प्रवचन—९

सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।

नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २४)

श्रीगोस्वामीजी महाराज सगुणसे भी बढ़कर ‘राम’ नामकी महिमा बतलाते आ रहे हैं। यहाँ वही प्रकरण चल रहा है। श्रीरघुनाथजी महाराजने तो शबरी, गीध (जटायु) आदि जो सुसेवक थे और जो उनका चिन्तन करते थे, उनको ही मुक्ति दी; परंतु उनके नामने अगनित दुष्टोंका उद्धार कर दिया। नामके गुणोंकी कथा वेदोंमें प्रसिद्ध है।

शबरीके बहुत दिनोंसे प्रतीक्षा हो रही थी कि ‘भगवान् आवें, भगवान् आवें’ और वह गीध भी भगवान‍्के चरणोंकी रेखाका चिन्तन करता था। रेखाओंमें वज्र आदिके चिह्न होते हैं, वे रक्षा करनेवाले होते हैं। ऐसे भगवान‍्का चिन्तन करनेवाले दो सेवक ‘रामचरितमानस’ में मिलते हैं। उनको ही मुक्ति (गति) दी, पर ‘नाम उधारे अमित खल’ नामने जिनका उद्धार किया, वे अमित हैं, कोई मित नहीं, उनकी कोई गणना नहीं है। ‘बेद बिदित गुन गाथ’—उनके गुणोंकी गाथाएँ वेदोंमें, शास्त्रोंमें, स्मृतियोंमें, पुराणोंमें, इतिहासोंमें प्रसिद्ध हैं। ऐसे अनेकोंका उद्धार कर दिया।

तीन प्रकारके सखा

राम सुकंठ बिभीषन दोऊ।

राखे सरन जान सबु कोऊ॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २५। १)

अब कहते हैं—सुग्रीव और विभीषण दोनों भगवान‍्के मित्र रहे। श्रीरामजीने इन दोनोंको अपनी शरणमें रखा, यह सब कोई जानते हैं। भगवान‍्ने इनको ‘सखा’ कहा है।

खल मंडली बसहु दिनु राती।

सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥

(मानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा ४६। ५)

विभीषणसे भगवान् गले मिलकर पूछते हैं कि ‘दिन-रात दुष्टोंकी मंडलीमें बसते हो, ऐसी दशामें, हे सखे! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है?’ ऐसे सुग्रीवको भी अपना सखा मानते हैं। जब विभीषण मिलने आया तो ‘कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा’ भगवान‍्ने सुग्रीवसे कहा—बोलो, सखा! तुम्हारी क्या सम्मति है? ऐसे दोनों ही सखा थे। इनको भगवान‍्ने अपनी शरणमें रखा।

ये दोनों ही भयभीत थे बेचारे! सुग्रीव बालीसे डरता था और विभीषणको भी रावणने जोरसे धमकाया, लात भी मारी और कह दिया कि ‘मेरे नगरमें रहता है और प्रीति तपस्वी (राम)-से करता है। निकल जा यहाँसे।’ ऐसे रावणने उसे निकाल दिया तो वह भगवान‍्के शरण आ गया। इन दोनोंको भगवान‍्ने अपने मित्र बना लिये। एक बात याद आ गयी—रामायणमें भगवान‍्के तीन सखा हैं। (१) निषादराज गुह, (२) सुग्रीव और (३) विभीषण। इन तीनोंको सखा बनानेका तात्पर्य क्या है? भगवान् कहते हैं—‘मैं सबको सखा बनानेके लिये तैयार हूँ।’ तीन तरहके भक्त होते हैं। (१) साधक भक्त होता है, (२) सिद्ध भक्त होता है और (३) विषयी भक्त होता है।

सांसारिक विषयी मनुष्यको भी भगवान् सखा बना लेते हैं, साधक भक्तको भी सखा बना लेते हैं और सिद्ध भक्तको भी सखा बना लेते हैं। इनमें निषादराज गुह सिद्ध भक्त था, जैसे ज्ञानी भक्त होते हैं, परमात्माके प्यारे होते हैं, पूर्णताको प्राप्त—ऐसे सिद्ध भक्त हैं, निषादराज गुह। विभीषण साधक भक्त है, भगवत्प्राप्तिकी साधना करनेवाला है और सुग्रीव विषयी भक्त है। भगवान‍्की भक्ति करता है, पर करता है विपत्ति आनेपर, दु:ख होनेपर और जब दु:ख मिट जाता है तो फिर जै रामजीकी! फिर कोई भक्ति नहीं। सुग्रीवके विषयमें भगवान् रामने लक्ष्मणजीसे कहा—

सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी।

पावा राज कोस पुर नारी॥

(मानस, किष्किन्धाकाण्ड, दोहा १८। ४)

सुग्रीव भी मेरी सुध भूल गया; क्योंकि उसको राज्य मिल गया, मकान मिल गया, नगर मिल गया, खजाना मिल गया, स्त्री मिल गयी। अब भजन कौन करे? जब विपत्ति थी, डर था, तब भजन करता था। अब भय मिट गया, मौजसे राज्य करता है, इसलिये मेरेको भी भूल गया।

हनुमान‍्जीने सुग्रीवको रामजीसे मिलनेके लिये कहा—‘तुम कर क्या रहे हो!’ रामजीने यहाँ प्रवर्षण गिरिपर चातुर्मास (निवास) किया है और तुमने भगवान‍्की बात भुला दी। इतने दिन हो गये, कभी मिलनेतक नहीं गये और सीताजीकी खोज भी तुमने नहीं की। ऐसी बात हनुमान‍्जीने कही। तब उसे कुछ चेत हुआ; परंतु फिर महाराज! लक्ष्मणजीके सामने रामजीने जोरसे कहा—‘सुग्रीव भी मुझे भूल गया है, जिस बाणसे बालिको मारा है, कल उसी बाणसे उसको भी मारना है।’ यह सुनकर लक्ष्मणजी बोले—‘महाराज! वह तकलीफ आपको नहीं देखनी पड़ेगी। मैं अभी जाता हूँ और सब काम कर दूँगा।’ तब भगवान‍्ने समझा कि कहीं लक्ष्मण उसे मार न दे। इसलिये कह दिया—‘ना, ना, भाई।’

भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव॥

(मानस, किष्किन्धाकाण्ड, दोहा १८)

‘देखो, सुग्रीव हमारा सखा है, मित्र है। भय दिखलाकर ले आना।’ भय दिखानेका तात्पर्य क्या है? ये विषयी भक्त होते हैं, इनमें जब कोई आफत आती है, भय होता है, तब भगवान‍्का भजन करते हैं। भय मिट जाता है तो फिर वैसे ही। इसलिये कहा—‘भय दिखाकर ले आना, मारना नहीं।’ भय दिखानेके लिये भगवान‍्को यह कहना पड़ा। लक्ष्मणजी जब वहाँ गये तो सुग्रीव भयभीत हो गया। उसने पहले ताराको भेजा कि लक्ष्मणजी आ रहे हैं, इनको राजी करो किसी तरह ही। स्त्रियाँ हैं, बालक हैं, इनको देखकर बड़ोंको दया आ जाती है, एक कृपा आ जाती है। इसलिये ताराको, हनुमान‍्जीको और अंगदको भेजा; क्योंकि वह डर गया। जब लक्ष्मणजी पधारे तो उनको अपनी खाटपर बैठाया। सुग्रीव विषयी था न! तो वहीं रहता था। बैठकमें नहीं, माचे (चारपाई) पर बैठा रहता। इसलिये लक्ष्मणजीको भी वहीं खाटपर बैठाया। इस तरह उनका आदर किया। ये सब विषयीके लक्षण हैं। रामजीसे जाकर मिला तो क्या कहा? रामजीसे कहा—‘महाराज!

नारि नयन सर जाहि न लागा।

घोर क्रोध तम निसि जो जागा॥

लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया।

सो नर तुम्ह समान रघुराया॥

यह गुन साधन तें नहिं होई।

तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई॥

(मानस, किष्किन्धाकाण्ड, दोहा २१। ४—६)

गीतामें जैसे काम, क्रोध और लोभ—ये तीन नरकके दरवाजे बताये हैं। उसी तरह सुग्रीवने कहा—‘नारि नयन सर जाहि न लागा’ स्त्रीका नयन बाण जिसको नहीं लगा अर्थात् जो कामके वशमें नहीं हुआ और ‘घोर क्रोध तम निसि जो जागा’—जो घोर क्रोध-रूपी रात्रिमें जग गया, मानो जिसको क्रोध नहीं हुआ और ‘लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया।’ लोभकी फाँसी जिसके गलेमें नहीं लगी है। ‘सो नर तुम समान रघुराया’ वह तो आपके समान ही है, जो इन दोषोंसे दूर है। ऐसे भगवान‍्के प्यारे भक्त होते हैं। ये गुण किसी साधनसे नहीं होते, आपकी कृपासे ही होते हैं। मैं जो काम, क्रोध और लोभमें फँसा हूँ, इसमें कारण है कि आपने कृपा नहीं की। मेरा दोष नहीं है इसमें। ‘तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई।’ आपकी कृपासे कोई-कोई पाता है। इसलिये यह हमारेमें अवगुण नहीं, यह अवगुण आपका ही है। विषयी आदमी भोगोंमें फँसे रहते हैं और कह देते हैं—भगवान‍्की माया है। भगवान‍्की मायाने ऐसा कर दिया। इस कारण हम फँस गये, क्या करें? हम तो दूधके धोये शुद्ध हैं। ये जो विषयी-पामर जीव संसारमें रात-दिन भोगोंमें लगे रहते हैं, वे रामजीके ऊपर ही दोषारोपण करते हैं कि हम क्या करें? बताओ जीव बेचारे क्या करें? यह तो भगवान् कृपा करे, तब छूटे।

ऐसे वचन विभीषण या निषादराज गुहके प्रसंगमें कहीं नहीं आयेंगे, क्योंकि ऐसी बात साधक और सिद्ध भक्त नहीं कहते। विषयोंमें डूबे हुए पामर जीव ही ऐसा कहते हैं। निषादराज गुहको तो भगवान‍्से मिलनेमें बड़ा दु:ख होता है वह कहता है—

कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।

जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह॥

(मानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ९१)

कैकयराजकी पुत्री मंदमति कैकेयीने बड़ी ही कुटिलता की है, जो रघुनन्दन श्रीरामजीको और जानकीजीको सुखके अवसरपर दु:ख दिया है, वनवास दे दिया, इस बातसे बड़ा दु:ख हुआ। लक्ष्मणजीने वहाँ समझाया कि यह दु:ख-सुख कुछ नहीं है ऐसे ‘लक्ष्मण-गीता’ का वहाँ उपदेश हुआ है। रामजीसे जब निषादराज मिला तो उसने कहा—‘महाराज! आप हमारे घरपर पधारो। यह आपका ही घर है, बाल-बच्चे सब आपके ही हैं। आप कृपा करो, घरपर पधारो।’ तब भगवान‍्ने कहा—‘भाई! इस समय हम गाँवमें किसीके घरपर नहीं जा सकते; क्योंकि हमारी माता कैकेयीने वनवास दे दिया है—‘तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी॥’ चौदह वर्षका वनवास है, इस कारण हम गाँवमें नहीं जाते हैं। जब विभीषण भगवान‍्के शरण आया तो कहने लगा—

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।

त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥

(मानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा ४५)

हनुमान‍्जीके द्वारा मैंने आपका सुयश सुना कि आप जन्म-मरणके भयका नाश करनेवाले हैं। दु:खियोंका दु:ख दूर करनेवाले आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपके शरणमें आया हूँ। विभीषणने भगवान् पर कोई दोषारोपण नहीं किया। उसके मनमें संकोच था, भय लगता था, इसलिये हनुमान‍्जी महाराजसे भी उसने कहा कि ‘महाराज! क्या मेरे जैसेको भी भगवान् स्वीकार कर लेंगे?’ हनुमान‍्जी कहते हैं—‘देखो मेरे जैसेको भी स्वीकार कर लिया है।’ भगवान् सबको स्वीकार करते हैं, तुमको भी स्वीकार कर लेंगे, इस प्रकार जब आश्वासन दिया, तब हिम्मत हुई। विभीषण संकोच रखता था और साधन करता था। भगवान‍्ने उसको भी अपना सखा बनाया। सुग्रीव जैसेको भी निषादराज गुहकी तरह अपना सखा बना लिया।

विभीषणने क्या किया कि जब सर्वथा विजय हो गयी और रावण मारा गया, तब विभीषणने भगवान‍्से कहा—‘महाराज! आप घरपर पधारिये।’

अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे।

मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे॥

(मानस, लंकाकाण्ड, दोहा ११६। ५)

‘जिससे युद्धका परिश्रम दूर होवे। मेरा घर पवित्र करो, पधारो।’ तो भगवान‍्ने कहा—‘भाई! तुम्हारा घर हमारा ही है, यह सच है, पर हमारेको भरतकी याद आ रही है। भरत भी मेरेको याद करता है, इसलिये मेरेको अयोध्या जल्दी पहुँचना है। गाँवमें, घरोंमें मैं नहीं जाता हूँ, इस कारण लक्ष्मणजीको भेजता हूँ, यह राजगद्दी कर देगा। विभीषणने युद्ध समाप्त होनेके बाद घर पधारनेके लिये कहा। जबकि निषादराज गुहने आरम्भमें मिलते ही यह कहा कि आप घरपर पधारो; परंतु बन्दा सुग्रीवने कहा ही नहीं कि आप मेरे घर पधारो। ऐसा विषयी था। फिर भी रामजी तो तीनोंको ही सखा कहते हैं।

भगवान् कहते हैं कि तुम अपने गुण-अवगुणोंकी तरफ मत देखो। केवल मेरे सम्मुख हो जाओ, मेरे पास आ जाओ, बस।

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।

जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

(मानस, सुन्दरकाण्ड, दोहा ४४। २)

इसलिये भगवान‍्की शरण ले लो, आश्रय ले लो, उनके सम्मुख हो जाओ। वे सबको सखा बनानेको, सबको अपना बनानेको तैयार हैं। भगवान् एक हाथमें धनुष और एक हाथमें बाण रखते हैं। बाण तो होता है सीधा और धनुष होता है टेढ़ा। वे दोनोंको ही हाथमें रखते हैं, सीधेको (बाणको) छोड़ देते हैं, पर टेढ़े (धनुष)-को नहीं छोड़ते हैं; क्योंकि उसपर कृपा विशेष रखते हैं, यह कहीं जायगा तो फँस जायगा।

इसलिये जैसे भी हो, अपनी ओरसे सरल, सीधे होकर भगवान‍्के चरणोंकी शरण चले जाओ, बस। आश्रय भगवान‍्का पकड़े रखो। फिर आप डरो मत कि हम कैसे हैं, कैसे नहीं हैं, इसकी जरूरत नहीं है।

नाम गरीब अनेक नेवाजे।

लोक बेद बर बिरिद बिराजे॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २५। २)

नाम महाराजने तो कई गरीबोंके ऊपर कृपा कर दी है। लोकमें और वेद-शास्त्रोंमें सब जगह नामकी विरदावली (यशकी प्रतिष्ठा) प्रसिद्ध है।

राम भालु कपि कटकु बटोरा।

सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २५। ३)

सुग्रीवसे मित्रता हो गयी, फिर युद्धकी तैयारी होने लगी। श्रीरामजीने भालू (रीछ) और बन्दरोंकी बड़ी भारी सेना इकट्ठी की और समुद्रसे पार उतरनेके लिये पुल बनानेमें कितना परिश्रम किया! यह सब कोई जानते ही हैं।

नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं।

करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २५। ४)

भगवान‍्का नाम लेते ही संसार-समुद्र सूख जाता है और फिर तो पैदल ही चले जाओ पार। तैरना ही नहीं पड़े। कोई पुल बनानेकी भी जरूरत नहीं। ऐसे नाम महाराजको परिश्रम करना नहीं पड़ता। ‘करहु बिचारु सुजन मन माहीं’ पहले यह बात कह आये हैं ‘को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू॥’ यहाँ कहते हैं कि सज्जन लोग मनमें ही विचार कर लो, हम छोटा-बड़ा क्या बतावें, आप ही विचार कीजिये कि इन दोनोंमें बड़ा कौन है?

राम सकुल रन रावनु मारा।

सीय सहित निज पुर पगु धारा॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २५। ५)

श्रीरामजीने कुटुम्बसहित रावणको मार दिया और उसके बाद सीताजीके सहित आप श्रीरघुनाथजी महाराज अयोध्यामें पधार गये।

राजा रामु अवध रजधानी।

गावत गुन सुर मुनि बर बानी॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २५। ६)

राजसिंहासनपर आप विराजमान हो गये और अयोध्या राजधानी हुई। देवता, ऋषि, मुनि, सन्त-महात्मा आदि उनकी बड़ी सुन्दर स्तुति करते हैं। श्रेष्ठ वाणीसे उनका वर्णन करते हैं। इस प्रकार यह तो रामजी महाराजने स्वयं ऐसा किया कि दुष्टोंको मारकर श्रेष्ठ राजधानी बना ली। अब देखो! नाम महाराज क्या करते हैं?

सेवक सुमिरत नामु सप्रीती।

बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २५। ७)

जो भगवान‍्का सेवक (भक्त) प्रीतिसहित नाम-जप करता है, वह मोहरूपी रावणकी काम, क्रोध, लोभ, मद, पाखण्ड आदि बड़ी भारी कलियुगकी सेनाको ‘बिनु श्रम’ बिना परिश्रमके जीत जाता है। जब मोहको ही जीत गया तो सेना कहाँ रहे बेचारी! मोहके साथ सारी सेना भी खतम हो जाती है, फिर क्या करता है? ‘फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें।’ सुखमें मस्त हुआ घूमता रहता है। प्रेमसहित नामका स्मरण करनेसे यह सब हो जाता है। रामजीके तो एक राजधानी है अयोध्या। नामकी राजधानी सब जगह है। जो भगवान‍्के नाम-प्रेमी होते हैं, उनका हृदय नाम महाराजकी राजधानी होती है।

‘नफा पाया है राम फकीरीमें।’...कैसी बात है! ‘हाथमें तुम्बी बगलमें सोटा। ये चारों ही धाम जागीरीमें॥’ वहाँ तो एक अयोध्या ही राजधानी है, नामके तो चारों ही धाम जागीरी है।

फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें।

नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २५। ८)

रामजी राजगद्दीपर बैठ गये फिर भी लवणासुर आदिने क्या-क्या आफत मचायी। राजगद्दीपर बैठनेपर भी रामजी सुखसे थोड़े ही रहे। नाम महाराजकी कृपासे जाग्रत् में तो क्या शोक आवे, स्वप्नमें भी शोक-चिन्ता नहीं सताती। ऐसे मस्त हो जाते हैं। इसलिये ‘ब्रह्म राम तें नामु बड़’ पहले ब्रह्मसे नामको बड़ा बताया, अब रामसे बड़ा बता दिया।

ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।

रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २५)

इस प्रकार निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान् राम इन दोनोंसे यह नाम बड़ा है और वरदान देनेवालेको वरदान देनेवाला है। मानो भगवन्नामका जो सहारा लेता है तो दुनियाको वरदान दे दे, इतनी ताकत उसमें आ जाती है, सामर्थ्य आ जाती है, ऋद्धि-सिद्धि सब कुछ उसमें आ जाती है। भुक्ति और मुक्ति कुछ भी बाकी नहीं रहती। इसलिये दोनोंसे ही यह बड़ा है। जैसे—

‘रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि।’

भगवान् शंकर वरदान देनेवाले हैं, वे भी वरदान देते हैं तो किसके प्रभावसे—नामके प्रभावसे!

अहं भवन्नाम गृणन्कृतार्थो

वसामि काश्यामनिशं भवान्या।

मुमूर्षमाणस्य विमुक्तयेऽहं

दिशामि मन्त्रं तव राम नाम॥

(अध्यात्म, युद्धकाण्ड १५। ६२)

यह जो आपका ‘राम’ नाम मन्त्र है, मरनेवालेको उसकी मुक्तिके लिये मैं इसका उपदेश देता हूँ। भगवान् शंकरको भी दानी बना दिया नाम महाराजने नाममें भगवान् शंकरका बहुत प्रेम है। वाल्मीकिजी महाराजने रामायण बनायी तो सौ करोड़ श्लोकोंकी रामायण बनायी और लाकर भगवान् शंकरके आगे रखी, जो सदा ही भगवान् रामका नाम लेनेवाले हैं, रामचरितमें ही मस्त रहनेवाले हैं।

रचि महेस निज मानस राखा।

पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥

(मानस, बालकाण्ड ३५। ११)

रामचरितको रचकर अपने मनमें ही रखा और अवसर पाकर पार्वतीको उपदेश दिया। वाल्मीकि बाबाने देखा कि रामायणको रखनेवाले भगवान् शंकर हैं, इसलिये सब-की-सब सौ करोड़ श्लोकोंवाली रामायण उनके सामने रख दी। सौ करोड़ श्लोकोंकी रामायण देखी तो महाराज भगवान् शंकर बहुत खुश हुए। बड़े लोगोंका स्वभाव होता है कि जब वे प्रसन्न होते हैं और किसी चीजसे लाभ देखते हैं तो वे चाहते हैं कि भैया! यह चीज तो सबको ही मिलनी चाहिये। श्रेष्ठ पुरुष उदार होते हैं। शंकरभगवान‍्ने देखा कि रामायण इतनी बढ़िया है कि इसे सबको ही देना चाहिये। इसलिये तीन विभाग करके त्रिलोकीको बाँटने लगे। तीनों लोकोंको तैंतीस-तैंतीस करोड़ दिया तो एक करोड़ बच गया। उस एक करोड़के तीन भाग किये तो एक लाख बच गया। एक लाखके फिर तीन भाग किये तो एक हजार बच गया। एक हजारके तीन भाग किये तो सौ बच गया। उसके भी तीन भाग किये तो एक श्लोक बचा। इस प्रकार रामायणमें जो सौ करोड़ श्लोक हैं, उनको तीन भाग करके बाँटते-बाँटते अन्तमें एक अनुष्टुप् श्लोक बच गया। एक अनुष्टुप् छन्दके श्लोकमें बत्तीस अक्षर होते हैं। उनमेंसे दस-दस करके तीनोंको दे दिया तो अन्तमें दो अक्षर बचे। भगवान् शंकरने विचार किया कि तीन अक्षर होते तो उनको भी बाँट देते। अब इन दो अक्षरोंको किसको देवें और किसको नहीं देवें। इसलिये ये दो अक्षर ‘रा’ और ‘म’ हम रख लेंगे। बँटवारेमें कुछ मिलना चाहिये न! भगवान् शंकरने कहा, ‘बस हमारे तो सार यही है। राम राम!’ इन दो अक्षरोंके अन्तर्गत ही है सब रामायण। जितने शास्त्र हैं, जो कुछ भी है, भगवान‍्के नामके अन्तर्गत ही हैं। भगवान् भी वशमें हो जायँ, औरोंकी बात ही क्या है? इसलिये यह ‘राम’ नाम निर्गुण और सगुण दोनोंसे ही बढ़कर है।

चारों वेद ढंढोर के अन्त कहोगे राम।

सो रज्जब पहले कहो एते ही में काम॥

नामका प्रभाव

अब आगे भगवान‍्के नाम लेनेवाले भक्तोंको गिनाते हैं। उन लोगोंने कैसे नाम लिया, वह भी बताते हैं।

नाम प्रसाद संभु अबिनासी।

साजु अमंगल मंगल रासी॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २६। १)

नामके प्रसादसे ही शिवजी अविनाशी हैं और अमंगल वेषवाले होनेपर भी मंगलकी राशि हैं। शंकर अविनाशी किससे हुए? तो कहते हैं ‘नाम-प्रसाद’—नामके प्रभावसे।

एक बार नारदजीने पार्वतीके शंका पैदा कर दी कि ‘भोले बाबासे पूछो तो सही कि ये मुण्डमाला जो पहने हुए हैं, यह माला क्या है?’ पार्वतीने पूछा—‘महाराज! आपने यह माला पहन रखी है यह क्या है?’ शंकर टालने लगे। ‘क्या करोगी पूछकर?’ पर उसने कहा, ‘नहीं महाराज! आप बताओ।’ तो शंकर कहने लगे—‘बात यह है कि तुम्हारे इतने जन्म हुए हैं। तुम्हारा एक-एक मस्तक लेकर इतनी माला बना ली हमने।’ पार्वतीको आश्चर्य हुआ। वह बोली—‘महाराज! मेरे तो इतने जन्म हो गये और आप वही रहे, इसमें क्या कारण है?’ उन्होंने बताया कि हम अमरकथा जानते हैं। ‘फिर तो अमरकथा हमें भी जरूर सुनाओ।’ हठ कर लिया ज्यादा, तो एकान्तमें जाकर कहा—‘अच्छा तुमको सुनायेंगे, पर हरेकको नहीं सुनायेंगे।’ भगवान् शंकर सुनाने लगे, भगवान‍्का नाम और भगवान‍्का चरित्र। अमरकथा यही है। भगवान् शंकरने सब पक्षियोंको उड़ानेके लिये तीन बार ताली बजायी। उस समय और दूसरे सभी पक्षी उड़ गये, पर एक सड़ा गला तोतेका अण्डा पड़ा था, उसने इस कथाको सुन लिया। पार्वतीने हठ तो कर लिया; परंतु उसे नींद आ गयी।

एक तो प्रेमसे सुननेकी स्वयंकी उत्कण्ठा होती है और एक-दूसरेकी प्रेरणासे इच्छा की जाती है। पार्वतीने नारदजीकी प्रेरणासे इच्छा की थी, इस कारण नींद आ गयी। जिसके स्वयंकी लगन होती है, उसको नींद नहीं आती। पार्वतीको नींद आ गयी, तोता सुनते-सुनते हाँ-हाँ कहने लगा। भगवान् शंकर मस्त होकर भगवान‍्का चरित्र कहे जा रहे हैं और उसीमें मस्त हो रहे हैं। आँख खोलकर जब देखा तो तोता बैठा है और सुन रहा है। ‘अरे! इसने चोरीसे नाम सुन लिया!’ वह वहाँसे उड़ा, शंकरभगवान् पीछे भागे। त्रिशूल हाथमें लिये हुए पीछे-पीछे गये। उस समय वेदव्यासजीकी स्त्री सिर गुँथा रही थी। उसको भी नींद आ रही थी थोड़ी। उसका मुख खुला था। वह मुखके भीतर प्रवेश कर गया। वे ही शुकदेव हुए, शुकदेवमुनि जो राजा परीक्षित् को मुक्ति दिलानेवाले, भागवत सप्ताह सुनानेवाले हुए। वे शुकदेवजी माँके पेटमें ही नाम-जपमें लग गये। शुकदेव मुनि इस तरहसे श्रेष्ठ हुए। पार्वतीको अमरकथा सुनायी, जिससे पार्वती भी अमर हो गयी।

अमर कैसे हों? ‘नाम-प्रसाद’—नामकी कृपासे भगवान् शंकर अविनाशी हो गये। उनका साज देखा जाय तो महाराज! सर्प है, मुर्देकी राख है, मुण्डमाला है। ऐसा अमंगल साज है, विचित्र ढंगका साज है। भगवान् शंकरके साज विचित्र हैं! भगवान् शंकरके साज अमंगल हैं, केवल इतनी ही बात नहीं है, बड़ी आफत है महाराज! इधर तो खुदका गहना साँप है और उधर गणेशजीका वाहन चूहा है। इधर आपका वाहन बैल है तो भवानीका वाहन सिंह है। इस प्रकार घरमें एक-दूसरेकी कितनी कलह है, इसको तो वे ही जानें। भगवान् शंकर ही निभाते हैं। विरोधी-ही-विरोधी इकट्ठे हुए हैं सभी। सर्प गलेमें बैठा है तो कार्तिकेयके मयूर है। मयूर साँपको खाने दौड़े तो साँप चूहेको खाने दौड़े। ऐसे एक-एकके वैरी हैं। यह दशा है घरमें। ऐसे साज हैं अमंगलराशि! फिर भी मंगलराशि हैं। ‘शिव-शिव’ कहनेसे कल्याण हो जाय, उद्धार हो जाय, मंगल हो जाय। सदा ही सबके मंगल कर दे। इसमें कारण क्या है? यह नाम महाराजकी कृपा है।

सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी।

नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २६। २)

शुकदेव मुनि, वही तोता जिसने अमरकथा सुनी और सनकादि सिद्ध, मुनि और योगी लोग हरदम भगवान‍्का नाम लेते हुए भगवान‍्के चरणोंमें ही रहते हैं। सनकादि हमेशा पाँच वर्षकी बालक-अवस्थामें ही रहते हैं। ये ब्रह्माजीसे सबसे पहले प्रकट हुए, सृष्टि पीछे हुई, ऐसे इतने पुराने; परंतु देखनेमें छोटे-छोटे बच्चे, चार-पाँच वर्षके। वे सदा नग्न रहनेवाले महात्माकी तरह घूमते फिरते हैं। सदैव ‘हरि: शरणम्’ ऐसे रटते रहते हैं। वे नामके प्रसादसे ब्रह्मसुख लेते हैं।

नारद जानेउ नाम प्रतापू।

जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २६। ३)

संसारको तो विष्णुभगवान् प्यारे लगते हैं, वे संसारका पालन-पोषण करनेवाले हैं। जैसे बालकको माँ बड़ी प्यारी लगती है ‘मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणम्’—शरीरका पालन करनेमें माँके समान कोई नहीं है। कोई आफत हो तो बालकको माँ याद आती है। हम भाई-बहन जितने हैं, हम सबका पालन-पोषण माँने ही किया है। माँकी तरह संसारमात्रका पालन करनेवाली शक्ति (माँ) है भगवान् हरि (विष्णु)। नारदजी भगवान‍्के नामका कीर्तन करते हैं। इस नामके कारण भगवान् विष्णुको और भगवान् शंकरको भी प्यारे लगने लगे। इस प्रकार सबको प्रिय लगनेवाले नारदजी महाराज हो गये।

नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू।

भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २६। ४)

नाम महाराजकी कृपासे प्रह्लादजी महाराज भक्तशिरोमणि हो गये। जहाँ भागवतोंको नमस्कार किया, वहाँ प्रह्लादजीका नाम पहले और गुरुजी—नारद बाबाका नाम पीछे है।

प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक-

व्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान्।

रुक्माङ्गदार्जुनवसिष्ठविभीषणादीन्

पुण्यानिमान्परमभागवतान्स्मरामि॥

बाल्यावस्थामें ही रात-दिन लग गये। इतना विश्वास, इतना भरोसा, इतनी दृढ़ता कि हिरण्यकशिपुसे इतनी दुनिया काँपती, देवता भी काँपते, ऐसे पितासे भी कोई भय नहीं, कहीं किसी तरहका भय देखातक नहीं। वे तो बस, नाम जपते हैं मस्तीसे। यह क्या है? नाम-प्रसाद है। जप करनेसे ऐसी कृपा हुई।

ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ।

पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २६। ५)

ध्रुवजी महाराजने भी नाम-जप किया, पर ग्लानिसे किया। विमाताके कठोर वचनोंसे दु:खी होकर राज्यके लिये सकामभावसे भजनमें लगे। छोटे बालक होकर भी कितनी हिम्मत की! इसलिये कहते हैं—

हिम्मत मत छाड़ो नरां मुख सूँ कहता राम।

हरिया हिम्मत सूँ किया ध्रुवका अटल धाम॥

नारदजीने कहा—‘अरे जंगलमें अकेला कहाँ रहेगा? भय लगेगा। वहाँ जंगलमें माँ थोड़ी बैठी है। कहाँ जा रहा है तू!’ तो कहते हैं—‘मैं तो भगवान‍्का भजन करूँगा।’ फिर कई प्रलोभन दिये, बहुत-सी बातें बतायीं नारद बाबाने, पर डिगा ही नहीं। ‘पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥’ उसने राज्यके लिये ही भजन किया था। इसलिये भगवान‍्ने कहा कि ‘इसके रहनेके लिये अटल धाम बनाता हूँ, जहाँसे कोई विचलित न कर सके।’ ऐसा ध्रुवलोक हो गया।

हनुमान‍्जीका सेवाभाव

सुमिरि पवनसुत पावन नामू।

अपने बस करि राखे रामू॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २६। ६)

हनुमान‍्जीने महान् पवित्र नामका स्मरण करके श्रीरामजीको अपने वशमें कर रखा है। हरदम नाममें तल्लीन रहते हैं। ‘रहिये नाममें गलतान’ रात-दिन नाम जपते ही रहते हैं। हनुमान‍्जी महाराजको खुश करना हो तो राम-नाम सुनाओ, रामजीके चरित्र सुनाओ; क्योंकि ‘प्रभुचरित्र सुनिबेको रसिया’ भगवान‍्के चरित्र सुननेके बड़े रसिया हैं।

रामजीने भी कह दिया, ‘धनिक तूँ पत्र लिखाउ’ हनुमान‍्जीको धनी कहा और अपनेको कर्जदार कहा। रामजीने देखा कि मैं तो बन गया कर्जदार पर सीताजी कर्जदार न बनें तो घरमें ही दो मत हो जायँगे। इसलिये रामजीका संदेश लेकर सीताजीके चरणोंमें हनुमान‍्जी महाराज गये। जिससे सीताजी भी ऋणी बन गयीं। ‘बेटा, तूने आकर महाराजकी बात सुनायी। ऐसा सन्देश और कौन सुनायेगा!’ रामजीने देखा कि हम दोनों तो ऋणी बन गये, पर लक्ष्मण बाकी रह गया। जब लक्ष्मणके शक्तिबाण लगा, उस समय संजीवनी लाकर लक्ष्मणजीके प्राण बचाये। ‘लक्ष्मणप्राणदाता च’ इस प्रकार जंगलमें आये हुए तीनों तो ऋणी बन गये, पर घरवाले बाकी रह गये। भरतजीको जाकर सन्देश सुनाया कि रामजी महाराज आ रहे हैं। हनुमान‍्जीने बड़ी चतुराईसे संक्षेपमें सारी बात कह दी।

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।

सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥

(मानस, उत्तरकाण्ड, दोहा २। ५)

पहले जब हनुमान‍्जी आये थे तो भरतजीका बाण लगा था, उस समय उन्होंने वहाँकी बात कही कि ‘युद्ध हो रहा है, लक्ष्मणजीको मूर्च्छा हो गयी है और सीताजीको रावण ले गया है।’ अब किसकी विजय हुई, क्या हुआ? इसका पता नहीं है? यह सब इतिहास जानना चाहते हैं भरतजी महाराज। तो थोड़ेमें सब इतिहास सुना दिया। ऐसे ‘अपने बश करि राखे रामू॥’ इनकी सेवासे रामजी अपने परिवारसहित वशमें हो गये। ऐसी कई कथाएँ आती हैं। हनुमान‍्जी महाराज सेवा बहुत करते थे। सेवा करनेवालेके वशमें सेवा लेनेवाला हो ही जाता है।

सेवा करनेवाला ऐसे तो छोटा कहलाता है और दास होकर ही सेवा करता है; परंतु सेवा करनेसे सेवक मालिक हो जाता है और सेवा लेनेवाला स्वामी उसका दास हो जाता है। स्वामीको सेवककी सब बात माननी पड़ती है। संसारमें रहनेकी यह बहुत विलक्षण विद्या है—सेवा करना ‘सेवाधर्म: परमगहनो योगिनामप्यगम्य:’ सेवक धर्म बड़ा कठोर है। भरतजी महाराज भी यही कहते हैं। ऐसे सेवा-धर्मको हनुमान‍्जी महाराजने निभाया।

वे रघुनाथजी महाराजकी खूब सेवा करते थे। जंगलमें तो सेवा करते ही थे, राजगद्दी होनेपर भी वहाँ हनुमान‍्जी महाराज सेवा करनेके लिये साथमें रह गये। एक बारकी बात है। लक्ष्मणजी और सीताजीके मनमें आया कि हनुमान‍्जीको कोई सेवा नहीं देनी है। देवर-भौजाईने आपसमें बात कर ली कि महाराजकी सब सेवा हम करेंगे। सीताजीने हनुमान‍्जीके सामने बात रखी कि ‘देखो बेटा! तुम सेवा करते हो ना! अब वह सेवा हम करेंगे। इस कारण तुम्हारे लिये कोई सेवा नहीं है।’ हनुमान‍्जी बोले, ‘माताजी! आठ पहर जो-जो सेवा आपलोग करोगे, उसमेंसे जो बचेगी, वह सेवा मैं करूँगा। इसलिये एक लिस्ट बना दो।’ बहुत अच्छी बात। अब कोई सेवा हनुमान‍्के लिये बची नहीं। हनुमान‍्जी महाराजको बहाना मिल गया। भगवान‍्को जब उबासी आवे तो चुटकी बजा देवें।

शास्त्रोंमें, स्मृतियोंमें ऐसा वचन आता है कि उबासी आनेपर शिष्यके लिये गुरुको भी चुटकी बजा देनी चाहिये। इसलिये रघुनाथजी महाराजको उबासी आते ही चुटकी बजा देते थे, यह सेवा हो गयी। अब वह उस कागजमें लिखी तो थी ही नहीं। चुटकी बजानेकी कौन-सी सेवा है! रात्रिके समय हनुमान‍्जीको बाहर भेज दिया। अब तो वे छज्जेपर बैठे-बैठे मुँहसे ‘सीताराम, सीताराम, सीताराम’ कीर्तन करते रहते और चुटकी भी बजाते रहते। न जाने कब भगवान‍्को उबासी आ जाय। अब चुटकी बजाने लगे तो रामजीको भी जँभाई आनी शुरू हो गयी। सीताजीने देखा कि बात क्या हो गयी? घबराकर कौशल्याजीसे कहा और सबको बुलाने लगी। वसिष्ठजीको बुलाया कि रामललाको आज क्या हो गया। वसिष्ठजीने पूछा, ‘हनुमान् कहाँ है?’ ‘उसको तो बाहर भेज दिया।’ ‘हनुमान‍्को तो बुलाओ।’ हनुमान‍्जीने आते ही ज्यों ही चुटकी बजाना बन्द कर दिया, त्यों ही भगवान‍्की जँभाई भी बन्द हो गयी। तब सीताजीने भी सेवा करनेकी खुली कर दी। इस प्रकार हृदयमें रामजीको वशमें कर लिया।

भरतजीने भी हनुमान‍्जीसे कह दिया ‘नाहिन तात उरिन मैं तोही।’ तुमने जो बात सुनायी, उससे उऋण नहीं हो सकता। ‘अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।’ अब भगवान‍्के चरित्र सुनाओ। खबर सुनानेमात्रसे तो आप पहले ही ऋणी हो गये। चरित्र सुनानेसे और अधिक ऋणी हो जाओगे। भरतजीने विचार किया कि जब कर्जा ले लिया तो कम क्यों लें? कर्जा तो ज्यादा हो जायगा, पर रामजीकी कथा तो सुन लें। हनुमान‍्जी महाराजको प्रसन्न करनेका उपाय भी यही है और उऋण होनेका उपाय भी यही है कि उनको रामजीकी कथा सुनाओ, चाहे उनसे सुन लो। रामजीकी चर्चासे वे खुश हो जाते हैं। इस प्रकार हनुमान‍्जीके सब वशमें हो गये।

अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ।

भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २६। ७)

अब जो आचरणोंसे, योनिसे, सब तरहसे बहुत नीच हैं, वे भी नामके प्रभावसे मुक्त हो गये। ऐसे भक्तोंके उदाहरण देते हैं। अजामिल ब्राह्मण घरमें जन्मा था, पर वेश्याके घरमें चला गया, ऐसे आचरणोंसे गिर गया था। गणिका तोतेको पढ़ाया करती। बोलो राधेकृष्ण! राधेकृष्ण! गोपीकृष्ण! वह कोई नाम-जप नहीं कर रही थी, पर साँपने काटा और मरी तो मुक्त हो गयी। हाथी—गजराज भी मुक्त हो गया। ये सब-के-सब भगवन्नामके प्रभावसे मुक्त हो गये। इस प्रकार ऊँचे-से-ऊँचे भगवान् शंकरसे लेकर पापी-से-पापी वेश्यातककी बात कह दी। इसका अर्थ हुआ कि भगवन्नाम लेनेके सब अधिकारी हैं। कोई भी अनधिकारी नहीं है। भक्ति करनेके सब अधिकारी हैं। शाण्डिल्य सूत्रमें आता है—‘आनिन्द्ययोन्यधिक्रियते पारम्पर्यात् सामान्यवत्’ निन्दनीय-से-निन्दनीय योनिवाला और निन्दनीय-से-निन्दनीय कर्म करनेवाला कोई हो, वह भी भगवान‍्के चरणोंकी शरण चला जाय तो उसके लिये भी मना नहीं है। कितनी विचित्र बात है! नामकी महिमा ऐसे कहते-कहते गोस्वामीजी महाराज मस्त हो जाते हैं।

कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई।

रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २६। ८)

नामके गुण गानेमें भगवान् राम स्वयं भी असमर्थ हैं, फिर दूसरेकी तो बात ही क्या है, क्योंकि नामकी महिमा अपार है। भगवान् सर्वसमर्थ हैं, साथ-साथ सर्वज्ञ भी हैं। नामकी अपार महिमा जानते हैं, पर कह नहीं सकते तो क्या इसमें रामजीकी निन्दा हो गयी! इसमें निन्दा नहीं है। यह नाम बड़ा है किनके लिये? हम सांसारिक लोगोंके लिये। रामजीसे और ब्रह्मसे भी बड़ा है। नामसे भगवान् प्रकट हो जायँ, तत्त्वज्ञान हो जाय, इस कारण हमारे लिये नाम बड़ा है। किसी धनी आदमीके बारेमें कहें कि उसके पास इतना धन है कि उसको खुदको भी पूरा पता नहीं है कि कितना है। इसमें उसकी निन्दा कैसे हुई? यह तो उसकी प्रशंसा ही हुई।

कलियुगमें नाम-महिमा

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।

जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २६)

कल्पतरुमें सब चीजें रहती हैं। उससे जो चाहो, मिल जाय। कलियुगमें मनचाहा पदार्थ देनेवाला ‘राम’ नामरूपी कल्पवृक्ष है और कल्याणका निवास-स्थान ‘राम’ नाम है। गोस्वामीजी महाराज कहते हैं कि इसके लिये मैं दूसरेकी क्या गवाही दूँ। भाँग पीनेसे नशा आ जाय, बुद्धि बावली हो जाय और माथा खराब हो जाय, ऐसा भाँगका प्रभाव होता है। मैं भाँगके समान था, पर नामका स्मरण करनेसे भाँगके समान मैं तुलसीदास तुलसी बन गया। तुलसी-दल बिना बढ़िया-से-बढ़िया चीजें भी ठाकुरजीके भोग नहीं लगती। इसलिये अब नामकी महिमा कहाँतक कहूँ, मैं खुद ही उदाहरण हूँ।

चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका।

भए नाम जपि जीव बिसोका॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २७। १)

केवल कलियुगकी बात नहीं है। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चारों ही युगोंमें और भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें तथा स्वर्ग, मृत्यु और पाताल तीनों ही लोकोंमें सब-के-सब जीव भगवान‍्का नाम लेकर सदाके लिये चिन्तारहित हो गये।

बेद पुरान संत मत एहू।

सकल सुकृत फल राम सनेहू॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २७। २)

विशेष ध्यान देनेकी बात है। वेद, पुराण और सन्त सबका इसमें एक मत है। क्या? ‘सकल सुकृत फल राम सनेहू॥’ रामजी और रामजीके नाममें स्नेह हो जाय तो सम्पूर्ण पुण्योंका फल मिल गया। मानो वे भाग्यशाली हैं, जो भगवान‍्का नाम लेते हैं। नाम-जपमें स्वत: रुचि हो गयी तो समझना चाहिये कि सम्पूर्ण पुण्योंने आकर एक साथ फल दे दिया। इसका रहस्य नाम लेनेवाले ही समझते हैं। साधारण आदमी समझ नहीं सकते। कलियुगमें विशेष क्या बात है? वह आगे कहते हैं—

ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें।

द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥

कलि केवल मल मूल मलीना।

पाप पयोनिधि जन मन मीना॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २७। ३-४)

सत्ययुगमें भगवान‍्का ध्यान लगाकर तल्लीन होनेसे परमात्माकी प्राप्ति होती थी। त्रेतायुगमें यज्ञ करनेसे और द्वापरयुगमें भगवान‍्का पूजन करनेसे प्राप्ति होती थी; परंतु ‘कलि केवल मल मूल मलीना’ अब ध्यान दो भाई! कलियुगमें क्या है? क्या बतावें? कलियुगमें पाप ही मूल हो गया है। मनुष्योंका मन पापरूपी समुद्रकी मछली बन गया है। मछलीको जैसे जलसे दूर करनेसे मुश्किल हो जाती है, वह तड़पने लगती है, ऐसे आज अगर कह दिया जाय कि झूठ, कपट, ब्लैक मत करो तो उनका मन व्याकुल हो जायगा। मनुष्योंका मन पापसे कभी अलग होना चाहता ही नहीं। उनसे ध्यान, यज्ञ और पूजन कुछ नहीं बन सकते।

नाम कामतरु काल कराला।

सुमिरत समन सकल जग जाला॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २७। ५)

कराल काल (कलियुग)-में नाम कल्पवृक्ष है। कल्पवृक्ष इसलिये बताया कि इस नामसे ध्यान, यज्ञ, पूजन आदि सब हो जायँगे। ‘नाम लिया उसने सब किया जोग जग्य आचार।’ एक जगह व्याख्यान हो रहा था तो एक बड़े अच्छे सन्त थे, उन्होंने कहा—‘नाम जपके सिवाय कलियुगमें दूसरा कुछ साधन नहीं हो सकता। इसमें ध्यानयोग, कर्मयोग, अष्टांगयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग कोई भी योग नहीं हो सकता। कलियुगमें केवल भगवान‍्का नाम ही लिया जा सकता है। इसलिये नाम-जप करना चाहिये।’ ऐसे उन्होंने नामकी महिमा कही। उसके बाद पासमें बैठे महात्माने अपने व्याख्यानमें कहा—‘बात बिलकुल ठीक है। नाम-जपके बिना कुछ नहीं हो सकता, पर नाम महाराजकी कृपासे ध्यान भी हो जायगा, यज्ञ भी हो जायगा, दान भी हो जायगा, पूजन भी हो जायगा, सब कुछ हो जायगा। नाम-जपसे अगर ये नहीं हुए तो नामकी महिमा ही क्या हुई?’

बड़े-बड़े साधन भी नाम महाराजकी कृपासे सुगम हो जायँगे। यज्ञ, दान, पूजन, ध्यान, भजन चाहे जो करो, नाम महाराजका सहारा लेकर करोगे तो सब तरहकी योग्यता आ जायगी। जगत् के जालको शान्त करनेवाला नाम महाराज है।

राम नाम कलि अभिमत दाता।

हित परलोक लोक पितु माता॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २७। ६)

इस कलियुगमें ‘राम’ नाम मनचाहा फल देनेवाला है। परलोकमें हित करनेवाला है अर्थात् भगवान‍्का परम धाम दिलानेवाला है और लोकमें माता-पिताके समान हित करता है। गोस्वामीजी महाराज कहते हैं—बालकका पालन-पोषण माँ-बापके समान कौन कर सकता है! पिताजी बाहरकी और माँ भीतरकी सब तरहसे रक्षा करती है।

भरोसो जाहि दूसरो सो करो।

मोको तो रामको नाम कलपतरु कलि कल्यान फरो॥ १॥

करम, उपासन, ग्यान, बेदमत, सो सब भाँति खरो।

मोहि तो ‘सावनके अंधहि’ ज्यों सूझत रंग हरो॥ २॥

चाटत रह्यो स्वान पातरि ज्यों कबहुँ न पेट भरो।

सो हौं सुमिरत नाम-सुधारस पेखत परुसि धरो॥ ३॥

स्वारथ औ परमारथ हू को नहि कुंजरो-नरो।

सुनियत सेतु पयोधि पषाननि करि कपि कटक-तरो॥ ४॥

प्रीति-प्रतीति जहाँ जाकी, तहँ ताको काज सरो।

मेरे तो माय-बाप दोउ आखर, हौं सिसु-अरनि अरो॥ ५॥

संकर साखि जो राखि कहौं कछु तौ जरि जीह गरो।

अपनो भलो राम-नामहि ते तुलसिहि समुझि परो॥ ६॥

(विनय-पत्रिका, पद २२६)

जिसे दूसरेका भरोसा हो, वह भले ही करे, पर मेरे तो यह ‘राम’ नाम ही कल्पवृक्ष है। अन्तमें कहते हैं—‘मेरे तो माय-बाप दोउ आखर’—मेरे तो माँ-बाप ये दोनों अक्षर ‘र’ और ‘म’ हैं। मैं तो इनके आगे बच्चेकी तरह अड़ रहा हूँ। यदि मैं कुछ भी छिपाकर कहता होऊँ तो भगवान् शंकर साक्षी हैं; मेरी जीभ जलकर या गलकर गिर जाय। गवाही देनेवालेसे कहा जाता है कि ‘सच्चा-सच्चा कहते हो न? तो गंगाजल उठाओ सिरपर!’ ऐसे भगवान् शंकर जो गंगाको हर समय सिरपर अपनी जटामें धारण किये हुए रहते हैं, उनकी साक्षीमें कहता हूँ। वे कहते हैं तुलसीदासको तो यही समझमें आया कि अपना कल्याण एक ‘राम’ नामसे ही हो सकता है। इस प्रकार ‘राम’ नाम लेनेसे लोक-परलोक दोनों सुधर जाते हैं। कितनी बढ़िया बात है!

नहिं कलि करम न भगति बिबेकू।

राम नाम अवलंबन एकू॥

कालनेमि कलि कपट निधानू।

नाम सुमति समरथ हनुमानू॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २७। ७-८)

वेदोंमें तीन काण्ड हैं—कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड। इसलिये कहते हैं कि कलियुगमें कर्मका भी सांगोपांग अनुष्ठान नहीं कर सकते, भक्तिका भी सांगोपांग अनुष्ठान नहीं कर सकते और ‘ग्यान पंथ कृपान कै धारा’ वह तो कड़ा है ही, कर ही नहीं सकते। तो कहते हैं एक ‘राम’ नाम ही अवलम्बन है उसके लिये।

यह कलियुग महाराज कालनेमि राक्षस है, कपटका खजाना है और नाम महाराज हनुमान‍्जी हैं। हनुमान‍्जी संजीवनी लेनेके लिये जा रहे थे। रास्तेमें प्यास लग गयी। मार्गमें कालनेमि तपस्वी बना हुआ बड़ी सुन्दर जगह आश्रम बनाकर बैठ गया। रावणने यह सुन लिया था कि हनुमान‍्जी संजीवनी लाने जा रहे हैं और संजीवनी सूर्योदयसे पहले दे देंगे तब तो लक्ष्मण जी जायगा और नहीं तो मर जायगा। इसलिये किसी तरहसे हनुमान‍्को रोकना चाहिये। कालनेमिने कहा कि ‘मैं रोक लूँगा।’ वह तपस्वी बनकर बैठ गया। हनुमान‍्जीने साधु देखकर उसे नमस्कार किया। ‘तुम कैसे आये हो?’ ‘महाराज! प्यास लग गयी।’ तो बाबाजी कमण्डलुका जल देने लगा। ‘इतने जलसे मेरी तृप्ति नहीं होगी।’ ‘अच्छा, जाओ, सरोवरमें पी आओ।’ वहाँ गये तो मकड़ीने पैर पकड़ लिया, उसका उद्धार किया। उसने सारी बात बतायी कि ‘महाराज! यह कालनेमि राक्षस है और आपको कपट करके ठगनेके लिये बैठा है।’ हनुमान‍्जी लौटकर आये तो वह बोला—‘लो भाई, आओ! दीक्षा दें तुम्हारेको।’ हनुमान‍्जीने कहा—‘महाराज, पहले गुरुदक्षिणा तो ले लीजिये।’ पूँछमें लपेटकर ऐसा पछाड़ा कि प्राणमुक्त कर दिये। कलियुग कपटका खजाना है। जो नाम महाराजका आश्रय ले लेता है, वह कपटमें नहीं आता।

राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।

जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २७)

‘राम’ नाम नृसिंहभगवान् है। कलियुग महाराज हिरण्यकशिपु है और ‘जापक जन’—भजन करनेवाले प्रह्लादके समान हैं। जैसे भगवान् नृसिंहने प्रह्लादकी हिरण्यकशिपुको मारकर रक्षा की थी, ऐसे भक्तोंकी रक्षा कलियुगसे नाम महाराज करते हैं। ‘जिमि पालिहि दलि सुरसाल।’ यह ‘राम’ नाम देवताओंके शत्रु राक्षसोंको (कलियुगको) मारकर भजन करनेवालोंकी रक्षा करनेवाला है।

भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।

नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥

सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा।

करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥

(मानस, बालकाण्ड, दोहा २८। १-२)

भावसे, कुभावसे, क्रोधसे या आलस्यसे, किसी तरहसे नाम जपनेसे दसों दिशाओंमें मंगल ही मंगल होता है। तुलसीदासजी महाराज कहते हैं—ऐसे जो नाम महाराज हैं, उनका स्मरण करके और रघुनाथजी महाराजको नमस्कार करके मैं रामजीके गुणोंका वर्णन करता हूँ। प्रकरण आरम्भ किया तो ‘बंदउँ नाम राम रघुबर को’ नाम-वन्दनासे आरम्भ किया और प्रकरणकी समाप्तिमें भी रामजीकी वन्दना करते हैं। नाम-वन्दना और नाम-महिमा करनेके बाद रामजीके गुण और रामचरितकी महिमा कहते हैं। अपनेको ऐसा नाम मिल गया, बड़ी मौजकी बात है। इसमें सबका अधिकार है।

जाट भजो गूजर भजो भावे भजो अहीर।

तुलसी रघुबर नाममें सब काहू का सीर॥

राम दड़ी चौड़े पड़ी सब कोई खेलो आय।

दावा नहीं सन्तदास जीते सो ले जाय॥

इसलिये नाम लेकर मालामाल हो जाओ, चलते-फिरते, उठते-बैठते हर समय राम राम राम राम.....।

कबिरा सब जग निर्धना धनवन्ता नहिं कोय।

धनवंता सोइ जानिये जाके राम नाम धन होय॥