विधवाएँ अपने धर्मकी रक्षा करें
एक उच्च हिन्दूकुलकी विधवा महिला हैं। वे लिखती हैं—‘भगवान्ने मेरे जीवनका सहारा मुझसे हमेशाके लिये अलग कर दिया है—......मैंने पूर्व-जन्ममें कौन-सा पाप किया था, जिसका दु:ख मुझे देखना पड़ रहा है? किन्तु इतनेपर भी मेरा विचार है कि यह दुनिया क्षणभंगुर है, जिन्दगीका कोई भरोसा नहीं, शेष जीवन भगवान्के भजनमें व्यतीत करूँगी, परन्तु समाज मेरे पीछे पड़ा हुआ है। मेरी उम्र २० वर्षकी है, एक लड़का दो सालका है। इसपर भी समाज मेरा पुनर्विवाह करनेपर तुला हुआ है तथा मुझे हर प्रकारकी बातसे पथभ्रष्ट किया जा रहा है। मुझको फिसलानेके लिये चिकनी मिट्टी दिखायी जा रही है। मैं कबतक अपने मनको दृढ़ रख सकूँगी? क्या पुनर्विवाह शास्त्रसम्मत है? इसके विषयमें ‘कल्याण’ में दो शब्द देंगे, जिससे दिलमें शान्ति हो।’
यह उनके पत्रके एक अंशका उद्धरण है। वे उच्च कुलकी महिला हैं। उनके उच्च विचार हैं। सीता और सावित्रीकी परम्परामें उनका जन्म हुआ है। उनमें भी सतीत्वके वे संस्कार वर्तमान हैं। वे नहीं चाहतीं, अब पुनर्विवाह हो। वे यह भी जानती हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, इसका क्षणभर भी भरोसा नहीं। फिर इसके लिये पापपंकमें डूबकर अपनेको नरकमें क्यों ढकेला जाय? प्रत्येक नारीको अपने वैधव्यके लिये दु:ख होता है। उनको भी दु:ख है। किन्तु उस दु:खके आवेगमें वे अपने पवित्र धर्म एवं कर्तव्यको भुलाना नहीं चाहतीं। वे शेष जीवन भगवान्के भजनमें बिताना चाहती हैं। भगवान्का भजन सभी पापोंका एकमात्र अमोघ प्रायश्चित्त है। इससे तन-मन सभी पवित्र होते हैं और भविष्य मंगलमय हो जाता है।
मैं उक्त देवीसे विनयपूर्वक यही अनुरोध करना चाहता हूँ कि वे अपने धर्मपर दृढ़ रहें। आज जो दु:ख प्राप्त हुआ है, वह अपने ही पूर्व-कर्मका फल है; अत: दु:खसे छूटने और भविष्यमें कल्याण प्राप्त करनेके लिये सत्कर्म एवं श्रीभगवान्का सहारा लेना ही उनके लिये सर्वथा उचित है।
समाजके जो लोग उन्हें पथभ्रष्ट करनेकी चेष्टा करते हैं, वे पाप करते हैं। वे अपनी वासना या स्वार्थकी पूर्तिके लिये उनको तो नरकमें ढकेलना चाहते ही हैं, उनके कुलीन बालकका भी भविष्य नष्ट करना चाहते हैं। ऐसे प्राणी अपने तो नरकमें डूबते ही हैं, अपने साथ दूसरोंको भी डुबोते हैं।
उन्होंने शास्त्रकी सम्मति जाननी चाही है। शास्त्र भगवान्की आज्ञा है, उनके आदेशका पालन करनेसे भगवान् सन्तुष्ट होते हैं और मनुष्यका परम हित होता है। शास्त्रके आदेश लोक-परलोक दोनोंको सुधारनेवाले होते हैं। वर्तमानमें सुख हो और भविष्य भी मंगलमय बना रहे, यह शास्त्रका उद्देश्य है। वही शास्त्र विधवाको विवाहसे रोकता है। शास्त्रकी दृष्टिसे विधवाका पुनर्विवाह महापाप है (देखिये मनुस्मृति अध्याय ९, श्लोक ६४ से ६८ तक)।
आजकलके सुधारक शास्त्रकारोंको निष्ठुर बताते हैं। परन्तु शास्त्रकार कितने सदय हैं, इसका अनुभव उनको है ही नहीं। एक आदमी भूखसे अत्यन्त पीड़ित है, उसके सामने मधुर पकवान रखा हुआ है, वह उसपर टूट पड़ना चाहता है। एक सज्जन उस पकवानके पास बैठे हैं और उस भूखेसे कहते हैं, इसे न खाओ। इसे खा लेनेपर सुखके स्थानपर महान् दु:ख होगा। वह उस मनुष्यको निष्ठुर बताकर भोजनपर टूट पड़ता है और सब चट कर जाता है। सोचता है, इतने मधुर भोजनको यह दु:खकारक बता रहा था। कितना झूठा है!
परन्तु वह झूठा नहीं था; वह जानता था इस भोजनमें घातक विष है। थोड़ी देरमें उसका असर हुआ। वह आदमी जो मौजसे माल उड़ाता था, मृत्युकी यन्त्रणासे छटपटाने लगा।
यही दशा वर्तमान विषयभोगकी सुविधाके लिये शास्त्राज्ञाके विपरीत चलनेवालोंकी होती है। पुनर्विवाहसे विधवाको वही सुख मिलता है, जो विषमिश्रित भोजन करनेवाले भूखे मनुष्यको मिला था। फिर असीम यन्त्रणा! अपार दु:खका सामना करना पड़ता है। अत: अपना परम कल्याण चाहनेवाली प्रत्येक विधवाको पुनर्विवाहका विचार मनमें न लाकर ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक भगवद्भजनमें संलग्न रहना चाहिये।
जिस विधवाकी गोदमें बालक है, उसे उस बालकके भविष्यकी भी रक्षा करनी है। उच्च कुलकी विधवा क्षणिक आवेशमें किसी मनचले युवकसे विवाह कर ले तो उसके पुत्रकी क्या दशा होगी? कौन उसे आश्रय देगा? जब वह बड़ा होगा, समाजमें आदरणीय व्यक्ति बनेगा, तब उसकी माताका कलंक उसे सब प्रकारके सम्मानसे वंचित कर देगा।
अत: समाजके श्रेष्ठ पुरुषोंको चाहिये कि वे विधवाओंके धर्मरक्षणमें सहयोग दें, उन्हें पाप-पंकमें न घसीटें। विधवा भी अपने धर्ममें दृढ़ रहे। भगवान् मंगल करेंगे। शेष प्रभुकी दया।