प्रवचन—१

श्रीसीताराम-वन्दना

गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।

बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा १८)

गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी महाराज कथा प्रारम्भ करनेसे पहले सभीकी वन्दना करते हैं। इस दोहेमें श्रीसीतारामजीको नमस्कार करते हैं। इसके बाद नाम-वन्दना और नाम-महिमाको लगातार नौ दोहे और बहत्तर चौपाइयोंमें कहते हैं। श्रीगोस्वामीजी महाराजको यह नौ संख्या बहुत प्रिय लगती है। नौ संख्याको कितना ही गुणा किया जाय, तो उन अंकोंको जोड़नेपर नौ ही बचेंगे। जैसे, नौ संख्याको नौसे गुणा करनेपर इक्यासी होते हैं। इक्यासीके आठ और एक, इन दोनोंको जोड़नेपर फिर नौ हो जाते हैं। इस प्रकार कितनी ही लम्बी संख्या क्यों न हो जाय, पर अन्तमें नौ ही रहेंगे; क्योंकि यह संख्या पूर्ण है।

गोस्वामीजी महाराजको जहाँ-कहीं ज्यादा महिमा करनी होती है तो नौ तरहकी उपमा और नौ तरहके उदाहरण देते हैं। नौ संख्या आखिरी हद है, इससे बढ़कर कोई संख्या नहीं है। यह नौ संख्या अटल है।

संबत सोरह सै एकतीसा।

करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥

नौमी भौम बार मधुमासा।

अवधपुरीं यह चरित प्रकासा॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा ३४। ४, ५)

रामजन्म तिथि बार सब जस त्रेता महँ भास।

तस इकतीसा महँ जुरो जोग लगन ग्रह रास॥

भगवान् श्रीरामने त्रेतायुगमें चैत्र मास, शुक्ल पक्ष, नवमी तिथि, मंगलवारके दिन शुभ मुहूर्तके समय अयोध्यामें अवतार लिया। भगवान‍्के अवतारके दिन जैसा शुभ मुहूर्त था, ठीक वैसा ही शुभ मुहूर्तका संयोग संवत् १६३१में भगवान‍्के अवतारके दिन बना। श्रीगोस्वामीजी महाराजने अयोध्यामें उसी दिन श्रीरामचरितमानस ग्रन्थ लिखना आरम्भ किया। जबतक ऐसा संयोग नहीं बना, तबतक वैसे शुभ मुहूर्तकी प्रतीक्षा करते रहे।

यहाँ अठारहवें दोहेमें श्रीसीतारामजीके चरणोंकी वन्दना करते हैं। सीतारामजीकी बहुत विलक्षणता है। ‘जिन्हहि परम प्रिय खिन्न’ दु:खी आदमी किसीको प्यारा नहीं लगता। दीन-दु:खीको सब दुत्कारते हैं, पर सीतारामजीको जो दु:खी होता है, वह ज्यादा प्यारा लगता है, वह उनका परमप्रिय है, उसपर विशेष कृपा करते हैं। उन श्रीसीतारामजीके चरणोंमें मैं प्रणाम करता हूँ।

श्रीसीतारामजी अलग-अलग नहीं हैं। इस बातको समझानेके लिये दो दृष्टान्त देते हैं। जैसे, गिरा-अरथ और जल-बीचि कहनेका तात्पर्य है कि वाणी और उसका अर्थ कहनेमें दो हैं, पर वास्तवमें दो नहीं, एक हैं। वाणीसे कुछ भी कहोगे तो उसका कुछ-न-कुछ अर्थ होगा ही और किसीको कुछ अर्थ समझाना हो तो वाणीसे ही कहा जायगा—ऐसे परस्पर अभिन्न हैं। इसी तरह जल होगा तो उसकी तरंग भी होगी। तरंग और जल कहनेमें दो हैं, पर जलसे तरंग या तरंगसे जल अलग नहीं है, एक ही है।

गिरा और बीचि—ये दोनों स्त्रीलिंग पद हैं, अरथ और जल—ये दोनों पुल्लिंग पद हैं। ये दोनों दृष्टान्त सीता और रामकी परस्पर अभिन्नता बतानेके लिये दिये गये हैं। इनका उलट-पुलट करके प्रयोग किया है। पहले ‘गिरा’ स्त्रीलिंग पद कहकर ‘अरथ’ पुल्लिंग पद कहा, यह तो ठीक है; क्योंकि पहले सीता और उसके बाद राम हैं, पर दूसरे उदाहरणमें उलट दिया अर्थात् ‘जल’* पुल्लिंग पद पहले रखा और उसके साथ ‘बीचि’ स्त्रीलिंग पद बादमें रखा।

इसका तात्पर्य ‘रामसीता’ हुआ। इस प्रकार कहनेसे दोनोंकी अभिन्नता सिद्ध होती है। ‘सीताराम’ सब लोग कहते हैं, पर ‘रामसीता’ ऐसा नहीं कहते हैं। जब भगवान‍्के प्रति विशेष प्रेम बढ़ता है, उस समय सीता और राम भिन्न-भिन्न नहीं दीखते। इस कारण किसको पहले कहें, किसको पीछे कहें—यह विचार नहीं रहता, तब ऐसा होता है। श्रीभरतजी महाराज जब चित्रकूट जा रहे हैं तो प्रयागमें प्रवेश करते समय कहते हैं—

भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।

कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग॥

(मानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा २०३)

प्रेममें उमँग-उमँगकर रामसिय-रामसिय कहने लगते हैं। उस समय प्रेमकी अधिकताके कारण दोनोंकी एकताका अनुभव होता है। इसलिये चाहे श्रीसीताराम कहो—चाहे रामसीता कहो, ये दोनों अभिन्न हैं। ऐसे श्रीसीतारामजीकी वन्दना करते हैं। अब इससे आगे नाम महाराजकी वन्दना करके नौ दोहोंमें नाममहिमाका वर्णन करते हैं।

एक नाम-जप होता है और एक मन्त्र-जप होता है। ‘राम’ नाम मन्त्र भी है और नाम भी है। नाममें सम्बोधन होता है तथा मन्त्रमें नमन और स्वाहा होता है। जैसे ‘रामाय नम:’ यह मन्त्र है। इसका विधिसहित अनुष्ठान होता है और राम! राम!! राम!!! ऐसे नाम लेकर केवल पुकार करते हैं। ‘राम’ नामकी पुकार विधिरहित होती है। इस प्रकार भगवान‍्को सम्बोधन करनेका तात्पर्य यह है कि हम भगवान‍्को पुकारें, जिससे भगवान‍्की दृष्टि हमारी तरफ खिंच जाय।

कैसा ही क्यों न जन नींद सो

वो नाम लेते ही सुबोध होता।

जैसे, सोये हुए किसी व्यक्तिको पुकारें तो वह अपना नाम सुनते ही नींदसे जग जाता है, ऐसे ही राम! राम!! राम!!! करनेसे रामजी हमारी तरफ खिंच जाते हैं। जैसे, एक बच्चा माँ-माँ पुकारता है तो माताओंका चित्त उस बच्चेकी तरफ आकृष्ट हो जाता है। जिनके छोटे बालक हैं, उन सबका एक बार तो उस बालककी तरफ चित्त खिंचेगा, पर उठकर वही माँ दौड़ेगी, जिसको वह बच्चा अपनी माँ मानता है। माँ नाम तो उन सबका ही है, जिनके बालक हैं। फिर वे सब क्यों नहीं दौड़तीं? सब कैसे दौड़ें! वह बालक तो अपनी माँको ही पुकारता है। दूसरी माताओंके कितने ही सुन्दर गहने हों, सुन्दर कपड़े हों, कितना ही अच्छा स्वभाव हो, पर उनको वह अपनी माँ नहीं मानता। वह तो अपनी माँको ही चाहता है, इसलिये उस बालककी माँ ही उसकी तरफ खिंचती है। ऐसे ही ‘राम-राम’ हम आर्त होकर पुकारें और भगवान‍्को ही अपना मानें तो भगवान् हमारी तरफ खिंच जायँगे।

जब लग गज अपनो बल बरत्यो नेक सरॺो नहीं काम।

निरबल ह्वै बलराम पुकारॺो आयो आधे नाम॥

जैसे, गजराजने पूरा नाम भी उच्चारण नहीं किया, उसने केवल ‘हे ना.....(थ)’ आधा नाम लेकर पुकारा। उतनेमें भगवान‍्ने आकर रक्षा कर दी। शास्त्रीय विधियोंकी उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी इस तरह आर्त होकर पुकारनेकी है। इसलिये आर्त होकर, दु:खी होकर, भगवान‍्को अपना मानकर पुकारें और केवल उनका ही भरोसा, उनकी ही आशा, उनका ही विश्वास रखें और सब तरफसे मन हटाकर उनका ही नाम लें और उनको ही पुकारें—हे राम! राम!! राम!!! आर्तका भाव तेज होता है, इससे भगवान् उसकी तरफ खिंच जाते हैं और उसके सामने प्रकट हो जाते हैं। तभी तो भगवान् प्रह्लादके लिये खम्भेमेंसे प्रकट हो गये। भीतरका जो आर्तभाव होता है, वही मुख्य होता है। ‘राम’ नाम उच्चारण करनेकी बड़ी भारी महिमा है। उस ‘राम’ नामका प्रकरण रामचरितमानसमें बड़े विलक्षण ढंगसे आया है।

नाम-वन्दना

बंदउँ नाम राम रघुबर को।

हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा १९। १)

नामकी वन्दना करते हुए श्रीगोस्वामीजी महाराज कहते हैं कि मैं रघुवंशमें श्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीके उस ‘राम’ नामकी वन्दना करता हूँ, जो कृसानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा)-का हेतु अर्थात् बीज है। बीजमें क्या होता है? बीजमें सब गुण होते हैं। वृक्षके फलमें जो रस होता है, वह सब रस बीजमें ही होता है। बीजसे ही सारे वृक्षको तथा फलोंको रस मिलता है। अग्निवंशमें परशुरामजी, सूर्यवंशमें रामजी और चन्द्रवंशमें बलरामजी—इस प्रकार तीनों वंशोंमें ही भगवान‍्ने अवतार लिये। ये तीनों अवतार ‘राम’ नामवाले हैं, पर श्रीरघुनाथजी महाराजका जो ‘राम’ नाम है, वह इन सबका कारण है। मैं रघुनाथजी महाराजके उसी ‘राम’ नामकी वन्दना करता हूँ, जो अग्निका बीज ‘र’, सूर्यका बीज ‘आ’ और चन्द्रमाका बीज ‘म’ है। ‘राम’ नाममें ‘र’, ‘आ’ और ‘म’—ये तीन अवयव हैं। इन अवयवोंका वर्णन करनेके लिये कृसानु, भानु और हिमकर—ये तीन शब्द दिये हैं।

यहाँ ये तीनों शब्द बड़े विचित्र एवं विलक्षण रीतिसे दिये गये हैं। कृसानुमें ‘ऋ’, भानुमें ‘आ’ और हिमकर में ‘म’ है। ‘कृसानु’ शब्दमेंसे ‘ऋ’ को निकाल दें तो ‘क्सानु’ शब्द बचेगा, जिसका कोई अर्थ नहीं होगा। ‘भानु’ शब्दमेंसे ‘आ’ निकाल दें तो ‘भ्नु’ का भी कोई अर्थ नहीं होगा। ऐसे ही ‘हिमकर’ शब्दमेंसे ‘म’ को निकाल दें तो ‘हिकर’ का भी कोई अर्थ नहीं निकलेगा; अर्थात् कृसानु, भानु और हिमकर—ये तीनों मुर्देकी तरह हो जायँगे; क्योंकि इनमेंसे ‘राम’ ही निकल गया। इनके साथ ‘राम’ नाम रहनेसे कृसानुमें ‘कृ’ का अर्थ करना, ‘सानु’ का अर्थ शिखर है, ऐसे ही ‘भानु’ में ‘भा’ नाम प्रकाशका है, ‘नु’ नाम निश्चयका है और ‘हिमकर’ में ‘हिम’ नाम बर्फका है और ‘कर’ नाम हाथका है।

इन तीनोंका हेतु ‘राम’ नाम ही है। इस प्रकार सब अक्षरोंमें ‘राम’ नाम प्राण है। कृसानु, भानु और हिमकर—इन तीनोंमेंसे ‘राम’ नाम निकाल देनेपर वे कुछ कामके नहीं रहते हैं, उनमें कुछ भी तथ्य नहीं रहता। यहाँ नामके तीनों अवयवोंको बतानेका तात्पर्य यह है कि ‘राम’ नाम जपनेसे साधकके पापोंका नाश होता है, अज्ञानका नाश होता है और अन्धकार दूर होकर प्रकाश हो जाता है। अशान्ति, सन्ताप, जलन आदि मिटकर शान्तिकी प्राप्ति हो जाती है। ऐसा जो रघुनाथजी महाराजका ‘राम’ नाम है, उसकी मैं वन्दना करता हूँ। अब आगे गोस्वामीजी महाराज कहते हैं—

बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो।

अगुन अनूपम गुन निधान सो॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा १९। २)

यह ‘राम’ नाम ब्रह्मा, विष्णु और महेशमय है। विधि, हरि, हर—सृष्टिमात्रकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाली, ये तीन शक्तियाँ हैं। इनमें ब्रह्माजी सृष्टिकी रचना करते हैं, विष्णुभगवान् पालन करते हैं और शंकरभगवान् संहार करते हैं।

संसारमें ‘राम’ नामसे बढ़कर कुछ नहीं है। सब कुछ शक्ति इसमें भरी हुई है। इसलिये सन्तोंने कहा है—

‘रामदास सुमिरण करो रिध सिध याके माँय।’

ऋद्धि-सिद्धि सब इसके भीतर भरी हुई है। विश्वास न हो तो रात-दिन जप करके देखो। सब काम हो जायगा, कोई काम बाकी नहीं रहेगा।

यह ‘राम’ नाम वेदोंके प्राणके समान है, शास्त्रोंका और वर्णमालाका भी प्राण है। प्रणवको वेदोंका प्राण माना गया है। प्रणव तीन मात्रावाला ‘ॐ’ कार पहले-ही-पहले प्रकट हुआ, उससे त्रिपदा गायत्री बनी और उससे वेदत्रय बना। ऋक्, साम, यजु:—ये तीनों मुख्य वेद हैं। इन तीनोंका प्राकट्य गायत्रीसे, गायत्रीका प्राकट्य तीन मात्रावाले ‘ॐ’ कारसे और यह ‘ॐ’ कार—प्रणव सबसे पहले हुआ। इस प्रकार यह ‘ॐ’ कार (प्रणव) वेदोंका प्राण है।

यहाँपर ‘राम’ नामको वेदोंका प्राण कहनेमें तात्पर्य है कि ‘राम’ नामसे ‘प्रणव’ होता है। प्रणवमेंसे ‘र’ निकाल दो तो ‘पणव’ हो जायगा और ‘पणव’ का अर्थ ढोल हो जायगा। ऐसे ही ‘ॐ’ मेंसे ‘म’ निकालकर उच्चारण करो तो वह शोकका वाचक हो जायगा। प्रणवमें ‘र’ और ‘ॐ’ में ‘म’ कहना आवश्यक है। इसलिये यह ‘राम’ नाम वेदोंका प्राण भी है।

‘अगुन अनूपम गुन निधान सो’—यह ‘राम’ नाम निर्गुण अर्थात् गुणरहित है। सत्त्व, रज और तमसे अतीत है, उपमारहित है और गुणोंका भण्डार है; दया, क्षमा, सन्तोष आदि सद‍्गुणोंका खजाना है, नाम लेनेसे ये सभी आप-से-आप आ जाते हैं। यह ‘राम’ नाम सगुण और निर्गुण दोनोंका वाचक है। आगेके प्रकरणमें आयेगा—

अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी।

उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २१। ८)

यह ‘राम’ नाम सगुण और निर्गुण—दोनोंको जनानेवाला है। इसलिये सगुण उपासक भी ‘राम’ नाम जपते हैं और निर्गुण उपासक भी ‘राम’ नाम जपते हैं। सगुण-साकारके उपासक हों, चाहे निर्गुण-निराकारके उपासक हों। ‘राम’ नामका जप सबको करना चाहिये। यह दोनोंकी प्राप्ति करा देता है।

‘राम’ नाम अमृतके समान है; जैसे, बढ़िया भोजनमें घी और दूध मिला दो तो वह भोजन बहुत बढ़िया बन जाता है। ऐसे ही ‘राम’ नामको दूसरे साधनोंके साथ करो, चाहे केवल ‘राम’ नामका जप करो, यह हमें निहाल कर देगा।

‘राम’ नामके समान तो केवल ‘राम’ नाम ही है। यह सब साधनोंसे श्रेष्ठ है। नामके दस अपराधोंमें बताया गया है—‘धर्मान्तरै: साम्यम्’* नामके साथ किसीकी उपमा दी जायगी तो वह नामापराध हो जायगा। मानो नाम अनुपम है। इसमें उपमा नहीं लग सकती। इसलिये ‘नाम’ को किसीके बराबर नहीं कह सकते।

* सन्निन्दाऽसति नामवैभवकथा

श्रीशेशयोर्भेदधी-

रश्रद्धा श्रुतिशास्त्रदैशिकगिरां

नाम्न्यर्थवादभ्रम:।

नामास्तीति निषिद्धवृत्तिविहित-

त्यागौ हि धर्मान्तरै:

साम्यं नामजपे शिवस्य च हरे-

र्नामापराधा दश॥

भगवान् श्रीराम शबरीके आश्रमपर पधारे और शबरीको कहने लगे—

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं।

सावधान सुनु धरु मन माहीं॥

(मानस, अरण्यकाण्ड, दोहा ३५। ७)

—‘मैं तुझे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मनमें धारण कर।’ नवधा भक्ति कहकर अन्तमें कहते हैं—‘सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥ (मानस, अरण्यकाण्ड, दोहा ३६।७) तेरेमें सब प्रकारकी भक्ति दृढ़ है।’ शबरीको भक्तिके प्रकारोंका पता ही नहीं; परंतु नवधा भक्ति उसके भीतर आ गयी। किस प्रभावसे? ‘राम’ नामके प्रभावसे! ऐसी उसकी लगन लगी कि ‘राम’ नाम जपते हुए रामजीके आनेकी प्रतीक्षा निरन्तर करती ही रही। इस कारण ऋषि-मुनियोंको छोड़कर शबरीके आश्रमपर भगवान् खुद पधारते हैं।

‘गुन निधान सो’ यह ‘नाम’ गुणोंका खजाना है मानो ‘राम’ नाम लेनेसे कोई गुण बाकी नहीं रहता। बिना जाने ही उसमें सद‍्गुण, सदाचार अपने-आप आ जाते हैं।

‘राम’ नाम जपनेवाले जितने सन्त महात्मा हुए हैं। आप विचार करके देखो! उनमें कितनी ऋद्धि-सिद्धि, कितनी अलौकिक विलक्षणता आ गयी थी! ‘राम’ नाम जपमें अलौकिकता है, तब न उनमें आयी? नहीं तो कहाँसे आती? इसलिये यह ‘राम’ नाम गुणोंका खजाना है। यह सत्त्व, रज और तमसे रहित है और गुणोंके सहित भी है एवं व्यापक भी है। यहाँ इस प्रकार ‘राम’ नाम में ‘र’, ‘आ’ और ‘म’ इन तीन अक्षरोंकी महिमाका वर्णन हुआ और तीनोंकी महिमा कहकर उनकी विलक्षणता बतलायी। यहाँतक ‘राम’ नामके अवयवोंका एक प्रकरण हुआ। अब गोस्वामीजी ‘राम’ नामकी महिमा कहना प्रारम्भ करते हैं—

महामन्त्रकी महिमा

महामंत्र जोइ जपत महेसू।

कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा १९। ३)

यह ‘राम’ नाम महामन्त्र है, जिसे ‘महेश्वर’—भगवान् शंकर जपते हैं और उनके द्वारा यह ‘राम’ नाम-उपदेश काशीमें मुक्तिका कारण है। ‘र’,‘आ’ और ‘म’—इन तीन अक्षरोंके मिलनेसे यह ‘राम’ नाम तो हुआ ‘महामन्त्र’ और बाकी दूसरे सभी नाम हुए साधारण मन्त्र।

सप्तकोट्यो महामन्त्राश्चित्तविभ्रमकारका:।

एक एव परो मन्त्रो ‘राम’ इत्यक्षरद्वयम्॥

सात करोड़ मन्त्र हैं, वे चित्तको भ्रमित करनेवाले हैं। यह दो अक्षरोंवाला ‘राम’ नाम परम मन्त्र है। यह सब मन्त्रोंमें श्रेष्ठ मंत्र है। सब मंत्र इसके अन्तर्गत आ जाते हैं। कोई भी मन्त्र बाहर नहीं रहता। सब शक्तियाँ इसके अन्तर्गत हैं।

यह ‘राम’ नाम काशीमें मरनेवालोंकी मुक्तिका हेतु है। भगवान् शंकर मरनेवालोंके कानमें यह ‘राम’ नाम सुनाते हैं और इसको सुननेसे काशीमें उन जीवोंकी मुक्ति हो जाती है। एक सज्जन कह रहे थे कि काशीमें मरनेवालोंका दायाँ कान ऊँचा हो जाता है—ऐसा मैंने देखा है। मानो मरते समय दायें कानमें भगवान् शंकर ‘राम’ नाम मन्त्र देते हैं। इस विषयमें सालगरामजीने भी कहा है—

जग में जितेक जड़ जीव जाकी अन्त समय,

जम के जबर जोधा खबर लिये करे।

काशीपति विश्वनाथ वाराणसी वासिन की,

फाँसी यम नाशन को शासन दिये करे॥

मेरी प्रजा ह्वेके किम पे हैं काल दण्डत्रास,

सालग विचार महेश यही हिये करे।

तारककी भनक पिनाकी यातें प्रानिन के,

प्रानके पयान समय कानमें किये करे॥

जब प्राणोंका प्रयाण होता है तो उस समय भगवान् शंकर उस प्राणीके कानमें ‘राम’ नाम सुनाते हैं। क्यों सुनाते हैं? वे यह विचार करते हैं कि भगवान‍्से विमुख जीवोंकी खबर यमराज लेते हैं, वे सबको दण्ड देते हैं; परन्तु मैं संसारभरका मालिक हूँ। लोग मुझे विश्वनाथ कहते हैं और मेरे रहते हुए मेरी इस काशीपुरीमें आकर यमराज दण्ड दे तो यह ठीक नहीं है। अरे भाई! किसीको दण्ड या पुरस्कार देना तो मालिकका काम है। राजाकी राजधानीमें बाहरसे दूसरा आकर ऐसा काम करे तो राजाकी पोल निकलती है न! सारे संसारमें नहीं तो कम-से-कम वाराणसीमें जहाँ मैं बैठा हूँ, यहाँ आकर यमराज दखल दे—यह कैसे हो सकता है।

काशीमें ‘वरुणा’ और ‘असी’ दोनों नदियाँ गंगाजीमें आकर मिलती हैं। उनके बीचका क्षेत्र ‘वाराणसी’ है। इस क्षेत्रमें ‘मण्डूकमत्स्या: कृमयोऽपि काश्यां त्यक्त्वा शरीरं शिवमाप्नुवन्ति।’ मछली हो या मेढक हो या अन्य कोई जीव-जन्तु हों, आकाशमें रहनेवाले हों या जलमें रहनेवाले हों या थलमें रहनेवाले जीव हों, उनको भगवान् शंकर मुक्ति देते हैं। यह है काशीवासकी महिमा! काशीकी महिमा बहुत विशेष मानी गयी है। यहाँ रहनेवाले यमराजकी फाँसीसे दूर हो जायँ, इसके लिये शंकरभगवान् हरदम सजग रहते हैं। मेरी प्रजाको कालका दण्ड न मिले—ऐसा विचार हृदयमें रखते हैं।

अध्यात्मरामायणमें भगवान् श्रीरामकी स्तुति करते हुए भगवान् शंकर कहते हैं—जीवोंकी मुक्तिके लिये आपका ‘राम’ नामरूपी जो स्तवन है, अन्त समयमें मैं इसे उन्हें सुना देता हूँ, जिससे उन जीवोंकी मुक्ति हो जाती है—‘अहं हि काश्यां.. दिशामि मन्त्रं तव रामनाम॥’

जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं।

अंत राम कहि आवत नाहीं॥

अन्त समयमें ‘राम’ कहनेसे वह फिर जन्मता-मरता नहीं। ऐसा ‘राम’ नाम है। भगवान‍्ने ऐसा मुक्तिका क्षेत्र खोल दिया। कोई भी अन्नका क्षेत्र खोले तो पासमें पूँजी चाहिये। बिना पूँजीके अन्न कैसे देगा? भगवान् शंकर कहते हैं—‘हमारे पास ‘राम’ नामकी पूँजी है। इससे जो चाहे मुक्ति ले लो।’

मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर।

जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न॥

यह काशी भगवान् शंकरका मुक्ति-क्षेत्र है। यह ‘राम’ नामकी पूँजी ऐसी है कि कम होती ही नहीं। अनन्त जीवोंकी मुक्ति कर देनेपर भी इसमें कमी नहीं आती। आवे भी तो कहाँसे! वह अपार है, असीम है। नामकी महिमा कहते-कहते गोस्वामीजी महाराज हद ही कर देते हैं। वे कहते हैं—

कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई।

रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २६। ८)

भगवान् श्रीराम भी नामका गुण नहीं गा सकते। इतने गुण ‘राम’ नाममें हैं। ‘महामन्त्र जोइ जपत महेसू’—इसका दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि यह महामन्त्र इतना विलक्षण है कि महामन्त्र ‘राम’ नाम जपनेसे ‘ईश’ भी महेश हो गये। महामन्त्रका जप करनेसे आप भी महेशके समान हो सकते हैं। इसलिये बहिनों, माताओं एवं भाइयोंसे कहना है कि रात-दिन, उठते-बैठते, चलते-फिरते हरदम अपने तो ‘राम’ नाम लेते ही रहो। भगवान‍्का नाम है तो सीधा-सादा; परन्तु इससे स्थिति बड़ी विलक्षण हो जाती है।