्यका, अपने ही भाईका भी खून कर डालता है। क्या मनुष्यके लिये उपयोगी होना ही उपयोगिता है? यदि मनुष्यके लिये अनुपयोगी होनेके कारण दूसरे जीव समाप्त किये जा सकते हैं तो दूसरे समस्त जीवोंके लिये अनुपयोगी होनेके कारण मनुष्य-जातिको ही क्यों न समाप्त कर दिया जाय? मनुष्यके पास इसका क्या उत्तर है? वह कभी अपनेको घाटेमें नहीं रखना चाहता और इसीलिये वह दूसरोंके प्रति न्याय नहीं कर सकता।

अतएव हमारे यहाँ व्यक्ति अथवा मनुष्यकी इच्छाको प्रधानता न देकर कर्तव्य-अकर्तव्यके निर्णयमें शास्त्रको प्रमाण माना गया है। गीतामें स्वयं भगवान‍्का कथन है—

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

शास्त्र भगवान‍्की आज्ञा है—

श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे।

इन आदेशोंका वीतराग महर्षियोंने संकलन किया है, जो धर्मनिष्ठ थे। स्वार्थमयी प्रवृत्तियोंसे ऊँचे उठकर मानवताके उच्चतम आदर्शमें—देवत्वमें सुप्रतिष्ठित थे, अत: शास्त्रीय आज्ञाओंके पालनसे न केवल मानवका ही, अपितु सम्पूर्ण जीव-समुदायका, समस्त जड़-चेतनमय जगत‍्का कल्याण हो सकता है। शास्त्रकी यह स्पष्ट आज्ञा है—‘मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि’ किसी भी जीवकी हिंसा न करो।

जबतक हृदयमें स्वार्थभावना डेरा डाले हुए है, तबतक केवल उपयोगितावादका सहारा लेनेवाला घोर अन्धकारमें ही गिरेगा। अत: कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको वैसे कुतर्कोंसे बचना और शास्त्रीय आदेशोंके पालनमें दत्तचित्त रहना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।