वर्तमान राजनीतिका स्वरूप
प्रिय भाई! सप्रेम हरिस्मरण। तुम्हारा पत्र मिला। मैं भी तरुण अवस्थाके प्रारम्भसे ही राजनीतिक जगत्के किसी एक कोनेमें था। बीसों वर्ष उसमें बीते भी। परन्तु भगवान्की प्रेरणासे उसमेंसे निकलकर दूसरे क्षेत्रमें आना पड़ा। यह बुरा हुआ या अच्छा, इसका निर्णय करनेका मेरा काम नहीं, न निर्णय जाननेकी इच्छा ही है। परन्तु इतना मैं अनुभवसे कहता हूँ कि उस समयकी राजनीतिसे इस समयकी राजनीति बहुत नीचे स्तरपर आ गयी है। उसमें केवल त्याग था। उस समयके युवक केवल नींवके पत्थरोंकी भाँति अपना निस्तब्ध बलिदान करते थे। उनके सामने न कोई प्रलोभन था, न उनके लिये कोई पुरस्कार था। मिलता था समाजसे अपमान और तिरस्कार, जिसको वे सानन्द पी जाते थे और मरणोन्मादमें झूमते हुए अपनेको मिटा देते थे। आजका राजनीतिक जगत् उससे सर्वथा जुदा है। मैं इस सम्बन्धमें तुम्हें कोई उपदेश नहीं दे सकता; क्योंकि मैं इस क्षेत्रसे प्राय: सर्वथा अलग हूँ। वर्तमान राजनीतिके स्वरूपकी जरा-सी झाँकी करानेके लिये ‘World-birth’ के अनुभवी लेखक श्री Shaw Desmond के कुछ वाक्योंका यहाँ अनुवाद देता हूँ; इनको पढ़कर तुम जिस उलझनमें आज पड़े हो, उसका कारण जान सकोगे और अपने लिये कोई मार्ग भी शायद चुन सकोगे।
‘घुड़दौड़की भाँति राजनीतिमें भी कई ऐसी बातें हैं जो मनुष्यको नीचेके स्तरमें फेंक देती हैं। वे अच्छे मनुष्यको बुरा और बुरेको और भी पतित बना देती हैं। वे यौवनकी तीव्रताको कुण्ठित तथा जीवनके लिये आवश्यक वस्तुओंके भावात्मक मूल्यको कम कर देती हैं। इसका कारण उस मेघके टुकड़ेके समान बिलकुल स्पष्ट है, जो सूर्यको ढक लेता है। हमारी आजकी राजनीति भी सदाकी भाँति अधिकारपरक है।’*
कूटनीतिकी चालोंसे अनभिज्ञ और आदर्शवादके उत्साहसे परिपूर्ण आगे बढ़नेके लिये उत्सुक तरुण राजनीतिज्ञ अपने दल या समुदायके तत्त्वावधानमें कांग्रेस, पार्लियामेंट या प्रतिनिधि सभामें चुन लिये जानेके पश्चात् तुरन्त ही अपने-आपको एक उलझनमें पाता है।
उसे चुनावमें सफलता प्राप्त करनेके लिये पहलेसे ही सत्यको छिपाने और झूठे वादे करनेकी मोहक कलामें निपुण कर दिया जाता है। पुराने अनुभवी खूँसट उसे बतलाते हैं कि इस पृथ्वीमण्डलमें ऐसा कोई मनुष्य है ही नहीं, जो सत्यपूर्ण सत्य, केवल सत्य बोलकर सफल हो सके।
अब उसके सामने दो ही मार्ग हैं—या तो वह दलके नेताओंके—पुराने खूँसटोंके विरुद्ध—जो न तो इस जीवनमें और न मरणके बाद ही उसे क्षमा करेंगे—खड़ा हो और अपनेको मंचके पीछे नेपथ्यमें फेंका हुआ पावे, जहाँसे वह अपनी तरुणावस्थाकी उत्सुकतापूर्ण आवाजको सुनानेके लिये कोई अवसर ही नहीं पा सके या वह उन नेताओंकी हाँ-में-हाँ मिलानेवाला होकर रहे, जिससे अन्तमें कदाचित् वह प्रभुताके प्रसादसे पुरस्कृत किया जावे। आम या इमली—दोनोंमेंसे वह जो चाहे पसन्द कर ले। यदि आदर्शवादके पीछे पड़कर वह इस पुराने यन्त्रसे लड़नेकी ठानेगा तो उसपर उस यन्त्रके बाहरी बेलनका इतना दबाव पड़ेगा कि उसे पिस जाना पड़ेगा और वह इतनी फुर्तीसे बाहर फेंक दिया जायगा कि उसको इसका पता भी न चलेगा कि मैं कहाँसे कहाँ आ गया। पर यदि वह उन पुराने अनुभवी खूँसटोंका होकर चलेगा तो उसे उनके द्वारा प्रोत्साहन मिलेगा और फलत: जैसे बुढ़ापा जवानीको नष्ट कर देता है, वैसे ही वह भी बर्बाद हो जायगा।
क्या हमें आदर्शवादके ऐसे भक्त तरुण नहीं मिले हैं, जिन्होंने अपने एक समयके आदर्शवादके प्रेमको ठुकराकर अपने-आपको प्रभुत्व और विशेषाधिकारके बदलेमें बेच डाला है?..... खेदकी बात है कि कई बार उन्हें ऐसा करते बड़ी प्रसन्नता होती है।.....क्या अन्तमें उनको ऐसे पद तथा प्रभुत्वसे पुरस्कृत होते नहीं पाया है जिससे वे इस लोक और परलोक दोनोंमें शाश्वत नारकीय यातनाएँ भोगते रहे हैं?’*
यह आजकी राजनीतिका स्वरूप है, गहरी नजरसे देखोगे तो तुम्हें इस समय भारत, यूरोप और अमेरिका आदि सभी देशोंमें इसीके विविध रूप दिखायी देंगे। अब सोच लो तुम्हें क्या करना है।