उत्कट इच्छासे ही भगवत्प्राप्ति होती है

सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। उत्तरमें निवेदन है कि भगवत्प्राप्तिका सबसे प्रथम और परम आवश्यक साधन है भगवत्प्राप्तिकी उत्कट इच्छा—ऐसी इच्छा कि जैसे प्याससे मरते हुए मनुष्यको जलकी होती है। इस प्रकारकी तीव्र और अनिवार्य आवश्यकता उत्पन्न हो जानेपर—जैसे प्यासेको जलका अनन्य चिन्तन होता है और जल मिलनेमें जितनी ही देर होती है, उतनी ही उसकी व्याकुलता बढ़ती है, वैसे ही भगवान‍्का अनन्य चिन्तन होगा और भगवान‍्के लिये परम व्याकुलता होगी। इससे सहज ही भगवान‍्की प्राप्ति हो जायगी। याद रखना चाहिये, भगवान् किसी कर्मके फलरूपमें नहीं प्राप्त होते, वे तो प्रबल और उत्कट इच्छा होनेपर ही मिलते हैं। ऐसी इच्छा होनेपर अपने-आप ही सारे कर्म उनके अनुकूल हो जाते हैं और उसकी प्रत्येक चेष्टा भक्ति बन जाती है। फिर वह यज्ञ, दान, तप आदि शास्त्रीय और खाना-पीना, सोना-उठना, चलना-फिरना, कमाना-खोना आदि लौकिक—जो कुछ भी करता है, सब स्वाभाविक ही भगवान‍्के लिये करता है। क्योंकि भगवान् ही उसके परम आश्रय, परम गति और परम प्रियतम होते हैं। उसकी सारी आसक्ति, ममता और प्रीति सब जगहसे सिमटकर एकमात्र अपने प्राण-प्राण श्रीभगवान‍्के प्रति ही हो जाती है। वह अनवरत उन्हींका स्मरण करता रहता है। भगवान् जब इस प्रकार उसकी व्याकुल इच्छाको देखते हैं, तब सहज ही आकर्षित होकर उसके सामने प्रकट हो जाते हैं और उसे अपने अंकमें लेकर अपने हृदयसे लगाकर सदाके लिये निहाल कर देते हैं। भगवान‍्ने कहा है—

अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।

तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥

(गीता ८। १४)

‘जो मनुष्य अनन्यचित्त होकर नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उस नित्य मुझमें लगे हुए योगीके लिये मैं सुलभ हो जाता हूँ, वह मुझे सहजमें ही प्राप्त कर लेता है।’

आपने लिखा कि ‘मैं अपने जीवनका प्रत्येक कार्य भगवान‍्का समझकर ही करूँ—ऐसा क्योंकर हो सकता है?’ इसके उत्तरमें पतिव्रता पत्नीका उदाहरण हमारे सामने है। वह पतिके चरणोंमें आत्मनिवेदन कर अपने पृथक् अस्तित्वको और अपनी पृथक् आवश्यकताको सर्वथा मिटा देती है एवं जीवनभर जो कुछ करती है, सब पति-सुखके लिये ही करती है। इसी प्रकार भगवान‍्के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण कर देनेपर सहज ही उसका प्रत्येक कार्य भगवान‍्के लिये ही होता है। उसका कोई पृथक् प्रयोजन ही नहीं रह जाता। वह जीता है भगवान‍्के लिये और मरता है भगवान‍्के लिये। वह अपने प्रत्येक श्वासमें प्रत्येक चेष्टासे केवल भगवत्कार्य ही करता है। ऐसे आत्मसमर्पित भक्तका हृदय और उसका पवित्र शरीर भगवान‍्के निर्बाध लीलाक्षेत्र बन जाते हैं। उनके द्वारा भगवान‍्की ही लीला होती है। ऐसे भगवद‍्गतप्राण महात्मा ही भगवान‍्के सच्चे सन्देशवाहक होते हैं और अपने सहज सदाचरणोंके द्वारा अनायास ही जगत‍्के जीवोंको पवित्र भगवद्धाममें पहुँचानेका पावन प्रयास करते रहते हैं। उनकी मूक शिक्षासे जगत‍्का जैसा कल्याण होता है वैसा लाखों-करोड़ों भाषणों, लेखों और प्रचार-कार्योंसे कदापि नहीं हो सकता।

आपने अपने लिये आवश्यक कार्य पूछा, सो सबसे बढ़कर आवश्यक कार्य आपके, मेरे तथा प्रत्येक मनुष्यके लिये यही है कि वह मानव-जीवनके परम और चरम लक्ष्य भगवत्प्राप्तिको समझे और सावधानीके साथ तत्पर होकर उसीकी साधनामें संलग्न हो जाय।