प्रवचन—४

अमृतमय ‘राम’ नाम

स्वाद तोष सम सुगति सुधा के।

कमठ सेष सम धर बसुधा के॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २०। ७)

जीवका कल्याण हो जाय, इससे ऊँची कोई गति नहीं है। ऐसी जो श्रेष्ठ गति (मुक्ति) है, उसको ‘सुगति’ कहते हैं, परम सिद्धि भी वही है, जो इस ‘राम’ नामसे प्राप्त हो जाती है। ‘स्वाद तोष सम’—अमृतके स्वाद और तृप्तिके समान ‘राम’ नाम है। जैसे, भोजन किया जाता है तो उसमें बढ़िया रस आता है। भोजन करनेके बादमें तृप्ति और सन्तोष होता है, ऐसे ही यह ‘राम’ नाम सुगति और सुधाके स्वाद और तोष (तृप्ति)-के समान है। मानो ‘र’ मधुरिमा और ‘म’ सन्तोष है। ‘रा’ कहते ही मुख खुलता है और ‘म’ कहते ही बन्द होता है। भोजन करते समय मुख खुलता है और तृप्ति होनेपर मुख बन्द हो जाता है। इस प्रकार ‘रा’ और ‘म’ अमृतके स्वाद और तोषके समान हैं।

भोजनकी परीक्षाके लिये जीभपर रस लेकर तालुसे लगानेपर पता लग जाता है कि उसमें रस कैसा है। जहाँसे रस लिया जाता है, वहाँसे ही ‘र’ का उच्चारण होता है। ‘र’ कहनेमें सुधाका स्वाद आता है और ‘म’ कहनेमें तोष हो जाता है। राम, राम, राम.... ऐसे कहते हुए एक बहुत विलक्षण रस आता है। उससे सदाके लिये तृप्ति हो जाती है। नाममें रस आनेपर फिर दूसरे रसोंकी जरूरत नहीं रहती। जिनको भगवन्नाममें रस आ जाता है, उनकी संसारके विषयोंसे रुचि हट जाती है। जबतक संसारके विषयोंकी रुचि रहती है, तबतक भगवन्नाममें रस नहीं आता है। भगवान‍्के नाममें जब रस आना शुरू हो जाता है, फिर सब रस फीके हो जाते हैं।

श्रीगोस्वामीजी महाराज कहते हैं—‘यदि ‘राम’ नाम मेरेको मीठा लगता तो सब-के-सब रस फीके हो जाते’। भोजनके छ: रस और काव्यके नौ रस होते हैं। ये सब फीके हो जाते हैं; क्योंकि ये सब बाह्य हैं। उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थोंसे मिलनेवाला रस ‘नीरसता’ में बदल जाता है। ‘विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्’—संसारमें जितने रस हैं, वे विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे होनेवाले हैं। वे आरम्भमें अमृतके समान लगते हैं, परंतु ‘परिणामे विषमिव’—परिणाममें जहरकी तरह होते हैं। इस तरफ विचार न करनेसे मनुष्य विषयोंमें फँसता है। जो विचारवान् सात्त्विक पुरुष होते हैं, वे पहले परिणामकी तरफ देखते हैं, इस कारण वे फँसते नहीं।

सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं,

सुदीर्घकालेऽपि न याति विक्रियाम्।

सज्जनो! ये बातें ऐसे ही केवल कहने-सुननेकी नहीं हैं, समझनेकी हैं और समझकर काममें लानेकी हैं। आदमीको सोच-समझकर काम करना चाहिये। विचारपूर्वक काम करनेवालेको परिणाममें कष्ट नहीं उठाना पड़ता।

बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछताय,

काज बिगारे आपना जगमें होत हँसाय

जगमें होत हँसाय चित्तमें चैन न पावे,

राग रंग सन्मान ताहिके मन नहिं भावे

कह गिरधर कविराय करम गति टरे न टारे,

खटकत है हिय माँहि करे जो बिना बिचारे॥

बिना विचार किये काम करनेसे आगे दु:ख पाना पड़ता है और वह बात हृदयमें भी खटकती रहती है। मनुष्य अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग कर दे और दूसरोंके हितके लिये काम करे तो उसका जीवन सफल हो जाय। सात्त्विक वृत्तियोंकी मुख्यता रखकर अर्थात् विचारपूर्वक प्रत्येक कार्य करना चाहिये। लोग भोजन करते हैं तो दु:ख, शोक और रोग देनेवाले राजसी भोजनमें प्रवृत्त होते हैं। जान-बूझकर कुपथ्य कर लेते हैं। छोटे-से जीभके टुकड़ेके वशमें होकर साढ़े तीन हाथके शरीरका नुकसान कर लेते हैं। अगर विवेक होता तो शरीरका नाश क्यों कर लेते? इतना ही नहीं, अभक्ष्य-भक्षण करके नरकोंकी तैयारी कर लेते हैं।

‘राम’ नामकी महिमा कहते हुए गोस्वामीजी कहते हैं—‘सुगति’ रूपी जो सुधा है, यह सदाके लिये तृप्त करनेवाली है। सदाके लिये लाभ हो जाय, जिस लाभके बादमें कोई लाभ बाकी नहीं रहता, जहाँ कोई दु:ख पहुँच ही नहीं सकता है। ऐसे महान् आनन्दको प्राप्त करानेवाली जो श्रेष्ठ गति है, उसका रस ‘राम’ नामका जप करनेसे आता है। जो ‘राम’ नामसे तृप्त हो जाते हैं, वे फिर सांसारिक भोगोंमें फँसेंगे नहीं। उनसे कहना नहीं पड़ेगा कि पाप-अन्याय मत करो। उनकी पाप-अन्यायमें रुचि रहेगी ही नहीं। जिनको भगवन्नामका रस नहीं मिला है, वे धन इकट्ठा करने और भोग भोगनेमें लगे हैं।

सज्जनो! माताओ-बहनो! भगवान‍्के नाममें रस लो, इसमें तल्लीन हो जाओ। रात-दिन इसमें लग जाओ। आप-से-आप पाप-अन्याय छूट जायगा। निषिद्ध आचरणोंसे स्वत: ही ग्लानि हो जायगी। अभी मलिनता अच्छी लगती है, बुरी नहीं लगती, कारण क्या है? अन्त:करण मैला है। जो खुद मैला है, उसे मैली चीज ही अच्छी लगेगी। मक्खियाँ मिठाईपर तभीतक बैठी रहती हैं कि जबतक मैलेकी टोकरी पाससे होकर न निकले। मुँहपर मक्खियाँ बैठने लगें तो बढ़िया सुगन्धवाला इत्र थोड़ा-सा लगा लो फिर मक्खियाँ नहीं आयेंगी; क्योंकि उनको सुगन्धि सुहाती ही नहीं। ‘मक्षिका व्रणमिच्छन्ति’—वे तो घावपर जहाँ पीप-खून मिले, वहाँ बैठेंगी। ऐसे ही जिसका मन अशुद्ध होता है, वह ही मलिन वस्तुओंकी तरफ आकृष्ट होता है। भगवान‍्के नाम-रूपी सुगन्धके मिलनेपर फिर मैली वस्तुओंकी तरफ मन नहीं जायगा।

सज्जनो! यह बड़ा सुगम उपाय है। भगवान‍्के नामका जप करो और प्रभुके चरणोंका सहारा रखो। जैसे साधारण मनुष्य धन कमाने और भोग भोगनेमें रस लेते हैं, वैसे ही भगवत्प्रेमीको भगवन्नाम, सत्संग और सत्-शास्त्रोंके अध्ययनमें रस लेना चाहिये। इस रसके लिये ही मानव जीवन मिला है जिसे ‘राम’ नाम लेनेमें रस आने लगेगा, वह रात-दिन नाम जपमें लग जायगा, फिर वह संसारके विषयोंमें फँसेगा ही कैसे?

संत-संगकी महिमा

श्रीचैतन्य-महाप्रभुके कई शिष्य हुए हैं। उनमें एक यवन हरिदासजी महाराज भी थे। वे थे तो मुसलमान, पर चैतन्य-महाप्रभुके संगसे भगवन्नाममें लग गये। सनातन धर्मको स्वीकार कर लिया। उस समय बड़े-बड़े नवाब राज्य करते थे, उनको बड़ा बुरा लगा। लोगोंने भी शिकायत की कि यह काफिर हो गया। इसने हिन्दूधर्मको स्वीकार कर लिया। उन लोगोंने सोचा—‘इसका कोई-न-कोई कसूर हो तो फिर अच्छी तरहसे इसको दण्ड देंगे।’

एक वेश्याको तैयार किया और उससे कहा—‘यह भजन करता है, इसको यदि तू विचलित कर देगी तो बहुत इनाम दिया जायगा।’ वेश्याने कहा—‘पुरुष जातिको विचलित कर देना तो मेरे बायें हाथका खेल है।’ ऐसे कहकर वह वहाँ चली गयी जहाँ हरिदासजी एकान्तमें बैठे नाम-जप कर रहे थे। वह पासमें जाकर बैठ गयी और बोली—‘महाराज, मुझे आपसे बात करनी है।’ हरिदासजी बोले—‘मुझे अभी फुरसत नहीं है।’ ऐसा कहकर भजनमें लग गये। ऐसे उन्होंने उसे मौका दिया ही नहीं। तीन दिन हो गये, वे खा-पी लेते और फिर ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥’ मन्त्र-जपमें लग जाते। ऐसे वेश्याको बैठे तीन दिन हो गये, पर महाराजका उधर खयाल ही नहीं है, नाममें ही रस ले रहे हैं। अब उस वेश्याका भी मन बदला कि तू कितनी निकृष्ट और पतित है। यह बेचारा सच्चे हृदयसे भगवान‍्में लगा हुआ है इसको विचलित कर नरकोंकी ओर तू ले जाना चाहती है, तेरी दशा क्या होगी? इतना भगवन्नाम सुना, ऐसे विशुद्ध संतका संग हुआ, दर्शन हुए। अब तो वह रो पड़ी एकदम ही ‘महाराज! मेरी क्या दशा होगी, आप बताओ?’

जब महाराजने ऐसा सुना तो बोले ‘हाँ, हाँ। बोल अब फुरसत है मुझे। क्या पूछती हो?’ वह कहने लगी—‘मेरा कल्याण कैसे होगा? मेरी ऐसी खोटी बुद्धि है, जो आप भजनमें लगे हुएको भी नरकमें ले जानेका विचार कर रही थी। मैं आपको पथभ्रष्ट करनेके लिये आयी। नवाबने मुझे कहा कि तू उनको विचलित कर दे, तेरेको इनाम देंगे। मेरी दशा क्या होगी?’ तो उन्होंने कहा ‘तुम नाम-जप करो, भगवान‍्का नाम लो।’

फिर बोली—‘अब तो मेरा मन भजन करनेका ही करता है, भविष्यमें कोई पाप नहीं करूँगी, कभी नहीं करूँगी।’ हरिदासजीने उसे माला और मन्त्र दे दिया। ‘अच्छा यह ले माला! बैठ जा यहाँ और कर हरि भजन।’ उसे वहाँ बैठा दिया और वह—‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥’ इस मन्त्रका जप करने लगी। हरिदासजीने सोचा—‘यहाँ मेरे रहनेसे नवाबको दु:ख होता है तो छोड़ो इस स्थानको और दूसरी जगह चलो।’

एकान्तमें दो-तीन दिनतक वेश्या बैठी रही, फिर भी हरिदासजीका मन नहीं चला—इसमें कारण क्या था? ‘राम’ नामका जो रस है, वह भीतरमें आ गया। अब बाकी क्या रहा! सज्जनो! संसारके रससे सर्वथा विमुख होकर जब भगवन्नाम-जपमें प्रेमपूर्वक लग जाओगे, तब यह भजनका रस स्वत: आने लगेगा। इसलिये ‘राम’ नाम रात-दिन लो, कितनी सीधी बात है!

नाम लेने का मजा जिसकी जुबाँ पर आ गया।

वो जीवन्मुक्त हो गया चारों पदार्थ पा गया॥

किसी व्यापारमें मुनाफा कब होता है? जब वह बहुत सस्तेमें खरीदा जाय, फिर उसका भाव बहुत मँहगा हो जाय, तब उसमें नफा होता है। मान लो, दो-तीन रुपये मनमें अनाज आपके पास लिया हुआ है और भाव चालीस, पैंतालीस रुपये मनका हो गया। लोग कहते हैं, अनाजका बाजार बड़ा बिगड़ गया, पर आपसे पूछा जाय तो आप क्या कहेंगे? आप कहेंगे कि मौज हो गयी। आपके लिये बाजार खराब नहीं हुआ। ऐसे ही ‘राम’ नाम लेनेमें सत्ययुगमें जितना समय लगता था, उतना ही समय अब कलियुगमें लगता है। पूँजी उतनी ही खर्च होगी और भाव होगा कलियुगके बाजारके अनुसार। कितना सस्ता मिलता है और कितना मुनाफा होता है इसमें! कलियुगमें नामकी महिमा विशेष है।

भगवन्नाममें शक्ति

चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।

कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥

नाम्नामकारि बहुधा निज सर्वशक्ति-

स्तत्रार्पिता नियमित: स्मरणे न काल:।

श्रीचैतन्य-महाप्रभुने कहा है कि नाममें भगवान‍्ने अपनी सब-की-सब शक्ति रख दी। अनेक साधनोंमें जो शक्ति है, सामर्थ्य है, जिन साधनोंके करनेसे जीवका कल्याण होता है, कलियुगको देखकर भगवान‍्ने भगवन्नाममें उन सब साधनोंकी शक्ति रख दी। जो अनेक साधनोंमें ताकत है, वह सब ताकत नाम महाराजमें है। इसे स्मरण करनेके लिये समयका प्रतिबन्ध भी नहीं है। सुबह, दोपहर या रातमें, किसी समय जप करें। ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य ही करें, दूसरे न करें, भाई लोग जप करें, माता-बहनें न करें’—ऐसा कोई नियम नहीं है।

कलिसंतरणोपनिषद् में नाम-महिमा आयी है। एक बार नारदजी ब्रह्माजीके पास गये। ब्रह्माजीने पूछा—‘कैसे आये हो?’ नारदजीने कहा—‘पृथ्वीमण्डलपर अभी कलियुग आया हुआ है। इस कलियुगमें जीवोंका उद्धार सुगमतापूर्वक कैसे हो?’ ब्रह्माजीने कहा—‘कलियुगके पापोंको दूर करनेके लिये यह महामन्त्र है—‘हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥’ ‘इति षोडशकं कल्मषनाशनम्’ भगवन्नाम ही इस कलियुगमें सुगम साधन है।

फिर नारदजीने पूछा—‘कोऽस्ति विधिरिति सहोवाच प्रजापति:’ भगवन्नाम लेनेकी विधि क्या है? तो ब्रह्माजीने उत्तर दिया—‘नास्ति विधि:’ कोई कैसा ही हो। पापी हो या पुण्यात्मा वह नाम जपता हुआ सायुज्य, सालोक्य आदि मुक्तियोंको प्राप्त कर लेता है। इसलिये नाम लिये जाओ बस। कलियुगी जीवोंके लिये कितनी सुगम बात बता दी! अगर विधियाँ बता देते तो मुश्किल हो जाती। नाम-जपमें निषेध कुछ है ही नहीं। ‘सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू’ सबके लिये सुलभ है। ‘सुलभं भगवन्नाम वागस्ति वशवर्तिनी’। भगवान‍्का नाम सुलभ है, इसपर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया है। वर्तमान सरकारने भी कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया है, आगे खतरा हो सकता है, परंतु अभी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। खुला नाम लो भले ही, कोई मना नहीं है।

राम दड़ी चौड़े पड़ी, सब कोई खेलो आय।

दावा नाहीं सन्तदास, जीते सो ले जाय॥

किसीका दावा नहीं है। सब कोई भगवान‍्का नाम ले सकते हैं। जैसे बापकी जगहपर बेटेका हक लगता है, वैसे भगवन्नामपर हमारा पूरा-का-पूरा हक लगता है; क्योंकि यह हमारे बापका नाम है। ऐसा अपनेको अधिकार मिला हुआ है। कितनी मौजकी बात है, कितने आनन्दकी बात है यह! मनुष्य-शरीर मिल गया और फिर इसमें भगवान‍्का नाम मिल गया।

हाथ काम मुख राम है, हिरदे साँची प्रीत।

दरिया गृहस्थी साध की, याही उत्तम रीत॥

हाथोंसे अपना काम करते हुए मुँहसे ‘राम’ नाम जप करते रहें। बहनें-माताएँ घरका काम करें। भाई लोग खेतोंमें या दूकानोंमें काम करें। वे जहाँ हों, वहाँ ही रहकर काम करते रहें। हृदयमें भगवान‍्से स्नेह बना रहे। हमें भगवान‍्की तरफ ही चलना है। मनुष्य-शरीर मिला है इसलिये उद्धार करना है। हृदयमें सच्चा प्रेम भगवान‍्से हो, सांसारिक पदार्थोंसे, भोगोंसे न हो। संतोंने कहा है—

नर तन दीनो रामजी, सतगुरु दीनो ज्ञान,

ए घोड़ा हाँको अब, ओ आयो मैदान।

ओ आयो मैदान बाग करड़ी कर सावो,

हृदय राखो ध्यान नाम रसनासे गावो।

कुण देख सगराम कहे आगे काढ़े कान,

नर तन दीनो रामजी, सतगुरु दीनो ज्ञान॥

कह दास सगराम बरगड़े घालो घोड़ा,

भजन करो भरपूर रह्या दिन बाकी थोड़ा।

थोड़ा दिन बाकी रह्या कद पहुँचोला ठेट,

अध बिचमें बासो बसो तो पड़सो किणरे पेट।

पड़सो किणरे पेट पड़ेला भारी फोड़ा,

कह दास सगराम बरगड़े घालो घोड़ा॥

ऐसा बढ़िया मौका आ गया है। कितना सीधा, सरल रास्ता संतोंने बता दिया! ‘संतदास सीधो दड़ो सतगुरु दियो बताय’, ‘धावन्निमिल्य वा नेत्रे न स्खलेन्नपतेदिह।’ इस मार्गमें मनुष्य न स्खलित होता है, न गिरता है, न पड़ता है—ऐसा सीधा और सरल रास्ता है। संतोंने कृपा करके बता दिया। हर कोई ऐसी गुप्त बात बताते नहीं हैं—

राम नामकी संतदास दो अन्तर धक धूण।

या तो गुपती बात है कहो बतावे कूण॥

तुलसीदासजी कहते हैं ‘कमठ सेष सम धर बसुधा के’—‘राम’ नामके दो अक्षर ‘र’ और ‘म’ शेषनाग और कमठके समान हैं। जैसे पृथ्वीको धारण करनेवाले शेष और कमठ हैं, ऐसे यह जो ‘राम’ नाम है इसमें ‘र’ शेषनाग है (‘र’ का आकार भी ऐसा ही होता है) और ‘म’ कमठ (कछुआ) है। संसारमात्रको धारण करनेमें रामजी महाराज कमठ और शेषके समान हैं। अपने भक्तको धारण करनेमें उनके कौन बड़ी बात है!

सरवर पर गिरवर तरे, ज्यूँ तरवरके पात।

जन रामा नर देहको तरिबो किती एक बात॥

भगवान‍्के नामसे समुद्रके ऊपर पत्थर तैर गये तो मनुष्यका उद्धार हो जाय—इसमें क्या बड़ी बात है! भगवान‍्ने उद्धार करनेके लिये ही इसको मनुष्य-शरीर दिया। भगवान‍्ने भरोसा किया कि यह अपना उद्धार करेगा। सज्जनो! मुफ्तमें बात मिली हुई है। भगवान‍्ने जब विचार किया कि यह उद्धार करे तो भगवान‍्की कृपा एवं उनका संकल्प हमारे साथ है। पतनमें हमारा अपना हाथ है, उसमें भगवान‍्का हाथ नहीं है। उनका संकल्प हमारे उद्धारका है, कितनी भारी मदद है! सब संत, ग्रन्थ, धर्म, सद‍्गुरु, सत्-शास्त्र हमारे साथ हैं। ऐसा भगवान‍्का नाम है। केवल हम थोड़ी-सी हाँ-में-हाँ मिला दें। आगे गोस्वामीजी कहते हैं—

जन मन मंजु कंज मधुकर से।

जीह जसोमति हरि हलधर से॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २०। ८)

ये नाम महाराज भक्तोंके मन-रूपी सुन्दर कमलमें विहार करनेवाले भैांरेके समान हैं और जीभरूपी यशोदाजीके लिये श्रीकृष्ण और बलरामजीके समान आनन्द देनेवाले हैं। भक्तोंका मन बहुत सुन्दर कमलके समान है, उसके ऊपर राम, राम, राम... नामरूपी भँवरे मँडरा रहे हैं। ये मनके ऊपर बैठे हैं। मन हरदम भगवान‍्के नाममें लगा हुआ है। इस कारण भक्तोंको दूसरी चीज सुहाती नहीं। भगवन्नाममें यदि कोई बाधा लगती है तो वह उन्हें सुहाती नहीं है।

भजनानन्दी संत

जोधपुरमें श्रीबुधारामजी महाराज हुए हैं। ‘बागर’ में उनका रामद्वारा है। वे माताजी सहित वहाँ रहते थे। इनको खेड़ापा महाराजका उपदेश हो गया तो रात-दिन ‘राम’ नाम जपमें लग गये। जब रसोई बनकर तैयार हो जाती तो माँ कह देती—‘बेटा! रोटी बन गयी है।’ तब वे आकर भोजन कर लेते, फिर वैसे ही राम, राम... करने लग जाते। एक बार वे अपनी माँसे बोले—‘माँ, रोटी मत बनाया कर। रोटी चबानेमें जितना समय लगता है, उतना समय नाम-जपके बिना चला जाता है, इसलिये तू खिचड़ी या खीचड़ा बना दिया कर।’ अब खिचड़ी परोसे तो वह बहुत देरतक गरम रहती थी। तो कहा—‘माँ, जब ठण्डी हो जाय, तब मेरेको कहा कर। अब इस अन्नकी उपासना कौन करे, देर लगती है।’ फिर एक दिन कहा—‘माँ, राबड़ी बना दिया कर।’ माँ आटा घोलकर राबड़ी बना देती। वह ठण्डी होनेपर गट-गट पी लेते। फिर राम, राममें लगे रहते।

भजन करनेमें लगे हुएको भोजन करनेमें समय लगाना ठीक नहीं लगता है। अब स्वाद तो ले ही कौन? क्या बढ़िया देखे और क्या घटिया? प्राणोंको रखना है, इसलिये अन्नकी खुराक दे दो—

कबीर छुधा है कूकरी तन सों दई लगाय।

याको टुकड़ा डालकर पीछे हरि गुण गाय॥

गोस्वामीजी कहते हैं—‘जीह जसोमति हरि हलधर से’—माता यशोदाकी गोदमें कन्हैया और बलदाऊ—दोनों खेलते हैं। भगवान‍्के भक्तोंकी जो जीभ है, वह यशोदाजीके समान है। उनकी गोदमें ‘रा’ और ‘म’ रूपी कन्हैया और दाऊ भैया खेल रहे हैं। बालकको माँकी गोदमें खेलनेमें आनन्द आता है। मनमें ‘भँवरे’ रूपसे ‘राम’ नाम है, जीभपर राम-नाम ‘हरि हलधर से’ हैं। इसलिये भक्तलोग मनसे भी ‘राम’ नाम और जीभसे भी ‘राम’ नाम जपते रहते हैं। मनसे, वाणीसे, इन दोनों अक्षरोंमें तल्लीन होकर रात-दिन भजन करते हैं। किसी तरहकी कोई इच्छा, तृष्णा और वासना उनमें रहती ही नहीं। इस प्रकार इन ‘र’ और ‘म’ अक्षरोंकी महिमा कहाँतक कही जाय! इनको लेनेसे ही इनका रस अनुभवमें आता है। इसलिये हर समय भगवन्नाम-जप करते ही रहना चाहिये।