विपत्तिसे बचनेके उपाय
सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। अनीति, शास्त्रविरोधी असत् आचरण और प्रेत-पिशाचोंकी-सी छीना-झपटीका जैसा प्रवाह चल रहा है, उसे देखते अभी तो यही प्रतीत होता है कि विपत्तियों और दु:खोंकी और भी वृद्धि होगी। तीसरे युद्धके प्रसंग भी बन रहे हैं, ज्योतिषियोंने आगामी कालको संकटपूर्ण बताया है, हालमें ही उगनेवाले पुच्छल तारेका भी ऐसा ही कुछ अनिष्ट फल बतलाया जाता है। मेरी समझसे तो इसके निवारणका सर्वप्रधान एक ही उपाय है और वह है भगवान्का स्मरण, भगवत्प्रार्थना और भगवच्छरणागति। तीनों एक ही वस्तुके नाम हैं, एक-दूसरेके आश्रित हैं और एककी दूसरेसे वृद्धि होती है। अतएव यदि हम अपना और जगत्का यथार्थ कल्याण चाहते हैं तो हमे स्वयं भगवान्की शरण लेनी चाहिये और दूसरोंको विनयपूर्वक ऐसा करनेके लिये प्रेरणा-प्रार्थना करनी चाहिये। इसीमें सबका कल्याण है।
आपने यह ठीक लिखा है—‘महात्मा गाँधीजीकी राजनीतिक बातोंको तो लोग मानते हैं, परन्तु उनकी भगवत्प्रार्थना और मानव-मात्रके हितकी बातको कार्यत: बहुत ही कम लोग मानते हैं।’ वस्तुत: ऐसी ही स्थिति है। इसीसे तो हमारी विपत्तियाँ उत्तरोत्तर बढ़ी जा रही हैं। विशेष भगवत्कृपा।