विपत्ति-नाशका उपाय

सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने अपने पतिकी जो स्थिति लिखी, वह शोचनीय है। मोहग्रस्त मनुष्य इसी प्रकार अधर्मको धर्म बतलाया करते हैं और उसमें साथ न देनेवालोंको कोसा करते हैं। उनकी यह स्थिति दयनीय है! उनपर जो मलिन वासनाका भूत सवार है, उसने उनके विवेकको हर लिया है। इस अवस्थामें आपको दु:ख होना स्वाभाविक ही है; परन्तु मेरी समझसे आपकी साधनासे यह रोग मिट सकता है। आप लिखती हैं ‘मेरा कोई भी नहीं है’ सो ऐसी बात नहीं है। आप निश्चय मानिये—‘भगवान् आपके हैं’ और जो यह अनुभव करता है कि जगत‍्में मेरा कोई नहीं है, उसके तो भगवान् अवश्य ही अपने हो जाते हैं। आप इस बातपर विश्वास कीजिये। और मन-ही-मन उन्हें सारी स्थिति समझाकर उनसे प्रार्थना कीजिये—अपने स्वामीकी बुद्धि शुद्ध करके उन्हें सत्पथपर लानेके लिये। आपकी सच्ची कातर प्रार्थनाका फल अवश्य होगा। भगवान् सुनेंगे और आपके मार्गभ्रष्ट स्वामी सन्मार्गपर अवश्य आ जायँगे। समय हो तो श्रीरामचरितमानसका नवाह्न या कम समय हो तो मासिक पारायण कीजिये। कहींसे गीताप्रेसमें छपी कोई रामायणकी प्रति खरीद लीजिये, उसमें नवाह्न और मासिक पारायणके दैनिक विश्राम-स्थल आपको मिल जायँगे। प्रतिदिन यह दृढ़ भावना कीजिये कि भगवान् मेरी प्रार्थना सुन रहे हैं और उनकी कृपासे मेरे स्वामीकी बुद्धि ठीक हो रही है।

साथ ही अपने पतिकी बातोंका उनके मुखपर कभी खण्डन न करके उनकी यथासाध्य तन-मनसे विशेष सेवा कीजिये। इससे भी उनपर प्रभाव पड़ेगा जो उनको सन्मार्गपर लानेमें बहुत सहायक होगा। इसके अतिरिक्त प्रतिदिन—

‘हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे,

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥

—इस सोलह नामोंके मन्त्रकी कम-से-कम एक माला (१०८) का जप विश्वासपूर्वक अवश्य कीजिये। देखिये चार-छ: महीनेमें क्या परिणाम होता है।