अलौकिक प्रेम

शरत्पूर्णिमाकी चाँदनी रातमें जब भगवान‍् श्रीकृष्णने अपनी बाँसुरी बजानी आरम्भ की, तब उसकी मधुर एवं चित्ताकर्षक ध्वनिको सुनकर गोपियाँ जिस अवस्थामें थीं, उसी अवस्थामें श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये वेगपूर्वक चल पड़ीं। यह प्रेमकी ऐसी विलक्षण स्थिति थी कि स्वयं गोपियोंको ही पता नहीं था कि हम कौन हैं! कहाँ जा रही हैं! क्यों जा रही हैं! भगवान‍्का सब कुछ दिव्य है, अलौकिक है, चिन्मय है! अत: उनकी बाँसुरी भी दिव्य थी और उसकी ध्वनि भी। उस दिव्य ध्वनिको सुननेपर गोपियोंमें भी जडता नहीं रही और वे चिन्मय होकर चिन्मयसे मिलनेके लिये चल पड़ीं!

‘काम’ (लौकिक शृंगार)-में स्त्री और पुरुष दोनों ही एक-दूसरेसे सुख लेना चाहते हैं, एक-दूसरेको अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं। इसलिये उनमें विशेष सावधानी रहती है और वे अपने शरीरको सजाते हैं। परन्तु ‘प्रेम’ में सुख लेनेका, अपनी ओर खींचनेका किंचिन्मात्र भी भाव न होनेसे यह सावधानी नहीं रहती, प्रत्युत अपने शरीरकी भी विस्मृति हो जाती है, इसीलिये गोपियाँ अपनेको सजाना, शृंगार करना भूल गयीं और वंशीध्वनि सुनते ही वे जैसी थीं, वैसी ही अस्त-व्यस्त वस्त्रोंके साथ चल पड़ीं—‘व्यत्यस्तवस्त्राभरणा: काश्चित् कृष्णान्तिकं ययु:’ (श्रीमद्भा० १०। २९। ७)।

उस समय कुछ गोपियोंको उनके पति, पुत्र आदिने अथवा पिता, भाई आदिने घरमें ही बन्द कर दिया, जिससे उनको घरसे निकलनेका मार्ग नहीं मिला। मार्ग न मिलनेपर उन गोपियोंकी क्या दशा हुई—इस विषयमें श्रीशुकदेवजी महाराज कहते हैं—

दु:सहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभा:।

ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गला:॥

तमेव परमात्मानं जारबुद‍्ध्यापि सङ्गता:।

जहुर्गुणमयं देहं सद्य: प्रक्षीणबन्धना:॥

(श्रीमद्भा० १०।२९।१०-११)

‘उन गोपियोंके हृदयमें अपने परम प्रियतम श्रीकृष्णके असह्य विरहका जो तीव्र ताप हुआ, उससे उनका अशुभ जल गया और ध्यानमें आये हुए श्रीकृष्णका आलिंगन करनेसे जो सुख हुआ, उससे उनका मंगल नष्ट हो गया।’

‘यद्यपि उन गोपियोंकी श्रीकृष्णमें जारबुद्धि थी, फिर भी एकमात्र परमात्मा (श्रीकृष्ण)-के साथ सम्बन्ध होनेसे उनके सम्पूर्ण बन्धन तत्काल एवं सर्वथा नष्ट हो गये और उन्होंने अपने गुणमय शरीरका त्याग कर दिया।’

अगर उपर्युक्त श्लोकोंपर विचार करते हुए ऐसा मानें कि भगवान‍्के विरहकी तीव्र जलनसे गोपियोंके पाप नष्ट हो गये—‘धुताशुभा:’ तथा ध्यानजनित सुखसे पुण्य नष्ट हो गये—‘क्षीणमङ्गला:’ और इस प्रकार पाप-पुण्यसे रहित (मुक्त) होकर वे भगवान‍्से जा मिलीं तो यह बात युक्तिसंगत नहीं दीखती। कारण कि विरह और मिलन पाप-पुण्यसे ऊँचा उठनेपर ही होते हैं। पाप-पुण्यसे होनेवाले सुख-दु:ख तो प्राकृत हैं, पर भगवान‍्को लेकर होनेवाले सुख-दु:ख (मिलन-विरह) प्राकृत नहीं हैं, प्रत्युत अलौकिक हैं। भगवान‍्का विरह और मिलन तो गुणोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर होता है, पर पाप और पुण्य गुणोंके सम्बन्धसे होते हैं। गुणोंसे सम्बन्ध न हो तो पाप-पुण्य हो सकते ही नहीं। भगवान‍्के प्रेममें होनेवाले सुख-दु:खको अर्थात् मिलन-विरहको पाप-पुण्यका फल कहना वास्तवमें उसकी निन्दा है। भगवान‍्के सम्बन्धसे योग होता है, भोग नहीं होता। भोग तो पापोंका कारण है।*

एक विचारणीय बात है कि पाप और पुण्यका नाश सुखी-दु:खी होनेसे नहीं होता, प्रत्युत अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आनेसे होता है। सुखी-दु:खी होना पाप-पुण्यका फल नहीं है, प्रत्युत अज्ञता (मूर्खता)-का फल है। परन्तु भगवान‍्का विरह प्रेमका फल है। भगवान‍्से सम्बन्ध होनेपर अज्ञता कैसे रह सकती है! अज्ञता न ज्ञानमें रहती है, न प्रेममें। मनुष्य तभीतक सुखी-दु:खी होता है, जबतक उसको अपने स्वरूपका बोध नहीं होता अथवा उसका भगवान‍्में प्रेम नहीं होता।

पाप-पुण्य नष्ट होना कोई बड़ी बात नहीं है। पाप-पुण्य तो हरेक आदमीके नष्ट होते रहते हैं; क्योंकि अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति हरेक प्राणीके सामने आती-जाती रहती है। स्वर्गमें निरन्तर पुण्योंका नाश होता है और नरकोंमें निरन्तर पापोंका नाश होता है। पाप-पुण्य प्रकृतिजन्य गुणोंके अन्तर्गत हैं। अत: पाप-पुण्य दोनों एक ही जातिके (बन्धनकारक) हैं, अशुभ हैं, मलिन हैं, उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं। परन्तु भगवान‍्के सम्बन्धसे होनेवाले विरह तथा मिलन अत्यन्त दिव्य हैं, चिन्मय हैं, अलौकिक हैं, नित्य हैं और प्रेमकी वृद्धि करनेवाले हैं। भगवान‍्के सम्बन्धसे केवल पाप-पुण्य ही नष्ट नहीं होते, प्रत्युत पाप-पुण्यका कारण अज्ञान (गुणसंग) ही नष्ट हो जाता है। इसलिये पाप-पुण्यका और विरह-मिलनका विभाग ही अलग है।

तत्त्वज्ञान होनेपर ज्ञानी पुरुष परिस्थितिसे रहित नहीं होता, प्रत्युत सुख-दु:खसे रहित होता है। ज्ञानीके सामने भी प्रारब्धके अनुसार अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थिति आती-जाती रहती है, पर उसपर परिस्थितिका असर नहीं होता अर्थात् वह सुखी-दु:खी नहीं होता; क्योंकि वह गुणातीत है—‘समदु:खसुख: स्वस्थ:’ (गीता १४। २४)। अगर अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति सुख-दु:ख देनेवाली होती अर्थात् सुख-दु:ख पाप-पुण्यका फल होता तो मनुष्य कभी सुख-दु:खसे रहित नहीं हो पाता, जबकि ज्ञानी पुरुष सुख-दु:खसे रहित हो जाता है—‘द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:खसंज्ञै:’ (गीता १५। ५)। प्रह्लादजी, मीराबाई आदिके सामने कितनी ही प्रतिकूल परिस्थितियाँ आयीं, फिर भी वे दु:खी नहीं हुए। इसलिये परिस्थितिसे रहित होनेमें मनुष्य स्वतन्त्र नहीं है, पर उसका भोग न करनेमें अर्थात् सुखी-दु:खी न होनेमें मनुष्य सर्वथा स्वतन्त्र है। कारण कि परमात्माका अंश होनेसे उसमें निर्विकारता स्वत:सिद्ध है।*

अत: भागवतके उपर्युक्त श्लोकोंमें आये ‘धुताशुभा:’ पदका अर्थ पाप नष्ट होना और ‘क्षीणमङ्गला:’ पदका अर्थ पुण्य नष्ट होना नहीं लिया जा सकता। तो फिर इन पदोंका क्या तात्पर्य है? अब इसपर विचार किया जाता है।

भगवान‍्के विरहसे गोपियोंको जो ताप (दु:ख) हुआ, वह दु:सह और तीव्र था—‘दु:सहप्रेष्ठ विरहतीव्रताप।’ यह ताप संसारके तापसे अत्यन्त विलक्षण है। सांसारिक तापमें तो दु:ख-ही-दु:ख होता है, पर विरहके तापमें आनन्द-ही-आनन्द होता है। जैसे मिर्ची खानेसे मुखमें जलन होती है, आँखोंमें पानी आता है, फिर भी मनुष्य उसको खाना छोड़ता नहीं; क्योंकि उसको मिर्ची खानेमें एक रस मिलता है। ऐसे ही प्रेमी भक्तको विरहके तीव्र तापमें उससे भी अत्यन्त विलक्षण एक रस मिलता है। इसीलिये चैतन्य महाप्रभु-जैसे महापुरुषने भी विरहको ही सर्वश्रेष्ठ माना है। सांसारिक ताप तो पापोंके सम्बन्धसे होता है, पर विरहका ताप भगवत्प्रेमके सम्बन्धसे होता है। इसलिये विरहके तापमें भगवान‍्के साथ मानसिक सम्बन्ध रहनेसे आनन्दका अनुभव होता है—‘ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या’। जैसे प्यास वास्तवमें जलसे अलग नहीं है, ऐसे ही विरह भी वास्तवमें मिलनसे अलग नहीं है। जलका सम्बन्ध रहनेसे ही प्यास लगती है। प्यासमें जलकी स्मृति रहती है। अत: प्यास जलरूप ही हुई। इसी तरह विरह भी मिलनरूप ही है। विरह और मिलन—दोनों एक ही प्रेमकी दो अवस्थाएँ हैं। संसारके सम्बन्धमें सुख भी दु:खरूप है और दु:ख भी दु:खरूप है, पर भगवान‍्के सम्बन्धमें दु:ख (विरह) भी सुखरूप है और सुख (मिलन) भी सुखरूप (आनन्दरूप) है। कारण कि सांसारिक सुख-दु:ख (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तो गुणोंके संगसे होते हैं, पर भगवान‍्का विरह और मिलन गुणोंसे अतीत हैं। इसलिये भगवान‍्के सम्बन्धसे होनेवाला दु:ख (विरह) सांसारिक सुखसे भी बहुत अधिक आनन्द देनेवाला होता है! सांसारिक दु:खमें अभावरूप संसारका सम्बन्ध है, पर विरहके दु:खमें भावरूप भगवान‍्का सम्बन्ध है। सांसारिक दु:खमें कर्म अपना फल देकर नष्ट हो जाते हैं और कर्ताकी स्वतन्त्र सत्ता रह जाती है; परन्तु विरहके दु:खमें कर्मोंका कारण (गुणोंका संग) ही नष्ट हो जाता है और कर्ताकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, प्रत्युत केवल परमात्माकी सत्ता रहती है। सांसारिक दु:खसे जन्म-मरणरूप बन्धन नष्ट नहीं होता, पर विरहके दु:खसे यह बन्धन सर्वथा नष्ट हो जाता है—‘प्रक्षीणबन्धना:।’ इसलिये श्रीकृष्णके विरहके तीव्र तापसे गोपियोंका गुणमय शरीर छूट गया। इसके साथ मन-ही-मन श्रीकृष्णका मिलन होनेसे गोपियोंको ब्रह्मलोकके सुखसे भी विलक्षण सुखका अनुभव हुआ। कारण कि ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्ती होनेसे बन्धनकारक हैं—‘आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन’ (गीता ८। १६)। अत: ब्रह्मलोकका सुख भी प्राकृत है, जबकि गोपियोंको मिलनेवाला ध्यानजनित सुख प्रकृतिसे अतीत है। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान‍्के विरहके दु:खसे और ध्यानजनित मिलनके सुखसे गोपियोंके पाप-पुण्य ही नष्ट नहीं हुए, प्रत्युत जन्म-मरणका कारण जो गुणोंका संग है, वह भी नष्ट हो गया! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण—तीनों गुणोंका संग मिटनेसे उनका गुणमय शरीर भी छूट गया और वे भगवान‍्के पास जा पहुँचीं—‘जहुर्गुणमयं देहं सद्य: प्रक्षीणबन्धना:।’ कारण कि सत्त्व, रज और तम—तीनों ही गुण जीवको शरीरमें बाँधनेवाले हैं।*

इन गुणोंका संग ही ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है ‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)। गुणसंग नष्ट होनेके कारण गोपियाँ किसी ऊँची या नीची योनिमें नहीं गयीं, प्रत्युत सीधे भगवान‍्को ही प्राप्त हो गयीं। तात्पर्य है कि जिनसे कर्मबन्धन होता है, ऐसे शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे गोपियाँ मुक्त हो गयीं—‘शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै:’ (गीता ९।२८)। जिस बन्धनके रहते हुए नरकोंका दु:ख भोगा जाता है और जिस बन्धनके रहते हुए स्वर्ग, ब्रह्मलोक आदिका सुख भोगा जाता है, गोपियोंका वह बन्धन (गुणोंका संग) सर्वथा नष्ट हो गया। कारण कि बन्धन पाप-पुण्यसे नहीं होता, प्रत्युत गुणोंके संगसे होता है। अत: भागवतके उपर्युक्त श्लोकोंमें आये ‘धुताशुभा:’ पदका अर्थ हुआ कि रजोगुण तथा तमोगुण नष्ट हो गये और ‘क्षीणमङ्गला:’ पदका अर्थ हुआ कि सत्त्वगुण नष्ट हो गया।१ सत्त्वगुण प्रकाशक और अनामय है, इसलिये उसको यहाँ ‘मंगल’ नामसे कहा गया है।२

परन्तु प्रकाशक और अनामय होनेपर भी वह सुख और ज्ञानके संगसे बाँधनेवाला होता है—‘सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ’ (गीता १४। ६)। ध्यानमें आये हुए श्रीकृष्णका मन-ही-मन आलिंगन करनेसे गोपियोंको जो विलक्षण सुख हुआ, उस सुखसे सत्त्वगुणसे होनेवाले सुखसंग और ज्ञानसंगका भी सुख मिट गया अर्थात् सात्त्विक सुख और सात्त्विक ज्ञानकी भी आसक्ति मिट गयी! इस प्रकार जन्म-मरणका कारण जो तीनों गुणोंका संग है, वह सर्वथा नहीं रहा, जिसके न रहनेसे गोपियोंका गुणमय शरीर भी नहीं रहा।

तत्त्वज्ञान शरीरके सम्बन्ध (अहंता-ममता)-का नाश तो करता है, पर शरीरका नाश नहीं करता। कारण कि जीवन्मुक्त होनेपर संचित और क्रियमाण कर्म तो क्षीण हो जाते हैं, पर प्रारब्ध क्षीण नहीं होता। इसलिये जीवन्मुक्ति, तत्त्वज्ञान होनेपर भी जबतक प्रारब्धका वेग रहता है, तबतक शरीर भी रहता है। अगर शरीर तत्काल नष्ट हो जाय तो फिर ज्ञानका उपदेश कौन करेगा? ब्रह्मविद्याकी परम्परा कैसे चलेगी? परन्तु गोपियोंका विरहजन्य ताप इतना विलक्षण था कि उनका गुणसंग तो रहा ही नहीं, गुणमय शरीर भी नष्ट हो गया! उनके संचित, क्रियमाण और प्रारब्ध—तीनों एक साथ तत्काल (सद्य:) और सर्वथा क्षीण (प्रक्षीण) हो गये—‘सद्य: प्रक्षीणबन्धना:।’ इससे सिद्ध होता है कि ‘वियोग’ में बन्धन जल्दी छूटता है, पर ‘योग’ में देरी लगती है। वियोगमें योगसे भी विलक्षण आनन्द होता है।

विरहका तीव्र ताप जन्म-मरणके मूल कारण गुणसंग (मूल अज्ञान)-को ही जला देता है। जो गोपियाँ वंशीवादन सुनकर भगवान‍्के पास चली गयी थीं, उनका वह अनादिकालका गुणसंग नष्ट नहीं हुआ; क्योंकि उनको वियोगजन्य तीव्र ताप नहीं हुआ। परन्तु जिनको वियोगजन्य तीव्र ताप हुआ, उनके लिये अनादिकालके गुणसंगसहित सम्पूर्ण जगत‍्की निवृत्ति हो गयी और वे सबसे पहले भगवान‍्से जा मिलीं। विरहके तीव्र तापसे उनका शरीर छूट गया और ध्यानजनित आनन्दसे वे भगवान‍्से अभिन्न हो गयीं। वे भगवान‍्से बाहर न मिलकर भीतरसे ही मिल गयीं, जो कि वास्तविक (सर्वथा) मिलन है।

यद्यपि श्रीकृष्णके प्रति उन गोपियोंकी जारबुद्धि थी अर्थात् उनकी दृष्टि परमपति भगवान‍्के शरीरकी सुन्दरताकी तरफ थी तो भी वे भगवान‍्को प्राप्त हो गयीं—‘तमेव परमात्मानं जारबुद‍्ध्यापि सङ्गता:’। जारबुद्धि होनेपर भी गोपियोंमें अपने सुखकी इच्छा (काम) लेशमात्र भी नहीं है। अगर उनमें अपने सुखकी इच्छा होती तो वे अपने शरीरको सजाकर भगवान‍्के पास जातीं। यहाँ ‘जारबुद्धि’ शब्द इसलिये दिया है कि गोपियोंका विवाह तो दूसरेके साथ हुआ था, पर उनका प्रेम श्रीकृष्णमें था। उनका गुणमय शरीर ही नहीं रहा, फिर भोगबुद्धि कैसे रहेगी? भोगबुद्धिके रहनेका स्थान ही नहीं रहा, केवल परमात्मा ही रहे। गोपियोंमें यह विलक्षणता भगवान‍्की दिव्यातिदिव्य वस्तुशक्ति (स्वरूपशक्ति)-से आयी है, अपनी भावशक्तिसे नहीं। भगवान‍्की वस्तुशक्तिसे गोपियोंकी जारबुद्धि नष्ट हो गयी। जैसे अग्निसे सम्बन्ध होनेपर सभी वस्तुएँ (अग्निकी वस्तुशक्तिसे) अग्निरूप ही हो जाती हैं, ऐसे ही भक्त भगवान‍्के साथ काम, द्वेष, भय, स्नेह आदि किसी भी भावसे सम्बन्ध जोड़े, वह (भगवान‍्की वस्तुशक्तिसे) भगवत्स्वरूप ही हो जाता है।*

इसमें भक्तका भाव, उसका प्रयास काम नहीं करता, प्रत्युत भगवान‍्की दिव्यातिदिव्य स्वरूपशक्ति काम करती है। इसका कारण यह है कि भगवान‍् जीवके कल्याणके लिये ही प्रकट होते हैं—‘नृणां नि:श्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप’ (श्रीमद्भा० १०। २९। १४)।

गीतामें भगवान‍्के चार प्रकारके भक्त बताये गये हैं—अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी (प्रेमी)*।

यद्यपि अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासुका गुणोंके साथ सम्बन्ध रहता है, तथापि मुख्य सम्बन्ध भगवान‍्के साथ रहनेके कारण वे भी तीनों गुणोंसे रहित हो जाते हैं। इसलिये जिस-किसी उपायसे जीवका भगवान‍्के साथ सम्बन्ध जुड़ना चाहिये—‘तस्मात् केनाप्युपायेन मन: कृष्णे निवेशयेत्’ (श्रीमद्भा० ७। १। ३१); क्योंकि जीव भगवान‍्का ही अंश है। भगवान‍्का सम्बन्ध मुख्य रहनेसे भोगोंका सम्बन्ध मिट जाता है, पर भोगोंका सम्बन्ध मुख्य रहनेसे भगवान‍्का सम्बन्ध छिप जाता है, मिटता नहीं। कारण कि जीवका भगवान‍्के साथ नित्ययोग है।

भगवान‍् श्रीकृष्णका एक नाम आता है—‘चोरजारशिखामणि:।’ इसका अर्थ है कि भगवान‍्के समान चोर और जार दूसरा कोई है ही नहीं, हो सकता ही नहीं। दूसरे चोर और जार तो केवल अपना ही सुख चाहते हैं, पर भगवान‍् केवल दूसरेके सुखके लिये चोर और जारकी लीला करते हैं। उनकी ये दोनों ही लीलाएँ दिव्य, विलक्षण, अलौकिक हैं—‘जन्म कर्म च मे दिव्यम्’ (गीता ४। ९)।*

संसारी चोर तो केवल वस्तुओंकी ही चोरी करते हैं, पर भगवान‍् वस्तुओंके साथ-साथ उन वस्तुओंके राग, आसक्ति, प्रियता आदिको भी चुरा लेते हैं। भगवान‍्ने गोपियोंके मक्खनके साथ-साथ उनके रागरूप बन्धनको भी खा लिया था। वे जार बनते हैं तो सुखके भोक्ताके साथ-साथ सुखासक्ति, सुखबुद्धिका भी हरण कर लेते हैं, जिससे सम्बन्धजन्य आकर्षण (काम) न रहकर केवल भगवान‍्का आकर्षण (विशुद्ध प्रेम) रह जाता है, अन्यकी सत्ता न रहकर केवल भगवान‍्की सत्ता रह जाती है। तात्पर्य है कि भगवान‍् अपने भक्तोंमें किसीको चोर और जार रहने ही नहीं देते, उनके चोर-जारपनेको ही हर लेते हैं। ‘कनक’ (धन) और ‘कामिनी’ (स्त्री)-की आसक्तिसे ही मनुष्य ‘चोर’ और ‘जार’ होता है। अत: कनक-कामिनीकी आसक्तिका सर्वथा अभाव करनेवाले होनेसे भगवान‍् चोर और जारके भी शिखामणि हैं।

यहाँ शंका हो सकती है कि जिन गोपियोंका गुणमय शरीर नहीं रहा, उनकी भगवान‍्के साथ रासलीला कैसे हुई? इसका समाधान है कि वास्तवमें रासलीला गुणोंसे अतीत (निर्गुण) होनेपर ही होती है। गुणोंके रहते हुए भगवान‍्के साथ जो सम्बन्ध होता है, उसकी अपेक्षा गुणोंसे रहित होकर भगवान‍्के साथ होनेवाला सम्बन्ध अत्यन्त विलक्षण है। दास्य, सख्य, वात्सल्य, माधुर्य आदि भाव भी वास्तवमें गुणातीत (मुक्त) होनेपर ही होते हैं।*

एक श्लोक आता है—

द्वैतं मोहाय बोधात्प्राग्जाते बोधे मनीषया।

भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥

(बोधसार, भक्ति० ४२)

‘तत्त्वबोधसे पहलेका द्वैत तो मोहमें डालता है, पर बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर होता है।’

भगवान‍्को विलक्षण आनन्द देनेवाला जो प्रेम है, वह गुणोंमें नहीं है, प्रत्युत निर्गुणमें है। कारण कि गुणातीत भगवान‍् भी जिस प्रेमके लोभी हैं, वह प्रेम गुणमय कैसे हो सकता है? जैसे भगवान‍्का शरीर दिव्य है, गुणमय नहीं है, ऐसे ही उन गोपियोंका शरीर भी दिव्य हो गया, गुणमय नहीं रहा। सगुण भगवान‍् भी सत्त्व-रज-तम-गुणोंसे युक्त नहीं हैं, प्रत्युत ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि दिव्य गुणोंसे युक्त हैं। इसलिये सगुण भगवान‍्की भक्तिको भी निर्गुण (सत्त्वादि गुणोंसे रहित) बताया गया है; जैसे—‘मन्निकेतं तु निर्गुणम्’ (श्रीमद्भा० ११। २५। २५), ‘मत्सेवायां तु निर्गुणा’ (श्रीमद्भा० ११। २५। २७) आदि। भगवान‍्की भक्ति करनेसे मनुष्य गुणातीत हो जाता है।*

तात्पर्य यह है कि भगवान‍्से सम्बन्ध होनेपर सत्त्व, रज और तमोगुण रहते ही नहीं। अत: रासलीलामें जो शरीर थे, वे हमारे शरीर-जैसे गुणोंवाले नहीं थे, प्रत्युत भगवान‍्के शरीर-जैसे तीनों गुणोंसे रहित अर्थात् दिव्यातिदिव्य थे। उस रासलीलामें जितनी भी गोपियाँ गयी थीं, वे सब-की-सब भगवान‍्की इच्छासे दिव्य भावमय शरीर धारण करके ही गयी थीं। इसीलिये उन गोपियोंके गुणमय शरीरोंको उनके पतियोंने अपने पास (घरमें ही) सोते हुए देखा—‘मन्यमाना: स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकस:’ (श्रीमद्भा० १०। ३३। ३८)।

तात्पर्य यह निकला कि जिन गोपियोंको विरहजन्य तीव्र ताप नहीं हुआ, उनके गुणमय शरीर तो पतिके पास रहे, पर (जीवन्मुक्तकी तरह) उन शरीरोंके साथ सम्बन्ध नहीं रहा, केवल शरीरका भान रहा। परन्तु जिन गोपियोंको विरहजन्य तीव्र ताप हुआ, उनके गुणमय शरीर और उनका भान ही नहीं रहा, फिर उन शरीरोंके साथ सम्बन्ध होनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता; क्योंकि उनका अनादिकालका गुणसंग ही नहीं रहा, जो कि जन्म-मरणका मूल कारण है।