प्रवचन—६
रूप बिसेष नाम बिनु जानें।
करतल गत न परहिं पहिचानें॥
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें।
आवत हृदयँ सनेह बिसेषें॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा २१। ५-६)
गोस्वामीजी महाराज आगे कहते हैं कि कोई भी वस्तु हथेलीपर रखी होनेपर भी पहचाननेमें नहीं आती, जबतक उसका नाम न जान लिया जाय और रूपके बिना देखे ही नामका स्मरण किया जाय तो उस रूपके प्रति हृदयमें विशेष प्रेम आ जाता है।
बिना नामके जाने अनजान वस्तुको हाथमें ले भी लें तो उसका पता नहीं लगता। नामके जाने बिना वस्तुकी पहचान नहीं होती। ऐसे इन दोनोंमें (रूप और नाममें) अन्वय-व्यतिरेकसे पता लगेगा कि बड़ा-छोटा कौन है। ‘सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें’ रूप देखे बिना ही केवल नामका स्मरण किया जाय तो भी हृदयमें भगवान् आ जायँगे। इस प्रकार नाम लेनेसे रूप महाराज तो पधार ही जायँगे, पर नाम महाराज बिना रूप महाराजके सामने रहते हुए भी उनकी पहचान नहीं होगी। ‘आवत हृदयँ सनेह बिसेषें’ विशेष स्नेहके साथ नामका स्मरण करनेसे हृदयमें भगवान् आ जाते हैं।
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।
प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा १८५। ५)
जैसे पत्थर रगड़नेसे अग्नि प्रकट हो जाती है, ऐसे ही हृदयके भावसे, स्नेहसे नाम लिया जाय तो भगवान् हृदयमें ही नहीं, बाहर-भीतर सब जगह प्रकट हो जाते हैं। तुलसीदासजी महाराज आगे बताते हैं—
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा २१)
‘राम’ नाम मणिदीप है। एक दीपक होता है और एक मणिदीप होता है। तेलका दीया दीपक कहलाता है। मणि स्वत: प्रकाश करनेवाली होती है। जो मणिदीप होता है, वह कभी बुझता नहीं। ‘राम’ नाम क्या है? तो कहते हैं, यह मणिदीप है। इसे कहाँ रखें? जीभके ऊपर। वहाँ क्यों? तो कहते हैं, जैसे दीपकको मकानके दरवाजेके बाहर रख दें, तो भीतर अँधेरा रह जाय और भीतर रख दें, तो बाहर अँधेरा रह जाय। तो क्या किया जाय? दरवाजेकी देहलीपर रख दो। वहाँपर रखनेसे दोनों जगह प्रकाश हो जाता है। परमात्म-बोध हो जाता है और बाहर भगवान्के दर्शन हो जाते हैं। हवासे यह मणिदीप नहीं बुझता। हवा कितनी ही जोरसे चले! शरीरकी देहली क्या है? जीभ है। एक कविने कहा है—
‘भारति जुक्त भली विधि भासत देहके गेहके द्वार थलीं तूँ’ इस जीभको कहा ‘तेरेमें सरस्वती निवास करती है।’ ‘देहके गेहके द्वार थलीं तूँ।’
‘पै जगदीस जपे बिनु सालग नाहक नागनसी निकली तूँ’ जैसे बिलमें कोई नागिन हो—सर्पिणीकी ज्यों मुखमें बैठी है, पर ‘ना उथली हरि नामको लेन न क्यों रसना बिजली ते जली तूँ’ भगवान्का नाम लेनेके लिये उथली नहीं तो तू बिजलीसे क्यों नहीं जल गयी?
‘रामगुणावली गाये बिना गुणहीन गँवारन क्यों न गली तूँ’ हे गँवारन जीभ! यदि तूने राम गुण नहीं गाया, तो तू गली क्यों नहीं? अब नामको साक्षी बनाते हुए कहते हैं—
नाम रूप गति अकथ कहानी।
समुझत सुखद न परति बखानी॥
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी।
उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा २१। ७-८)
नाम और रूपकी गतिकी कहानी अकथनीय है। वह समझनेमें सुखदायक है; परंतु उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। निर्गुण और सगुणके बीचमें ‘राम’ नाम सुन्दर साक्षी है और यह दोनोंका यथार्थ ज्ञान करानेवाला चतुर दुभाषिया है। यह नाम महाराज सगुण और निर्गुण दोनोंसे श्रेष्ठ चतुर दुभाषिया है।
नाममें पाप-नाशकी शक्ति
जब ही नाम हृदय धरॺो भयो पाप को नास।
मानो चिनगी आग की पड़ी पुराने घास॥
नये घासमें इतनी जल्दी आग नहीं लगती, पुराना घास बहुत जल्दी आगको पकड़ता है। अनेक जन्मोंके, युग-युगान्तरके जितने पुराने पाप पड़े हुए हैं, वे सब तो हैं पुराना घास। उसपर ‘राम’ नाम रूपी देदीप्यमान अग्नि रख दी जाय तो बेचारे सब पाप नष्ट हो जाते हैं। नामको अगर हृदयमें धारण कर लिया जाय तो अज्ञान सदाके लिये नष्ट हो जाता है। मानो सब जगह प्रकाश हो जाता है।
सन्तोंकी वाणीमें पढ़ा है कि पापका नाश करनेके लिये नाम महाराजका प्रयोग नहीं करना चाहिये। नाम महाराजसे पापोंके नाशकी कामना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि सूर्य भगवान् आ जायँ तो उनसे प्रार्थना नहीं करते कि महाराज! आप हमारे यहाँ अन्धकारका नाश कर दो, अन्धकारको हटा दो, प्रकाश कर दो, उनसे ऐसे क्या कहना! सूर्योदयकी तैयारी होते ही अन्धकार बेचारा आप-से-आप भाग जाता है। उदय होनेसे पहले ही वह भाग जाता है। ऐसे नाम महाराजके आनेकी तैयारी हो जाय हृदयमें, तो पाप भाग जाते हैं।
‘सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभि: शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात्’ जहाँ भगवान्की कथा सुननेका मन किया, नाम जप करें, भजन करें, ऐसी इच्छा हुई कि भगवान् उसके हृदयमें आकर विराजमान हो जाते हैं। ‘राम’ नाम महाराजकी तरफका विचार हो गया तो उसके आभासमात्रसे पाप नष्ट हो जाते हैं। पापोंमें ताकत नहीं है ठहरनेकी।
पाप वास्तवमें क्या है? शास्त्रनिषिद्ध आचरण। जिनका शास्त्रोंने निषेध किया कि ‘ऐसा मत करो’ उसका करना ही पाप है। पाप कोई बलवान् वस्तु नहीं है, यह तो निकृष्ट है। जो निकृष्ट होता है, वह बलवान् भी हो तो उसमें ताकत नहीं होती। जैसे, बड़े-बड़े बलवान् चोर मकानपर चढ़ जाते हैं, भीतर आना चाहते हैं, पर घरमें उसी समय एक बालक रोने लगे, तो वे भाग जाते हैं; क्योंकि उनका हृदय कच्चा होता है। पापी-अन्यायी होनेसे उनमें ताकत नहीं होती। वे भाग जाते हैं बच्चेके रोनेकी आवाजमात्रसे। बेचारे पापमें शक्ति नहीं है। मनुष्यने ही इसको आदर देकर पकड़ रखा है। पाप तो बेचारे भागते हैं। जहाँ सत्संग हो जाय, वहाँ पाप कैसे टिक सकता है! पर मनुष्य उसको पकड़-पकड़कर रखता है।
पापोंको मनुष्य क्यों रखता है? इनका आदर क्यों करता है? क्या पाप सुखदायी हैं? एक तो इसके भावना यह है कि पाप नष्ट नहीं होंगे। हमारे पाप ऐसे जल्दी नष्ट नहीं होंगे। आप जब संकल्प रखोगे कि ये नष्ट नहीं होंगे तो वे कैसे नष्ट होंगे? अर्जुनने पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ पाप क्यों करता है? तो भगवान्ने उत्तर दिया ‘काम एष क्रोध एष’ काम ही क्रोध है और पाप होनेमें कारण कामना है। इनको पकड़कर रखेंगे तो पाप रहेंगे ही; क्योंकि पापके बापको पकड़ लिया आपने। अब बेटा पैदा होगा ही। पाप किससे होते हैं? पाप सब होते हैं कामनासे, भोग भोगनेकी और पदार्थोंके संग्रहकी इच्छासे। यह इच्छा है पापका बाप।
पापका बाप
एक प्रसिद्ध कहानी है—एक पण्डितजी काशीसे पढ़कर आये। ब्याह हुआ, स्त्री आयी। कई दिन हो गये। एक दिन स्त्रीने प्रश्न पूछा कि ‘पण्डितजी महाराज! यह तो बताओ कि पापका बाप कौन है?’ पण्डितजी पोथी देखते रहे, पर पता नहीं लगा, उत्तर नहीं दे सके। अब बड़ी शर्म आयी कि स्त्री पूछती है पापका बाप कौन है? हमने इतनी पढ़ाई की, पर पता नहीं लगा। वे वापस काशी जाने लगे। मार्गमें ही एक वेश्या रहती थी। उसने सुन रखा था कि पण्डितजी काशी पढ़कर आये हैं। उसने पूछा,‘कहाँ जा रहे हैं महाराज?’ तो बोले—‘मैं काशी जा रहा हूँ।’ काशी क्यों जा रहे हैं? आप तो पढ़कर आये हैं? तो बोले—‘क्या करूँ? मेरे घरमें स्त्रीने यह प्रश्न पूछ लिया कि पापका बाप कौन है? मेरेको उत्तर देना आया नहीं। अब पढ़ाई करके देखूँगा कि पापका बाप कौन है?’ वह वेश्या बोली—‘आप वहाँ क्यों जाते हो? यह तो मैं यहीं बता सकती हूँ आपको।’
बहुत अच्छी बात। इतनी दूर जाना ही नहीं पड़ेगा। ‘आप घरपर पधारो। आपको पापका बाप मैं बताऊँगी।’ अमावस्याके एक दिन पहले पण्डितजी महाराजको अपने घर बुलाया। सौ रुपया सामने भेंट दे दिये और कहा कि ‘महाराज! आप मेरे यहाँ कल भोजन करो।’ पण्डितजीने कह दिया—‘क्या हर्ज है, कर लेंगे!’ पण्डितजीके लिये रसोई बनानेका सब सामान तैयार कर दिया। अब पण्डितजी महाराज पधार गये और रसोई बनाने लगे तो वह बोली—‘देखो, पक्की रसोई तो आप पाते ही हो, कच्ची रसोई हरेकके हाथकी नहीं पाते। पक्की रसोई मैं बना दूँ, आप पा लेना’! ऐसा कहकर सौ रुपये पासमें और रख दिये। उन्होंने देखा कि पक्की रसोई हम दूसरोंके हाथकी लेते ही हैं, कोई हर्ज नहीं, ऐसा करके स्वीकार कर लिया।
अब रसोई बनाकर पण्डितजीको परोस दिया। सौ रुपये और पण्डितजी महाराजके आगे रख दिये और नमस्कार करके बोली—‘महाराज! जब मेरे हाथसे बनी रसोई आप पा रहे हैं तो मैं अपने हाथसे ग्रास दे दूँ। हाथ तो वे ही हैं, जिनसे रसोई बनायी है, ऐसी कृपा करो।’ पण्डितजी तैयार हो गये उसकी बातपर। उसने ग्रासको मुँहके सामने किया और उन्होंने ज्यों ही ग्रास लेनेके लिये मुँह खोला कि उठाकर मारी थप्पड़ जोरसे और वह बोली—‘अभीतक आपको ज्ञान नहीं हुआ? खबरदार! जो मेरे घरका अन्न खाया तो! आप-जैसे पण्डितका धर्म मैं भ्रष्ट करना नहीं चाहती। यह तो मैंने पापका बाप कौन है, इसका ज्ञान कराया है।’ रुपये ज्यों-ज्यों आगे रखते गये पण्डितजी ढीले होते गये।
इससे सिद्ध क्या हुआ? पापका बाप कौन हुआ? रुपयोंका लोभ! ‘त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:’ (गीता १६।२१)। काम, क्रोध और लोभ—ये नरकके खास दरवाजे हैं।
पर उपदेस कुसल बहुतेरे।
जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥
(मानस, लंकाकाण्ड, दोहा ७८। २)
दूसरोंको उपदेश देनेमें तो लोग कुशल होते हैं, परंतु उपदेशके अनुसार ही खुद आचरण करनेवाले बहुत ही कम लोग होते हैं।
मनुष्य खयाल नहीं करता कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये। औरोंको समझाते हुए पण्डित बन जाते हैं। अपना काम जब सामने आता है, तब पण्डिताई भूल जाते हैं, वह याद नहीं रहती।
परोपदेशवेलायां शिष्टा: सर्वे भवन्ति हि।
विस्मरन्तीह शिष्टत्वं स्वकार्ये समुपस्थिते॥
दूसरोंको उपदेश देते समय जो पण्डिताई होती है, वही अगर अपने काम पड़े, उस समय आ जाय तो आदमी निहाल हो जाय। जाननेकी कमी नहीं है, काममें लानेकी कमी है। हमें एक सज्जनने बड़ी शिक्षाकी बात कही कि आप व्याख्यान देते हुए साथ-साथ खुद भी सुना करो। इसका अर्थ यह हुआ कि मैं जो बातें कह रहा हूँ तो मेरे आचरणमें कहाँ कमी आती है? कहाँ-कहाँ गलती होती है? जो आदमी अपना कल्याण चाहे तो वह दूसरोंको सुननेके लिये व्याख्यान न दे। अपने सुननेके लिये व्याख्यान दे। लोग सुननेके लिये सामने आते हैं, उस समय कई बातें पैदा होती हैं। अकेले बैठे इतनी पैदा नहीं होतीं। इसलिये उन बातोंको स्वयं भी सुनें। केवल औरोंकी तरफ ज्ञानका प्रवाह होता है, यह गलती होती है।
पण्डिताई पाले पड़ी ओ पूरबलो पाप।
ओराँ ने परमोदताँ खाली रह गया आप॥
पण्डित केरी पोथियाँ ज्यूँ तीतरको ज्ञान।
ओराँ सगुन बतावहि आपा फंद न जान॥
करनी बिन कथनी कथे अज्ञानी दिन रात।
कूकर ज्यूँ भुसता फिरे सुनी सुनाई बात॥
हमें एकने बताया—‘कूकर ज्यूँ भुसता फिरे’—इसका अर्थ यह हुआ कि एक कुत्ता यहाँ किसीको देखकर भुसेगा तो दूसरे मोहल्लेके कुत्ते भी देखा-देखी भुसने लग जायँगे। एक-एकको सुनकर सब कुत्ते भुसने लग जायँगे। अब उनको पूछा जाय कि किसको भुसते हो? यह तो पता नहीं। दूसरा भुसता है न, इसलिये बिना देखे ही भुसना शुरू कर दिया। ऐसे ही दूसरा कहता है तो अपने भी कहना शुरू कर दिया। अरे, वह क्यों कहता है? क्या शिक्षा देता है? उसका क्या विचार है? सुनी सुनायी बात कहना शुरू कर देनेसे बोध नहीं होता। इसलिये मनुष्यको अपनी जानकारी अपने आचरणमें लानी चाहिये।
भजनमें दिखावा
भगवान्का नाम प्रेमपूर्वक लेता रहे, नेत्रोंसे जल झरता रहे, हृदयमें स्नेह उमड़ता रहे, रोमांच होता रहे तो देखो, उनमें कितनी विलक्षणता आ जाती है, पर वही दूसरोंको दिखानेके लिये, दूसरोंको सुनानेके लिये करेंगे तो उसका मूल्य घट जायगा। यह चीज औरोंको दिखानेकी नहीं है। धन तिजोरीमें रखनेका होता है। किसीने एक सेठसे पूछा—‘तुम घरमें रहते हो या दूकानमें? कहाँ सोते हो?’ तो सेठने कहा—‘हम हाटमें सोवें बाटमें सोवें, घरमें सोवें, सोवें और न भी सोवें।’
अगर हम कहें कि दूकानमें सोते हैं तो घरमें चोरी कर लेगा! घरमें सोनेकी कहें तो दूकानमें चोरी कर लेगा। अर्थ यह हुआ कि तुम चोरी करने मत आना। लौकिक धनके लिये इतनी सावधानी है कि साफ नहीं कह सकते हो कि कहाँ सोते हैं? और नामके लिये इतनी उदारता कि लोगोंको दिखावें! राम, राम, राम! कितनी बेसमझी है! यह क्या बात है? नामको धन नहीं समझा है। इसको धन समझते तो गुप्त रखते।
एक राजा भगवान्के बड़े भक्त थे, वे गुप्त रीतिसे भगवान्का भजन करते थे। उनकी रानी भी बड़ी भक्त थी। बचपनसे ही वह भजनमें लगी हुई थी। इस राजाके यहाँ ब्याहकर आयी तो यहाँ भी ठाकुरजीका खूब उत्सव मनाती, ब्राह्मणोंकी सेवा, दीन-दु:खियोंकी सेवा करती; भजन-ध्यानमें, उत्सवमें लगी रहती। राजा साहब उसे मना नहीं करते। वह रानी कभी-कभी कहती कि ‘महाराज! आप भी कभी-कभी राम-राम—ऐसे भगवान्का नाम तो लिया करो।’ वे हँस दिया करते। रानीके मनमें इस बातका बड़ा दु:ख रहता कि क्या करें, और सब बड़ा अच्छा है। मेरेको सत्संग, भजन, ध्यान करते हुए मना नहीं करते; परन्तु राजा साहब स्वयं भजन नहीं करते।
ऐसे होते-होते एक बार रानीने देखा कि राजासाहब गहरी नींदमें सोये हैं। करवट बदली तो नींदमें ही ‘राम’ नाम कह दिया। अब सुबह होते ही रानीने उत्सव मनाया। बहुत ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दिया; बच्चोंको, कन्याओंको भोजन कराया, उत्सव मनाया। राजासाहबने पूछा—‘आज उत्सव किसका मना रही हो? आज तो ठाकुरजीका भी कोई दिन विशेष नहीं है।’ रानीने कहा—‘आज हमारे बहुत ही खुशीकी बात है।’ क्या खुशीकी बात है? ‘महाराज! बरसोंसे मेरे मनमें था कि आप भगवान्का नाम उच्चारण करें। रातमें आपके मुखसे नींदमें भगवान्का नाम निकला।’ निकल गया? ‘हाँ’ इतना कहते ही राजाके प्राण निकल गये। ‘अरे मैंने उमरभर जिसे छिपाकर रखा था, आज निकल गया तो अब क्या जीना?’
गुप्त अकाम निरन्तर ध्यान सहित सानन्द।
आदर जुत जपसे तुरत पावत परमानन्द॥
ये छ: बातें जिस जपमें होती हैं, उस जपका तुरन्त और विशेष माहात्म्य होता है। भगवान्का नाम गुप्त रीतिसे लिया जाय, वह बढ़िया है। लोग देखें ही नहीं, पता ही न लगे—यह बढ़िया बात है, परंतु कम-से-कम दिखावटीपन तो होना ही नहीं चाहिये। इससे असली नाम-जप नहीं होता। नामका निरादर होता है। नामके बदले मान-बड़ाई खरीदते हैं, आदर खरीदते हैं, लोगोंको अपनी तरफ खींचते हैं—यह नाम महाराजकी बिक्री करना है। यह बिक्रीकी चीज थोड़े ही है! नाम जैसा धन, बतानेके लिये है क्या! लौकिक धन भी लोग नहीं बताते, खूब छिपाकर रखते हैं। यह तो भीतर रखनेका है, असली धन है।
माई मेरे निरधनको धन राम।
रामनाम मेरे हृदयमें राखूँ ज्यूँ लोभी राखे दाम॥
दिन दिन सूरज सवायो उगे, घटत न एक छदाम।
सूरदास के इतनी पूँजी, रतन मणि से नहीं काम॥
यह अपने हृदयकी बात है। मेरे निर्धनका धन यही है। कैसा बढ़िया धन है यह! अन्तमें कहते हैं यह जो रत्न-मणि, सोना आदि है, इनसे मेरे मतलब नहीं है। ये पत्थरके टुकड़े हैं। इनसे क्या काम! निर्धनका असली धन तो ‘राम’ नाम है।
‘धनवन्ता सोइ जानिये जाके ‘राम’ नाम धन होय।’ यह धन जिसके पास है, वही धनी है। उसके बिना कंगले हैं सभी।
‘सम्मीलने नयनयोर्न हि किंचिदस्ति।’
करोड़ों रुपये आज पासमें हैं, पर ये दोनों आँखें सदाके लिये जिस दिन बन्द हो गयीं, उस दिन कुछ नहीं है। सब यहाँका यहीं रह जायगा।
‘सुपना सो हो जावसी सुत कुटुम्ब धन धाम।’
यह स्वप्नकी तरह हो जायगा। आँख खुलते ही स्वप्न कुछ नहीं और आँख मिचते ही यहाँका धन कुछ नहीं।
स्थूल बुद्धिवाले बिना समझे कह देते हैं कि ‘राम’ नामसे क्या होता है? वे बेचारे इस बातको जानते नहीं, उन्हें पता ही नहीं है। इस विद्याको जाननेवाले ही जानते हैं भाई! सच्ची लगन जिसके लगी है, वह जानता है। दूसरोंको क्या पता? ‘जिसके लागी है सोई जाने दूजा क्या जाने रे भाई’ भगवान्का नाम लेनेवालोंका बड़े-बड़े लोकोंमें जहाँ जाते हैं, वहाँ आदर होता है कि भगवान्के भक्त पधारे हैं। हमारा लोक पवित्र हो जाय। भगवन्नामसे रोम-रोम, कण-कण पवित्र हो जाता है, महान् पवित्रता छा जाती है। ऐसा भगवान्का नाम है। जिसके हृदयमें नामके प्रति प्रेम जाग्रत् हो गया, वह असली धनी है। इससे भगवान् प्रकट हो जाते हैं। वह खुद ऐसा विलक्षण हो जाता है कि उसके दर्शन, स्पर्श, भाषणसे दूसरोंपर असर पड़ता है। नाम लेनेवाले सन्त-महात्माओंके दर्शनसे शान्ति मिलती है। अशान्ति दूर हो जाती है, शोक-चिन्ता दूर हो जाते हैं और पापोंका नाश हो जाता है। जहाँ वे रहते हैं, वे धाम पवित्र हो जाते हैं और जहाँ वे चलते हैं, वहाँका वायुमण्डल पवित्र हो जाता है।
प्रह्लादपर संत-कृपा
प्रह्लादजी महाराजपर नारदजीकी कृपा हो गयी। इन्द्रको हिरण्यकशिपुसे भय लगता था। हिरण्यकशिपु तपस्या करने गया हुआ था। पीछेसे इन्द्र उसकी स्त्री कयाधूको पकड़कर ले गया। बीचमें नारदजी मिल गये। उन्होंने कहा—‘बेचारी अबलाका कोई कसूर नहीं है, इसको क्यों दु:ख देता है भाई!’ इन्द्रने कहा—‘इसको दु:ख नहीं देना है! इसके गर्भमें बालक है। अकेले हिरण्यकशिपुने हमारेको इतना तंग कर दिया है, अगर यह बालक पैदा हो जायगा तो बाप और बेटा दो होनेपर हमारी क्या दशा करेंगे। इसलिये बालक जन्मेगा, तब उसे मार दूँगा, फिर काम ठीक हो जायगा।’
नारदजीने कहा,‘इसका बेटा तेरा वैरी नहीं होगा।’ नारदजीकी बात सब मानते थे। इन्द्रने मान ली। ठीक है महाराज! कयाधूको छोड़ दिया। नारदजीने बड़े स्नेहसे उसको अपनी कुटियापर रखा और कहा कि ‘बेटी! तू चिन्ता मत कर। तेरे पति आयेंगे, तब पहुँचा दूँगा।’ वह जैसे अपने बापके घर रहे, वैसे नारदजीके पास रहने लगी। नारदजीके मनमें एक लोभ था कि मौका पड़ जाय तो इसके गर्भमें जो बालक है, इसको भक्ति सिखा दें। यह संतोंकी कृपा होती है। कयाधूको बढ़िया-बढ़िया भगवान्की बातें सुनाते, पर लक्ष्य रखते उस बालकका। वह प्रसन्नतासे सुनती और गर्भमें बैठा बालक भी उन बातोंको सुनता था। नारदजीकी कृपासे गर्भमें ही उसे ज्ञान हो गया।
माता रह्यो न लेश नारदके उपदेशको।
जो धारॺो हि अशेष गर्भ मांही ज्ञानी भयो॥
प्रह्लादजीको कितना कष्ट दिया! कितना भय दिखाया! परंतु उन्होंने नामको छोड़ा नहीं। प्रह्लादजीको रस आ गया, ऐसे नामको कैसे छोड़ा जाय? शुक्राचार्यजीके पुत्र प्रह्लादजीको पढ़ाते थे। राजाने उनको धमकाया कि तुम हमारे बेटेको बिगाड़ते हो। यह प्रह्लाद हमारे वैरीका नाम लेता है। यह कैसे सीख गया? प्रह्लादको पूछा—‘तुम्हारे यह कुमति कहाँसे आयी? दूसरोंका कहा हुआ करते हो कि स्वयं अपने मनसे ही! किसने सिखा दिया?’ प्रह्लादजी कहते हैं—‘जिसको आप कुमति कहते हो, यह दूसरा कोई सिखा नहीं सकता, न स्वयं आती है। संत-महापुरुष, भगवान्के प्यारे भक्तोंकी जबतक कृपा नहीं हो जाती, तबतक इसे कोई सिखा नहीं सकता।’
प्रेम बदौं प्रहलादहिको जिन पाहनतें परमेश्वरु काढ़े॥
प्रेम तो प्रह्लादजीका है, जिन्होंने पत्थरमेंसे रामजीको निकाल लिया। जिस पत्थरमेंसे कोई-सा रस नहीं निकलता, ऐसे पत्थरमेंसे रसराज श्रीठाकुरजीको निकाल लिया। ‘पाहनते परमेश्वरु काढ़े’ थम्भेमेंसे भगवान् प्रकट हो गये। थम्भे अपने यहाँ भी बहुत-से खड़े हैं। थम्भा तो है ही, पर प्रह्लाद नहीं है। राक्षसके घरके थम्भोंसे ये अशुद्ध थोड़े ही हैं? अपवित्र थोड़े ही हैं, पर जरूरत प्रह्लादकी है—‘प्रकर्षेण आह्लाद: यस्य स प्रह्लाद:’। इधर तो मार पड़ रही है, पर भीतर खुशी हो रही है, प्रसन्नता हो रही है। भगवान्की कृपा देख-देखकर हर समय आनन्द हो रहा है। ऐसे हम भी प्रह्लाद हो जायँ।
आपत्ति आवे, चाहे सम्पत्ति आवे, हर समय भगवान्की कृपा समझें। भगवान्की कृपा है ही, हम मानें तो है, न मानें तो है, जानें तो है, न जानें तो है। पर नहीं जानेंगे, नहीं मानेंगे, तो दु:ख पायेंगे। भीतरसे प्रभु कृपा करते ही रहते हैं। बच्चा चाहे रोवे, चाहे हँसे, माँकी कृपा तो बनी ही रहती है, वह पालन करती ही है। बिना कारण जब छोटा बच्चा ज्यादा हँसता है तो माँके चिन्ता हो जाती है कि बिना कारण हँसता है तो कुछ-न-कुछ आफत आयेगी। ऐसे आप संसारकी खुशी ज्यादा लेते हो तो रामजीके विचार आता है कि यह ज्यादा हँसता है तो कोई आफत आयेगी। यह अपशकुन है।