प्रवचन—३
नाम-जपका अनुभव
‘राम’ नामकी वन्दनाका प्रकरण चल रहा है। इसमें ‘राम’ नामकी महिमाका वर्णन भी आया है। इसकी महिमा सुननेसे ‘राम’ नाममें रुचि हो सकती है, पर इसका माहात्म्य तो ‘राम’ नाम जपनेसे ही मिलता है। नाम-महिमा कहने और सुननेसे उसमें रुचि होती है और नाम-जप करनेसे अनुभव होता है, इसलिये बड़ी उपयोगी बात है। इसकी वास्तविकता जपनेसे ही समझमें आयेगी, पूरा पता उससे ही लगेगा। जैसे, भूखे आदमीको भोजनकी बात बतायी जाय तो उसकी रुचि विशेष हो जाती है। पर बिना भूखके भोजनमें उतना रस नहीं आता। जोरसे भूख लगती है, तब पता लगता है कि भोजन कितना बढ़िया है! वह रुचता है, जँचता भी है और पच भी जाता है। उस भोजनका रस बनता है, उससे शक्ति आती है। ऐसे ही रुचिपूर्वक नामका जप करनेसे ही नामका माहात्म्य समझमें आता है, इसलिये ज्यों-ज्यों अधिक नाम जपते हैं, त्यों-ही-त्यों उसका विशेष लाभ होता है।
जैसे, धन कमानेवालोंके पास धन ज्यादा बढ़ जाता है तो उनके धनका लोभ भी बढ़ता जाता है। परंतु अन्तमें वह पतन करता है, क्योंकि धन नाशवान् वस्तु है। मानो साधारण आदमीके धनका अभाव थोड़ा होता है। धनी आदमीके अभाव ज्यादा होता है। साधारण आदमीके सैकड़ोंका, धनीके हजारोंका, अधिक धनीके लाखोंका और उससे भी बड़े धनीके करोड़ोंका घाटा होता है। वैसे ही भजन करनेवालोंके भी भजनकी जरूरत होती है। जो इसकी महिमा जानते हैं, उन्हें बहुत बड़े अभावका अनुभव होता है कि हमारे भजन बहुत कम हुआ। परंतु जो लोग भजन नहीं करते हैं, उन्हें पता ही नहीं, वे इसके माहात्म्यको जानते ही नहीं। परंतु वे ज्यों-ही अपनेमें कमी समझते हैं, त्यों-ही भजनका माहात्म्य समझमें आता है। ऐसे माहात्म्यको समझनेवालोंके लिये लिखा है कि नामके उच्चारणमात्रसे कल्याण हो जाय।
‘भगवन्नाम कौमुदी’ नामक एक ग्रंथ है। उसमें बड़े शास्त्रार्थदृष्टिसे विवेचना की गयी है। नामका उच्चारण करनेवाले नामके पात्र माने गये हैं। जैसे गजेन्द्रने आर्त होकर भगवान्का नाम लिया तो भगवान् प्रत्यक्ष प्रकट हो गये। आर्त होकर जो नाम लिया जाता है, उसका बहुत जल्दी महत्त्व दीखता है। ऐसे ही भावपूर्वक नाम लिया जाता है, उसका विलक्षण ही असर होता है। एक पदमें आता है—
कृष्ण नाम जब श्रवण सुने री मैं आली।
भूली री भवन हौं तो बावरी भयी री॥
जिन गोपिकाओंके हृदयमें भगवान्का प्रेम है, वे, उनका नाम सुननेसे ही पागल हो जाती हैं। पता ही नहीं कि स्वयं मैं कौन हूँ, कहाँ हूँ! ऐसे ही भगवन्नामसे भी ऐसी दशा हो जाती है। ‘कल्याण’ के भूतपूर्व सम्पादक भाई श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारकी नाम-निष्ठा अच्छी थी। कल्याण शुरू नहीं हुआ था, उस समयकी बात है। किसीने कह दिया—‘राम-नाम लेनेसे क्या होता है?’ तो उन्होंने कहा—‘कल्याण हो जाता है।’ उसने कहा—‘अर्थ समझे बिना क्या है? ‘राम’ नाम अंग्रेजीमें मेढा और भेड़ाका भी है’। तब उन्होंने जोशमें आकर कह दिया, ‘राम-नामसे कल्याण होता है’। ऐसे जोशमें आकर कहनेसे उन्हें आठ पहरतक होश नहीं आया। खाना-पीना, टट्टी-पेशाब सब बन्द। इस बातसे उनकी माँजी बड़ी दु:खी हो गयीं कि हनुमान्के क्या हो गया? ऐसे जो भगवान्का नाम लेता है, उसमें बहुत विलक्षणता आ जाती है।
जिसकी नाममें रुचि होती है, उसे पता लगता है कि नामकी महिमा क्या होती है? दूसरेको क्या पता नाम क्या चीज है? हरेक आदमी क्या समझे? नाममें रुचि ज्यादा होती है जप करनेसे, भजन करनेसे और उसमें तल्लीन होनेसे। सन्त-महात्माओंकी वाणीमें जो बातें हैं, वे विलक्षण बातें स्वयं अनुभवमें आने लगती हैं; सन्तोंने अलग-अलग स्थानोंपर अपना अलग-अलग अनुभव लिखा है।
एक बहन थी। उसने अपने नाम-जपकी ऐसी बातें बतायीं, जो सन्तोंकी वाणीमें भी मिलती नहीं। उसने कहा कि नाम जपते-जपते सब शरीरमें ठण्डक पहुँचती है। सारे शरीरमें ठण्डा-ठण्डा झरना बहता है तथा एक प्रकारके मिठास और आनन्दकी प्राप्ति होती है। मैंने सन्तोंकी वाणी पढ़ी है, पर ऐसा वर्णन नहीं आता, जैसा उस बहनने अपना अनुभव बताया। ऐसे-ऐसे अलौकिक चमत्कार सन्त-महात्माओंने थोड़े-थोड़े ही लिखे हैं। वे कहाँतक लिखें? जो अनुभव होता है, वो वर्णन करनेमें आता नहीं। वे खुद ही जानते हैं।
सो सुख जानइ मन अरु काना।
नहिं रसना पहिं जाइ बखाना॥
वह कहनेमें नहीं आता। आप इसमें लग जायँ। भाइयोंसे, बहनोंसे, सबसे मेरी प्रार्थना है कि आप नाम-जपमें लग जायँ। आप निहाल हो जायँगे और दुनिया निहाल हो जायगी। सबपर असर पड़ेगा और आपका तो क्या कहें, जीवन धन्य हो जायगा। ‘भगवन्नाम’ की अपार महिमा है। गोस्वामीजी महाराज आगे वर्णन करते हैं—
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा १९)
पहले ‘राम’ नामके अवयवोंका वर्णन हुआ फिर ‘महामन्त्र’ का वर्णन हुआ। अब दो अक्षरोंका वर्णन होता है। ‘र’ और ‘म’—ये दो अक्षर हैं। जो भगवान्के प्यारे भक्त हैं, वे सालि (बढ़िया चावल)-की खेती हैं और वर्षा-ऋतु श्रीरघुनाथजी महाराजकी भक्ति है। वर्षा-ऋतुमें ही वर्षा खूब हुआ करती है। चावलोंकी खेती, बाजरा आदि अनाजोंकी खेतीसे भिन्न होती है। राजस्थानमें खेतमें यदि पानी पड़ा रहे तो घास सूख जाय, पर चावलके खेतमें हरदम पानी भरा ही रहता है। जिससे खेतोंमें मछलियाँ पैदा हो जाती हैं। सालिके चावल बढ़िया होते हैं। चावल जितने बढ़िया होते हैं, उतना ही पानी ज्यादा माँगते हैं। उनको पानी हरदम चाहिये।
‘रा’ और ‘म’—ये दो श्रेष्ठ वर्ण हैं। ऐसे ही श्रावण और भाद्रपद इन दो मासोंकी वर्षा-ऋतु कही जाती है। श्रेष्ठ भक्तके यहाँ ‘राम’ नामरूपी वर्षाकी झड़ी लगी रहती है। आगे गोस्वामीजी महाराज कहते हैं—
आखर मधुर मनोहर दोऊ।
बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा २०। १)
ये दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं। ‘मधुर’ कहनेका मतलब है कि रसनामें रस मिलता है। ‘मनोहर’ कहनेका तात्पर्य है कि मनको अपनी ओर खींच लेता है। जिन्होंने ‘राम’ नामका जप किया है, उनको इसका पता लगता है और आदमी नहीं जान सकते। विलक्षण बात है कि ‘राम-राम’ करते-करते मुखमें मिठास पैदा होता है। जैसे, बढ़िया दूध हो और उसमें मिश्री पीसकर मिला दी जाय तो वह कैसा मीठा होता है उससे भी ज्यादा मिठास इसमें आने लगता है। ‘राम’ नाममें लग जाते हैं तो फिर इसमें अद्भुत रस आने लगता है। ऐसे ये दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं। ‘बरन बिलोचन जन जिय जोऊ’—ये दोनों अक्षर वर्णमालाकी दो आँखें हैं। शरीरमें दो आँखें सबसे श्रेष्ठ मानी गयी हैं। आँखके बिना जैसे आदमी अन्धा होता है, ऐसे ‘राम’ नामके बिना वर्णमाला भी अन्धी है।
नाम जपते हुए बहुत विलक्षण अनुभव होने लगता है। छ: कमलोंमें एक नाभिकमल है, उसकी पंखुड़ियोंमें भगवान्के नाम हैं, वे भी दीखने लग जाते हैं। आँखोंसे जैसे सब बाहरी ज्ञान होता है, ऐसे नाम-जपसे बड़े-बड़े शास्त्रोंका ज्ञान हो जाता है। जिन सन्तोंने पढ़ायी नहीं की, शास्त्र नहीं पढ़े, वेद नहीं पढ़े, उनकी वाणीमें भी वेदोंकी ऋचाएँ आती हैं। वेदोंमें जैसा लिखा है, वैसी बातें उनकी साखियोंमें, वाणियोंमें आती हैं। वेदोंका ज्ञान उनको कैसे हो गया? ‘राम’ नाम महाराजसे। ‘राम’ नाम महाराज सब अक्षरोंकी आँख है। आँखोंसे दीखने लग जाता है और विचित्र बातें दीखने लग जाती हैं।
श्रीरामदासजी और श्रीलालदासजी महाराज दोनोंकी मित्रता थी। उन दोनोंकी मित्रताकी कई बातें मैंने सुनी थी। एक बार एक माई भोजन लेकर जा रही थी तो उन दोनोंने आपसमें बात कही कि वह जो माई भोजन ला रही है, उसमें राबड़ी है, अमुक साग है, और ऐसी-ऐसी चीजें हैं और उलटा कटोरा भी साथमें है। फिर जब देखा तो वैसी ही बात मिली। इस प्रकार लौकिक दृष्टिसे भी विशेषता आ जाती है। एकान्तमें भजन करते हुए उन्हें ऐसा अनुभव होता है कि अमुक जगह अमुक बात हो रही है। इन बातोंको सन्त लोग प्रकट नहीं करते थे। ऋद्धि-सिद्धि आ जाती और कभी कुछ बात प्रकट हो जाती तो वे कहते कि चुप रहो, हल्ला मत करो, लोगोंको बताओ मत। अन्धेरेमें रातमें दीखने लग जाय—ऐसे चमत्कार होते हैं, यह तो मामूली चमत्कार है। विशेष बात यह है कि नाम-जपसे तत्त्वज्ञान हो जाता है। जो परमात्माका स्वरूप है, स्वयंका स्वरूप है, इन सबका अनुभव हो जाता है। यह मामूली बात है क्या? लौकिक चमत्कार दीख जाना कोई बड़ी बात नहीं है।
‘राम’ नाममें अपार-अनन्त शक्ति भरी हुई है। इसलिये गोस्वामीजी महाराज कहते हैं—‘बरन बिलोचन जन जिय जोऊ’—भक्तोंके हृदयको जाननेके लिये ये नेत्र हैं।
तुलसीका प्रिय ‘राम’ नाम
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू।
लोक लाहु परलोक निबाहू॥
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके।
राम लखन सम प्रिय तुलसी के॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा २०। २,३)
ये कहने, सुनने और स्मरण करनेमें बहुत ही अच्छे, सुन्दर और मधुर हैं। तुलसीदासजीको श्रीराम और लक्ष्मणके समान दोनों प्यारे हैं। ‘राम, राम, राम.......’ कहनेमें आनन्द आता है और ‘राम, राम, राम.....’ सुननेमें आनन्द आता है। मनसे याद करें तो आनन्द आता है। ऐसे ‘राम’ नामके ये दोनों अक्षर बड़े सुन्दर और श्रेष्ठ हैं। गोस्वामीजी महाराज इस प्रकार विलक्षण बात कह रहे हैं। मानो उनको कुछ भी होश नहीं है। ‘राम’ नाम कैसा है? तो कहते हैं—‘राम लखन सम प्रिय तुलसी के॥’ सुननेवालोंके सामने दृष्टान्त ऐसा दिया जाता है, जिसे सुननेवाले आसानीसे समझ सकें।
श्रीरामचरितमानसमें चार संवाद आये हैं—१. पार्वतीजी एवं शंकरभगवान् का, २. याज्ञवल्क्यजी और भरद्वाजजीका, ३. कागभुशुण्डिजी और गरुड़जीका तथा ४. सन्तों और गोस्वामीजी महाराजका संवाद। यहाँ गोस्वामीजी महाराज संतोंको नाम-महिमा सुनाते हुए कह रहे हैं कि ये दोनों अक्षर ऐसे सुन्दर और प्यारे हैं, जैसे तुलसीको राम और लखन प्यारे लगते हैं। रामचरितमानस समाप्त हुई, तब रघुवंशी रामजी और उनके नाम—इन दोनोंके विषयमें एक बात कही है—
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥
(मानस, उत्तरकाण्ड, दोहा १३० ख)
दोनों उदाहरण ऐसे दिये, जिनको हरेक आदमी समझ सके और जिसमें हरेक आदमीका मन खिंचे। सिद्धान्त समझाना हो तो दृष्टान्त वही दिया जाता है, जो हरेक आदमीके अनुभवमें आता हो। परंतु यहाँ गोस्वामीजी कहते हैं—‘राम लखन सम प्रिय तुलसी के’—राम-लक्ष्मणके समान मुझे प्यारे लगते हैं। हरेक आदमीको क्या पता कि तुलसीको राम और लक्ष्मण किस तरह प्यारे लगते हैं? राम-लक्ष्मण उसको भी प्यारे लगें, तब वह समझे कि ‘राम’ नाम कितना प्यारा है! इतने ऊँचे कवि होकर कैसा दृष्टान्त देते हैं! अब हम क्या समझें, तुलसीको कैसे प्यारे लगते हैं? तो कहते हैं—
‘कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम’—
जैसे कामीको स्त्री प्यारी लगती है और लोभीको दाम प्यारा लगता है, ऐसे मेरेको राम प्यारे लगें। ‘तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम’—गोस्वामीजी महाराजने दो नाम लिये। ‘कामिहि नारि पिआरि जिमि’—में लिया ‘रघुनाथ’ और ‘लोभिहि प्रिय जिमि दाम’ में लिया ‘राम’ नाम। कामीको सुन्दर रूप अच्छा लगता है और लोभीको दाम प्यारे लगते हैं। वह सुन्दरताकी ओर नहीं देखता। वह गिनती देखता है। उसको गिनती अच्छी लगती है। रघुवंशियोंके मालिक महाराजाधिराज श्रीराम विराजमान हैं, ऐसा उनका रूप और ‘राम’ नाम—ये दोनों प्यारे लगें अर्थात् भगवान्का स्वरूप और भगवान्का नाम—ये दोनों प्यारे लगें। एक कविने कहा है—
सुवरण को ढूँढ़त फिरत कवि व्यभिचारी चोर।
चरण धरत धड़कत हियो नेक न भावत शोर॥
कवि, व्यभिचारी और चोर—ये तीनों ही ‘सुवर्ण’ ढूँढ़ते हैं, कवि तो सुवर्ण—अच्छे-अच्छे अक्षरोंको ढूँढ़ते हैं। व्यभिचारी सुन्दर स्वरूपको ढूँढ़ता है और चोर सोना ढूँढ़ता है। ‘चरण धरत धड़कत हियो’—कवि भी किसी श्लोकका चरण रखता है तो उसका हृदय धड़कता है। मानो उसके यह भाव आता है कि श्लोक बढ़िया लिखा गया या नहीं। श्लोकके चार चरण होते हैं। व्यभिचारी और चोरका भी चरण रखते हृदय धड़कता है कि कोई देख न ले। ‘नेक न भावत शोर’—न कविको हल्ला-गुल्ला सुहाता है, न व्यभिचारीको और न चोरको। इस तरह तीनों ‘सुवर्ण’ को ढूँढ़ते फिरते हैं।
‘कामिहि नारि पिआरि जिमि’—इस उदाहरणसे श्रीरघुनाथजी महाराजका रूप लिया गया और ‘लोभिहि प्रिय जिमि दाम’—लोभीकी तरह मेरेको भगवान्का नाम प्यारा लगे। लोभीको सुन्दर रूप नहीं, प्रत्युत संख्या प्यारी लगती है। उसको एक रुपयेका नोट बढ़िया गड्डीमेंसे निकाल कर दे दो और पाँच या दसका फटा हुआ नोट दिखाओ और उससे पूछो कि दोनोंमेंसे कौन-सा लोगे? लोभी एक रुपयेका सुन्दर नोट नहीं लेगा, पुराना, मैला, फटा दस रुपयेका ही लेगा। एक रुपया सुन्दर है तो वह क्या करे? वह तो गिनती देखता है कि यह पाँचका है, यह दसका है। ऐसे ही गोस्वामीजी कहते हैं, सुन्दर रूप रामजीका प्यारा लगे और नामकी गिनती बढ़ाते ही चले जायें। ‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई’—नाम लोभीकी तरह लिया जाय।
यहाँ ये दो दृष्टान्त बतानेका तात्पर्य है कि इन दोपर ही लोग आकृष्ट होते हैं—माधोजीसे मिलना कैसे होय। सबल बैरी बसे घट भीतर कनक कामिनी दोय॥ एक तो स्त्री और एक रुपयोंकी गिनती—इन दोकी जगह क्या करें? इनमें संसारकी सुन्दरताकी जगह तो श्रीरघुनाथजी महाराजका रूप बैठा दें और रुपयोंकी गिनतीकी जगह भगवान्के नामको बैठा दें। इस तरह दोनोंकी खाना-पूर्ति हो गयी न! सुन्दरता भगवान्के रूपकी और गिनती उनके नामकी। इतना कहनेपर भी सन्तोष नहीं हुआ। फिर कहा—‘तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम’—निरन्तर नहीं होगा तो गलती रह जायगी। सांसारिक रुपये हैं तो प्यारे और अच्छे भी लगते हैं परंतु जब इंक्वायरी आ जाती है, दो नम्बरके रुपये भीतर रखे हैं, इधर सिपाही आ जाते हैं, तो मनसे यह इच्छा होती है कि अभी रुपये नहीं होते तो अच्छे थे। रुपयोंका लोभ होनेपर भी वह रुपयोंको नहीं चाहता। उसी तरह भोगोंको भी निरन्तर नहीं चाहता है। गोस्वामीजीने दृष्टान्त देनेमें ध्यान रखा कि साथमें ‘नहीं’ न आ जाय कहीं। कामी और लोभीको रूप और दाम प्यारे तो लगते हैं, पर प्रियतामें कभी-कभी अन्तर भी पड़ जाता है। हमारे श्रीरघुनाथजीके रूप और नामकी प्रियतामें कहीं अन्तर नहीं पड़ जाय।
नाम-जपका चमत्कार
‘तज्जपस्तदर्थभावनम्’—भगवान्के नामका जप होता रहे और मनमें भगवान्के श्रीविग्रहका ध्यान होता रहे, मन खिंच जाय उधर ‘राम’ नाममें ही बस, उसके बाद आप-से-आप ‘राम-राम’ होता है। ‘रोम-रोम उचरंदा है’ फिर करना नहीं पड़ता। ‘राम’ नाम लेना नहीं पड़ता। इतना खिंच जाता है कि छुड़ाये नहीं छूटता।
बंगालमें चैतन्य महाप्रभु भगवान्के नामके बड़े प्रेमी हुए हैं। उनके यहाँ कोई एक भक्त था। वह ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण.....॥’ निरन्तर जप करता रहता था। किसीने चैतन्य महाप्रभुसे जाकर कह दिया—‘महाराज! यह तो टट्टी फिरता हुआ भी नाम जपता रहता है।’ जब उससे पूछा गया तो उसने कहा ‘ऐसा होता तो है।’ चैतन्य महाप्रभुने बुलाकर उससे कहा—‘उस समय खयाल रखा कर, बोला मत कर।’ अब वह क्या करता? टट्टी फिरता तो जीभको पकड़ लेता। फिर उसकी लोगोंने शिकायत की—‘महाराज! यह टट्टी जाते समय जीभको पकड़े रखता है।’ महाप्रभुने कहा—‘तू यह क्या करता है?’ तो उसने कहा—‘महाराज! मैं क्या करूँ, जीभ मानती ही नहीं, पर आपने कह दिया इसलिये आपकी आज्ञा-पालन करनेके लिये जीभको पकड़ लेता हूँ।’ तब उन्होंने कहा कि ‘तेरे लिये किसी अवस्थामें नाम जपनेमें कोई दोष नहीं है, पर जीभ मत पकड़ा कर।’ इस प्रकार जिसको भगवन्नाममें रस आता है, वही जानता है कि नाममें कितनी विलक्षणता है, क्या अलौकिकता है! लोगोंकी शिकायत होती है कि मन लगता नहीं, जप होता नहीं। पर जो हरदम ही नाम जपते हैं रातमें, दिनमें, उनके हरदम ही नाम-जप होता रहता है।
ऐसे ही अर्जुनकी बात आती है। अर्जुनके सोते समय ‘कृष्ण-कृष्ण’ नाम उच्चारण होता रहता था। इसी कारण एक बार अर्जुन जब सो रहे थे तो वहाँ नारदजी, शंकरजी, ब्रह्माजी सब आ गये। बड़े-बड़े सन्त इकट्ठे हो गये। भगवान् भी आ गये। अर्जुनके रोम-रोमसे नामोच्चारण हो रहा था। ‘सहजाँ नाम सिवरंदा है’—मुखसे ही नहीं, रोम-रोमसे भगवन्नाम उच्चारण होता है।
गोरखपुरके पास ही बरहज गाँवमें एक परमहंसजी महाराज रहा करते थे। उनके शिष्यका नाम श्रीराघवदासजी था। वे उत्तर-प्रदेशके गाँधी कहे जाते थे। उन परमहंसजी महाराजके शरीरको छुआ जाता तो ‘ॐ’ का उच्चारण होता। एक बार पहलवान राममूर्तिजी उनसे मिलनेके लिये गये। परमहंस बाबाके पैरकी अँगुली व अँगूठेसे जप हो रहा था। उन्होंने पहलवानसे कहा—अँगूठेको हिलनेसे रोको। परन्तु वे अँगूठेको रोक नहीं सके। तो कहा कि ‘तुम्हारेमें जितना बल है। उससे ज्यादा बल तो बाबाके एक अँगूठेमें है।’ नाम-महाराजका कितना विलक्षण प्रभाव है! वह प्रभाव आदर प्रेमपूर्वक जपनेवालोंके सामने प्रकट होता है, बाकी दूसरे क्या जानें!
‘लोक लाहु परलोक निबाहू’—‘राम’ नाम इस लोक और परलोकमें सब जगह काम देता है। इसलिये गोस्वामीजी कहते हैं—‘मेरे तो माँ अरु बाप दोउ आखर’। ‘र’ और ‘म’—ये मेरे माँ-बाप हैं। संसारमें माता-पिताके समान रक्षा करनेवाला, पालन करनेवाला, हित करनेवाला दूसरा कोई है ही नहीं। गोस्वामीजी कहते हैं कि हमारे तो दोनों अक्षर माता-पिता हैं, हमारा पालन करनेवाले हैं—
‘र’ रो पिता, माता ‘म’ मो है दोनों का जीव।
रामदास कर बन्दगी तुरत मिलावे पीव॥
जो माँ-बापका भक्त होता है, उसपर भगवान् राजी हो ही जाते हैं। ‘राम’ नामसे भगवान् मिल जायँ, दर्शन दे दें। लोकमें, परलोकमें सब जगह ही वह निर्वाह करनेवाला है। लोकमें जो चाहिये, वह देनेवाला चिन्तामणि है और परलोकमें भगवद्दर्शन करानेवाला है। कई ऐसे आदमी देखे हैं, जो दिनभर माँगते रहते हैं, घूमते-फिरते हैं; परन्तु उनका पेट नहीं भरता। ऐसी दशामें वे भी अगर एकान्तमें ‘राम’-‘राम’ करने लग जायँ तो प्रत्यक्षमें उनके भी ठाट लग जायगा। अन्न, जल, कपड़े आदि किसी चीजकी कमी रहेगी नहीं। अब नामजप करते ही नहीं तो उसका क्या किया जाय? नाम-जप करके देखा जाय तो भाग्य खुल जाता है, विलक्षण बात हो जाती है। जीते-जी भाग्यमें विशेष परिवर्तन भगवन्नामसे होता है, इसमें कोई सन्देहकी बात नहीं है। साधारण आदमी भी नाम-जपमें लग जाता है तो लोगोंपर विशेष असर पड़ता है।
भजन करे पातालमें परगट होत अकास।
दाबी दूबी नहि दबे कस्तूरी की बास॥
कस्तूरीको सौगन्ध दिला दें कि तुम सुगन्धि मत फैलाओ तो क्या वह रुक जायगी? सुगन्धि तो फैल ही जायगी। इस तरहसे कोई चुपचाप भी भजन करे और किसीको पता ही न लगने दे तो भी महाराज यह तो प्रकट हो ही जाता है। उसकी विलक्षणता, अलौकिकता दीखने लगती है। लोगोंपर असर पड़ने लगता है; क्योंकि भगवान्का नाम है ही ऐसा विलक्षण। इसलिये लोक और परलोक दोनोंमें लाभ होता है। साधारण घरका बालक साधु होकर भजनमें तत्परतासे लग जाता है तो वह सन्त-महात्मा कहलाने लगता है। बड़े चमत्कार उसके द्वारा हो जाते हैं, जिसको पहले कोई पूछता ही नहीं था। बात क्या है? यह सब भगवन्नामकी महिमा है।
बरनत बरन प्रीति बिलगाती।
ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती॥
(मानस, बालकाण्ड, २०। ४)
इन ‘र’, ‘आ’ और ‘म’ का वर्णन किया जाय तो ये अलग-अलग दीखते हैं। मानो ये तीनों वर्ण कृशानु, भानु और हिमकरके बीज-अक्षर हैं। वृक्षमें बीजसे ही शक्ति आती है। इसी प्रकार अग्नि, सूर्य और चन्द्रमामें जो शक्ति है, वह ‘राम’ नामसे ही आयी है।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥
(गीता १५। १२)
गीतामें भगवान् कहते हैं कि इनमें जो विशेषता है, वह मेरी ही है। नाम और नामीमें अभेद है। इनके उच्चारण, अर्थ और फलमें भिन्नता दीखती है। वर्णन करनेमें ये अलग-अलग दीखते हैं। प्रीति भी अलग-अलग दीखती है; परन्तु ‘र’ और ‘म’ दोनों ब्रह्म और जीवके समान सहज संघाती हैं अर्थात् स्वत: सदा एक साथ रहनेवाले साथी हैं, सदा एकरूप और एकरस रहनेवाले हैं। ब्रह्म और जीवका अर्थ क्या है? ‘ममैवांश:’ (गीता १५। ७) यह जीव परमात्माका साक्षात् अंश है और यह परमात्मा (ब्रह्म)-को प्राप्त हो जाता है। ‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागता:।’ (गीता १४। २) मेरी साधर्म्यताको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् जैसे भगवान् हैं, ऐसे ही भक्त हो जाते हैं। इन दोनोंकी सहधर्मता हो जाती है। तुलसीदासजीने भी कहा है—
सुर नर मुनि सब कै यह रीती।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥
(मानस, किष्किंधाकाण्ड, दोहा १२। २)
स्वारथ मीत सकल जग माहीं।
सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥
(मानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ४७। ६)
प्राय: सब लोग स्वार्थसे ही प्रेम करनेवाले हैं; परंतु ‘हेतु रहित जग जुग उपकारी’—दो बिना स्वार्थके हित करनेवाले हैं। ‘तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी’—एक आप और दूसरे आपके प्यारे भक्त। ये बिना स्वार्थ, बिना मतलबके दुनियामात्रका हित करनेवाले हैं। गीतामें भी भगवान् कहते हैं—मेरेको सब प्राणियोंका सुहृद् जाननेसे शान्ति मिलती है (५।२९)। ‘सुहृद: सर्वदेहिनाम्’—भगवान्के जो भक्त होते हैं, वे प्राणी-मात्रके सुहृद् होते हैं। दुनियाका हित कैसे हो—ऐसा भगवान्का भाव निरन्तर रहता है। इस तरह भगवान्के प्यारे भक्तोंके हृदयमें भी दुनियामात्रके हितका भाव निवास करता है।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई।
मंद करत जो करइ भलाई॥
(मानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा ४१। ७)
अपने साथ बुरा बर्ताव करनेवालोंका भी सन्त भला ही करते हैं। इसलिये नीतिमें भी आया है—‘निष्पीडितोऽपि मधुरं वमति इक्षुदण्ड:’—ऊखको कोल्हूमें पेरा जाय तो भी वह मीठा ही मीठा रस सबको देता है। ऐसा नहीं कि इतना तंग करता है तो कड़वा बन जाऊँ! वह मीठा ही निकलता है; क्योंकि उसमें भरा हुआ रस मीठा ही है। ऐसे ही सन्त-महात्माओंको दु:ख दें तो भी वे भलाई ही करते हैं; क्योंकि उनमें भलाई-ही-भलाई भरी हुई है, यह विलक्षण बात है कि भगवान् स्वाभाविक ही सबका हित करनेवाले हैं। भगवान्का भजन करनेसे, मन लगानेसे, ध्यान करनेसे, भगवान्का नाम लेनेसे भजन करनेवालोंमें भी भगवान्के गुण आ जाते हैं अर्थात् वे विशेष प्रभावशाली हो जाते हैं। नाम-जपसे उनमें भी विलक्षणता आ जाती है।
नर नारायन सरिस सुभ्राता।
जग पालक बिसेषि जन त्राता॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा २०। ५)
ये दोनों अक्षर नर-नारायणके समान सुन्दर भाई हैं, ये जगत् का पालन और विशेषरूपसे भक्तोंकी रक्षा करनेवाले हैं। जैसे नर और नारायण दोनों तपस्या करते हैं और साथमें ही रहते हैं। लोगोंके सुखके लिये, आनन्दके लिये और वे सुख-शान्तिसे रहें, इसी बातको लेकर बदरिकाश्रम (उत्तराखण्ड)-में तपस्या करते हैं। इसी तरहसे नाम महाराज भी सबकी रक्षा करते हैं। ये दोनों अक्षर भाई-भाई हैं। ‘जग पालक बिसेषि जन त्राता’—मात्र जगत् का पालन करते हैं और जो भगवान्के भक्त होते हैं, उनकी विशेषतासे रक्षा करते हैं। ऐसा ही संतोंका स्वभाव होता है और दुष्टोंका स्वभाव कैसा होता है—
बयरु अकारन सब काहू सों।
जो कर हित अनहित ताहू सों॥
(मानस, उत्तरकाण्ड, ३९। ६)
हित करनेवालेके साथ भी वे विरोध करते हैं, पर भगवान्के भक्त सबका हित करते हैं और अपना अहित करनेवालोंपर वे विशेष कृपा करते हैं।
धनवत्ताका अभिमान
एक तो धनी आदमीका और दूसरे ज्यादा पढ़े-लिखे विद्वान्का उद्धार होना कठिन होता है। धनी आदमीके धनका और विद्वान्के विद्याका अभिमान आ जाता है। अभिमान सब तरहसे नुकसान करनेवाला होता है—‘अभिमानद्वेषित्वाद्दैन्यप्रियत्वाच्च।’ श्रीगोस्वामीजी महाराजने भी कहा है—
संसृत मूल सूलप्रद नाना।
सकल सोक दायक अभिमाना॥
(मानस, उत्तरकाण्ड, ७४। ६)
जन्म-मरणका मूल कारण अभिमान ही है। ‘नाना सूलप्रद’—एक तरहकी सूल नहीं, तरह-तरहकी आफत अभिमानसे होती है। धनका एवं विद्याका अभिमान होनेपर मनुष्य किसीको गिनता नहीं। धन आनेपर वह सोचता है कि बड़े-बड़े पण्डित एवं महात्मा हमारे यहाँ आते हैं और भिक्षा लेते हैं—यह गर्मी उनके चढ़ जाती है, जो भगवान्की भक्ति नहीं जाग्रत् होने देती। हृदय कठोर हो जाता है। वैसे यह कोई नियम नहीं है, पर प्राय: ऐसी बात देखनेमें आती है। एक कविने विचित्र बात कही है—
अन्ध रमा सम्बन्ध ते होत न अचरज कोय।
कमल नयन नारायण हु रहे सर्प में सोय॥
लक्ष्मीजीके सम्बन्धसे मनुष्य अन्धा हो जाय, इसमें कोई आश्चर्य नहीं। भगवान् पुण्डरीकाक्षकी कमलके समान बड़ी-बड़ी आँखें हैं। ऐसी आँखोंवाले भी जाकर सर्पपर सो गये। आँखें जिसके हों, वह साँपपर पैर भी नहीं रखता और वे भगवान् जाकर सो गये सर्पपर। क्या कारण? लक्ष्मीका सम्बन्ध है। लक्ष्मीके सम्बन्धसे बड़ी-बड़ी आँखोंवाले भी अन्धे हो जाते हैं। ‘अन्ध मूक बहरो अवश कमला नर ही करे’—लक्ष्मी जब आती है तो मनुष्यको अन्धा, बहरा और गूँगा बना देती है। यह इतने आश्चर्यकी बात नहीं है। आश्चर्य तो इस बातका है—‘विष अनुजा मारत न, बड़ आवत अचरज एह’—जहर खानेसे मनुष्य मर जाय, पर यह विषकी छोटी बहन होनेपर भी मारती नहीं है। यह उसकी कृपा है, नहीं तो लक्ष्मीके आनेसे मनुष्य मर जाय; क्योंकि जहरकी वह बहन ही तो है। धनके अभिमानके विषयमें कविने विचित्र बात कही है—
हाकम जिन धन होय विधि षट् मेख बनावे।
दोय श्रवणमें दिये शबद नहीं ताहि सुनावे॥
एक मेख मुख माँय विपति किणरी नहीं बूझे।
दोय मेख चख माँय सबल निरबल नहीं बूझे॥
पद हीन होय हाकम परो छठी मेख तल द्वार में।
पांचों ही मेख छिटके परी सरल भये संसारमें॥
जब आदमी बड़ा हो जाता है, तो वह किसीकी कुछ सुनता नहीं, उसको दीखता नहीं और वह गूँगा हो जाता है। उसके छ: प्रकारकी मेख लग जाती है। दो मेख कानमें लगती हैं, जिससे शब्द सुनायी नहीं देता। कोई पुकार करे कि ‘अन्नदाता! हमारे अमुक आफत आ गयी, आप कृपा करो, हमारे ऐसा बड़ा दु:ख है।’ कानसे बात सुननेमें आनी चाहिये न? परंतु वह सुनवायी करता ही नहीं, कानमें मेख लग गयी, अब सुने कहाँसे? ऐसे ही दो और मेख आँखोंमें लगनेसे ‘सबल निरबल नहीं बूझे’। ‘दे दो दण्ड इसको, जुर्माना लगा दो इतना’! ‘अरे भाई! कितना गरीब है, कैसे दे सकेगा?’ ‘कैद कर दो’—शब्दमात्र कहते क्या जोर आया? और एक मेख ‘मुख मांय विपति किणरी नहीं बूझे’—दु:खी हो कि सुखी, क्या हो, तुम्हारी दशा कैसी है? तुम्हारे कोई तकलीफ तो नहीं है—ऐसी बात पूछता ही नहीं। ये मेखें खुल जाती हैं फिर ‘सरल भये संसारमें’—तब वह सीधा सरल हो जाता है।
संतद्वारा सेठको शिक्षा
एक सेठकी बात सुनी। वह सेठ बहुत धनी था। वह सुबह जल्दी उठकर नदीमें स्नान करके घर आकर नित्य-नियम करता था। ऐसे वह रोजाना नहाने नदीपर आता था। एक बार एक अच्छे संत विचरते हुए वहाँ घाटपर आ गये। उन्होंने कहा ‘सेठ! राम-राम!’ वह बोला नहीं तो फिर बोले—‘सेठ! राम-राम!’ ऐसे दो-तीन बार बोलनेपर भी सेठ ‘राम-राम’ नहीं बोला। सेठने समझा कि कोई मँगता है। इसलिये कहने लगा—‘हट! हट! चल, हट यहाँसे।’ संतने देखा कि अभिमान बहुत बढ़ गया है, भगवान्का नाम भी नहीं लेता। मैं तो भगवान्का नाम लेता हूँ और यह हट कहता है।
इन धनी आदमियोंके वहम रहता है कि हमारेसे कोई कुछ माँग लेगा, कुछ ले लेगा। इसलिये धनी लोग सबसे डरते रहते हैं। वे गरीबसे, साधुसे, ब्राह्मणसे, राज्यसे, चोरोंसे, डाकुओंसे डरते हैं। अपने बेटा-पोता ज्यादा हो जायँगे तो धनका बँटवारा हो जायगा—ऐसे भी डर लगता है उन्हें।
संतने सोचा कि इसे ठीक करना है। तो वे वैसे ही सेठ बन गये और सेठ बनकर घरपर चले गये। दरवानने कहा कि ‘आज आप जल्दी कैसे आ गये?’ तो उन्होंने कहा कि ‘एक बहुरूपिया मेरा रूप धरके वहाँ आ गया था, मैंने समझा कि वह घरपर जाकर कोई गड़बड़ी नहीं कर दे। इसलिये मैं जल्दी आ गया। तुम सावधानी रखना, वह आ जाय तो उसे भीतर मत आने देना।’
सेठ घरपर जैसा नित्य-नियम करता था, वैसे ही वे सेठ बने हुए संत भजन-पाठ करने लग गये। अब वह सेठ सदाकी तरह धोती और लोटा लिये आया तो दरवानने रोक दिया। ‘कहाँ जाते हो? हटो यहाँसे!’ सेठ बोला—‘तूने भाँग पी ली है क्या? नशा आ गया है क्या? क्या बात है? तू नौकर है मेरा और मालिक बनता है।’ दरवानने कहा—‘हट यहाँसे, नहीं जाने दूँगा भीतर।’ सेठने छोरोंको आवाज दी—‘आज इसको क्या हो गया?’ तो उन्होंने कहा—‘बाहर जाओ, भीतर मत आना।’ बेटे भी ऐसे ही कहने लगे। जिसको पूछे, वे ही धक्का दें। सेठने देखा कि क्या तमाशा हुआ भाई? मुझे दरवाजेके भीतर भी नहीं जाने देते हैं। बेचारा इधर-उधर घूमने लगा।
अब क्या करें? उसकी कहीं चली नहीं तो उसने राज्यमें जाकर रिपोर्ट दी कि इस तरह आफत आ गयी। वे सेठ राज्यके बड़े मान्य आदमी थे। राजाने उनको जब इस हालतमें देखा तो कहा ‘आज क्या बात है? लोटा, धोती लिये कैसे आये हो?’ तो वह बोला—‘कैसे-कैसे क्या, महाराज! मेरे घरमें कोई बहुरूपिया बनकर घुस गया और मुझे निकाल दिया बाहर।’ राजाने कहा—‘चार घोड़ोंकी बग्घीमें आया करते थे, आज आपकी यह दशा!’ राजाने अपने आदमियोंसे पूछा—‘कौन है वह? जाकर मालूम करो।’ घरपर खबर गयी तो घरवालोंने कहा कि ‘अच्छा! वह राज्यमें पहुँच गया! बिलकुल नकली आदमी है वह। हमारे सेठ तो भीतर विराजमान हैं। राजाको जाकर कहा कि वह तो घरमें अच्छी तरहसे विराजमान है। राजाने कहा—‘सेठको कहो कि राजा बुलाते हैं।’ अब सेठ चार घोड़ोंकी बग्घी लगाकर ठाट-बाटसे जैसे जाते थे, वैसे ही पहुँचे और बोले—‘अन्नदाता! क्यों याद फरमाया, क्या बात है?’
राजाजी बड़े चकराये कि दोनों एक-से दीख रहे हैं। पता कैसे लगे? मंत्रियोंसे पूछा तो वे बोले—‘साहब, असली सेठका कुछ पता नहीं लगता।’ तब राजाने पूछा, ‘आप दोनोंमें असली और नकली कौन हैं?’ तो कहा—‘परीक्षा कर लो।’ जो सन्त सेठ बने हुए थे उन्होंने कहा—‘बही लाओ। बहीमें जो लिखा हुआ है, वह हम बता देंगे।’ बही मँगायी गयी। जो सेठ बने हुए संत थे, उन्होंने बिना देखे ही कह दिया कि अमुक-अमुक वर्षमें अमुक मकानमें इतना खर्चा लगा, इतना घी लगा, अमुकके ब्याहमें इतना खर्चा हुआ। वह हिसाब अमुक बहीमें, अमुक जगह लिखा हुआ है।’ वह सबका—सब मिल गया। सेठ बेचारा देखता ही रह गया। उसको इतना याद नहीं था। इससे यह सिद्ध हो गया कि वह सेठ नकली है। तो कहा कि—‘इसे दण्ड दो।’ पर संतके कहनेसे छोड़ दिया।
दूसरे दिन फिर वह धोती और लोटा लेकर गया। वहाँ वही संत बैठे थे। उस सेठको देखकर संतने कहा—‘राम-राम!’ तब उसकी आँख खुली कि यह सब इन संतका चमत्कार है। संतने कहा—‘तुम भगवान्का नाम लिया करो, हरेकका तिरस्कार, अपमान मत किया करो। जाओ, अब तुम अपने घर जाओ।’ वह सेठ सदाकी तरह चुपचाप अपने घर आ गये।
अभिमानमें आकर लोग तिरस्कार कर देते हैं। धनका अभिमान बहुत खराब होता है। धनी आदमीके प्राय: भक्ति लगती नहीं। धनी आदमी भक्त होते ही नहीं, ऐसी बात भी नहीं है। राजा अम्बरीष भक्त हुए हैं और भी बहुत-से धनी आदमी भगवान्के भक्त हुए हैं; परंतु धनका अभिमान उनके नहीं था। उन्हें धनकी परवाह नहीं थी। भगवान् अभिमानको अच्छा नहीं समझते—‘अभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च’। नारदजी जैसे भक्तको भी अभिमान आ गया। ‘जिता काम अहमिति मन माहीं।’ (मानस, बालकाण्ड, दोहा १२७।५) अभिमानकी अधिकता आ गयी कि मैंने कामपर विजय कर ली तो क्या दशा हुई उनकी? भगवान् अपने भक्तका अभिमान रहने ही नहीं देते।
ताते करहिं कृपानिधि दूरी।
सेवक पर ममता अति भूरी॥
(मानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ७४। ७)
अभिमानसे बहुत पतन होता है। उस अभिमानको भगवान् दूर करते हैं। आसुरीसम्पत्ति और जितने दुर्गुण-दुराचार हैं, सब-के-सब अभिमानकी छायामें रहते हैं।
महाभारतमें आया है—बहेड़ेकी छायामें कलियुगका निवास है, ऐसे ही सम्पूर्ण आसुरी सम्पत्तिका निवास अभिमानकी छायामें है। धनका, विद्याका भी अभिमान आ जाता है। हम साधु हो जाते हैं तो वेश-भूषाका भी अभिमान आ जाता है कि हम साधु हैं। हमें क्या समझते हो—यह भी एक फूँक भर जाती है। अरे भाई, फूँक भर जाय दरिद्रताकी। धनवत्ताकी भरे उसमें तो बात ही क्या है! धनीके यहाँ रहनेवाले मामूली नौकर आपसमें बात करते हैं—‘कोई भाग्यके कारण पैसे मिल गये; परंतु सेठमें अक्ल नहीं है।’ उनको पूछा जाय,‘तुम ऐसे अक्लमन्द होकर बेअक्लके यहाँ क्यों रहते हो’? ऐसे ही पंडितोंको अभिमानी लोग कहते हैं—‘पढ़ गये तो क्या हुआ अक्ल है ही नहीं।’ मानो अक्ल तो सब-की-सब उनके पास ही है। दूसरे सब बेअक्ल हैं।
‘अकलका अधूरा और गाँठका पूरा’ मिलना बड़ा मुश्किल है। धन मेरे पास बहुत हो गया, अब धनकी मुझे जरूरत नहीं है और मेरेमें समझकी कमी है, थोड़ा और समझ लूँ—ऐसे सोचनेवाले आदमी कम मिलते हैं। दोनोंका अजीर्ण हुआ रहता है। दरिद्रताका भी अभिमान हो जाता है। साधारण लोग कहते हैं—‘सेठ हैं, तो अपने घरकी सेठानीके हैं। हम क्या धरावें सेठ है तो?’ यह बहुत ही खराब है भगवान् ही बचायें तो आदमी बचता है, नहीं तो हरेक हालतमें अभिमान आ जाता है। इसलिये अभिमानसे सदा सावधान रहना चाहिये।
संतोंका स्वभाव
संतोंके अभिमान नहीं होता। वे भगवान्के प्यारे होते हैं और सबको बड़ा मानते हैं।
सीय राममय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा ८। २)
जितने पुरुष हैं, वे हमारे रामजी हैं और जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब सीताजी—माँ हैं। इस प्रकार उनका भाव होता है। ‘मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत’—वे सबको भगवान् मानते हैं, इस कारण उनके भीतर अभिमान नहीं आता। वे ही भगवान्को प्यारे लगते हैं; क्योंकि ‘निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध’—वे किसके साथ विरोध करें।
श्रीचैतन्य-महाप्रभुके समयमें जगाई-मधाई नामके पापी थे। उनको नित्यानन्दजीने नाम सुनाया तो उन्हें खूब मारा। मार-पीट सहते हुए वे कहते कि तू हरि बोल, हरि बोल। उनपर भी कृपा की। चैतन्य-महाप्रभुने उनको भक्त बना दिया। उन्होंने ऐसा निश्चय किया कि जो अधिक पापी, धनी एवं पंडित होते हैं, उनपर विशेष कृपा करनी चाहिये; क्योंकि उनको चेत कराना बड़ा मुश्किल होता है और उपायोंसे तो ये चेतेंगे नहीं, भक्तिकी बात सुनेंगे ही नहीं; क्योंकि उनके भीतर अभिमान भरा हुआ है। चैतन्य-महाप्रभुने ऐसे लोगोंके द्वारा भी भगवन्नाम उच्चारण करवाकर कृपा की। भगवान्के नाम-कीर्तनमें वे सबको लगाते। पशु-पक्षीतक खिंच जाते उनके भगवन्नाम-कीर्तनमें।
‘जग पालक बिसेषि जन त्राता’—ऐसे नाम महाराज दुष्टोंका भी पालन करनेवाले, अभिमानियोंका अभिमान दूर कराकर भजन करानेवाले एवं साधारण मनुष्योंको भी भगवान्की तरफ लगानेवाले हैं। ये सबको लगाते हैं कि सब भगवान्के प्यारे बन जायँ। ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:’—केवल नीरोग ही नहीं, भगवान्के प्यारे भक्त बन जायँ—यह उन नाम-महाराजकी इच्छा रहती है। इसी प्रकार संतोंके दर्शनसे भी बड़ा पुण्य होता है, बड़ा भारी लाभ होता है। क्यों होता है? उनके हृदयमें भगवद्बुद्धि बनी रहती है और वे सबकी सेवा करना चाहते हैं। इस कारण उनके दर्शनमात्रका असर पड़ता है। स्मरणमात्रका एवं उनकी बातमात्रका असर पड़ता है। क्योंकि उनके हृदयमें भगवद्भाव और सेवा-भाव लबालब भरे रहते हैं। इसलिये उनके दर्शन, भाषण, स्पर्श, चिन्तन आदिका लोगोंपर असर पड़ता है, लोगोंका बड़ा भारी कल्याण होता है।
जैसे बीड़ी-सिगरेट पीनेवाले लोग अपनी टोली बना लेते हैं, वैसे संत लोग भी कुछ-न-कुछ अपनी टोली बना लेते हैं। आप-से-आप उनकी टोली बन जाती है। भजन करनेवाले इकट्ठे हो जाते हैं और भजनमें लग जाते हैं। बहुत युगोंसे यह परम्परा चली आ रही है। बड़े-बड़े अच्छे महात्माओंको हुए सैकड़ों वर्ष हो गये; परंतु फिर भी उनके नामसे उनके क्षेत्र चल रहे हैं। वहाँ भगवन्नाम-जप, स्मरण-कीर्तन, उपकार, दान, पुण्य, दुनियाका हित आदि होता रहता है। नाम-महाराजके प्रभावसे ऐसा होता है। भगवान्का नाम अपने भक्त-जनोंका विशेष त्राता है, अर्थात् विशेषतासे रक्षा करनेवाला है।
भगति सुतिय कल करन बिभूषन।
जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा २०। ६)
‘र’ और ‘म’—ये दोनों अक्षर भक्तिरूपिणी जो श्रेष्ठ स्त्री है, उसके कानोंमें सुन्दर कर्ण-फूल हैं। हाथोंमें भूषण होते हैं और पैरोंके भी भूषण होते हैं, फिर यहाँ केवल कर्ण-भूषण कहनेका क्या तात्पर्य? कानोंसे ‘राम’ नाम सुननेसे भक्ति उसके हृदयमें आ जाती है। इसलिये ‘राम’ नाम भक्तिके कर्ण-भूषण हैं। भक्तिको हृदयमें बुलाना हो तो ‘राम’ नामका जप करो। इससे भक्ति दौड़ी चली आयेगी। भीतर विराजमान हो जायगी और निहाल कर देगी।
‘जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन’—चन्द्रमा और सूर्य—ये दो भगवान्की आँखें हैं। दोनों रात-दिन प्रकाश करते हैं। इन दोनोंसे जगत् का हित होता है
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥
(गीता १५। १२)
सूर्यके प्रकाशसे एवं गर्मीसे वर्षा होती है और उससे खेती होती है।
‘तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च’—सूर्यभगवान् वर्षा करते हैं। वर्षाके होनेसे धान बढ़ता है, घास बढ़ती है, खेती बढ़ती है। खेतीमें जहरीलापन सुखाकर पकानेमें सूर्यभगवान् हेतु होते हैं और खेतीको पुष्ट करनेमें चन्द्रमा हेतु होते हैं। खेती करनेवाले कहा करते हैं कि अब चान्दना (शुक्ल) पक्ष आ गया, अब खेती बढ़ेगी; क्योंकि चन्द्रमा अमृतकी वर्षा करते हैं, जिससे फल-फूल लगते हैं और बढ़ते हैं।
वायुमण्डलमें जो जहरीलापन होता है, उसको सूर्यका ताप नष्ट कर देता है। कभी वर्षा नहीं होती, अकरी आ जाती है तो लोग कहते हैं—झांझली आ गयी। वह झांझली भी आवश्यक होती है, नहीं तो यदि हरदम वर्षा होती रहे तो वायुमण्डलमें, पौधोंमें जहरीलापन पैदा हो जाता है। इस जहरीलेपनको सूर्य नष्ट कर देता है। इसलिये सूर्य पोषण करता है और चन्द्रमा अमृत-वर्षा करता है। गोस्वामीजी दोनों प्रकारकी ऋतुओंका वर्णन आगे करेंगे।
दोनों पक्षोंमें चन्द्रमाका प्रकाश समान ही रहता है, पर एक पक्षमें घटता है और दूसरेमें बढ़ता है—ऐसा लोग मानते हैं। रोजाना रात और दिनमें चन्द्रमाकी घड़ियाँ मिलाकर देखी जायँ तो बराबर होती हैं। इसी प्रकार आजकी आधी रातसे दूसरे दिन आधी राततक आठ पहरकी घड़ियोंका १५ दिनोंका मिलान करनेसे शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षके पंद्रह दिनोंमें प्रकाशकी और अन्धेरेकी घड़ियाँ बराबर आयेंगी। फिर यह शुक्ल और कृष्णपक्ष क्या है? चन्द्रमा शुक्लपक्षमें पोषण करता है, अमृत बरसाता है, जिससे वृक्षोंके फल बढ़ते हैं, बहनों-माताओंके गर्भ बढ़ते हैं और उन सबको पोषण मिलता है। चन्द्रमासे सम्पूर्ण बूटियोंमें विलक्षण अमृत आता है और सूर्यसे वे पकती हैं। जैसे सूर्य और चन्द्रमा सम्पूर्ण जगत् का हित करते हैं, वैसे ही भगवान्के नामके जो ‘र’ और ‘म’ दो अक्षर हैं, वे सब तरहसे पोषण करनेवाले हैं।
‘जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन’—यह ‘राम’ नाम विमल है। चन्द्रमा और सूर्यपर राहु और केतुके आनेसे ग्रहण होता है, परंतु ‘राम’ नामपर ग्रहण नहीं आता। चन्द्रमा घटता-बढ़ता रहता है, पर राम तो बढ़ता ही रहता है। ‘राम कभी फूटत नाहीं’ यह फूटता नहीं, रात-दिन बढ़ता ही रहता है। यह सदा ही शुद्ध है, इसलिये जगत् के हितके लिये निर्मल चन्द्रमा और सूर्यके समान है।
भगवान्के नामके दो अक्षर ‘रा’ और ‘म’ हैं, जिनकी महिमा गोस्वामीजी महाराज कह रहे हैं। यह महिमा ठीक समझमें तब आती है, जब मनुष्य नाम-जप करता है। भगवान्ने कृपा कर दी, यह मनुष्य-शरीर दे दिया, सत्संग सुननेको मिल गया। अब नाम-जपमें लग जाओ। इस जमानेमें जो थोड़ा भी जप करते हैं, उनकी बड़ी भारी महिमा है। कलियुगमें सब चीजोंके दाम बढ़ गये तो क्या भगवन्नामके दाम नहीं बढ़े हैं? अभी भजनकी महिमा अन्य युगोंकी अपेक्षा बहुत ज्यादा बढ़ी है।
चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।
कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा २२। ८)