विपत्तिसे उबारनेवाले भगवान्

कराचीसे एक सज्जनका पत्र मिला है। वे बड़े परिवारके हैं और अर्थाभावसे बड़े संकटमें हैं। उन्होंने अर्थसंकटसे उबारनेका उपाय पूछा है और किसी अनुष्ठानके लिये राय माँगी है। साथ ही यह भी लिखा है कि उनके मालिक—वे बहुत पुराने कर्मचारी होनेपर भी, उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहे हैं। इसके उत्तरमें निवेदन है कि असलमें अर्थसंकटका अधिकतर सम्बन्ध प्रारब्धसे है। फलदानोन्मुख प्रारब्धको रोककर नया प्रारब्ध बनानेके लिये विशेष प्रबल शास्त्रीय कर्मानुष्ठानकी आवश्यकता है। आजकल न तो उतनी श्रद्धा है, न विधिकी सुविधा है और न उतना धैर्य ही है। कहते हैं कि विद्यारण्य स्वामीने गृहस्थाश्रममें अर्थकी प्राप्तिके लिये गायत्रीके चौबीस पुरश्चरण किये पर कोई फल नहीं हुआ। तब उन्हें निर्वेद हो गया और उन्होंने गृहस्थका त्याग करके संन्यास ग्रहण कर लिया। संन्यास ग्रहण करनेके बाद उनके सामने गायत्री देवीने प्रकट होकर वर माँगनेको कहा तब उन्होंने कहा—‘माता! मैंने चौबीस पुरश्चरण किये, तब तो आप नहीं पधारीं, अब जब मैंने संन्यास ग्रहण कर लिया तब आपने दर्शन दिये—इसका क्या कारण है?’ गायत्रीदेवीने कहा—‘तुम्हारे पचीस महापातक थे। वे ही तुम्हारे अर्थलाभमें प्रतिबन्धक थे। चौबीस पुरश्चरणसे चौबीस महापातक कटे—एक पुरश्चरण और करते तो मैं गृहस्थाश्रममें ही आकर तुम्हें वर देती। अब संन्यासग्रहणरूपी महान् पुण्यसे तुम्हारा पचीसवाँ महापातक भी कट गया—इससे मैं अब आयी हूँ।’ इसपर स्वामीजीने कहा—‘अब तो मुझे धनकी आवश्यकता ही नहीं है, आप लौट जायँ।’ कहनेका तात्पर्य यह कि प्रतिबन्धकके अनुसार ही प्रायश्चित्त भी होना चाहिये, तब फल होता है। आजकल तो कुछ दिन कोई अनुष्ठान किया और फल न मिला तो देवतापर अश्रद्धा हो जाती है और लोग शास्त्रोंको कोसने लगते हैं। एक भाईको किसीने एक मन्त्र बताया था, उन्होंने दस-बीस दिन जाप किया। फल नहीं हुआ तो अश्रद्धा हो गयी और उसे छोड़ने लगे। ऐसी हालतमें अनुष्ठान बतलाना और भी हानिकर होता है; क्योंकि यह तो पता होता नहीं कि किसका कितना प्रबल प्रतिबन्धक है।

असल बात तो यह है कि संसारमें जो कुछ होता है, उसे भगवान् पर छोड़कर निष्काम भावसे भगवान‍्का भजन करना चाहिये। यहाँ जो कुछ होना है, सो हो ही जायगा। इसीमें जीवका वास्तविक कल्याण है। पर यदि न रहा जाय तो सकाम भावसे भगवान‍्को पुकारना और उनसे कातर प्रार्थना करनी चाहिये। भगवान‍्से सकाम प्रार्थना करना यद्यपि बेसमझी है, पर पाप नहीं है। भगवान‍्की प्रार्थनासे बहुत आश्चर्यजनक फल होते देखा गया है। यहाँ नीचे मैं इंगलैण्डसे निकलनेवाले ‘Science of Thought Review’ नामक पत्रमें प्रकाशित एक लेखका कुछ अनुवाद देता हूँ। इससे पता लगेगा कि भगवान् किस प्रकार सहायता करते हैं। मेरा उन भाईसे अनुरोध है कि वे कातर होकर अपनी ही भाषामें विश्वासपूर्वक भगवान‍्से प्रार्थना करें। प्रार्थना सच्ची हुई तो आशा है उनके कष्ट-निवारणका भगवान् कोई-न-कोई उपाय अवश्य कर देंगे।

रही मालिककी बात, सो यह बात मालिकके लिये अवश्य विचारणीय है। मालिकोंको अपने कर्मचारियोंके प्रति वैसा ही बर्ताव करना चाहिये जैसा माता अपने पुत्रके प्रति करती है। पराया और दीन समझकर जो दयाका बर्ताव किया जाता है उसमें भी दोष है। अपनेमें बड़प्पनका अहंकार है और उसमें दैन्यका आरोपण है। पुत्रका तो माँके स्नेह और धनपर हक है। माता अपने पुत्रको कुछ देकर ‘मैं उसका उपकार करती हूँ’ ऐसा नहीं मानती, बल्कि जितना ही देती है उतना ही उसे सुख मिलता है। और न दे सकनेकी स्थितिमें उसे दारुण दु:ख होता है। मालिकोंको भी अपने कर्मचारियोंके प्रति इसी प्रकार अपना कर्तव्य-पालन करना चाहिये।

‘Science of Thought Review’ में श्रीयुत सिडनी एच० विल्सन महोदय लिखते हैं—

‘भगवान् पर जिनका विश्वास है, उन्हें विपत्तिसे उबारनेके लिये भगवान् पूर्ण समर्थ हैं। इसके लिये कोई बहुत बड़े अलौकिक विश्वासकी आवश्यकता नहीं है, वरं उस सर्वशक्तिमान् परमात्मामें शान्त, अचल तथा कभी कम न होनेवाला विश्वास रखना ही पर्याप्त होगा। उन्होंने सदा भक्तोंकी पुकार सुनी है और अब भी सुनते हैं, क्योंकि भगवान‍्ने जो कुछ किया है, उसे बराबर करते चले आ रहे हैं, हाँ, उनपर विश्वास रखनेवाला व्यक्ति होना चाहिये। भगवान् पर विश्वास रखनेवाले नर-नारी असफलता एवं हृदयविदारक परिस्थितियोंके सम्मुख होते हुए भी एक विलक्षण बल प्राप्त कर सकते हैं और कह सकते हैं कि यह परिस्थिति मुझे भयभीत नहीं कर सकती, क्योंकि मेरी आँखें उन भगवान् पर लगी हैं जो मेरे दैनिक जीवनकी प्रत्येक परिस्थितिपर निरीक्षण रखते हैं और जो विपत्तिसे उबारनेमें पूर्ण समर्थ हैं।

एक मनुष्य अशक्त एवं सामर्थ्यहीन था, किन्तु उसकी स्त्री बड़ी साहसी थी। परिवारके भरण-पोषणका खर्च चलानेके लिये वह नित्य बाहर कमाने जाया करती थी। उसका पति ‘ट्रूथ’ (सत्य) नामक पत्रिकाका पाठक था। एक दिन वह घरके एक कमरेमें बैठा था। वहींसे उसने सुना कि दूसरे कमरेमें उसकी स्त्री असहायकी भाँति सिसक-सिसककर रो रही है। उसने विपत्तिका अनुमान लगा लिया। उसकी स्त्रीने कड़े परिश्रमसे कमाये हुए कुछ धनको बड़े हौसलेसे इसलिये रख छोड़ा था कि उससे वह परिवारके लिये आवश्यक कुछ छोटी-मोटी चीजें खरीदेगी। किन्तु उसने देखा कि वह पैसा प्रतिदिनके व्ययमें ही उड़ गया। उसके पास एक पैसातक न रह गया था। यहाँतक कि आगामी सप्ताहका साधारण खर्च भी वह नहीं चला सकती थी। उसके पतिको पत्नीकी इस दशापर बड़ा दु:ख हुआ। किन्तु वह जानता था कि इस समय केवल शाब्दिक सहानुभूति दिखानेसे उसकी आत्मग्लानि और भी बढ़ेगी, क्योंकि पहले भी इसी प्रकारकी परिस्थितियाँ आ चुकीं थीं, जिनका उसे पूरा अनुभव था फिर भी वह बड़ा चिन्तित हुआ और उसने भगवान‍्की शरण ली, जो एकमात्र सहायक हैं।

पहले तो उसे इस बातपर अविश्वास हुआ कि ईश्वरके भक्तोंपर जो हृदयविदारक दशाएँ आती हैं, वे यथार्थत: भगवदिच्छाकी परिचायक हैं। इसके बाद उसने दृढ़ताके साथ स्वीकार किया कि हमारे सभी कार्योंका भार भगवान् पर है अत: न तो उसे, न उसके प्रिय परिजनोंको ही किसी अच्छी वस्तुका अभाव हो सकता है। बस, उसने सब कुछ इसी विश्वासपर छोड़ दिया। अब भी उसकी स्त्री सिसक और रो रही थी, किन्तु वह अपने कामपर चला गया। यहाँ ध्यान देनेकी बात यह है कि भगवान् पर विश्वास होते हुए भी वह कर्तव्यसे विमुख नहीं हुआ। अशक्त शरीरसे जितना भी पुरुषार्थ वह कर सकता था, उसे करनेपर वह उद्यत हो गया।

लगभग एक घण्टेतक कार्य करनेपर उसे एक पौण्ड (लगभग १५ रुपये) मजदूरी मिली, जिसकी उसे कभी आशा न थी। उसने सब लाकर अपनी पत्नीके हाथपर रख दिया। उसकी पत्नीको भी बड़ा आश्चर्य हुआ। दूसरे दिन उसने एक लेख लिखा और परीक्षाके रूपमें उसे भेज दिया कि देखें यह प्रकाशित होता है या नहीं। चार दिन बाद उसी लेखके पारिश्रमिक-स्वरूप उसे ३ पौण्ड ३ शिलिंगका एक चेक प्राप्त हुआ। भगवान् देते हैं तो छप्पर फाड़कर देते हैं। उनकी दया हो जानेपर अनायास ही चारों ओरसे प्राप्ति होने लगती है। इसके पश्चात् दस ही दिनके भीतर ५ पौण्ड ५ शिलिंगका एक दूसरा अप्रत्याशित चेक मिला। यह उपहाररूपमें भेजा गया था और ऐसी इच्छा प्रकट की गयी थी कि ‘इसे घरके काममें खर्च किया जाय।’

इस चेकको भेजनेवाली एक महिला थीं, जो वहाँसे २०० मीलकी दूरीपर रहती थीं। सोचिये, उस दयालु महिलाने इस संकटग्रस्त परिवारकी आवश्यकताको इतनी दूरसे कैसे जाना? निश्चय ही वे नहीं जानती थीं, किन्तु ईश्वर (जिनसे प्रार्थनाद्वारा सम्बन्ध जोड़ लिया गया था) इस व्यक्तिकी आवश्यकताको जानते थे और उन्होंने इसकी पूर्तिके लिये उस महिलाके हृदयमें प्रेरणा की।

भगवान‍्की विपत्तिसे उबारनेकी क्षमता देखिये। एक कमरेमें सिसकती हुई पत्नी है, जिसके पास एक अधेला नहीं है। दूसरे कमरेमें अशक्त और सामर्थ्यहीन पति है जो अपने प्रियजनोंकी ओरसे भगवान् पर विश्वास रखकर उनकी प्रार्थना कर रहा है तथा चौदह दिनके भीतर नौ पौण्डसे अधिककी प्राप्ति हो जाती है, जिसकी आशा न थी। साधारण व्यक्तिके लिये ये बातें यों ही घटित होनेवाली घटनाएँ हैं, किन्तु उसके लिये, जिसकी समस्त आशाएँ भगवान् पर ही अवलम्बित हैं, भगवान‍्की शक्तिमत्ता, प्रेम और योग-क्षेम-वहन करनेकी सुन्दर भावना प्रकट करती हैं।

भगवान् पर विश्वास रखनेवाले व्यक्तिके जीवनमें इस प्रकारकी परीक्षाएँ बराबर होती रहती हैं। एक दूसरे अवसरपर उसी अशक्त व्यक्तिको भगवान‍्की विपत्ति-उद्धारक शक्तिके अपने विश्वासकी बहुत कठिन परीक्षाका सामना करना पड़ा था। उसका लड़का, जो मन्द बुद्धिका था, बहुत भारी अपराधमें फँसा लिया गया था। बात यह थी कि एक नौजवान और अकारण ही बहुत साधारण बातपर भी कड़ी कार्रवाई करनेवाले सिपाहीने उस लड़केके विरुद्ध अभियोग गढ़ लिया था। वह सोचता था कि इसके फलस्वरूप उसकी उन्नति हो जायगी, जिसका वह बड़ा इच्छुक था। किन्तु बादको यह सिद्ध हो गया कि यह उसका मनगढ़न्त अभियोग था।

असत्य सिद्ध होनेके पहले अभियोग तो न्यायालयमें विचारार्थ गया ही। लड़केकी माँको लज्जा और लड़केके छूटने-न-छूटनेके असमंजसके कारण कितनी पीड़ा हुई होगी, इसका अनुमान किया जा सकता है। उसका संकट इस बातसे और भी बढ़ गया था कि लड़केको लेकर न्यायालयमें उपस्थित होनेका भार उसीके कन्धोंपर था। क्योंकि उसका रुग्ण तथा अशक्त पति यह कार्य नहीं कर सकता था, किन्तु उसका पति शरीरसे असमर्थ होते हुए भी उस सारे कार्यके सम्पादनके लिये भगवान‍्की शक्ति लाकर अपने प्रियजनोंकी सहायता करनेमें समर्थ था। उसने भगवान‍्से प्रार्थना की और नित्य वह यह समझकर उनका ध्यान करता रहा कि हम जो कुछ सोच या कह सकते हैं, उससे कहीं अधिक करनेकी शक्ति भगवान‍्में है।

दिन-पर-दिन बीत रहे थे और लड़केका पक्ष स्पष्टत: निर्बल होता जा रहा था। ऐसा अनुमान होता था कि इस अभियोगमें सरकारी पक्षकी विजय होगी।

उधर नित्यकी प्रार्थनाद्वारा भगवान् पर विश्वास स्थिर किया जा रहा था। लड़केके पिताने सोचा कि सिपाही अपना कर्तव्य समझकर अपनी समझसे ठीक ही कर रहा था। अत: नित्यकी प्रार्थनामें उस सिपाही तथा तत्सम्बन्धी समस्त व्यक्तियोंको क्षमा कर देनेका भाव उसके मनमें रहता था और उनके प्रति उसकी शुभकामना थी। लड़केको दण्ड दिलानेके पक्षमें जितने गवाह थे, उनको भी उसने क्षमा कर दिया था और उनके लिये भी वैसे ही प्रार्थना किया करता था। इसके बाद उसने सोचा कि समस्त कार्योंपर यहाँतक कि न्यायाधीश और गवाहोंपर भी भगवान‍्का नियन्त्रण है। अत: मामलेकी सत्यता अवश्य प्रकाशमें आनी चाहिये।

लड़केका पिता और कुछ नहीं, केवल न्याय चाहता था। यदि लड़का सचमुच अपराधी है तो न्यायत: उसे अपराधका दण्ड भोगना ही चाहिये और यदि लड़केके विरुद्ध लगाया हुआ अभियोग झूठा है तो वह प्रार्थना करता था और उसे दृढ़ विश्वास था कि भगवान् सत्यको प्रकाशित करेंगे।

अभियोगकी सुनवाईके दिन सारा मामला ही पलट गया। एक प्रमुख गवाह जब गवाहोंके कठघरेमें खड़ा हुआ तो किसी अज्ञात कारणसे वह गूँगा हो गया और लड़केके विरुद्ध कोई प्रमाण न दे सका। सब कुछ एक अच्छा तमाशा हो गया। अभियोग समाप्त कर दिया गया और सब लोग घर चले गये।

भगवान‍्के भक्तोंपर कोई भी शस्त्र काम नहीं कर सकता किन्तु सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम प्रार्थना करें; क्योंकि प्रार्थना वह तलवार है, जो सहस्रों युद्धोंमें परीक्षित् और प्रमाणित है अर्थात् प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। भगवान् हमारी प्रार्थनाके द्वारा अपने अनन्त प्यारके कारण हमें तथा हमारे उन सब प्रियजनोंको, जिनके लिये हम प्रार्थना करते हैं, विपत्तिसे उबारनेमें समर्थ हैं—इस प्रकारके जितने अधिक विश्वासके साथ हम भगवान‍्की प्रार्थना करेंगे, हमारी उतनी ही अधिक सहायता भगवान् करेंगे।