प्रवचन—२
भगवान् शंकरने ‘राम’ नामके प्रभावसे काशीमें मुक्तिका क्षेत्र खोल दिया और इसी महामन्त्रके जपसे ईशसे ‘महेश’ हो गये। अब आगे गोस्वामीजी महाराज कहते हैं—
महिमा जासु जान गनराऊ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा १९। ४)
सम्पूर्ण त्रिलोकीकी प्रदक्षिणा करके जो सबसे पहले आ जाय, वही सबसे पहले पूजनीय हो—देवताओंमें ऐसी शर्त होनेसे गणेशजी निराश हो गये, पर नारदजीके कहनेसे गणेशजीने ‘राम’ नाम पृथ्वीपर लिखकर उसकी परिक्रमा कर ली। इस कारण उनकी सबसे पहले परिक्रमा मानी गयी। नामकी ऐसी महिमा जाननेसे गणेशजी सर्वप्रथम पूजनीय हो गये। आगे गोस्वामीजी कहते हैं—
जान आदिकबि नाम प्रतापू।
भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा १९। ५)
सबसे पहले श्रीवाल्मीकिजीने ‘रामायण’ लिखी है, इसलिये वे ‘आदिकवि’ माने जाते हैं। उलटा नाम (मरा-मरा) जप करके वाल्मीकिजी एकदम शुद्ध हो गये। उनके विषयमें ऐसी बात सुनी है कि वे लुटेरे थे। रास्तेमें जो कोई मिलता, उसको लूट लेते और मार भी देते। एक बार संयोगवश देवर्षि उधर आ गये। उनको भी लूटना चाहा तो देवर्षिने कहा—‘तुम क्यों लूट-मार करते हो? यह तो बड़ा पाप है।’ वह बोला—‘मैं अकेला थोड़े ही हूँ, घरवाले सभी मेरी कमाई खाते हैं। सभी पापके भागीदार बनेंगे।’ देवर्षिने कहा—‘भाई, पाप करनेवालेको ही पाप लगता है। सुखके, पुण्यके, धनके भागी बननेको तो सभी तैयार हो जाते हैं; परंतु बदलेमें कोई भी पापका भागी बननेके लिये तैयार नहीं होगा। तू अपने माँ-बाप, स्त्री-बच्चोंसे पूछ तो आ।’ वह अपने घर गया। उसके पूछनेपर माँ बोली—‘तेरेको पाल-पोसकर बड़ा किया, अब भी तू हमें पाप ही देगा क्या?’ उसने कहा—‘माँ! मैं आपलोगोंके लिये ही तो पाप करता हूँ।’ सब घरवाले बोले—‘हम तो पापके भागीदार नहीं बनेंगे।’
तब वह जाकर देवर्षिके चरणोंमें गिर गया और बोला— ‘महाराज! मेरे पापका कोई भी भागीदार बननेको तैयार नहीं हैं।’ देवर्षिने कहा—‘भाई! तुम भजन करो, भगवान्का नाम लो’, परंतु भयंकर पापी होनेके कारण मुँहसे प्रयास करनेपर भी ‘राम’ नाम उच्चारण नहीं कर सका। उसने कहा—‘यह मरा, मरा, मरा। ऐसा मेरा अभ्यास है, इसलिये ‘मरा’ तो मैं कह सकता हूँ।’ देवर्षिने कहा कि ‘अच्छा, ऐसा ही तुम कहो।’ तो ‘मरा-मरा’ करने लगा। इस प्रकार उलटा नाम जपनेसे भी वे सिद्ध हो गये, महात्मा बन गये, आदिकवि बन गये। ‘राम’ नाम महामन्त्र है, उसे ठीक सुलटा जपनेसे तो पुण्य होता ही है, पर उलटे जपसे भी पुण्य होता है।
उलटा नामु जपत जगु जाना।
बालमीकि भए ब्रह्म समाना॥
(मानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा १९४। ८)
सहस नाम सम सुनि सिव बानी।
जपि जेईं पिय संग भवानी॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा १९। ६)
‘राम’ नाम सहस्रनामके समान है, भगवान् शंकरके इस वचनको सुनकर पार्वतीजी सदा उनके साथ ‘राम’ नाम जपती रहती हैं। पद्मपुराणमें एक कथा आती है। पार्वतीजी सदा ही विष्णुसहस्रनामका पाठ करके ही भोजन किया करतीं। एक दिन भगवान् शंकर बोले—‘पार्वती! आओ भोजन करें।’ तब पार्वतीजी बोलीं—‘महाराज! मेरा अभी सहस्रनामका पाठ बाकी है।’ भगवान् शंकर बोले—
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने॥
पद्मपुराणके उस विष्णुसहस्रनाममें यह श्लोक आया है। राम, राम, राम—ऐसे तीन बार कहनेसे पूर्णता हो जाती है। ऐसा जो ‘राम’ नाम है, हे वरानने! हे रमे! रामे मनोरमे, मैं सहस्रनामके तुल्य इस ‘राम’ नाममें ही रमण कर रहा हूँ। तुम भी उस ‘राम’ नामका उच्चारण करके भोजन कर लो। हर समय भगवान् शंकर राम, राम, राम, जप करते रहते हैं। पार्वतीजीने भी फिर ‘राम’ नाम ले लिया और भोजन कर लिया।
नारद-राम-संवाद
अरण्यकाण्डमें ऐसा वर्णन आया है—श्रीरामजी लक्ष्मणजीके सहित, सीताजीके वियोगमें घूम रहे थे। वे घूमते-घूमते पम्पा सरोवर पहुँच गये। तो नारदजीके मनमें बात आयी कि मेरे शापको स्वीकार करके भगवान् स्त्री-वियोगमें घूम रहे हैं। उन्होंने देखा कि अभी बड़ा सुन्दर मौका है, एकान्त है। इस समय जाकर पूछें, बात करें। नारदजीने भगवान्को ऐसा शाप दिया कि आपने मेरा विवाह नहीं होने दिया तो आप भी स्त्रीके लिये रोते फिरोगे। भगवान्ने शाप स्वीकार कर लिया, परंतु नारदजीका अहित नहीं होने दिया।
यहाँ नारदजीने पूछा—‘महाराज! उस समय आपने मेरा विवाह क्यों नहीं होने दिया?’ तो भगवान्ने कहा—‘भैया! एक मेरे ज्ञानी भक्त होते हैं और दूसरे छोटे ‘दास’ भक्त होते हैं; परंतु उन दासोंकी, प्यारे भक्तोंकी मैं रखवाली करता हूँ।’
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी।
जिमि बालक राखइ महतारी॥
मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी।
बालक सुत सम दास अमानी॥
(मानस, अरण्यकाण्ड, दोहा ४३। ५, ८)
ज्ञानी भक्त बड़े बेटे हैं। अमानी भक्त छोटे बालकके समान हैं। जैसे, छोटे बालकका माँ विशेष ध्यान रखती है कि यह कहीं साँप, बिच्छू, काँटा न पकड़ ले, कहीं गिर न जाय। वह उसकी विशेष निगाह रखती है, ऐसे ही मैं अपने दासोंकी निगाह रखता हूँ। माँ प्यारसे बच्चेको खिलाती-पिलाती है, प्यार करती है, गोदमें लेती है। परंतु बच्चेको नुकसानवाली कोई बात नहीं करने देती। अपने मनकी बात न करने देनेसे बच्चा कभी-कभी क्या करता है कि गुस्सेमें आकर माँके स्तनको मुँहमें लेते समय काट लेता है, फिर भी माँ उसके मनकी बात नहीं होने देती। माँ इतनी हितैषिणी होती है कि उसका स्तन काटनेपर भी बालकपर स्नेह रखती है, गुस्सा नहीं करती। वह तो फिर भी दूध पिलाती है। वह उसकी परवाह नहीं करती और अहित नहीं होने देती।
इसी तरह भगवान्ने नारदजीके मनकी बात नहीं होने दी तो उन्होंने भगवान्को ही शाप दे दिया। छोटे बालक ही तो ठहरे! काट गये। फिर भी माँ प्यार करती है और थप्पड़ भी देती है तो प्यार भरे हाथसे देती है। माँ गुस्सा नहीं करती है कि काटता क्यों है! ऐसे ही पहले नारदजीने शाप तो दे दिया; परंतु फिर पश्चात्ताप करके बोले—‘प्रभु! मेरा शाप व्यर्थ हो जाय। मेरी गलती हुई, मुझे माफ कर दो।’ भगवान्ने कहा—‘मम इच्छा कह दीनदयाला’—मेरी ऐसी ही इच्छा थी। भगवान् इस प्रकार कृपा करते हैं।
पम्पासरोवरपर भगवान्की वाणी सुनकर नारदजीको लगा कि भगवान् प्रसन्न हैं। अभी मौका है। तब बोले कि ‘मुझे एक वर दीजिये।’ भगवान् बोले—‘कहो भाई! क्या वरदान चाहते हो?’ नारदजीने कहा—
राम सकल नामन्ह तें अधिका।
होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥
(मानस, अरण्यकाण्ड, ४२।८)
आपका जो नाम है, वह सब नामोंसे अधिक हो जाय और बधिकके समान पापरूपी पक्षियोंका नाश करनेवाला हो जाय। भगवान्के हजारों नाम हैं, उन नामोंकी गणना नहीं की जा सकती। ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ (मानस, बालकाण्ड, १४०।५) भगवान् अनन्त हैं, भगवान्की कथा अनन्त है तो भगवान्के नाम सान्त (सीमित) कैसे हो जायँगे?
राम अनंत अनंत गुनानी।
जन्म कर्म अनंत नामानी॥
(मानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ५२।३)
विष्णुसहस्रनाममें आया है—
‘यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मन:।’
भगवान्के गुण आदिको लेकर कई नाम आये हैं। उनका जप किया जाय तो भगवान्के गुण, प्रभाव, तत्त्व, लीला आदि याद आयेंगे। भगवान्के नामोंसे भगवान्के चरित्र याद आते हैं। भगवान्के चरित्र अनन्त हैं। उन चरित्रोंको लेकर नाम भी अनन्त होंगे। गुणोंको लेकर जो नाम हैं, वे भी अनन्त होंगे। अनन्त नामोंमें सबसे मुख्य ‘राम’ नाम है। वह खास भगवान्का ‘राम’ नाम हमें मिल गया तो समझना चाहिये कि बहुत बड़ा काम हो गया।
शिव-पार्वतीका नाम-प्रेम
हरषे हेतु हेरि हर ही को।
किय भूषन तिय भूषन ती को॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा १९।७)
‘राम’ नामके प्रति पार्वतीजीके हृदयकी ऐसी प्रीति देखकर भगवान् शंकर हर्षित हो गये और उन्होंने स्त्रियोंमें भूषणरूप (पतिव्रताओंमें शिरोमणि) पार्वतीजीको अपना भूषण बना लिया अर्थात् उन्हें अपने अंगमें धारण करके अर्धांगिनी बना लिया। किसी स्त्रीकी बड़ाई की जाय तो उसे ‘सती’ की उपमा देकर कहा जाता है कि यह बड़ी सती-साध्वी है। परंतु ‘राम’ नाममें हृदयकी प्रीति होनेसे वे पतिव्रताओंमें शिरोमणि हो गयीं। जितनी कन्याएँ हैं, वे सब-की-सब सती (पार्वती) जीकी पूजन करती हैं कि जिससे हमें अच्छा वर मिले, अच्छा घर मिले, हम सुखी हो जायँ।
जगज्जननी जानकीजी भी पार्वतीजीका पूजन करती हैं। उनकी माँ सुनयनाजी कहती हैं—‘जाओ बेटी! सतीका पूजन करो।’ सीताजी सतीका पूजन करती हैं और अपने मनचाहा वर माँगती हैं। सतीका पूजन करनेसे श्रेष्ठ वर मिलता है। सती सब स्त्रियोंका गहना है। सतीका नाम ले तो पतिव्रता बन जाय, इतना उसका प्रभाव है। उस सतीको भगवान् शंकरने खुश होकर अपनी अर्धांगिनी बना लिया। आपने ‘अर्द्धनारीश्वर’ भगवान् शंकरका चित्र देखा होगा। एक तरफ आधी मूँछ है और दूसरी तरफ ‘नथ’ है। वाम भाग पार्वतीका शरीर और दाहिना भाग भगवान् शंकरका शरीर है।
एक कविने इस विचित्ररूपके विषयमें बड़ा सुन्दर लिखा है—
निपीय स्तनमेकं च मुहुरन्यं पयोधरम्।
मार्गन्तं बालमालोक्याश्वासयन्तौ हि दम्पती॥
बालक माँका स्तन चूँगता (पीता) है तो मुँहमें एक स्तनको लेता है और दूसरेको टटोलकर हाथमें पकड़ लेता है कि कहीं कोई दूसरा लेकर पी न जाय, इसका दूध भी मैं ही पीऊँगा। इसी प्रकार गणेशजी भी ऐसे एक बार माँका एक स्तन पीने लगे और दूसरा स्तन टटोलने लगे, पर वह मिले कहाँ? उधर तो बाबाजी बैठे हैं, माँ तो है ही नहीं। अब वे दूसरा स्तन खोजते हैं दूध पीनेके लिये, तो माँने कहा—‘बेटा! एक ही पी ले। दूसरा कहाँसे लाऊँ।’ ऐसे शंकरभगवान् अर्द्धनारीश्वर बने हुए हैं।
भगवान् शंकरने ‘राम’ नाम-जप करनेवाली सती पार्वतीको अपने अंगका भूषण ही बना लिया। ‘राम’ नामपर उनका बहुत ज्यादा स्नेह है—ऐसा देखकर पार्वतीजीने पूछा—
तुम्ह पुनि राम राम दिन राती।
सादर जपहु अनँग आराती॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा १०८। ७)
‘आप तो महाराज! रात-दिन आदरपूर्वक ‘राम-राम-राम’ जप कर रहे हैं। एक-एक नाम लेते-लेते उसमें आपकी श्रद्धा, प्रेम, आदर उत्तरोत्तर बढ़ता ही जा रहा है। ‘दिन राती’—न रातका ख्याल है, न दिनका। वह नाम किसका है? वह ‘राम’ नाम क्या है महाराज?’ ऐसा पार्वतीके पूछनेपर शिवजीने श्रीरामजीकी कथा सुनायी।
रचि महेस निज मानस राखा।
पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा ३५। ११)
पहले भगवान् श्रीशंकरने राम-कथाको रचकर अपने मनमें ही रखा। वे दूसरोंको सुनाना नहीं चाहते थे, पर फिर अवसर पाकर उन्होंने यह राम-कथा पार्वतीजीको सुनायी।
भगवान् शंकरका ‘राम’ नामपर इतना स्नेह है कि ‘चिताभस्मालेप:’—वे मुर्देकी भस्म अपने शरीरपर लगाते हैं। इस विषयमें एक बात सुनी है—कोई एक आदमी मर गया, लोग उसे श्मशान ले जा रहे थे और ‘राम-नाम सत् है’—ऐसा उच्चारण कर रहे थे। शंकरने देखा कि यह कोई भक्त है, जो इसके प्रभावसे ले जानेवाले ‘राम’ नाम बोल रहे हैं। बड़ी अच्छी बात है, वे उनके साथमें हो गये। ‘राम’ नामकी ध्वनि सुने तो ‘राम’ नामके प्रेमी साथ हो ही जायँ। जैसे—पैसोंकी बात सुनकर पैसोंके लोभी उधर खिंच जाते हैं, सोनेकी बात सुनते ही सोनेके लोभीके मनमें आती है कि हमें भी सोना मिले और गहना बनवायें, इसी प्रकार भगवान् शंकरका मन भी ‘राम’ नाम सुनकर उन लोगोंकी तरफ खिंच गया।
अब लोगोंने मुर्देको श्मशानमें ले जाकर जला दिया और पीछे जब अपने-अपने घर लौटने लगे तो भगवान् शंकरने सोचा—‘क्या बात है? ये आदमी तो वे-के-वे ही हैं; परंतु नाम कोई लेता ही नहीं!’ उनके मनमें आया कि उस मुर्देमें ही करामात थी, उसके कारण ही ये सब लोग ‘राम’ नाम ले रहे थे। वह मुर्दा कितना पवित्र होगा! भगवान् शंकरने श्मशानमें जाकर देखा, वह तो जलकर राख हो गया। इसलिये उन्होंने उस मुर्देकी भस्म अपने शरीरमें लगा ली और वहाँ ही रहने लगे। अत: राखमें ‘रा’ और मुर्देमें ‘म’ इस तरह ‘राम’ हो गया। ‘राम’ नाम उन्हें बहुत प्यारा लगता है। ‘राम’ नाम सुनकर वे खुश हो जाते हैं, प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिये मुर्देकी राख अपने अंगोंमें लगाते हैं। किसी कविने कहा है—
रुचिर रकार बिन तज दी सती सी नार,
किनी नाहीं रति रुद्र पायके कलेश को।
गिरिजा भई है पुनि तप ते अपर्णा तबे,
कीनी अर्धंगा प्यारी लगी गिरिजेश को॥
विष्नु पदी गंगा तउ धूर्जटी धरि न सीस,
भागीरथी भई तब धारी है अशेष को।
बार बार करत रकार और मकार ध्वनि,
पूरण है प्यार राम-नाम पे महेश को॥
—सबसे श्रेष्ठ सती है, पर उनके नाममें ‘स’ और ‘त’ है, पर ‘र’ और ‘म’ तो है ही नहीं। इस कारण भगवान् शंकरने सतीको छोड़ दिया। वे सतीका त्याग कर देनेसे अकेले दु:ख पा रहे हैं। उनका मन भी अकेले नहीं लगा। इस कारण काकभुशुण्डिजीके यहाँ हंस बनकर गये और उनसे ‘रामचरित’ की कथा सुनी। ऐसी बात आती है कि एक बार सतीने सीताजीका रूप धारण कर लिया था, इस कारण उन्होंने फिर सतीसे प्रेम नहीं किया और साथमें रहते हुए भी उन्हें अपने सामने आसन दिया, सदाकी तरह बायें भागमें आसन नहीं दिया। फिर सतीने जब देह-त्याग कर दिया तो वे उसके वियोगमें व्याकुल हो गये।
सतीने पर्वतराज हिमाचलके यहाँ ही जन्म लिया और कोई देवता नहीं थे क्या? परंतु उनकी पुत्री होनेसे सतीको गिरिजा, पार्वती नाम मिला और तभी इन नामोंमें ‘र’ कार आया। इतनेपर भी भगवान् शंकर मुझे स्वीकार करेंगे या नहीं, क्या पता? इसलिये तपस्या करने लगी।
पुनि परिहरे सुखानेउ परना।
उमहि नामु तब भयउ अपरना॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा ७४। ७)
जब पार्वतीने सूखे पत्ते खाने भी छोड़ दिये तब उसका नाम ‘अपर्णा’ हो गया। किसी तरहसे मेरे नाममें ‘र’ आ जाय। पार्वतीकी ऐसी प्रीति देखकर भगवान् शंकर इतने प्रसन्न हुए कि इन्हें दूर रखना ही नहीं चाहते हैं—ऐसा विचार करके उन्हें अपने अंगमें ही मिला लिया—‘विष्णु पदी गंगा तउ धूर्जटी धरि न सीस पर’—पृथ्वीपर लानेके लिये भगीरथने गंगाजीकी तपस्या की, उसके कारण गंगाजीका ‘भागीरथी’ नाम पड़ गया। भगवान् शंकरने गंगाजी (भागीरथी)-को अपनी जटामें रमा लिया—‘जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरीविलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि’—जैसे कड़ाहमें पानी डालें तो वह उसमें ही घूमता रहता है, ऐसे ही भगवान् शंकरकी जटामें गंगा घूमने लगी। उनके मनमें था कि मेरे वेगको कौन रोक सकता है! मैं उसे ले जाऊँ पातालमें। भगवान् शंकरने उन्हें अपनी जटामें ही रख लिया। जटामें वे घूमती रहीं। भगीरथकी पीढ़ियाँ गुजर गयीं। उसने भगवान् शंकरसे प्रार्थना की, तब उन्होंने थोड़ी-सी जटा खोली, उसमेंसे तीन धाराएँ निकलीं। एक स्वर्गमें गयी, एक पातालमें गयी और एक पृथ्वी लोकमें आयी, इस कारण इसका नाम ‘त्रिपथगामिनी’ पड़ा।
‘राम’ नाममें भगवान् शंकरका विशेष प्रेम है। नामके प्रभावसे ही पार्वतीको उन्होंने अपना भूषण बना लिया।
नाम प्रभाउ जान सिव नीको।
कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा १९। ८)
वे नामके प्रभावको ठीकसे जानते हैं। समुद्रका मंथन किया गया, उसमेंसे सबसे पहले जहर निकला तो सब देवता-असुर घबरा गये। उन्होंने भगवान् शंकरको याद किया और कहा—‘भोले बाबा! दुनिया मर रही है, बचाओ!’ उन्होंने ‘राम’ नामके सम्पुटमें उस हलाहल जहरको कण्ठमें रख लिया। ‘रा’ लिखकर बीचमें जहर रख लिया और ऊपर ‘म’ लिख दिया तो अमृतका काम कर दिया उस जहरने। जो स्पर्श करनेसे भी मार दे ऐसा हलाहल जहर। उससे भगवान् शंकर नीलकण्ठ हो गये। जहर तो अपना काम करे ही। बस, कण्ठमें ही उसको रोक लिया। जहर बाहर आ जाय तो मुँह कड़वा कर दे और भीतर चला जाय तो मार दे। ऐसे ‘राम’ नामने शिवजीको अमर बना दिया। अब आगे गोस्वामीजी महाराज कहते हैं—
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू।
लोक लाहु परलोक निबाहू॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा २०। २)
सुमिरन करनेमें ‘राम’ नाम कठिन नहीं है। ‘रा’ और ‘म’—ये दोनों अक्षर उच्चारण करनेमें सुगम हैं; क्योंकि ये अक्षर अल्पप्राण हैं। जिनमें प्राण कम खर्च होते हैं, वे अक्षर अल्पप्राण कहे जाते हैं। ‘र’ का उच्चारण जितना सुगमतासे कर सकते हैं, उतना ‘ह’ का नहीं कर सकते; क्योंकि ‘ह’ महाप्राण है। जैसे ख, फ, छ, ठ, थ—प्रत्येक वर्गका दूसरा और चौथा अक्षर महाप्राण है। पहला, तीसरा और पाँचवाँ अक्षर अल्पप्राण है। ‘क’ बहुत समयतक कह सकते हैं, पर ‘ख’ इतने समयतक नहीं कह सकते। बहुत जल्दी खतम हो जायँगे प्राण; क्योंकि महाप्राण है वह। पाँचवाँ अक्षर (‘ञ, म, ङ, ण, न’)—अल्पप्राण है और ‘यणश्चाल्पप्राणा:’ य, र, ल, व भी अल्पप्राण हैं। अल्पप्राणवाला अक्षर उच्चारण करनेमें सुगम होता है और उसका उच्चारण भी ज्यादा देर हो सकता है। महाप्राणवाले अक्षरमें बहुत जल्दी प्राण खतम हो जाते हैं। अत: अल्पप्राणवाले अक्षरोंके समान दूसरे नाम उतनी देरतक नहीं ले सकते। इस कारण ‘राम’ नाम अल्पप्राण होनेसे उच्चारण करनेमें सुगम है।
नाममें अरुचिका कारण
वाल्मीकिजीको अल्पप्राणवाला नाम भी क्यों नहीं आया? कारण क्या था? ध्यान दें! ‘राम’ नाम उच्चारण करनेमें सुगम है; परंतु जिसके पाप अधिक हैं, उस पुरुषद्वारा नाम-उच्चारण कठिन हो जाता है। एक कहावत है—
मजाल क्या है जीव की, जो राम-नाम लेवे।
पाप देवे थाप की, जो मुण्डो फोर देवे॥
जिनका अल्प पुण्य होता है, वे ‘राम’ नाम ले नहीं सकते। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी आया है—
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता:॥
(७। २८)
जिनके पाप नष्ट हो गये हैं, वे ही दृढ़व्रत होकर भगवान्के भजनमें लग सकते हैं। ‘राम’ नामके विषयमें भी ऐसी ही बातें शास्त्रोंमें पढ़ते हैं, संतोंसे सुनते हैं। ऐसी ही हमने एक घटना सुनी है—
बाँकुड़ाकी बात है। एक सज्जन थे श्रीबद्रीदासजी गोयन्दका। वे अपनी बीती घटना सुनाने लगे। एक बूढ़ा बंगाली सरोवरके किनारे मछलियाँ पकड़ रहा था। श्रीजयदयालजी गोयन्दका एवं श्रीबद्रीदासजीने उसे देखा और कहा—‘यह बूढ़ा हो गया, बेचारा भजनमें लग जाय तो अच्छा है।’ उससे जाकर कहा कि तुम भगवन्नाम-उच्चारण करो तो उसे ‘राम’ नाम आया नहीं। वह मेहनत करनेपर भी सही उच्चारण नहीं कर सका। कई नाम बतानेके बाद अन्तमें ‘होरे-होरे’ कहने लगा। इस नामका उससे उच्चारण हुआ और कोई नाम आया ही नहीं। उससे पूछा गया कि ‘तुम्हें एक दिनमें कितने पैसे मिलते हैं?’ उसने बताया कि इतनी मछलियाँ मारनेसे इतने पैसे मिलते हैं। तो उन्होंने कहा कि ‘उतने पैसोंके चावल हम तुम्हें दे देंगे। तुम हमारी दूकानमें बैठकर दिनभर होरे-होरे (हरि-हरि) किया करो।’ उसको किसी तरह ले गये दूकानपर। वह एक दिन तो बैठा। दूसरे दिन देरसे आया और तीसरे दिन आया ही नहीं। फिर दो-तीन दिन बाद जाकर देखा, वह उसी जगह धूपमें मछली पकड़ता हुआ मिला। उन्होंने उसे कहा कि ‘तू वहाँ दूकानमें छायामें बैठा था। क्या तकलीफ थी? तुमको यहाँ जितना मिलता है, उतना अनाज दे देंगे, केवल दिनभर बैठा हरि-हरि कीर्तन किया कर।’ उसने कहा—‘मेरेसे यह नहीं होगा।’ वह दूकानपर बैठ नहीं सका। ऐसी बीती हुई घटना बतायी। हमारे विश्वास हुआ कि बात तो ठीक है भाई! पापीका शुभ काममें लगना कठिन होता है। श्रीतुलसीदासजी महाराजने कहा है—
तुलसी पूरब पाप ते हरि चर्चा न सुहात।
जैसे ज्वर के जोरसे भूख बिदा हो जात॥
जब ज्वर (बुखार)-का जोर होता है तो अन्न अच्छा नहीं लगता। उसको अन्नमें भी गन्ध आती है। जैसे भीतरमें बुखारका जोर होता है तो अन्न अच्छा नहीं लगता, वैसे ही जिसके पापोंका जोर ज्यादा होता है, वह भजन कर नहीं सकता, सत्संगमें जा नहीं सकता।
इसलिये सज्जनो! एक बातपर आप ध्यान दें। जो भाई सत्संगमें रुचि रखते हैं, सत्संगमें जाते हैं, नाम लेते हैं, जप करते हैं, उन पुरुषोंको मामूली नहीं समझना चाहिये। वे साधारण आदमी नहीं हैं। वे भगवान्का भजन करते हैं, शुद्ध हैं और भगवान्के कृपा-पात्र हैं। परंतु जो भगवान्की तरफ चलते हैं, उनको अपनी बहादुरी नहीं माननी चाहिये कि हम बड़े अच्छे हैं। हमें तो भगवान्की कृपा माननी चाहिये, जिससे हमें सत्संग, भजन-ध्यानका मौका मिलता है। हमें ऐसा समझना चाहिये कि ऐसे कलियुगके समयमें हमें भगवान्की बात सुननेको मिलती है, हम भगवान्का नाम लेते हैं, हमपर भगवान्की बड़ी कृपा है।
जैसे नदीका प्रवाह समुद्रकी तरफ जा रहा है, ऐसे ही इस समय संसारका प्रवाह नरकोंकी तरफ बड़े जोरोंसे जा रहा है। पढ़ाईमें, रस्म-रिवाजमें, कानून-कायदोंमें, व्यापार आदि कार्योंमें जहाँ कहीं भी देखो, पापका बड़े जोरोंसे प्रवाह चल रहा है। गोस्वामीजीने वर्णन किया है—
कलि केवल मल मूल मलीना।
पाप पयोनिधि जन मन मीना॥
(मानस, बालकाण्ड, २७। ४)
कलियुगमें ऐसा जोरोंसे पाप छा जायगा कि मनुष्योंका मन जलमें मछलीकी तरह पापोंमें रम जायगा अर्थात् जैसे मछलीको जलसे दूर कर देनेपर वह घबरा जाती है, उसको पहले अगर यह समझमें आ जाय कि तुम्हें जलसे दूर कर देंगे तो वह घबरा जायगी; क्योंकि वह जलके बिना जी नहीं सकती, ऐसे ही ‘पाप पयोनिधि’—पापरूपी तो हुआ समुद्र और उसमें ‘जन मन मीना’—मनुष्योंका मन मछली हो गया।
आज अगर कहा जाय कि ब्लैक मत करो, झूठ-कपट मत करो, बेईमानी मत करो, न्यायसे काम करो तो कहते हैं, ‘महाराज! झूठ-कपटके बिना आजके जमानेमें काम नहीं चलता। ईमानदारीसे अगर काम करें तो बड़ी मुश्किल हो जायगी। हमारेसे यह नहीं होगा।’ पापसे दूर करनेकी बात सुनते ही काँपते हैं। वे डरते हैं कि पाप अगर छोड़ देंगे तो गजब हो जायगा, फिर तो, हमारा निर्वाह होगा ही नहीं। हमारा तो झूठ-कपट-बेईमानीसे ही काम चलता है।
इन बातोंसे ऐसा नहीं मानना चाहिये कि दुराचारी-पापी, अन्यायी मनुष्य भजनमें नहीं लग सकता। गीता तो कहती है—
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥
(गीता ९। ३०)
सांगोपांग दुराचारी भी यदि पक्का विचार करके भजनमें लग जाय तो उसे मामूली आदमी नहीं समझना चाहिये। भगवान् कहते हैं—‘उसे साधु ही मानना चाहिये; क्योंकि उसने निश्चय पक्का कर लिया।’
भगवान्ने गीतामें चार प्रकारके भक्त बताये हैं—‘आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ’—‘आर्त’ और ‘अर्थार्थी,’ भक्त भगवान्का नाम लेते हैं। जिज्ञासु भी उनका नाम लेता है। परंतु ज्ञानी तो ‘प्रभुहि बिसेषि पिआरा, ‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्’—वह तो भगवान्की आत्मा ही है।
अर्थार्थी भक्त ध्रुव
संसारका आकर्षण रखनेवाले ‘आर्त’ और ‘अर्थार्थी’ भी भगवान्के ही भक्त होते हैं। परंतु धनके लिये भगवान्का नाम लेनेसे या कोई दु:ख दूर करनेके लिये भगवान्का नाम लेनेसे उसे ‘अर्थार्थी’ या ‘आर्त’ भक्त नहीं कहा जाता। ‘अर्थार्थी’ और ‘आर्त’ भक्त तो वे कहलाते हैं, जो धनके लिये केवल भगवान्के ऊपर ही भरोसा रखते हैं। धन प्राप्त करेंगे तो केवल भगवान्से ही, दूसरे किसीसे नहीं—ऐसा उनका दृढ़ निश्चय होता है।
जैसे, ध्रुवजी महाराजको नारदजीने कहा कि ‘तुम वापस घरपर चलो। हम राजासे कहकर तुम्हारा और तुम्हारी माँका प्रबन्ध करवा देंगे। तुम्हें राज्य भी दिलवा देंगे।’ ध्रुवने जब इस बातको स्वीकार नहीं किया तो, उसे डराया कि देख! जंगलमें बाघ, चीते, सर्प आदि बड़े-बड़े भयंकर जन्तु हैं, वे तुझे खा जायँगे, पर न तो वह डरा और न धनके लोभमें ही आया। ध्रुवजी तो नाम-जपमें लग ही गये, यद्यपि ध्रुवजीकी आरम्भमें शुद्ध भावना नहीं थी। उस समय उनके मनमें राज्यका लोभ था। इस विषयमें श्रीगोस्वामीजी महाराज कहते हैं—
ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ।
पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा २६। ५)
ध्रुवजीने ग्लानिसे (विमाताके वचनोंसे दु:खी होकर सकामभावसे) ‘हरि’ नामका जप किया। विमाताने पिताकी गोदसे उतारकर धक्का देकर निकाल दिया कि ‘जा तू इस गोदमें बैठने लायक नहीं है। तू उस अभागिनकी कोखसे जन्मा है, इसलिये राजाकी गोदमें बैठनेका अधिकारी नहीं है।’ ध्रुव इस बातसे बड़ा दु:खी हुआ। ध्रुवने माँसे पूछा तो उसने भी कहा—‘तेरी छोटी माँने जो बात कही है, वह सच्ची है। तूने और मैंने—दोनोंने ही भजन नहीं किया। तभी तो यह दशा हुई है। नहीं तो हमारी ऐसी दशा क्यों होती!’ ऐसा सुनकर वे भगवान्से ही राज्य लेनेकी इच्छाको लेकर भजनमें लग गये। नारदजीके प्रलोभन और भय दिखानेपर भी वे पीछे नहीं हटे, भजन करनेके लिये जंगलमें चल दिये; क्योंकि वे ध्रुव अर्थात् पक्के थे। ऐसे भक्तोंको ‘अर्थार्थी’ कहा जाता है।
आजकल भी लोग भगवान्से धन चाहते हैं, पर वे केवल भगवान्के भक्त नहीं हैं। साथ-साथ वे भक्त बनते हैं—झूठ, कपट और बेईमानीके। वे कहते हैं—‘हे बेईमानी देवता! हे झूठ देवता! हे कपट देवता! हे ब्लैक देवता! तुम हमें निहाल करो। आपकी कृपासे ही हम जीयेंगे, और जीनेका कोई साधन है नहीं।’ वे भी एक तरहसे अर्थार्थी भक्त हैं, पर हैं वे पापोंके भक्त, भगवान्के नहीं हैं। जो भगवान्का भक्त होगा, वह पाप क्यों करेगा! क्या पाप जितनी भी ताकत भगवान्में नहीं है!
पापसे छूटनेका उपाय
‘पाप पयोनिधि जन मन मीना’—पहले हमारे समझमें यह बात नहीं आयी थी। पापमें मनुष्यका इतना मन कैसे लग जाता है? क्या बात है? परंतु आजकल देखते हैं तो कई जगह यह बात सुननेमें आती है कि बिना पाप-अन्याय किये, झूठ-कपट किये हम जी नहीं सकते। जीवनका आधार पापको मान लिया। ऐसे जो पापोंमें रचे-पचे हैं, उनसे कहा जाय कि ‘तुम नाम-जप करो’ तो बड़ा कठिन हो जायगा। पापीके मुखसे भगवान्का नाम नहीं आता। पाप अधिक होनेके कारण ऐसी दशा हो जाती है।
इस विषयमें मेरे मनमें एक बात आती है। आप भाई-बहन ध्यान दें! हम तो हिम्मत करके ‘राम-राम’ करेंगे ही—ऐसा पक्का निश्चय करके नाम-जपमें लग जाओ तो पाप ठहरेगा नहीं। ये दोनों साथमें नहीं रह सकते। पाप भाग जायगा। भगवान्के नामका आश्रय लेकर यह निश्चय करो कि उसका पाप नष्ट हो जाता है, जो दृढ़ होकर भजन करता है। तो हम भी दृढ़व्रत होकर भजन करेंगे। दृढ़तासे हम भजनमें ही लग जायँगे। तो फिर पाप ठहरेगा नहीं, अशुद्धि टिकेगी नहीं। जैसे सूर्योदय होनेपर अमावस्याकी बड़ी काली रात भी ठहर नहीं सकती, ऐसे ही आपलोग कृपा करके रात-दिन ‘राम’ नाममें लग जाओ तो सब पाप नष्ट हो जायँगे।
एक सन्त थे, उनसे किसीने पूछा—‘महाराज! आप कहते हैं कि पाप मत करो। पाप तो हमसे छूटता नहीं; परंतु हमारेसे पाप छूट जाय—ऐसा कोई उपाय बतलाओ। पाप छोड़नेकी हमारे हिम्मत नहीं होती।’ सन्तने कहा—‘तुम रात-दिन ‘राम-राम’ जपमें ही लग जाओ।’ ‘पाप पयोनिधि जन मन मीना’—ऐसे पापी लोगोंको भी यह उपाय सन्तने बताया। हमने तो परम्परासे सुना। उनसे इतना ही कहा गया कि तुम राम-राम करो। मैंने सोचा कि देखो, सन्तोंकी कितनी गहरी सूझ है, जो सीधा उपाय बता दिया कि राम-राममें लग जाओ। राम-राममें लगनेसे क्या होगा कि ‘राम’ नाम भीतरमें बैठ जायगा। अभी तो बाहरसे होता है।
प्रथम राम रसना सिवर, द्वितीय कण्ठ लगाय।
तृतीय हृदय ध्यान धर, चौथे नाभ मिलाय॥
अध मध उत्तम प्रिय घर ठानु,
चौथे अति उत्तम अस्थानु।
ये चहुँ बिन देखे आसरमा,
राम भगति को पावे मरमा॥
(नाम परचा)
ऐसे जब ‘राम’ नाम भीतर उतरेगा तो भीतर जानेपर वह सब काम कर लेगा। शुद्धि, पवित्रता, निर्मलता, भगवान्की भक्ति—जो आनी चाहिये सब आ जायगी। इसलिये गोस्वामीजी महाराजने बड़ी विचित्र बात लिखी—‘नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी।’ और कुछ नहीं तो जीभसे ही जपो। ‘तज्जपस्तदर्थभावनम्’—भगवान्के नामका जप करे और भीतर-ही-भीतर ध्यान होता रहे—उसका तो फिर कहना ही क्या है! जीभमात्रसे नाम जपनेसे योगी जाग जाता है। जो नामका जप करते हैं, जीभमात्रसे ही, वे भी ब्रह्माजीके प्रपंचसे वियुक्त होकर विरक्त सन्त हो जाते हैं। जीभमात्रसे जप करना है भी सुगम।
बहुत-से लोग कह देते हैं—‘तुम नाम जपते हो तो मन लगता है कि नहीं लगता है? अगर मन नहीं लगता है तो कुछ नहीं, तुम्हारे कुछ फायदा नहीं—ऐसा कहनेवाले वे भाई भोले हैं, वे भूलमें हैं, इस बातको जानते ही नहीं; क्योंकि उन्होंने कभी नाम-जप करके देखा ही नहीं। पहले मन लगेगा, पीछे जप करेंगे—ऐसा कभी हुआ है? और होगा कभी? ऐसी सम्भावना है क्या? पहले मन लग जाय और पीछे ‘राम-राम’ करेंगे—ऐसा नहीं होता। नाम जपते-जपते ही नाम-महाराजकी कृपासे मन लग जाता है ‘हरिसे लागा रहो भाई। तेरे बिगड़ी बात बन जाई, रामजीसे लागा रहो भाई॥’ इसलिये नाम-महाराजकी शरण लेनी चाहिये। जीभसे ही ‘राम-राम-राम’ शुरू कर दो, मनकी परवाह मत करो। ‘परवाह मत करो’—इसका अर्थ यह नहीं है कि मन मत लगाओ। इसका अर्थ यह है कि हमारा मन नहीं लगा, इससे घबराओ मत कि हमारा जप नहीं हुआ। यह बात नहीं है। जप तो हो ही गया, अपने तो जपते जाओ। हमने सुना है—
माला तो करमें फिरे, जीभ फिरे मुख माहिं।
मनवाँ तो चहुँ दिसि फिरे, यह तो सुमिरन नाहिं॥
‘भजन होगा नहीं’—यह कहाँ लिखा है? यहाँ तो ‘सुमिरन नाहिं’—ऐसा लिखा है। सुमिरन नहीं होगा, यह बात ठीक है; क्योंकि ‘मनवाँ तो चहुँ दिसि फिरे’ मन संसारमें घूमता है तो सुमिरन कैसे होगा? सुमिरन मनसे होता है; परंतु ‘यह तो जप नाहिं’—कहाँ लिखा है? जप तो हो ही गया। जीभ-मात्रसे भी अगर हो गया तो नाम-जप तो हो ही गया।
हमें एक सन्त मिले थे। वे कहते थे कि परमात्माके साथ आप किसी तरहसे ही अपना सम्बन्ध जोड़ लो। ज्ञानपूर्वक जोड़ लो और मन-बुद्धिपूर्वक जोड़ लो तब तो कहना ही क्या है? और नहीं तो जीभसे ही जोड़ लो। केवल ‘राम’ नामका उच्चारण करके भी सम्बन्ध जोड़ लो। फिर सब काम ठीक हो जायगा। ‘अनिच्छया हि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावक:’—आग बिना मनके छू जायँगे तो भी वह जलायेगी ही, ऐसे ही भगवान्का नाम किसी तरहसे ही लिया जाय—
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा २८। १)
इसका अर्थ उलटा नहीं लेना चाहिये कि हम कुभावसे ही नाम लें और मन लगावें ही नहीं। बेगारखाते ऐसे ही नाम लें—ऐसा नहीं। मन लगानेका उद्योग करो, सावधानी रखो, मनको भगवान्में लगाओ, भगवान्का चिन्तन करो, पर न हो सके तो घबराना बिलकुल नहीं चाहिये। मेरे कहनेका मतलब यह है कि मन नहीं लग सका तो ऐसा मत मानो कि हमारा नाम-जप निरर्थक चला गया। अभी मन न लगे तो परवाह मत करो; क्योंकि आपकी नीयत जब मन लगानेकी है तो मन लग जायगा। एक तो हम मनको लगाते ही नहीं और एक मन लगता नहीं—इन दोनों अवस्थाओंमें बड़ा अन्तर है। ऐसे दीखनेमें तो दोनोंकी एक-सी अवस्था ही दीखती है। कारण कि दोनों अवस्थाओंमें ही मन तो नहीं लगा। दोनोंकी यह अवस्था बराबर रही; परन्तु बराबर होनेपर भी बड़ा भारी अन्तर है। जो लगाता ही नहीं, उसका तो उद्योग भी नहीं है, उसके मन लगानेका विचार ही नहीं है। दूसरा व्यक्ति मनको भगवान्में लगाना चाहता है, पर लगता नहीं। भगवान् सबके हृदयकी बात देखते हैं—
रहति न प्रभु चित चूक किए की।
करत सुरति सय बार हिए की॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा २९। ५)
भगवान् हृदयकी बात देखते हैैं, कि यह मन लगाना चाहता है, पर मन नहीं लगा। तो महाराज! उसका बड़ा भारी पुण्य होगा। भगवान् पर उसका बड़ा असर पड़ेगा। वे सबकी नीयत देखते हैं। अपने तो मन लगानेका प्रयत्न करो, पर न लगे तो उसमें घबराओ मत और नाम लिये जाओ।