प्रवचन—७

नाम रूप गति अकथ कहानी।

समुझत सुखद न परति बखानी॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २१। ७)

नाम और रूप (नामी)-की जो गति है, इसका जो वर्णन है, ज्ञान है, इसकी जो विशेष कहानी है, वह समझनेमें महान् सुख देनेवाली है; परंतु इसका विवेचन करना बड़ा कठिन है। जैसे नामकी विलक्षणता है, ऐसे ही रूपकी भी विलक्षणता है। अब दोनोंमें कौन बड़ा है, कौन छोटा है—यह कहना कैसे हो सकता है! भगवान‍्का नाम याद करो, चाहे भगवान‍्के स्वरूपको याद करो, दोनों विलक्षण हैं। भगवान‍्के नाम अनन्त हैं, भगवान‍्के रूप अनन्त हैं, भगवान‍्की महिमा अनन्त है और भगवान‍्के गुण अनन्त हैं। इनकी विलक्षणताका वाणी क्या वर्णन कर सकती है! ‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।’ ‘मन समेत जेहि जान न बानी’ मन भी वहाँ कल्पना नहीं कर सकता। बुद्धि भी वहाँ कुण्ठित हो जाती है तो वर्णन क्या होगा?

नामीके दो स्वरूप

अब आगे नामीके दो स्वरूपोंका वर्णन करते हैं। पहले अन्वय-व्यतिरेकसे नामकी महिमा और नामको श्रेष्ठ बताया। अब कहते हैं—

अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी।

उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २१। ८)

परमात्मतत्त्वके दो स्वरूप हैं—एक अगुण स्वरूप है और एक सगुण स्वरूप है। नाम क्या चीज है? तो कहते हैं—‘अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी’ नाम महाराज निर्गुण और सगुण परमात्माके बीचमें सुन्दर साक्षी हैं और दोनोंका बोध करानेवाले चतुर दुभाषिया हैं। जैसे, कोई आदमी हिन्दी जानता हो, पर अंग्रेजी नहीं जानता और दूसरा अंग्रेजी जानता हो,पर हिन्दी नहीं जानता तो दोनोंके बीचमें एक आदमी ऐसा रख दिया जाय, जो दोनों भाषाओंको जानता हो, परस्परकी बात एक-दूसरेको समझा दे, वह दुभाषिया होता है। ऐसे नाममहाराज दोनोंके बीचमें दुभाषिया हैं। ‘चतुर दुभाषी’ इसका तात्पर्य हुआ कि केवल सगुणको निर्गुण और निर्गुणको सगुण बता दे—यह बात नहीं है; किन्तु नाम महाराजका आश्रय लेनेवाला जो भक्त है, उसको ये नाम महाराज सगुण और निर्गुणका ज्ञान करा देते हैं, यह विशेषता है।

संसारका दुभाषिया एकके भावोंको दूसरेके प्रति समझा देता है और दूसरेके भावोंको उसके प्रति कह देता है—इस तरहसे नाम महाराज नाम जपनेवालेको दोनोंका ज्ञान करा देते हैं कि निर्गुण तत्त्व क्या है और सगुण तत्त्व क्या है! ऐसा चतुर दुभाषिया है, जो निर्गुण-सगुण दोनोंका ज्ञान करा दे। मानो भगवन्नाम जपनेसे सगुण और निर्गुण दोनोंकी प्राप्ति हो जाती है। गोस्वामीजी महाराजने और एक जगह लिखा है कि ‘हियँ निरगुन नयनन सगुन’ हृदयमें निर्गुणका ज्ञान हो जाता है और बाहर नेत्रोंसे सगुणका दर्शन हो जाता है।

अब कहते हैं कि हम निर्गुण तत्त्वको ही जानना चाहते हैं तो निर्गुण तत्त्वको जनानेमें ‘राम’ नाम बहुत ही चतुर है। आपको निर्गुण तत्त्व ठीक समझा देगा। जिसकी ऐसी भावना है कि हम सगुणके दर्शन चाहते हैं, प्रेम चाहते हैं, भगवान‍्की कृपा, गुण, प्रभाव आदिको जानना चाहते हैं तो नाम महाराज सगुण भगवान‍्के दर्शन करा देंगे। जो दोनोंके ठीक तत्त्वको जानना चाहें कि सगुण तत्त्व क्या है और निर्गुण तत्त्व क्या है तो उनको दोनोंके तत्त्वको जना देंगे—ऐसे विलक्षण नाम महाराज हैं।

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।

तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २१)

तुलसीदासजी महाराज कहते हैं कि भीतर और बाहर दोनों जगह उजाला चाहते हो तो ‘राम’ नामरूपी मणिदीपको जीभरूपी देहलीपर रख दो। तो क्या होगा कि नाम महाराज बाहर तो साक्षात् धनुषधारी सगुण भगवान‍्के स्वरूपका दर्शन करा देंगे और भीतरमें परमात्मतत्त्वका तथा अपने स्वरूपका बोध करा देंगे। इस प्रकार बाहर और भीतर दोनों जगह ज्ञानका उजाला करा देते हैं।

हमारे बहुत-से विचित्र-विचित्र दर्शनशास्त्र हैं। न्याय, सांख्य, योग, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा—ये छ: आस्तिक दर्शन कहे जाते हैं। इनके सिवाय और भी बौद्ध, जैन, ईसाई, यवन आदिके अनेक दर्शन हैं, इनके अनेक सिद्धान्त हैं। इन दर्शनोंमें आपसमें कई मतभेद हैं। परमात्मतत्त्व क्या है? प्रकृति क्या है? कई दर्शन परमात्मा, जीवात्मा और जगत् इन तीनोंको लेकर चलते हैं। इनमें कई-कई परमात्माको छोड़कर जीवात्मा और जगत् दोको ही लेकर चलते हैं। चार्वाक शरीरको लेकर चलता है। ऐसे अनेक दार्शनिक भेद हैं, परंतु जो परमात्मतत्त्वको जानना चाहते हैं और आत्मतत्त्वको भी जानना चाहते हैं तो उनको नाम महाराज जना देते हैं। शबरीके प्रसंगमें भगवान‍्ने यह कहा है—

मम दरसन फल परम अनूपा।

जीव पाव निज सहज सरूपा॥

(मानस, अरण्यकाण्ड, दोहा ३६। ९)

मेरे दर्शनका परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। भगवान‍्के दर्शन होना और चीज है, निज-स्वरूपका ज्ञान और चीज है। ऐसे देखा जाय तो एक ही तत्त्व मिलता है, परंतु इसमें भी दार्शनिकोंने और भेद माना है। कोई द्वैत मानते हैं, कोई अद्वैत मानते हैं। द्वैतमें भी विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत और अचिन्त्यभेदाभेद—ऐसे वैष्णवोंके मत हैं। सब मतोंका अगर कोई ज्ञान करना चाहे तो नामकी ठीक निष्ठापूर्वक शरण लेनेसे नाम महाराज सबका ज्ञान करा देते हैं। ऐसे देखा जाय तो सगुण और निर्गुणके अन्तर्गत सब सम्प्रदाय आ जाते हैं।

ज्ञानी भक्त

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी।

बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥

ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा।

अकथ अनामय नाम न रूपा॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २२। १-२)

ब्रह्माजीके बनाये हुए इस प्रपंच (दृश्य जगत् )-से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नामको ही जीभसे जपते हुए (तत्त्वज्ञानरूपी दिनमें) जागते हैं और नाम तथा रूपसे रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुखका अनुभव करते हैं।

संसारमें जितने जीव हैं, वे सब नींदमें पड़े हुए हैं। जैसे नींद आ जाती है तो बाहरका कुछ ज्ञान नहीं रहता, इसी तरह परमात्माकी तरफसे जीव प्राय: सोये हुए रहते हैं। परमात्मा क्या हैं, क्या नहीं हैं—इस बातका उनको ज्ञान नहीं है। इसका जो कोई ज्ञान करना चाहते हैं और अपने स्वरूपका बोध भी करना चाहते हैं, वे योगी होते हैं। मानो उनका संसारसे वियोग होता है और परमात्माके साथ योग होता है। वे जीभसे नाम-जप करके जाग जाते हैं। उनको सब दीख जाता है।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:॥

(गीता २। ६९)

मानो साधारण मनुष्य परमात्मतत्त्वकी तरफसे बिलकुल सोये हैं। जैसे अँधेरी रातमें दीखता नहीं, ऐसे उनको भी कुछ नहीं दीखता, पर संयमी पुरुष उसमें जागते हैं। जिसमें सभी प्राणी जाग रहे हैं, मेरा-तेरा कहकर बड़े सावधान होकर संसारका काम करते हैं, संसारके तत्त्वको जाननेवाले मुनिकी दृष्टिमें वह रात है। ये लोग अपनी दृष्टिसे इसे जागना भले ही मानें; परंतु बिलकुल सोये हुए हैं, उनको कुछ होश नहीं है। वे समझते हैं कि हम तो बड़े चालाक, चतुर और समझदार हैं। यह तो पशुओंमें भी है, पक्षियोंमें भी है, वृक्षोंमें भी है, लताओंमें भी है और जन्तुओंमें भी है। खाना-पीना, लड़ाई-झगड़ा, मेरा-तेरा आदि संसारभरमें है। इसमें जागना मनुष्यपना नहीं है। मनुष्यपन तो तभी है, जब परमात्म-स्वरूपको जान लें अर्थात् उसमें जाग जायँ। उसे कैसे जानें? उसका उपाय क्या है? परमात्माके नामको जीभसे जपना शुरू कर दें और परमात्माको चाहनेकी लगन हो जाय तो वे जाग जाते हैं।

नाम-जपसे सब कुछ मिलता है। हृदयसे जो चाहना होगी, वह चीज उसको मिल जायगी। जैसे कल्पवृक्षके नीचे बैठकर मनुष्य जो कामना करता है, वह कामना पूरी होती है, ऐसे ही यदि हृदयमें नाम-जपकी सच्ची लगन होगी तो नाम महाराज उसी तत्त्वको जना देंगे। इसलिये वह जाग जायगा। जागनेसे क्या होगा? जो अनुपम ब्रह्मसुख है, उसका वह अनुभव कर लेगा। ब्रह्मसुख कैसा होता है? उसकी कोई उपमा नहीं है। भोजन करनेसे जैसे तृप्ति होती है, ऐसा वह सुख नहीं है। सम्पत्ति, वैभव मिलनेसे एक खुशी आती है, इसकी उस सुखसे तुलना नहीं कर सकते। ब्रह्मसुखमें कभी भी किंचिन्मात्र कमी नहीं आ सकती। दु:ख नजदीक नहीं आ सकता। नाम जपनेवाले उस सुखका अनुभव कर लेते हैं।

‘अकथ अनामय नाम न रूपा’—अभी पहले कहा था कि नाम और रूप अकथनीय हैं। अब कहते हैं वह जो निर्गुण ब्रह्मसुख है, वह भी अकथनीय है। निर्गुण और सगुण दोनों अकथनीय हैं और इनके नामकी महिमा भी कथनमें नहीं आ सकती। तात्पर्य क्या निकला? लौकिक इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि तो सांसारिक पदार्थोंका वर्णन और दर्शन कराते हैं, परंतु परमात्माकी तरफ चलनेमें ये सब कुण्ठित हो जाते हैं; क्योंकि परमात्मा इनका विषय नहीं है। परमात्मतत्त्व प्रकृतिसे भी अतीत है। प्रकृतिका वर्णन दार्शनिक लोगोंने किया है; परंतु प्रकृतिका वर्णन भी पूरा नहीं हो सकता। जो साधन हमें प्राप्त हैं, उनमें सबसे बढ़िया बुद्धि है, वह बुद्धि भी प्रकृतितक नहीं पहुँच पाती। प्रकृतिके कार्यों (शरीर, मन, इन्द्रियाँ)-में बुद्धि काम करती है, पर कारणमें अर्थात् प्रकृतिमें काम नहीं करती। जैसे, मिट्टीसे बना हुआ घड़ा है, वह कितना ही बड़ा बना हो, सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने भीतर समा लेगा क्या? क्या घड़ेमें पूरी पृथ्वी भरी जायगी? नहीं भरी जा सकती। ऐसे प्रकृतिके कार्य—मन, बुद्धि आदि प्रकृतिको ही अपने कब्जेमें नहीं ला सकते, फिर प्रकृतिसे अतीत परमात्मातक कैसे पहुँच सकते हैं?

परमात्मा अनामय है अर्थात् विकाररहित है। उसमें विकार संभव नहीं है। उसका न नाम है, न रूप है। उसका स्वरूप देखा जाय तो काला, पीला या सफेद—ऐसा नहीं है। उसको जाननेके लिये उसका नाम रखकर सम्बोधित करते हैं; क्योंकि हमलोग नाम-रूपमें बैठे हैं, इसलिये उसको ब्रह्म कहते हैं। संतोंने उसके विषयमें कहा है—

न को रस भोगी।

न को रहत न्यारा।

न को आप हरता।

न को कर्तु व्यवहारा॥ १॥

ज्युं देख्या त्युं मैं कह्या।

काण न राखी काय।

हरिया परचा नामका।

तन मन भीतर थाय॥

वहाँ तुरीय पद भी नहीं है, वहाँ मोक्ष, मुक्ति भी नहीं है, बन्धन भी नहीं है। ऐसा अलौकिक तत्त्व है! तुलसीदासजी महाराज कहते हैं कि जीभसे नाम-जप करके उस ब्रह्मसुखका स्वयं अपने-आपमें जहाँ नाम पहुँचता ही नहीं, वहाँ अनुभव कर लेते हैं।

दार्शनिकोंका जहाँ विचार हुआ है, वहाँ शब्दमें अचिन्त्य शक्ति मानी है। जीभ वागिन्द्रिय है, उससे ‘राम-राम’ ऐसे जपकी क्रिया होती है, पर इस नाम-जपमें इतनी अलौकिक शक्ति है कि ज्ञानेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियोंसे आगे अन्त:करण और अन्त:करणसे आगे प्रकृति और प्रकृतिसे अतीत परमात्म-तत्त्व है, उस परमात्म-तत्त्वको यह नाम महाराज जना दे, ऐसी इसमें शक्ति है। ‘शब्द’ में अचिन्त्य शक्ति होनेसे मोहका नाश हो जाता है। साधारण रीतिसे अपने अनुभवमें भी देखते हैं कि कोई गहरी नींदमें सोया हुआ है तो सोते समय सभी इन्द्रियाँ मनमें, मन बुद्धिमें, बुद्धि प्रकृतिमें अर्थात् अविद्यामें लीन हो जाती हैं, तब गाढ़ नींद आती है। गाढ़ नींदमें सभी इन्द्रियाँ लीन हो जाती हैं, किसी इन्द्रियका कोई ज्ञान नहीं; परंतु उस आदमीका नाम उच्चारण करके पुकारा जाय तो वह आदमी उस अविद्यामेंसे जग जाता है।

विचार करो—नामका सम्बन्ध तो कर्णेन्द्रियके साथ है। कर्णेन्द्रियपर गाढ़ नींदमें इतने पर्दे आ जाते हैं; परंतु नाममें—शब्दमें वह अचिन्त्य, अलौकिक शक्ति है, जो अविद्यामें लीन हुई बुद्धि, बुद्धिमें लीन हुई कर्णेन्द्रिय; उस कर्णेन्द्रियके द्वारा सुनाकर सोते हुएको जगा दे। शब्दमें इतनी शक्ति है कि जो सम्पूर्ण जीवोंका मालिक परमात्म-तत्त्व है, उस परमात्म-तत्त्वका केवल जीभसे नाम जपनेसे अनुभव करा दे।

जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ।

नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ॥

साधक नाम जपहिं लय लाएँ।

होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २२। ३-४)

अब दूसरे भक्तोंकी बात बताते हैं कि जो ‘गूढ़ गति’—मानो सबसे गूढ़ बातको जानना चाहते हैं, जिनके यह जाननेकी मनमें है कि हम भी उस परमात्म-तत्त्वको जानें, जो कि सबसे गूढ़ तत्त्व है, उसके लिये कहा कि जीभसे नाम-जप करेंगे तो उस तत्त्वको वे जान लेंगे। अब साधकके विषयमें कहते हैं कि साधक अगर लौ लगाकर नाम-जप करता है तो वह सिद्ध हो जाता है। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राकाम्य, वशिता आदि जो आठ सिद्धियाँ हैं, उन सब सिद्धियोंको वह पा लेता है।

जपहिं नामु जन आरत भारी।

मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २२। ५)

जो दु:खी, संतप्त होता है और संकटसे छूटना चाहता है, वह आर्त होकर व्याकुलतापूर्वक नामका जप करता है तो उसके सब संकट मिट जाते हैं। वह सुखी हो जाता है। ऐसे भगवान‍्के नामकी महिमा कही।

चार प्रकारके भक्त

राम भगत जग चारि प्रकारा।

सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २२। ६)

अब कहते हैं, चार प्रकारके भगवान‍्के भक्त हैं। चारों ही बड़े सुकृती हैं, अनघ (पापरहित) हैं और सब-के-सब उदार हैं।

(१) ‘नाम जीहँ जपि... ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा’—ये परमात्माको जाननेवाले ज्ञानी भक्त हैं, (२) ‘जाना चहहिं गूढ़ गति’—ये जिज्ञासु हैं, (३) ‘साधक नाम जपहिं’—ये अर्थार्थी हैं और (४) ‘जपहिं नामु जन आरत भारी’—ये आर्त भक्त हैं। इनमें ज्ञानी भक्त परमात्म-तत्त्वका अनुभव कर लेता है। उसके लिये कोई काम बाकी नहीं रहता, वह ब्रह्मसुखका अनुभव कर लेता है। जो परमात्म-तत्त्वको जानना चाहते हैं, वे जिज्ञासु भक्त हैं। वे नाम-जपसे परमात्म-तत्त्वको जान लेते हैं। जो धन-सम्पत्ति, वैभव चाहते हैं, उसके लिये साधना करते हैं, ऐसे अर्थार्थी भक्तको भी नाम-जपसे सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। दु:खको दूर करना चाहता है, तो दु:खी होकर नाम-जप करनेसे आर्त भक्तका भी दु:ख दूर हो जाता है। गीतामें भी आया है—

चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन।

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥

(७। १६)

भगवान् कहते हैं कि सब-के-सब अर्थात् चारों प्रकारके भक्त सुकृती हैं। यहाँ तुलसीदासजीने भी इनको सुकृती बताया है और ये अनघ और उदार भी हैं। यही बात गीतामें भी आयी है—‘उदारा: सर्व एवैते’(७। १८)। ऐसे ये चारों प्रकारके भक्त उदार हैं, चारों ही अनघ—पापरहित हैं और चारों-के-चारों सुकृती हैं।

देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥

(गीता ७। २३)

यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रता:।

भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥

(गीता ९। २५)

देवताओंका यजन (पूजन) करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं, भूत-प्रेतोंका यजन करनेवाले भूतोंको प्राप्त होते हैं और मेरा यजन करनेवाले मेरेको ही प्राप्त होते हैं। आर्त हो चाहे अर्थार्थी हो, चाहे कोई क्यों न हो, भगवान‍्के साथ सम्बन्ध हो जानेके बाद किसीका भी पतन नहीं होता।

‘तस्मात्केनाप्युपायेन मन: कृष्णे निवेशयेत्।’

भगवान‍्के भजनमें लगनेवालेका किसी रीतिसे भगवान‍्के साथ सम्बन्ध हो जायगा तो वह कल्याण करनेवाला ही होगा।

चहू चतुर कहुँ नाम अधारा।

ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २२। ७)

चारों प्रकारके भक्तोंके नामका ही आधार होता है। चतुर वही कहलाता है, जो बहुत-सी चीजोंमेंसे सार-सार चीज ले लेता है। उनके खोज रहती है कि सबमें सार चीज क्या है? हम किसका आश्रय लें, जिससे हमारा दु:ख भी दूर हो जाय, धन भी हमें मिल जाय और हमारी जिज्ञासा भी पूरी हो जाय। ज्ञानीके किसी तरहकी कामना नहीं रहती, वह निष्काम होता है। इसलिये भगवान‍्को वह (ज्ञानी) विशेष प्यारा होता है। नाम ऐसा विलक्षण है कि चाहे आर्त हो, चाहे अर्थार्थी हो, चाहे जिज्ञासु हो, उसकी कामनापूर्ति कर देता है और केवल कामनापूर्ति ही नहीं, वह भगवान‍्की प्राप्ति भी करा देता है। ज्ञानी भक्तोंके लिये ऐसा आया है—

आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।

कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थंभूतगुणो हरि:॥

आत्माराम मुनि अपने स्वरूपमें नित्य-निरन्तर मस्त रहते हैं। उनमें किसी तरहकी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं रहती। अपने स्वरूपमें स्थित रहना और परमात्माको प्राप्त करना—इसमें थोड़ा-सा फर्क है। अपने स्वरूपमें स्थिर होनेपर भी कल्याण हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है, परंतु परमात्म-स्वरूपको जाननेसे एक विलक्षण प्रेम प्रकट होता है। वह प्रेम सगुण और निर्गुण दोनोंमें आता है। परमात्म-तत्त्वकी भूखके बिना प्रेम प्रकट नहीं होता। ऐसे तो जिज्ञासुमें, अर्थार्थीमें और आर्तमें भी प्रेम रहता है, परंतु विशेष शुद्ध प्रेम तो परमात्माके सन्मुख होनेसे ही होता है।

आत्माराम पुरुष किसी कामनाको लेकर भगवान‍्की भक्ति नहीं करते हैं, पर दूसरे भक्त कामनासे ही भक्ति करते हैं। जैसे आर्त भक्त दु:ख दूर करनेके लिये भजन करते हैं और अर्थार्थी भक्त धनके लिये और अणिमा आदि सिद्धियोंके लिये भजन करते हैं और जिज्ञासु परमात्म-तत्त्वको जाननेके लिये भजन करते हैं। ‘इत्थम्भूतगुणो हरि:’ भगवान् ही ऐसे विलक्षण गुणवाले हैं। जिन पुरुषोंकी किंचिन्मात्र कामना स्वप्नमें भी नहीं है, उनका चित्त भगवान‍्में आकृष्ट हो जाता है। उनकी भक्ति अहैतुकी होती है।

आर्त भक्तोंमें गजेन्द्रका नाम लिया जाता है। ग्राहने जब गजेन्द्रको पकड़ लिया तो पहले उसने अपने साथवाले हाथी-हथिनियोंपर भरोसा रखा और बहुत वर्षोंतक लड़ता रहा, पर जब किसीका सहारा नहीं रहा और बेचारा डूबने लगा तो उसने अनन्यतासे प्रभुको याद किया और आर्त होकर पुकारने लगा। ‘प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम्’ पहले जन्ममें शिक्षा पाया हुआ स्तोत्र था। उसको इतना ही याद आया कि कोई एक परमात्मा है जो सबका मालिक है। आपत्तिमें भी पुकारा जाता है तो वह रक्षा करता है, ऐसा ज्ञान हुआ।

य: कश्चनेशो बलिनोऽन्तकोरगात्

प्रचण्डवेगादभिधावतो भृशम्।

भीतं प्रपन्नं परिपाति यद्भयान्-

मृत्यु: प्रधावत्यरणं तमीमहि॥

भागवतमें गजेन्द्र मोक्ष आता है। उसमें वर्णन आता है कि गजेन्द्रने भगवान‍्के स्वरूपका ध्यान नहीं किया। सगुण है कि निर्गुण है, साकार है कि निराकार है, धनुषधारी है कि वंशीधारी है, वह चक्रधारी है कि चतुर्भुजधारी है, कैसा है, ऐसे किसी रूप विशेषका ध्यान नहीं किया। वह कहता है—‘य:कश्चनेश:’—‘कोई एक ईश्वर, जो सबका मालिक है।’ ‘बलिनोऽन्तकोरगात्’ महान् बलवान् अन्तक है मानो साँप खानेको दौड़ रहा है। मौत जिसके पीछे पड़ी हुई है। ऐसे ‘प्रचण्डवेगात्’ मौतका बड़ा भारी प्रचण्ड वेग है। ‘प्रपन्नं यद्भयात् परिपाति’ मृत्यु सम्पूर्ण संसारका नाश करती है, वह मृत्यु भी जिससे भयभीत होकर दौड़ती है; उस मृत्युके भयसे शरणागतवत्सल उसकी रक्षा करता है, जो भयभीत होकर उसके शरण होता है। ऐसे वह सब तरहके भयसे रक्षा करनेवाला है। ‘अरणं तमीमहि’ उस शरणागतवत्सल परमात्माके हम शरण हैं। भगवान् प्रकट हो करके उनका दु:ख दूर कर देते हैं।

आदमीके जब आफत आती है, तब उसकी वृत्ति संसारसे हटती है और संसारसे हटते ही भीतर प्रकाश होता है। संसारमें मन लगानेसे अँधेरा होता है। आफत आनेसे जग जाता है, जैसे, आदमी नींदमें सोया हुआ हो और उसके सुई चुभोई जाय तो वह जग जाता है। ऐसे आपत्तिमें आदमी जग जाता है। जो भजन नहीं करते हैं, उनपर जब आफत आती है, तब उनको होश हो जाता है और वे भगवान‍्की तरफ लग जाते हैं; परंतु जो आफत आनेपर नहीं चेतते और भजन नहीं करते, उनके लिये क्या कहा जाय?

ध्रुवजीकी विमाताने राजाकी गोदसे उनको नीचे उतार दिया और कहने लगी—‘चल यहाँसे, तू लायक नहीं है। राजाकी गोदमें बैठना था तो मेरी कोखसे पैदा होता।’ वे रोने लगे और अपनी माँके पास गये। माँने भी कहा—‘बात तो ठीक है बेटा! तेरी छोटी माँने जो कहा, वह ठीक ही है। तूने और मैंने भजन किया नहीं, इस कारण आज यह दशा हुई है।’ तब ध्रुव बोला—‘मैं अब भजन करूँगा।’ वे राजगद्दीकी वासना लेकर भजन करने गये, इसलिये अर्थार्थी भक्त कहलाये।

जिज्ञासु भक्तोंमें उद्धव, अर्जुन आदिके नाम लिये जाते हैं। एकादश स्कन्धमें भगवान‍्ने उद्धवजीको उपदेश दिया। उस उपदेशको ‘उद्धवगीता’ कहते हैं। अर्जुनको भगवान‍्ने जो उपदेश दिया, उसे भगवद‍्गीताके नामसे कहते हैं। ये दोनों (उद्धव और अर्जुन) जिज्ञासु भक्त कहलाते हैं।

जो नित्य-निरन्तर परमात्म-तत्त्वमें ही रहते हैं, जिनके कोई कामना नहीं, ऐसे ज्ञानी भक्त शुकदेवजी हुए हैं। शुकदेवजी बारह वर्षतक गर्भवासमें ही रहे। उनके मनमें विचार आया कि बाहर आते ही भगवान‍्की माया घेर लेगी और मैं फँस जाऊँगा। इस कारण वे भीतर ही भगवान‍्के भजनमें लगे रहे। जब नारदजीने भगवान‍्से आश्वासन दिलवाया, तब वे बाहर आये और जन्मते ही घरसे निकल गये। व्यासजी महाराज ‘पुत्र! पुत्र!!’ आवाज देते चले जा रहे थे। पहाड़ोंसे वापस ‘पुत्र! पुत्र!!’ आवाज आयी। मानो सबके एक हुए शुकदेवजी मुनि हैं, वे उस समय वृक्षोंमेंसे बोल उठे—‘पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु:’ ऐसे सबके हृदयमें विराजमान ज्ञानी भक्त शुकदेवजीको सूतजी नमस्कार करते हैं।

यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं

द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव।

पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु-

स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि॥

व्यासजीके बुलानेपर भी शुकदेवजी वापस नहीं आये। जंगलमें ही भजन-स्मरणमें लग गये। व्यासजी महाराजने भागवत ग्रन्थ बनाया और अपने ब्रह्मचारियोंको सिखाने लगे। एक बार कुछ ब्रह्मचारियोंसे कहा कि पुष्प, समिधा आदि यज्ञके लिये ले आओ। वे उस जंगलमें वहाँ चले गये, जहाँ व्यासजीके पुत्र शुकदेवजी बैठे भजन-ध्यान कर रहे थे। वहाँपर ब्रह्मचारी ऐसे श्लोक पढ़ने लगे—

अहो बकी यं स्तनकालकूटं

जिघांसयापाययदप्यसाध्वी।

लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं

कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥

अहो! बड़े आश्चर्यकी बात है। बकासुरकी बहन पूतनाने अपने स्तनोंमें कालकूट जहर लगा लिया। जिस जहरका स्पर्श हो जाय तो बच्चा मर जाय, ऐसा भयंकर जहर लगाकर मारनेकी इच्छासे वह पूतना आयी और बालरूप भगवान् कृष्णके मुखमें जहर भरा हुआ स्तन दे दिया। महान् नीचा आचरण करनेवाली उस असाध्वीको वह गति मिली, जो धाय माँको मिलती है। धाय माँ प्यारपूर्वक पालन करती है। बालकको स्नेहपूर्वक दूध पिलाती है।

‘जसुमति की गति पाई

लालजी रो मुख देखनने आई’

यशोदाजीको जो गति मिलनेवाली थी, वह उस पूतनाको भी दे दी। इसलिये ऐसा कौन दयालु होगा, जिसके हम शरण जावें!

ऐसे श्लोक जब शुकदेवजीने सुने तो उन ब्रह्मचारियोंसे पूछा कि ये कहाँके श्लोक हैं? तो बताया कि भागवतके श्लोक हैं। ‘भागवत जैसा ग्रन्थ कहाँ है, जिसमें ऐसे दयालुका वर्णन है?’ उन्होंने कहा कि हम व्यासजी महाराजके पास भागवतजी पढ़ते हैं। अब तो शुकदेवजी बोले—‘हम भी पढ़ेंगे।’ ‘कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिम्’ अब उनको क्या करना, जानना और पाना बाकी था। उनके काम बाकी रहा ही नहीं। पर ऐसे शुद्ध ज्ञानी भक्त भी भगवान‍्के गुणोंको सुनकर आकृष्ट हो जाते हैं। इसलिये भगवान‍्को सर्वथा निष्काम होनेके कारण ज्ञानी भक्त विशेष प्रिय हैं।

जिसके कुछ भी चाहना नहीं है, वह क्या करे? तो कहते हैं, उसको भजन करना चाहिये। दूसरेको पूछा कि तुम्हें क्या चाहिये? ‘हमें सब तरहके लोक-परलोकके सुख चाहिये।’ तो ‘राम-राम’ करो। ‘सब तरहका सुख और कोई नहीं दे सकता।’ किसीसे पूछा—‘आप क्या चाहते हो?’ ‘हम तो अपना कल्याण चाहते हैं। मुक्ति हो जाय और कोई इच्छा नहीं है तो क्या करना चाहिये?’ ‘राम-राम करनेमें लग जाओ।’ भागवतमें आया है—

अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।

तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥

गुणोंको देखकर हम किसीसे स्नेह करते हैं तो वह स्नेह उसके गुणोंसे हुआ, उस व्यक्तिसे नहीं हुआ। जैसे, दुकानदार अपनी दुकानकी वस्तुओंको सजाकर रखते हैं और उनको अपनी वस्तुएँ अच्छी भी लगती हैं। बार-बार साफ करते रहते हैं, जिससे लोगोंका चित्त खिंच जाय। ऐसे खूब सजाकर रखते हैं। पैसे आते ही उसे निकालकर दे देते हैं। ऐसा क्यों? वह वस्तुओंकी सजावट थोड़े ही करता है। सजावट पैसोंके लिये ही थी। ऐसे ही वस्तुओंसे प्रेम दीखता है, पर उसका प्रेम पैसोंसे रहता है।

ऐसे कोई मिनिस्टरका आदर, बड़ाई करे, दासता भी करे तो मतलब क्या है? परमिट लेना है या व्यापार आदि अपने कामके लिये आज्ञा लेनी है। उसको मिनिस्टरसे मतलब नहीं है, मतलब है अपने कामसे। दीखनेमें और जगह प्रेम दीखे भले ही, पर जो मतलब सिद्ध करना होता है, उसीको लेकर प्रेम होता है। ऐसे आर्त और अर्थार्थी भगवान‍्का भजन तो करते हैं, पर किसीको दु:ख दूर करवाना है, किसीको अर्थ (धन) चाहिये। जिज्ञासु कुछ जानना चाहता है। इन तीनोंके साथ कुछ-न-कुछ कामना लगी हुई है, पर ज्ञानी केवल भगवान‍्में लगा हुआ है। इसलिये वह भगवान‍्को विशेष प्यारा लगता है। ऐसे चार प्रकारके भक्तोंका वर्णन हुआ।