वर्तमान संकट और ईश्वर

सादर सप्रेम भगवत्स्मरण! आपका पत्र मिला। अकाल आदिसे पीड़ित गरीब दु:खी मानवोंकी यन्त्रणाका विचार करके आपके हृदयमें जो वेदना हुई है, उसे आपने बहुत ही प्रभावशाली वाणीमें अंकित किया है। वास्तवमें लाखों नर-नारियोंपर जो एक साथ ही विपत्तिके पहाड़ टूट पड़े हैं, इससे प्रत्येक सात्त्विक विचारवाले सहृदय मनुष्यके हृदयमें अत्यन्त दु:ख हुआ है। न्यायी और दयालु, सर्वशक्तिमान् ईश्वरके राज्यमें ऐसा अनर्थ क्योंकर सम्भव हुआ? यह प्रश्न आज बड़े-बड़े बुद्धिमानोंको भी धैर्यसे विचलित किये देता है। मेरी आपके साथ पूर्ण सहानुभूति है और मैं आपके लिखे अनुसार इस समस्यापर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहता हूँ।

इसमें सन्देह नहीं कि इधर गत चार-पाँच वर्षोंसे चारों ओर भीषण नरसंहार हो रहा है। बंगालके अकालकी भीषण यातना भी किसीसे छिपी नहीं है। एक ओर क्षुधाकी ज्वालामें जलते हुए लाखों-करोड़ों गरीबोंका हाहाकार और दूसरी ओर कुछ मुट्ठीभर मुनाफाखोरोंको खाते-खाते अजीर्ण होना भी सबके सामने है। यह माननेमें भी कोई संकोच नहीं कि आधुनिक साम्राज्यवाद और पूँजीवाद भी इस भयानक परिस्थितिको लानेमें विशेष सहायक हुआ है, पर वर्तमान राजनीति और पदलोलुपता भी कम हेतु नहीं हैं।

अब प्रश्न यह है कि इन करोड़ों नर-नारियोंको यह दुर्दशा क्यों भोगनी पड़ी? इस तरहके संकटोंका वास्तविक कारण क्या है? इसकी निवृत्तिका उपाय क्या है? यदि ईश्वरके देखते-देखते ऐसी बातें हुईं तो वह निर्दयी और अन्यायी सिद्ध होता है अथवा उसका अस्तित्व ही धोखा है। आजतक विद्वान् लोग जो पूँजीपतियोंके हाथके खिलौने रहे हैं, ईश्वरकी कल्पना करके जनताको धोखा देते आये हैं, उनके साथ उन्होंने गद्दारी की है। क्या ऐसा मानना ठीक है?

आइये, हम और आप मिलकर इसपर ठण्डे दिलसे विचार करें। आपने अपने पत्रमें जिस भीषण नर-संहारकी चर्चा की है, वह अकाल; युद्ध या साम्प्रदायिक संघर्ष आदि कारणोंसे हुआ है। अत: इसका उत्तरदायित्व जिन लोगोंपर है उनके प्रति आप अपना रोष प्रकट करते हैं; परन्तु जब अतिवृष्टि या अनावृष्टिके कारण अकाल पड़ते हैं और उनमें लाखों-करोड़ों जीवोंकी मृत्यु होती है, उसका उत्तरदायित्व किसपर होगा? बाढ़में हजारों गाँव बह जाते हैं। प्लेग और हैजेके भीषण प्रकोपसे लाखों मनुष्य कालके गालमें एक साथ ही चले जाते हैं। यों भी नाना प्रकारके रोग, शोक, दु:ख, जरा, मृत्यु, स्वजन-वियोग आदि कारणोंसे प्राय: सम्पूर्ण प्राणी कष्ट भोगते रहते हैं। यह सब क्यों होता है? जब ऐसे कारणोंसे एक ही समय असंख्य प्राणियोंको मौतके घाट उतरना पड़ता है, तब इस परिस्थितिको लानेवाला कौन समझा जायगा? परिस्थितिको लानेवाले चाहे जो भी रहे हों उन असंख्य जीवोंमें जो सदा ही कष्ट होता रहता है और हुआ है, उसमें उनका भी कुछ दोष है या नहीं? क्या वे बिना अपराधके ही सताये जाते हैं?

इन सब प्रश्नोंका उत्तर पानेके लिये हमें हिन्दू-शास्त्रोंकी शरण लेनी पड़ेगी, अन्यथा इसका हल निकालना कठिन है। शास्त्र कहते हैं—दु:ख चाहे जैसा भी हो और चाहे जिस कारणसे भी आया हो, वह अपने पूर्वकृत पापकर्म (प्रारब्ध)-का फल है। इसी प्रकार सुख भी अपने पूर्वकृत पुण्यकर्म (प्रारब्ध)-का फल है। इस विषयको समझनेके लिये कर्मके रहस्यपर भी दृष्टिपात करना होगा। कर्म तीन प्रकारके होते हैं—क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध। जो कर्म वर्तमान कालमें किया जा रहा है वह क्रियमाण है। काम हो जानेपर वह हृदयमें संस्काररूपसे संचित हो जाता है। और उन संचित कर्मोंमेंसे कुछ कर्म जो फल भुगतानेके लिये उन्मुख होते हैं, उन्हें प्रारब्ध कहते हैं। जैसे एक किसान खेती करता है, यह क्रियमाण है। खेती पकी, कटी और अन्न घरमें जमा हुआ, यह संचित है। उस संचित अन्नमेंसे कुछ अन्न अलग निकालके रख लिया जाता है, जिसे दैनिक भोजनके काममें खर्च किया जाता है, यह अलग निकाला हुआ अन्न प्रारब्धके स्थानमें है।

यह प्रारब्ध भी तीन प्रकारसे भोगा जाता है—स्वेच्छा, अनिच्छा और परेच्छासे। स्वेच्छा-प्रारब्ध वह है, जब हम स्वयं प्रयत्न करके सुख या दु:ख उठाते हैं। अनिच्छा-प्रारब्ध वह है, जब हमें इच्छा न होनेपर भी अकस्मात् किसी कारणसे सुख या दु:ख प्राप्त होते हैं और परेच्छा वह है, जहाँ चोर, डाकू, अत्याचारी आदिके द्वारा आक्रमण होकर हमें कष्ट भोगना पड़ता है। इस प्रकार दु:ख भोगनेके प्रकार और निमित्तमें अन्तर हो सकता है; किन्तु दु:खका भोग जो मिलता है वह तो अपने ही बुरे कर्मोंका फल है। सम्भव है वह बुरा कर्म इसी जन्ममें हुआ हो अथवा अन्य जन्मोंमें। हैजा, प्लेग, आँधी, पानी, आग, बिजली, रोग, व्याधि आदि कारणोंसे जो मृत्यु या कष्ट होता है वह अनिच्छा-प्रारब्धकी देन है। आपके विचारानुसार यदि हम मान भी लें कि वह भीषण नरसंहार या अकाल पूँजीपतियों या साम्राज्यवादियोंकी देन है तो इसे हम शास्त्रीय शैलीसे परेच्छा-प्रारब्ध कह सकते हैं।

सारांश यह कि दु:ख-सुख अपने ही प्रारब्धकी देन हैं और वे इस जन्मके अथवा पूर्वजन्मोंके शुभाशुभ कर्मोंके फलरूपमें ही प्राप्त होते हैं। इसमें यह कभी नहीं मानना चाहिये कि दु:खभोग तो अपने ही कर्मोंका फल है, इसलिये जो दूसरोंको दु:ख देते या सताते रहते हैं, वे निर्दोष हैं। प्रारब्धवश जो सुख या दु:ख मिलता है, उसका मिलना पहलेसे ही निश्चित रहता है, परन्तु वह अमुक कारण या व्यक्तिसे मिलेगा यह बात पहलेसे निश्चित नहीं होती। अत: यदि कोई मनुष्य किसीके दु:ख देनेमें निमित्त बनता है तो वह अपराधी है और उसका दण्ड उसे भोगना ही पड़ता है। अतएव साम्राज्यवाद, पूँजीवाद या दूषित राजनीतिके दोषसे जो गरीबोंको कष्ट भोगना पड़ता है उसका फल उन साम्राज्यवादियों, पूँजीपतियों और राजनीतिक पुरुषोंको अपने-अपने कर्मानुसार न्यूनाधिक रूपमें अवश्य भोगना पड़ेगा। अत: दु:ख पहुँचानेवाले लोगोंको प्रत्येक शास्त्रीय उपायोंसे रोकना या उनका प्रतीकार करना हरेक धर्मशील मनुष्यका कर्तव्य हो जाता है। यह कर्तव्यविमुखता भी एक प्रकारसे पाप ही है, क्योंकि इससे समाजमें पापको प्रोत्साहन मिलता है और पापकर्म करनेवाले लोगोंको परिणाममें पापका फल दु:ख भोगना पड़ता है।

इस मामलेमें ईश्वर क्या करते हैं, इसपर भी विचार करना आवश्यक है। कर्म स्वयं जड़ है, वह स्वयं ही फल देनेकी व्यवस्था नहीं कर सकता। अत: किसी सर्वज्ञ और सर्वसमर्थ ईश्वरके रहे बिना कर्म-फलोंकी ठीक व्यवस्था नहीं हो सकती। किसके कौन-कौनसे पूर्वकर्म हैं, तथा किनको कहाँ और कब किस रूपमें फल मिलेगा, इन सब बातोंका विचार सर्वज्ञ ईश्वर ही कर सकता है। यही उसका न्याय है कि वह सबको यथायोग्य फल देता है। किसी हिंसाके अपराधीको प्राणदण्डकी सजा देते समय न्यायाधीशको कठोर होना ही पड़ता है। परन्तु वह प्राणदण्ड अपराधीके अपने ही कर्मका फल है, न्यायाधीशकी कठोरताका नहीं। हाँ, न्यायाधीश कभी कठोर भी हो सकता है; परन्तु ईश्वर नहीं। उसकी दयाका तो पग-पगपर अनुभव होता है। जैसे डॉक्टर रोग दूर करनेके लिये ही सुई चुभोता अथवा घावका ऑपरेशन करता है, उसी प्रकार जीवको शुद्ध करनेके लिये ही भगवान् जीवात्माको उसके पापोंका दण्ड देते हैं। यद्यपि चोर और डाकूको उसके कुकर्मका ही दण्ड मिलता है, परन्तु दण्डकी व्यवस्था करनेवाले चेतन न्यायाधीश अलग होते हैं। उसी प्रकार कर्मोंकी व्यवस्था करनेवाले न्यायशील, दयालु, सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान् प्रभुकी सत्ता माननी ही पड़ती है।

भगवान् किसी पापी या अन्यायीका हाथ नहीं रोकते। यह उन्हींका बनाया हुआ नियम है कि मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है। जैसे गवर्नमेण्ट जब किसीको बन्दूकका लाइसेंस देती है, तो उसे बन्दूक रखने या चलानेकी कानूनी बातें समझाकर स्वतन्त्र कर देती है। फिर वह अपने इच्छानुसार उस शस्त्रका उपयोग करता है। वह चाहे तो कानूनका पालन करते हुए उसका उपयोग कर सकता है अथवा चाहे तो कानून तोड़कर भी उपयोग कर सकता है। जिस समय कानूनके विरुद्ध वह उस शस्त्रको चलाता है उस समय भी वह उसका हाथ पकड़ने नहीं आती, फिर भी उसके कानून-भंग करनेका दण्ड उसे यथासमय अवश्य देती है तथा शस्त्र भी जब्त कर लेती है। इसी प्रकार भगवान् जब जीवको मानव-शरीररूपी शस्त्र देकर संसारमें भेजते हैं तो शास्त्ररूपी कानून साथ रख देते हैं और कहते हैं शास्त्रके अनुसार चलनेसे तुम्हें लाभ होगा, पुरस्कार प्राप्त होगा। जो शास्त्रके विरुद्ध चलता है उसका वे हाथ नहीं पकड़ते, केवल उसके अन्यायको स्मरण रखते हैं और उसका यथोचित दण्ड समयपर उसे देते हैं। यदि पूर्वोक्त साम्राज्यवादियों, पूँजीपतियों और राजनीतिकोंका अन्याय है तो उसका दण्ड भगवान् उन्हें देंगे ही। आपको भगवान‍्के न्यायपर विश्वास करना चाहिये।

यही ईश्वरका ईश्वरत्व है। इसके सिवा जो सब सहारा छोड़कर भगवान‍्का भरोसा करके उन्हें पुकारता है, उसे दयामय प्रभु स्वयं भी दौड़कर कष्टसे उबारते हैं। उन्होंने ही द्रौपदी तथा गजराजको संकटसे उबारा था। प्रह्लादके प्राणोंकी रक्षा की थी और मीराके जहरको अमृत बना दिया था।

आपकी यह धारणा ठीक नहीं कि ‘ईश्वर कल्पनामात्र है। विद्वान् लोग पूँजीपतियोंके खिलौने रहे हैं और साधारण लोगोंको धोखा देते रहे हैं।’ यह पूँजीवाद आधुनिक रोग ही है। प्राचीन राजतन्त्रमें यह दोष नहीं था। इसके अलावा ईश्वरकी खोज करनेवाले वे ऋषि-महर्षि हैं जो केवल जल अथवा वायु पीकर वर्षों तपस्या करते थे। बहुत किया तो दो-चार फल और पत्ते चबा लिये। वस्त्रके नामपर वल्कल ही पहनते थे। जंगलोंमें रहते थे। पूँजीपतियों अथवा सम्राटोंकी ओर वे आँख उठाकर देखते भी नहीं थे। सम्राटोंके मुकुट उनके चरणोंपर बराबर गिरते थे, पर वे कभी उनके दास नहीं हुए। ईश्वरवाद उन्हीं त्यागी महात्माओंकी अनुभवसिद्ध देन है; उनके स्वानुभवका प्रकाश है। यह धोखा नहीं, परम सत्य है। इसे धोखा मानकर आप अपनेको धोखा न दें। यही आपसे मेरी विनीत प्रार्थना है।

पत्र कुछ बड़ा हो गया, किन्तु प्रसंग ही ऐसा था। आशा है आपको मेरा विचार जाननेमें इससे सुविधा होगी। यदि इससे आपको कुछ सन्तोष हुआ तो प्रसन्नताकी बात है। अन्यथा इसे आप मानें ही, ऐसा मेरा आग्रह नहीं है।