प्रवचन—८

चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ।

कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २२। ८)

चारों युगोंमें और चारों ही वेदोंमें भगवान‍्के नामका प्रभाव है; परंतु कलियुगमें नामका प्रभाव विशेष है। भक्तोंके लिये भगवान‍्के नामका ही आधार है। इसके अलावा और कोई उपाय नहीं है। कलियुगके आनेपर भगवान‍्ने विशेष कृपा कर दी कि सभी साधनोंकी शक्तिको नाम महाराजमें लाकर रख दी।

‘नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति:’

भगवान‍्ने अपनी पूरी-की-पूरी शक्ति नाम महाराजमें रख दी। इसमें विलक्षणता यह रखी कि ‘स्मरणे न काल:’ नाम जपनेके लिये कोई समय नहीं बाँधा। कोई पात्र विशेषकी बात नहीं कही, कोई विधि विशेषकी बात नहीं, कोई जपे और कैसे ही जपे, किसी तरहसे भगवन्नाममें लग जाय।

उद्धारका सुगम उपाय

सत्ययुग, त्रेता, द्वापरमें आदमी शुद्ध होते थे, पवित्र होते थे, वे विधियाँ जानते थे, उन्हें ज्ञान होता था, समझ होती थी, उनकी आयु बड़ी होती थी। कलियुगके आनेपर इन सब बातोंकी कमी आ गयी, इसलिये जीवोंके उद्धारके लिये बहुत सुगम उपाय बता दिया।

कलियुग केवल नाम अधारा।

सुमिरि सुमिरि भव उतरहिं पारा॥

संसारसे पार होना चाहते हो तो नामका जप करो।

जुगति बताओ जालजी राम मिलनकी बात।

मिल जासी ओ मालजी थे राम रटो दिन रात॥

रात-दिन भगवान‍्के नामका जप करते चले जाओ। हरिरामदासजी महाराज भी कहते हैं—

जो जिव चाहे मुकुतिको तो सुमरिजे राम।

हरिया गेले चालताँ जैसे आवे गाम॥

जैसे रास्ते चलते-चलते गाँव पहुँच ही जाते हैं, ऐसे ही ‘राम-राम’ करते-करते भगवान् आ ही जाते हैं, भगवान‍्की प्राप्ति अवश्य हो जाती है। इसलिये यह ‘राम’ नाम बहुत ही सीधा और सरल साधन है।

रसनासे रटबो करे आठुं पहर अभंग।

रामदास उस सन्त का राम न छाड़े संग॥

संत-महापुरुषोंने नामको बहुत विशेषतासे सबके लिये प्रकट कर दिया, जिससे हर कोई ले सके; परंतु लोगोंमें प्राय: एक बात हुआ करती है कि जो वस्तु ज्यादा प्रकट होती है, उसका आदर नहीं करते हैं। ‘अतिपरिचयादवज्ञा’—अत्यधिक प्रसिद्धि हो जानेसे उसका आदर नहीं होता। नामकी अवज्ञा करने लग जाते हैं कि कोरा ‘राम-राम’ करनेसे क्या होता है? ‘राम-राम’ तो हरेक करता है। टट्टी फिरते बच्चे भी करते रहते हैं। इसमें क्या है! ऐसे अवज्ञा कर देते हैं।

हमारे भाई-बहनोंमें यह विचार उठता है कि हमारेको कोई विशेष साधन बताया जाय और जब उनको कहते हैं कि ऐसे प्राणायाम करो, ऐसे बैठो, ऐसे आहार-विहार करो तो कह देंगे—‘महाराज! ऐसे तो हमारेसे होता नहीं, हम तो साधारण आदमी हैं, हम गृहस्थी हैं, निभता नहीं है, क्या करें? यह तो कठिन है।’ फिर ‘राम-राम’ करो तो वे कहेंगे कि ‘राम-राम’ हरेक बालक भी करते हैं। ‘राम-राम’ में क्या है? अब कौन-सा बढ़िया साधन बतावें? अगर विधियाँ बतावें तो होती नहीं हमारेसे, और ‘राम-राम’ तो हरेक बालक ही करता है। ‘राम-राम’ में क्या है! यह जवाब मिलता है। अब आप ही बताओ उनको क्या कहा जाय!

परमात्म-तत्त्वसे विमुख होनेका यह एक तरहसे बढ़िया तरीका है। भगवन्नामके प्रकट हो जानेसे नाममें शक्ति कम नहीं हुई है। नाममें अपार शक्ति है और ज्यों-की-त्यों मौजूद है। इसको संतोंने हमलोगोंपर कृपा करके प्रकट कर दिया; परंतु लोगोंको यह साधारण दीखता है। नाम-जप साधारण तभीतक दीखता है, जबतक इसका सहारा नहीं लेते हैं, इसके शरण नहीं होते हैं। शरण कैसे होवें? विधि क्या है?

शरण लेनेकी विधि नहीं होती है। शरण लेनेकी तो आवश्यकता होती है। जैसे, चोर-डाकू आ जायँ, मारने-पीटने लगें, ऐसी आफतमें आ जायँ तो पुकारते हैं कि नहीं, ‘मेरी रक्षा करो, मुझे बचाओ’ ऐसे चिल्लाते हैं। कोई लाठी लेकर कुत्तेके पीछे पड़ जाय और वहाँ भागनेकी कहीं जगह नहीं हो तो बेचारा कुत्ता लाठी लगनेसे पहले ही चिल्लाने लगता है। यह चिल्लाना क्या है? वह पुकार करता है कि मेरी रक्षा होनी चाहिये। उसके पुकारकी कोई विधि होती है क्या? मुहूर्त होता है क्या? ‘हरिया बंदीवान ज्यूँ करिये कूक पुकार।’

शरणागति सुगम होती है, जब अपनेपर आफत आती है और अपनेको कोई भी उपाय नहीं सूझता, तब हम भगवान‍्के शरण होते हैं। उस समय हम जितना भगवान‍्के आधीन होते हैं, उतना ही काम बहुत जल्दी बनता है। इसमें विधिकी आवश्यकता नहीं है। बालक माँको पुकारता है तो क्या कोई विधि पूछता है, या मुहूर्त पूछता है कि इस समयमें रोना शुरू करूँ, यह सिद्ध होगा कि नहीं होगा अथवा ऐसा समय बाँधता है कि आधा घण्टा रोऊँ या दस मिनट रोऊँ; वह तो माँ नहीं मिले, तबतक रोता रहता है। इस माँके मिलनेमें सन्देह है। यह माँ मर गयी हो या कहीं दूर चली गयी हो तो कैसे आवेगी? पर ठाकुरजी तो ‘सर्वत: श्रुतिमल्लोके’ सब जगह सुनते हैं। इसलिये ‘हे नाथ! हे नाथ! मैं आपकी शरण हूँ’—ऐसे भगवान‍्के शरण हो जायँ, उनके आश्रित हो जायँ। इसमें अगर कोई बाधक है तो वह है अपनी बुद्धिका, अपने वर्णका, अपने आश्रमका, अपनी योग्यता-विद्या आदिका अभिमान। भीतरमें उनका सहारा रहता है कि मैं ऐसा काम कर सकता हूँ। जबतक यह बल, बुद्धि, योग्यता आदिको अपनी मानता रहता है, तबतक सच्ची शरण हो नहीं सकता। इसलिये इनके अभिमानसे रहित होकर चाहे कोई शरण हो जाय और जब कभी हो जाय, उसी वक्त उसका बेड़ा पार है।

नाम-वन्दनाके प्रकरणमें नामकी महिमाका प्रकरण चल रहा है। उसमें चार प्रकारके भक्तोंका वर्णन हुआ। अब गोस्वामीजी महाराज प्रेमी भक्तका वर्णन करते हैं—

नाम-प्रेमी भक्त

सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।

नाम सुप्रेम पियूष ह्रद तिन्हहुँ किए मन मीन॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २२)

वे भगवान‍्की भक्तिरूपी रसमें रात-दिन तल्लीन रहते हैं, उनके किसी तरहकी किंचिन्मात्र भी कोई कामना नहीं है। उनके कामना क्यों नहीं है? नामरूपी एक बड़ा भारी अमृतका सरोवर है। उन्होंने अपने मनको उस सरोवरकी मछली बना लिया है और हर समय भगवान‍्के प्रेममें ही मतवाले रहते हैं। भगवान‍्के प्रेमी भक्त चाहे परमात्माके तत्त्वको न जानें, पर फिर भी वे परमात्माकी तरफ स्वाभाविक ही आकृष्ट हो जाते हैं। उनके मनमें और कोई इच्छा नहीं रहती है। न तत्त्वको जाननेकी इच्छा है, न अपने दु:ख दूर करनेकी इच्छा है और न कोई धनादि पदार्थोंकी इच्छा है। किसी तरहकी कोई लिप्सा नहीं। केवल भगवान‍्के प्रेममें रात-दिन मस्त रहते हैं। इसके अलावा उनके कोई विचार ही नहीं उठता। उन्हें कुछ करना बाकी नहीं, कुछ जानना बाकी नहीं और कुछ पाना बाकी नहीं। स्वाभाविक ही उनका भगवान‍्में प्रेम रहता है।

प्रेमकी बात बड़ी अलौकिक है। संतोंने इसे पंचम पुरुषार्थ माना है। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—ये चार पुरुषार्थ माने जाते हैं। मनुष्योंमें कई तो अर्थ—धन चाहते हैं, कई सुख चाहते हैं कि संसारका सुख मिल जाय, भोग—कामना पूर्ति चाहते हैं, कई धर्मका अनुष्ठान करना चाहते हैं, इसके लिये दान-पुण्यादि करते हैं और कई मुक्ति चाहते हैं, अपना कल्याण चाहते हैं। ये चार तरहकी चाहनाएँ होती हैं। इनमें किसीके कोई चाहना मुख्य और कोई गौण रहती है, पर इन चाहनावालोंसे प्रेमी भक्त विलक्षण ही होते हैं। वे अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—इनमेंसे कुछ भी नहीं चाहते। वे भगवान‍्में तल्लीन रहते हैं।

अद्वैतवीथी पथिकैरुपास्या:

स्वाराज्यसिंहासनलब्धदीक्षा:।

शठेन केनापि वयं हठेन

दासीकृता गोपवधूविटेन॥

‘भक्तिरसायन’ ग्रन्थमें, वेदान्तमें अद्वैत सिद्धान्तके बड़े भारी आचार्य श्रीमधुसूदनाचार्यजी कहते हैं कि जो अद्वैत-मार्गमें चलनेवाले हैं, उनके हम उपास्य हैं, कोई मामूली थोड़े ही हैं। स्वानन्द, ब्रह्मानन्दमें भी पूर्ण हैं, फिर भी हम तो भगवान‍्की तरफ खिंच गये। इस प्रेमको उन्होंने पाँचवाँ पुरुषार्थ माना है। भगवान‍्के प्रेमीकी बात बहुत विलक्षण है।

दार्शनिकोंने विचार बहुत किया है; परंतु प्रेमकी तरफ कम किया है। कई-कई वैष्णवशास्त्रोंमें प्रेमका वर्णन आता है। परंतु ‘दर्शन’ नाम है अनुभवका। दार्शनिक चीज प्राय: अनुभवकी होती है। प्रेमी लोग अपना अनुभव भी नहीं चाहते हैं। वे भगवान‍्से प्यार करते हैं, केवल भगवान् मीठे लगते हैं। इसलिये रात-दिन उसीमें मस्त रहते हैं। वे मुक्तिकी भी परवाह नहीं करते हैं। मुक्तिकी परवाह वे करें, जिनके बन्धन है। उनके बन्धन दूसरा है ही नहीं। बन्धन एक भगवान‍्का ही है। विनोदमें संत कहते हैं—

अब तो भोग मोक्षकी इच्छा

व्याकुल कभी न करती है।

मुखड़ा ही नित नव बन्धन है

मुक्ति चरणसे झरती है॥

उनको न तो संसारकी इच्छा ही व्याकुल करती है और न मुक्तिकी इच्छा व्याकुल करती है। भगवान‍्का स्वरूप ही उनके लिये बन्धन है। वह नित्य नया बन्धन प्रिय लगता है। ‘दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम्।’ मुक्तिमें आनन्द शान्त एकरस रहता है। प्रेममें ‘प्रतिक्षणं वर्धमानम्’ प्रतिक्षण आनन्द बढ़ता ही रहता है। भगवान‍्के दर्शन करनेवाले कहते हैं—

‘आज अनूप बनी युगल छबि, आज अनूप बनी’ युगल सरकारकी छवि आज बड़ी सुन्दर बनी है। ऐसे प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमका आनन्द है। प्रेमकी विशेष लहरें उठती रहती हैं, जिसे प्रेमी लोग ही जानते हैं। अपने स्वरूपको जाननेवाले ज्ञानी-मुक्त लोग उस प्रेमकी विशेषताको नहीं जानते हैं। उन्हें अपने स्वरूपमें ही सम, शान्त, अखण्ड आनन्दका निरन्तर अनुभव होता रहता है।

नाम और नामीकी बात पहले आयी थी जिसमें नामको बड़ा बताया। अब नामीका विवेचन करते हैं कि नामी कितने प्रकारके होते हैं। तो कहते हैं—

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा।

अकथ अगाध अनादि अनूपा॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २३। १)

परमात्मा एक हैं, परंतु उनके स्वरूप दो हैं—एक अगुण अर्थात् निर्गुण और दूसरा सगुण। दो स्वरूपोंका अर्थ क्या हुआ? गुणोंसे रहित जिसको देखते हैं, वह अगुण कहलाता है और जिसे गुणोंके सहित देखते हैं, वह सगुण कहलाता है। ये दोनों उस परमात्माके विशेषण हैं। अब कहते हैं—‘अकथ अगाध अनादि अनूपा’ इनका कथन नहीं होता है। पहले भी नाम और नामीको ‘अकथ’ कहा था। अब यहाँ अगुण और सगुण-दोनों स्वरूपोंको भी अकथ कहते हैं। वाणीके द्वारा ये वर्णनमें नहीं आते। वाणी भी कुण्ठित हो जाती है। ‘अगाध’—‘गाध’ नाम सरोवरके तलका है। ये ऐसे गहरे हैं कि तलका पता नहीं चलता। ये दोनों कबसे हैं? कहाँसे हैं? तो कहते हैं ‘अनादि’—सदासे हैं और सदा ही रहनेवाले हैं। कालसे जिनका माप-तौल नहीं हो सकता। इतने वर्षोंसे या इतने कल्पोंसे हैं—ऐसी बात नहीं है और ‘अनूपा’—इनके लिये कोई उपमा नहीं है। इनको किसकी उपमा दी जाय! उपमा लगाकर किसीके बराबर नहीं बताये जा सकते।

निर्गुण ब्रह्मसे नामकी श्रेष्ठता

मोरें मत बड़ नामु दुहू तें।

किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २३। २)

पहले ऐसा कहकर आये हैं कि कौन बड़ा और कौन छोटा है, यह कहनेमें अपराध है। बड़ा और छोटा कहनेका अवसर आया तो अब अपनी सम्मति साफ कह देते हैं कि मेरे मतमें दोनोंसे बड़ा नाम है। आगे चलकर उपसंहारमें भी यही बात कहते हैं—‘ब्रह्म राम तें नाम बड़।’ क्यों महाराज! दोनोंसे नाम बड़ा कैसे हुआ? यदि दोनों स्वरूप भी नामकी तरह अकथ, अगाध, अनादि, अनुपम हैं तो फिर यह नाम इनसे बड़ा कैसे हो गया? इसके उत्तरमें कहते हैं कि नाम महाराजने अपनी शक्ति-प्रभावसे अगुण और सगुण दोनोंको अपने वशमें कर लिया है। मानो नाम जपनेसे निर्गुणका बोध हो जाय और सगुण भी प्रकट हो जाय। इसलिये यह दोनोंसे बड़ा है। अब इसके बाद प्रकरण बाँधकर नामको एक-एक करके दोनोंसे बड़ा बताते हैं। पहले अगुणसे नामको बड़ा बतानेका प्रकरण आरम्भ करते हुए गोस्वामीजी महाराज कहते हैं—

प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की।

कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २३। ३)

मेरा जो कहना है, उसे कोई प्रौढ़िवाद न माने। किसी बातको बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं, उसे प्रौढ़िवाद कहते हैं। अपने लोगोंमें कहावत है—‘जिसका ब्याह उसीका गीत’ मानो जिसका मौका आ जाय, उसीकी बड़ाई कर देना, इसको प्रौढ़िवाद कहते हैं। इसलिये गोस्वामीजी महाराज पहले ही कह देते हैं कि सज्जन इस दासकी इस बातको केवल प्रौढ़िवाद न समझें। साहित्यमें जब वर्णन करते हैं तो विशेषतासे उपमा अलंकार आदि लगाकर बहुत विलक्षण वर्णन करते हैं। इस तरहसे यहाँ मैं नहीं कहता हूँ। कोई यह न जाने कि यह बढ़ा-चढ़ाकर कह रहा है। तो ‘क्या कहते हो बाबा’!

‘कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मनकी’ तीन बातें हैं। ‘प्रतीति’—एक तो मेरेको ऐसा ही दीखता है और जैसा मेरेको दीखता है, वैसा ही कहता हूँ और एक प्रीति—दीखता तो है परंतु प्रेम वैसा न हो—ऐसी बात नहीं है। नाममें प्रेम भी वैसा ही है और स्वत: मनकी रुचि भी है। गोस्वामीजी महाराज नामके बहुत ज्यादा प्रेमी हैं। नाममें पहलेसे ही इतने रचे-पचे थे कि जन्मते ही ‘राम’ ऐसा मुँहसे उच्चारण हुआ। इस कारण उनको ‘राम बोला’ कहते थे। ऐसे वे अपने मनकी बात कहते हैं।

एकु दारुगत देखिअ एकू।

पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २३। ४)

भगवान‍्के दो स्वरूप हैं। वे कौन-कौनसे हैं? एक तो है दारुगत। जैसे काठमें आग होती है, दियासलाईमें आग होती है, पत्थरमें आग होती है, पर वह आग दीखती नहीं। ऐसे यह भगवान‍्का अगुणरूप सर्वत्र रहनेवाला है, पर यह दीखता नहीं। दूसरा रूप वह है, जो देखनेमें आता है। जैसे आग जलती हुई दीखती है, वह अग्निका प्रकटरूप है, ऐसे ही सगुण भगवान् अवतार लेकर लीला करते हैं, वह सगुणरूप प्रकट अग्निकी तरह है। भगवान् मनुष्योंकी तरह ही आचरण करते हैं। मनुष्यरूपमें प्रकट होनेके कारण वे प्रत्यक्ष दीखते हैं। एक दीखनेमें न आनेवाला और एक दीखनेमें आनेवाला—दो रूप अग्निके हुए; परंतु अग्नि एक ही तत्त्व है। दीखने और न दीखनेसे आग दो नहीं हुई। ऐसे ही अगुण अर्थात् अप्रकट और सगुण अर्थात् प्रकट—ये दो रूप परमात्माके हुए, परंतु परमात्मा एक ही हैं।

काठमें अथवा दियासलाईमें आग रहती है, वह आग दूसरी है और सुलगती है, वह आग दूसरी है—ऐसा कोई नहीं कह सकता। दोनों एक ही हैं। एक तो दीखती है और एक नहीं दीखती। केवल इतना अन्तर है। ऐसे नहीं दीखनेवाले परमात्माके रूपको अगुण कह देते हैं, दीखनेवाले रूपको सगुण कह देते हैं, पर परमात्मा दो नहीं हैं, तत्त्व एक ही है। इस तत्त्वको समझना ही ‘ब्रह्म बिबेकू’ है।

‘उभय अगम जुग सुगम नाम तें’—दोनों ही परमात्माके रूप अगम्य हैं। इनकी प्राप्ति करना चाहें तो निर्गुणकी प्राप्ति भी कठिन है और सगुणकी प्राप्ति भी कठिन है। इनको जानना चाहें तो अगुण और सगुण दोनोंको जानना कठिन है। इन दोनोंमें भी गोस्वामीजी महाराज आगे चलकर कहेंगे कि सगुणका जानना और भी कठिन है। अवतार लेकर मनुष्य जैसे चरित्र करते हैं—इस कारण उनको जाननेमें कठिनता है।

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।

सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥

(मानस, उत्तरकाण्ड, दोहा ७३ ख)

अगुणरूपको तो हर कोई जान सकता है, पर सगुणरूपको हर कोई नहीं जानता। मनुष्यकी तरह आचरण करते देखकर बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंके मनमें भी भ्रम हो जाता है। वे भगवान‍्को मनुष्य ही मान लेते हैं। वे कहते हैं, यह तो मनुष्य ही है। गीतामें भी भगवान‍्ने कहा है—‘देवता और महर्षि भी मेरे परम अविनाशी भावको नहीं जानते, इसलिये अवतार लेकर घूमते हुए मुझको मूढ़ लोग साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं अर्थात् मेरा तिरस्कार, अपमान, निन्दा करते हैं*।’ उन मूर्खोंके सामने हीरा भी पत्थर होता है। न जाननेके कारण वे निन्दा करते हैं। उनकी निंदाका कोई मूल्य नहीं है। कारण कि वे बेचारे जानते नहीं, अनजान हैं।

नामसे निर्गुण-सगुणकी सुलभता

निर्गुणरूपको सुलभ बताया है। दोनों रूपोंको देखा जाय तो निर्गुणका स्वरूप सुगम है। कारण कि निर्गुणस्वरूपमें दोषबुद्धि होनेकी गुंजाइश नहीं है। युक्तियोंसे भी उसकी सिद्धि की जा सकती है। पर सगुणमें दोषबुद्धि होनेकी गुंजाइश है और युक्तियोंसे सिद्ध भी नहीं हो सकता।

परंतु जहाँ साधनाकी चर्चा हुई है, वहाँ गोस्वामीजीने भक्तिके साधनको सुगम बताया है ‘सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी’ और ज्ञानके पंथको कृपाणकी धारा बताया है। तलवारकी धारपर चलना बड़ा मुश्किल होता है। इस तरहसे निर्गुणका मार्ग बड़ा कठिन है और सगुण परमात्माका मार्ग अर्थात् उनकी भक्ति सुगम है।

यहाँ कहते हैं कि ‘निर्गुन रूप सुलभ अति’ निर्गुणरूपको सुलभ ही नहीं, अत्यन्त सुलभ बताया और सगुणको कोई जानता नहीं, ऐसा कहा। इस कारण कहा जा सकता है कि दोनों बातोंमें विरोध आता है। एक जगह निर्गुणको अति सुलभ बता रहे हैं तो दूसरी जगह ‘ग्यान पंथ कृपान कै धारा’। इसी तरह ‘सगुन जान नहिं कोइ’ कह रहे हैं और फिर सुगमता बताकर भक्तिकी महिमा गा रहे हैं।

दोनों बातोंमें विरोध दीखता है; परंतु वास्तवमें विरोध नहीं है। निर्गुणरूप समझनेमें बड़ा सुगम है, उसमें दोषबुद्धि संभव नहीं है। उसे तर्क-वितर्कसे समझा जा सकता है; परंतु सगुणरूपमें दोषबुद्धि हो सकती है तथा तर्क-वितर्क भी वहाँ चलता नहीं। इसलिये सगुणरूपके समझनेमें कठिनता है। परंतु प्राप्तिके मार्गमें चला जाय तो सगुणका मार्ग बड़ा सरल है, सीधा है। सगुण भगवान‍्की लीला गाकर, पढ़कर, सुनकर मनुष्य बड़ी सरलतासे भगवत्प्राप्ति कर सकता है। निर्गुण पन्थ बड़ा कठिन है, कारण कि देहाभिमानी मनुष्यकी निर्गुण-तत्त्वमें स्थिति होनी बड़ी कठिन है (गीता १२।५)।

इससे निष्कर्ष निकला कि मार्ग तो सगुणवाला श्रेष्ठ है। साधक उसके द्वारा जल्दी पहुँचता है और विचारसे एवं तर्कसे निर्गुण स्वरूपको सुगमतासे समझ सकते हैं, पर सगुणमें तर्क नहीं चलता। इसलिये अपनी-अपनी जगह दोनों ही श्रेष्ठ हैं, दोनों ही उत्तम हैं।

खास बात यह है कि पात्रके अनुसार सुगमता और कठिनता होती है। जिसकी रुचि, योग्यता, विश्वास निर्गुणमें है, उसके लिये निर्गुणरूप सुलभ है। जिसकी रुचि, विश्वास, योग्यता सगुणमें है, उसके लिये सगुण सुलभ है। इसलिये पात्रके अनुसार दोनों ही कठिन हैं और दोनों ही सुगम हैं। जो जिसको चाहता है, वह उसके लिये सुगम हो जाता है।

एक रूपकी प्राप्ति होनेपर दोनोंकी ही प्राप्ति हो जाती है, फिर कोई-सा भी रूप जानना बाकी नहीं रहता; क्योंकि दोनोंका तत्त्व एक ही है। सगुण और निर्गुण किसी रूपको लेकर साधक साधना करे, अन्तमें दोनोंको जान लेगा। कारण कि तत्त्वत: दोनों एक ही हैं।

उभय अगम जुग सुगम नाम तें।

कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २३। ५)

दोनों ही रूप नाम लेनेसे सुगम हो जाते हैं। दोनों अगम हैं मानो बुद्धि वहाँ काम नहीं करती। इस कारण जाननेमें अगम हैं; परंतु ‘जुग सुगम नाम तें’ नामसे दोनों सुगम हो जाते हैं अर्थात् अगम होते हुए भी नाम-जप किया जाय तो दोनों ही सुगम हो जायँ। आपने सुना होगा कि कई सगुणरूपके और कई निर्गुणरूपके भक्त हुए हैं, उन्होंने भी ‘राम-राम’ किया है। जैसे, श्रीगोस्वामीजी आदि वैरागी बाबा लोग सगुण भगवान‍्के उपासक हुए, वे भी ‘राम-राम सीताराम राम-राम’—ऐसा करते थे। निर्गुण-साधनामें भी संत मतको माननेवाले भक्त हुए हैं। जैसे, श्रीहरिरामदासजी महाराज, श्रीरामदासजी महाराज—ये रामस्नेही सम्प्रदायमें संत हुए हैं। ये भी ‘राम-राम’ करते थे। बिलकुल प्रत्यक्ष बात है कि नामसे दोनों रूप सुगम हो जाते हैं। इसलिये तुलसीदासजी महाराज कहते हैं ‘कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें।’ राम और ब्रह्मसे नाम बड़ा है। अगुण ब्रह्म हुआ और सगुण रामजी हुए। इन दोनोंको प्रत्यक्ष करा देनेके कारण नाम दोनोंसे बड़ा हुआ। नामको अगुण-सगुण दोनोंसे बड़ा कहकर गोस्वामीजी निर्गुण प्रकरण प्रारम्भ करते हैं।

ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी।

सत चेतन घन आनँद रासी॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २३। ६)

जो दारुगत अग्निकी तरह काष्ठमें व्यापक है और दीखता नहीं है—ऐसे सब संसारमें व्यापक अगुण परमात्मा हैं। वह अगुण स्वरूप है। वह अविनाशी है और व्यापकरूपसे सर्वत्र परिपूर्ण है ‘सत चेतन घन आनँद रासी।’ वह सत् है, चेतन है और घन-आनन्द राशि है, मानो सब जगह केवल आनन्द-ही-आनन्द है, आनन्दकी राशि है। उस आनन्दरूप परमात्मासे कोई जगह खाली नहीं है, कोई समय खाली नहीं, कोई वस्तु खाली नहीं, कोई व्यक्ति खाली नहीं, कोई परिस्थिति उससे खाली नहीं। सबमें परिपूर्ण ऐसा अविनाशी वह निर्गुण है। वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं, व्यक्ति नष्ट हो जाते हैं, समयका परिवर्तन हो जाता है, देश बदल जाता है; परंतु यह तत्त्व ज्यों-का-त्यों ही रहता है। सब समयमें, सब कालमें, सब देशमें, सब वस्तुओंमें, सम्पूर्ण घटनाओंमें, सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें ज्यों-का-त्यों रहता है। इसका विनाश नहीं होता, इसलिये यह सत् है। सत् सबका आश्रय है, आधार है, चित् सबका प्रकाशक है। केवल शुद्धज्ञान-स्वरूप है, इसलिये चित् है और आनन्दकी तो राशि है, घन है मानो बड़ा ठोस है। किसी चीजका उसमें प्रवेश सम्भव नहीं है। लोहेमें तो आग प्रविष्ट हो सकती है; परंतु आनन्दराशिमें कभी दु:ख किंचिन्मात्र भी प्रविष्ट नहीं हो सकता। परमात्मामें परमात्माके सिवाय और किसी पदार्थका प्रवेश सम्भव ही नहीं है, इतना घन है परमात्मा। इस प्रकार ब्रह्मका स्वरूप बताया। फिर कहते हैं—

अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी।

सकल जीव जग दीन दुखारी॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २३। ७)

संसारमें जितने जीव हैं, उनके हृदयमें आनन्दराशि परमात्मा विराजमान हैं। ‘अस प्रभु’ कहनेका तात्पर्य है कि ऐसे आनन्दराशि प्रभुके हृदयमें रहते हुए संसारमें जितने जीव हैं, वे सब-के-सब दीन हो रहे हैं और दु:खी हो रहे हैं। महान् आनन्दराशि भगवान‍्के भीतर रहते हुए दीन हो रहे हैं। आनन्दराशि निर्गुण परमात्मा सबके हृदयमें रहकर भी जीवोंका दु:ख दूर नहीं कर सके, दरिद्रता नहीं मिटा सके। परंतु भगवन्नामका यदि यत्नसे निरूपण किया जाय तो वह आनन्द प्रत्यक्ष प्रकट हो जाता है। दु:ख और दरिद्रता सर्वथा मिट जाते हैं।

नाम निरूपन नाम जतन तें।

सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २३। ८)

निर्गुणतत्त्वमें निरूपणकी मुख्यता है। निरूपण यानी उसका स्वरूप क्या है, उसकी महिमा क्या है, वह तत्त्व क्या है? ठीक गहरा उतरकर तत्त्वको समझा जाय और उसीमें तल्लीन होकर नाम जपा जाय मानो सब जगह परमात्मा परिपूर्ण हैं, ऐसे जपनेसे ‘सोउ प्रगटत’—वह आनन्द प्रकट हो जाता है। इस प्रकार खयाल रखकर उसका विशेष यत्नपूर्वक निरूपण किया जाय तो निर्गुणतत्त्व आनन्दरूपसे हृदयमें प्रकट हो जाता है। ‘कंचन खान खुली घट माहीं रामदासके टोटो नाहीं।’ घटमें, हृदयमें आनन्दकी खान खुल गयी। अब घाटा किस बातका रहा बताओ! भीतरसे ही जब आनन्द उमड़ता है तो सांसारिक सुखकी कामना किंचिन्मात्र नहीं रहती। आप कह सकते हैं, ऐसे आनन्दका हमें अनुभव नहीं। ठीक है, आनन्द तो प्रकट नहीं हुआ; परंतु शीत ज्वर कभी आया ही होगा! शीत ज्वर जब आता है, तब भीतरसे सर्दी लगती है, ऊपरसे कई कम्बल, रजाई आदि ओढ़नेपर भी भीतरसे कँपकँपी आती रहती है। बाहर कपड़ा ओढ़नेसे क्या हो! भीतरसे शीत हो, तब बाहरकी गर्मी बेचारी क्या करे! गर्म-गर्म जल भीतर जानेसे कुछ शान्ति हो सकती है, ऐसे जिसके भीतर आनन्द प्रकट हो जाय, तो उसे बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियोंके संयोगसे मिलनेवाले सुखकी आवश्यकता नहीं रहती। ऐसे बाहरकी प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थितिमें भी उसे दु:ख नहीं हो सकता। ‘यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते॥’ (गीता ६।२२) बड़े भारी दु:ख आनेपर भी किंचिन्मात्र दु:ख नहीं हो सकता; क्योंकि उसके भीतर आनन्दके फव्वारे छूटते हैं। उसके दर्शन, भाषण, स्पर्श, संगसे आनन्द आता है। उसका नाम लेनेसे आनन्द आता है।

‘सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें’—रत्नका मूल्य प्रकट हो जाता है। कैसे? लाखों रुपयोंका बहुत बड़ा कीमती रत्न हो; परंतु पासमें रहनेपर भी उससे कोई लाभ नहीं मिलता, जबतक उसका मूल्य न ले लिया जाय। पासमें रहनेपर भी उससे रोटी नहीं मिलती, कपड़ा नहीं मिलता, मकान नहीं मिलता, सवारी नहीं मिलती, दवाई नहीं मिलती; पर उस रत्नको बेचकर दाम खड़े कर लिये जायँ तो रुपये खर्च करनेपर किसी बातकी कमी नहीं रहती। अकेला रत्न पड़ा रहे तो कुछ काम नहीं निकलता। ऐसे दरिद्रता दूर नहीं होती। ऐसे ही जबतक वह आनन्द प्रकट नहीं किया जाता, अर्थात् नाम नहीं लिया जाता, तबतक वह आनन्द प्रकट नहीं होता। नामसे वह प्रकट हो जाता है; फिर किसी बातकी कमी नहीं रहती। जाननेसे उसका मूल्य प्रकट होता है।

हमने एक कहानी सुनी है। एक संत बाबा थे। वे कहीं भिक्षाके लिये गये। जाकर आवाज लगायी राम! राम! जिसके घर बाबाजी गये थे, वह रोने लग गया। बाबाजीने पूछा, ‘भैया! रोते क्यों हो?’ वह बोला, ‘महाराज! भगवान‍्ने मेरेको ऐसे ही पैदा कर दिया है। तीन दिन हो गये चूल्हा नहीं जला है। घरमें कुछ खानेको नहीं है। भूखे मरता हूँ। आज संत पधारे, भिक्षा देनेको मन भी करता है, पर देऊँ कहाँसे?’ संतने कहा—‘तू घबराता क्यों है? तू तो बड़ा भारी धनी है। तू चाहे तो त्रिलोकीको धनी बना सकता है।’ वह गृहस्थी कहता है—‘महाराज! आप आशीर्वाद दे दें तो ऐसा हो जाऊँ। अभी तो मेरी परिस्थिति ऐसी है कि मुझे खानेको अन्न नहीं मिलता। आप कहते हैं कि लोगोंको धनी बना सकता है, तो यह कैसे सम्भव है महाराज!’

बाबाने संकेत करते हुए कहा—‘वह सामने क्या वस्तु पड़ी है?’ ‘वह तो सिलबट्टा है महाराज! पत्थर है, जब रोटी मिल जाती है तो इसपर चटनी पीस लेते हैं।’ बाबा कहते हैं—‘वह पत्थर नहीं है, वह पारस है। पारसका नाम सुना है?’ ‘ हाँ सुना है।’ तो पूछा ‘पारस क्या होता है महाराज!’ ‘लोहेको छुआनेसे सोना हो जाय, वह पारस होता है’ ‘पर महाराज! यदि यह पारस होता तो मैं भूखा क्यों मरता?’ संत कहते हैं कि ‘तू भूखा इसलिये मरता है कि उसको जानता नहीं। घरमें कुछ लोहा है क्या?’ ‘हाँ महाराज! लोहेका चिमटा है। रसोई बनाते हैं तो चिमटा काममें आता है।’ वह ले आया तथा उसको पारससे छुआया, पर लोहा सोना बना नहीं। बाबाने कहा—‘इसपर जमी हुई चटनी, मिर्च, मिट्टी साफ कर दे।’ उसे साफ करके छुआया तो चिमटा सोना बन गया। संत बोले, ‘बता, अब तू धनी है कि नहीं!’ लोहेको सोना बनानेवाला पारस मिल गया, अब धनी होते कितनी देर लगे। पारस तो पासमें ही था, परंतु जानकारी न होनेसे उसे मामूली पत्थर समझता था। अब वह केवल आप ही धनी नहीं बना, बल्कि चाहे जिसको धनी बना दे।

इसी तरह भगवान‍्का नाम मौजूद है, भगवान् विद्यमान हैं। ‘राम’ नाम लेते भी हैं; परंतु ऊपर-ऊपरसे लेते हैं, भीतरी भावसे नहीं लेते। निष्कपट होकर सरलतापूर्वक भीतरसे लिया जाय तो नाम महाराज दुनियामात्रका दु:ख दूर कर दें। संत-महात्मा, भगवान‍्के प्रेमी भक्त जहाँ जाते हैं, वहाँ दुनियाका दु:ख दूर हो जाता है। उनके दर्शन, भाषण, चिन्तनसे दु:ख दूर होता है, धन देनेसे दूर नहीं होता। जिनके पास लाखों-करोड़ोंकी सम्पत्ति है, बहुत वैभव है, वे भीतरसे जलते रहते हैं; परंतु नाम-प्रेमी संत-महात्माओंके दर्शनसे वे भी निहाल हो जाते हैं। संतोंके मिलनेसे शान्ति मिलती है; क्योंकि नाम जपनेसे उनमें आनन्दराशि प्रभु प्रकट हो गये। प्रभुके प्रकट होनेसे उन संतोंमें यह विलक्षणता आ जाती है।

निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।

कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २३)

सगुणसे नामकी श्रेष्ठता

ऊपर गोस्वामीजीने नामको निर्गुण स्वरूपसे बड़ा बताया और अब अपने विचारके अनुसार सगुण रामसे नामको बड़ा बताते हैं। निर्गुण-स्वरूपका उपक्रम करते हुए ‘मोरें मत बड़ नामु दुहू तें।’ दोनोंसे बड़ा बताया और यहाँ बीचमें निर्गुण-स्वरूपका उपसंहार करते हुए कहते हैं ‘निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।’ इस प्रकार निर्गुणसे नाम बड़ा बताया और यहाँसे आगे सगुण-स्वरूपका उपक्रम करते हुए ‘कहउँ नामु बड़ राम तें’ सगुणसे नामको बड़ा बताते हैं। अब ध्यान देना! सगुणसे बड़ा नामको बताते हुए तुलसीदासजी महाराज पूरी रामायणका वर्णन करते हैं। रामजीने क्या किया और नाम महाराजने क्या किया—ऐसे दोनोंकी तुलना करते हैं।

राम भगत हित नर तनु धारी।

सहि संकट किए साधु सुखारी॥

नामु सप्रेम जपत अनयासा।

भगत होहिं मुद मंगल बासा॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २४। १,२)

गोस्वामीजी कहते हैं कि रामजीने भक्तोंके हितके लिये मनुष्यरूप धारण किया। नाना प्रकारके कष्ट स्वयं सहे और संतोंको सुखी किया। रामजीने भक्तोंके लिये शरीर धारण करके काम किया। जरा गहरा विचार करें! संत कभी दु:खी होते हैं? वे सदा सुखी ही रहते हैं। सगुण भगवान‍्के दर्शन करके वे विशेष प्रसन्न हो जाते हैं, यह बात तो कह सकते हैं।

दूसरे, भगवान‍्ने स्वयं जा-जाकर उनके यहाँ दर्शन दिये और आप स्वयं वन-वन घूमे, नाना प्रकारके कष्ट सहे; परंतु नाम महाराजको कहीं आना-जाना नहीं पड़ता। किसी तरहका कष्ट सहन नहीं करना पड़ता। जहाँ हो, वहीं बैठे-बैठे नाम जपनेसे सब प्रकारके मंगल हो जाते हैं, आनन्द छा जाता है। भगवान् एक शरीर धारण करके कितने जीवोंको सुखी कर सकते हैं; परंतु नाम लेकर प्रत्येक जीव आनन्द प्राप्त कर सकता है। नाम-जपसे अभक्त भक्त हो जाय, असाधु साधु हो जाय, दुष्ट सज्जन हो जाय, नाम महाराजको जोर पड़ता ही नहीं। बस इतनी-सी शर्त है कि प्रेमसहित, आदरसहित नाम-जप करें। इस प्रकार नाम-जप करनेसे मोदमें, मंगलमें निवास हो जाय। उसके सदाके लिये मौज हो जाती है। नाम जपनेवालेके किसी बातकी कमी रहती ही नहीं। प्रश्न उठ सकता है कि फिर लोग क्यों दु:खी हो रहे हैं? इस बातपर विश्वास नहीं करते, इसलिये दु:खी हो रहे हैं। सब-का-सब संसार नाममें विश्वास न करनेके कारणसे मौतके चक्करमें पड़ा है।

अश्रद्दधाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप।

अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥

(गीता ९। ३)

मौतसे बढ़कर संसारमें कोई दु:ख नहीं, जिसके आनेपर उस दु:खको सह नहीं सकते, इतना भयंकर दु:ख कि प्राण छूट जाते हैं, उस दु:खके रास्तेमें केवल दु:खोंका ही सामना करना पड़ता है। विश्वास न करनेके कारण भगवान‍्के नामका जप करते नहीं। इसलिये मौतके रास्तेमें सब-का-सब संसार जा रहा है। अगर प्रेमसे विश्वास करके नाम-जप किया जाय तो सब-के-सब आनन्दमें मग्न हो जायँ।

राम एक तापस तिय तारी।

नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २४। ३)

आगे गोस्वामीजी कहते हैं—‘राम एक तापस तिय तारी’ जब वे जनकपुरी जा रहे थे तो बीचमें गौतमकी पत्नी अहल्या पत्थररूपसे पड़ी हुई थी। भगवान् रामजीके चरणकी रज लगनेसे उसका उद्धार हो गया। अब ध्यान देना!

राम एक तापस तिय तारी।

नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥

इस प्रकार एक-एक शब्दमें रामजीसे नामकी श्रेष्ठता बताते हैं। सगुण रामजीने केवल एक तापस स्त्रीका उद्धार किया। गिनतीमें एक और वह भी तपस्वीकी स्त्री। तपस्वीका आधा अंग अशुद्ध थोड़ा ही होता है! उसको तार दिया, उसका उद्धार कर दिया, इसमें क्या बड़ी बात की! परंतु नाम महाराजने एककी नहीं, करोड़ोंकी; तापसकी नहीं, खलोंकी तथा स्त्री (सुमति)-को नहीं, कुमतिको सुधारा। कुमति सुधर जाय तो वह स्वयं दूसरोंका उद्धार करनेवाला बन जाता है। जो केवल अपना ही उद्धार नहीं कर सकता, वह दुनियाका उद्धार करनेवाला संत बन जाता है। अब अहल्याका उद्धार हो गया तो हमारेको क्या मिला? नाम जपनेवाला हमारेको भी निहाल कर दे। इतनी महिमा है नाम-जपकी! तात्पर्य है सगुण रामजीकी अपेक्षा नाम बहुत बड़ा है।

रिषि हित राम सुकेतुसुता की।

सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी॥

सहित दोष दुख दास दुरासा।

दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २४। ४, ५)

ऋषियोंका हित करनेके लिये अर्थात् विश्वामित्रजीका यज्ञ पूर्ण करनेके लिये उनके आश्रममें भगवान् राम पधारे। वहाँ उन्होंने विश्वामित्र ऋषिके हितके लिये सुकेतुराजकी लड़की ताड़काको मारा और उसके बेटेसहित उसकी सेनाको नष्ट कर दिया। यह तो रामजीने किया। अब नाम महाराज क्या करते हैं, इसको बताते हैं कि भगवान‍्के दासके सामने दुराशारूपी ताड़का आ जाय तो ‘राम-राम’ करते ही ताड़का मर जायगी। भगवन्नाम प्रेमपूर्वक लेनेसे सभी बुरी कामनाएँ नष्ट हो जाती हैं। इस ताड़काके दो बेटे बताये हैं—दोष और दु:ख। दुराशासे ही दोष और दु:ख पैदा होते हैं। दुराशा भीतरसे मिट जाती है तो न दोष बनता है, न दु:ख होता है अर्थात् न पाप बनता है तथा न ही पापोंका फल—दु:ख होता है। दुराशा मर जाय और इनके बेटे भी मर जायँ। फिर इनकी जो सेना है—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, पाखण्ड, झूठ, दम्भ आदि ये कई तरहके राक्षस हैं। ‘राम-राम’ करनेसे ये सेना भी सब-की-सब खतम हो जाती हैं। यह नाम महाराज सबका नाश कर देते हैं। जैसे सूर्योदय होनेसे रात्रिका नाम-निशान नहीं रहता। रात्रि आती है, तब सब जगह अँधेरा छा जाता है। बाहर और भीतर सब जगह अँधेरा ठसाठस भर जाता है, मानो इतना भर जाता है कि सूई भी भीतर नहीं जावे। सूर्योदय होते ही अँधेरेकी जय रामजीकी हो जाती है अर्थात् अँधेरा विदा हो जाता है।

एक कहानी आती है। एक बार अँधेरेने जाकर ब्रह्माजीसे शिकायत की कि ‘महाराज! सूर्य भगवान् मेरेको टिकने नहीं देते। जिस देशमें मैं जाता हूँ, वहींसे भगा देते हैं। मैं कहाँ जाऊँ? ऐसा वैर वे मुझसे रखते हैं।’ ब्रह्माजीने सूर्यसे पूछा, ‘सूर्य महाराज! आप बेचारे अन्धकारको क्यों दु:ख देते हैं?’ सूर्यने कहा—‘महाराज! उम्रभरमें मैंने उसको देखा ही नहीं। दु:ख देना तो दूर रहा। हमारा और उसका कैसा वैर?’ अब देखें कैसे! वह सूर्यके सामने आता ही नहीं। ऐसे भगवन्नाम महाराजने दोष, दु:ख और दुराशारूपी अँधेरेको देखा ही नहीं। नाम जहाँ आ जाता है, वहाँसे ये बेचारे सब भाग जाते हैं। रामजीकी अपेक्षा नाम महाराजने कितना बड़ा काम किया!

भंजेउ राम आपु भव चापू।

भव भय भंजन नाम प्रतापू॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २४। ६)

विश्वामित्र ऋषिका यज्ञ पूरा करके रामजी जनकपुरी पहुँचे। राजा जनकके बड़ी आफत थी। हमारी कन्याका लगन हो जाय, यह बड़ी चिन्ता थी। पुत्रीके विवाहकी चिन्ता माता-पिताके रहती ही है। महाराज जनकने धनुष-यज्ञ रचा। इस धनुषको जो तोड़ देगा, उसके साथ अपनी बेटीको ब्याह दूँगा—ऐसी प्रतिज्ञा की। बड़े-बड़े बलवान् राजालोग आये। रावण, बाणासुर आदि रात्रिमें आकर धनुषको उठानेका उद्योग करके हार चुके थे, इसलिये राजाओंके सामने उसको छूनेकी उनकी हिम्मत ही नहीं पड़ी। ‘यों ही क्यों अपनी बेइज्जती कराओ मुफ्तमें, यह टूटनेवाला तो है नहीं।’ सबका घमण्ड दूर हो गया।

महाराज जनकके बड़ी चिन्ता हो गयी। वे कहते हैं कि यदि प्रण छोड़ देता हूँ तो बड़ा दोष लगता है। प्रतिज्ञा भंग करना बड़ा पाप है; और यदि प्रण नहीं छोड़ता हूँ तो कन्या कुँआरी रह जाती है। अब क्या करूँ? ऐसी आफत जनकजीके आ गयी। रामजीने कृपा की। शंकरजीके धनुषको तोड़ दिया। भगवान् रामने जाकर शंकरके चापको तोड़ा, पर नाम महाराजको कहीं जाना नहीं पड़ता, इनका प्रताप ही ऐसा है कि वह संसारके जन्म-मरणके भयको सर्वथा मिटा देता है। यहाँ रामजीने एक शंकरके चापको तोड़ा, पर नाम महाराजका प्रताप ही हजारों, लाखों, करोड़ों मनुष्योंके भव-बन्धनको तोड़ देता है। नाम महाराजके प्रभावसे मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं।

यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात्।

विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे॥

(विष्णुसहस्रनाम)

दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन।

जन मन अमित नाम किए पावन॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २४। ७)

विवाह कराकर रामजी अयोध्या वापस आ गये। फिर उनको वनवास हुआ। रामजीके लिये कहा गया—‘दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन’ दण्डकवनको शाप था। इस कारण बालू बरस गयी थी और जंगल सब सूख गया था। ऐसा सूखा जंगल था, वह दण्डकवन! भगवान् रामजीके पधारनेसे वह हरा-भरा हो गया, सुहावना हो गया। सब-का-सब जंगल बड़ा सुन्दर हो गया। रामजीने एक जंगलको हरा-भरा कर दिया, पवित्र कर दिया; परंतु ‘जन मन अमित नाम किए पावन’ भगवन्नामने अपने अनगिनत जनोंके मनको पवित्र कर दिया। मनरूपी जंगल कितने सूखे पड़े हुए थे जिनकी गिनती नहीं, इतने अमित मन पावन किये! ऐसे रामजीकी अपेक्षा नामजी कितने बड़े हुए!

निसिचर निकर दले रघुनंदन।

नामु सकल कलि कलुष निकंदन॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २४। ८)

रामजीने राक्षसोंके समूह-के-समूहका नाश कर दिया। राक्षस बहुत मरे, पर सब नहीं मरे, राजगद्दी होनेपर भी राक्षस रह गये। उनको मारनेके लिये शत्रुघ्नजीको भेजना पड़ा। कई आफत आयी; परंतु नाम महाराजके लिये कहा गया है कि ‘नामु सकल कलि कलुष निकंदन’ इन्होंने कलियुगके सारे-के-सारे पापोंका नाश कर दिया। कोई पाप बाकी नहीं रहा, सबको नष्ट कर दिया।

अब बोलो! स्वयं राम महाराज बड़े हैं कि नाम महाराज बड़े हैं! ऐसे रामजीके चरणोंकी शरण ले लो अपने तो! जिसे दूसरे किसीकी आशा ही न हो, वह भगवान‍्का प्यारा हो जाता है।

एक बानि करुनानिधान की।

सो प्रिय जाकें गति न आन की॥

(मानस, अरण्यकाण्ड, दोहा १०। ८)

यदि कोई दूसरा सहारा रखता है तो उसको भगवान‍्की तरफसे पूरा बल नहीं मिलता। भगवान् पर पूरा विश्वास, भरोसा न करके अपनेको भगवान‍्से जितना अलग रख लेता है, भगवान‍्की उतनी चीज उसे नहीं मिलती। इसलिये दूसरेका सहारा छोड़ दें और उनके शरण हो जायँ।

एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।

एक राम घनस्याम हित चातक तुलसीदास॥