मानवशरीरका सदुपयोग
मानवशरीरकी जो महिमा है, वह आकृतिको लेकर नहीं है, प्रत्युत विवेकको लेकर ही है। सत् और असत् , जड़ और चेतन, सार और असार, कर्तव्य और अकर्तव्य—ऐसी जो दो-दो चीजें हैं, उनको अलग-अलग समझनेका नाम ‘विवेक’ है। यह विवेक परमात्माका दिया हुआ और अनादि है। इसलिये यह पैदा नहीं होता, प्रत्युत जाग्रत् होता है। सत्संगसे यह विवेक जाग्रत् और पुष्ट होता है। सत्संगमें भी खूब ध्यान देनेसे, गहरा विचार करनेसे ही विवेक जाग्रत् होता है, साधारण ध्यान देनेसे नहीं होता। आजकल प्राय: यह देखनेमें आता है कि सत्संग करनेवाले, सत्संग करानेवाले, व्याख्यान देनेवाले भी गहरी पारमार्थिक बातोंको समझते नहीं। वे जड़-चेतनके विभागको ठीक तरहसे जानते ही नहीं। थोड़ी जानकारी होनेपर व्याख्यान देने लग जाते हैं। जिनका विवेक जाग्रत् हो जाता है, उनमें बहुत विलक्षणता, अलौकिकता आ जाती है।
साधकको सबसे पहले शरीर (जड़) और शरीरी (चेतन)-का विभाग समझना चाहिये। शरीर और अशरीरीसे आरम्भ करके संसार और परमात्मातक विवेक होना चाहिये। शरीर और शरीरीका विवेक मनुष्यके सिवाय और जगह नहीं है। देवताओंमें विवेक तो है, पर भोगोंमें लिप्त होनेके कारण वह विवेक काम नहीं करता।
शरीर और शरीरीके विभागको जाननेवाले मनुष्य बहुत कम हैं। इसलिये सत्संगके द्वारा इस विभागको जाननेकी खास जरूरत है। शरीर जड़ है और स्वयं (आत्मा) चेतन है। स्वयं परमात्माका अंश है और शरीर प्रकृतिका अंश है। चेतन अलग है और जड़ अलग है। मुक्ति चेतनकी होगी, जड़की नहीं; क्योंकि बन्धन चेतनने स्वीकार किया है। जड़ तो हरदम बदल रहा है और नाशकी तरफ जा रहा है। हमारी जितनी उम्र बीत गयी है, उतने दिन तो हम मर ही गये हैं। ‘मरना’ शब्द भले ही खराब लगे, पर बात सच्ची है। जन्मके समय जीनेके जितने दिन बाकी थे, उतने दिन अब बाकी नहीं रहे। जितने दिन बीत गये, उतने दिन तो मर गये, अब कितने दिन बाकी हैं, इसका पता नहीं है। जीवनका जो समय चला गया, नष्ट हो गया, वह जड़-विभागमें हुआ है, चेतन-विभागमें नहीं। चेतन-विभागमें मृत्यु नहीं है। उसकी कोई उम्र नहीं है। वह अमर है। शरीर मरता है, आत्मा नहीं मरता। इस प्रकार आरम्भसे ही जड़-चेतनके विभागको समझ लेना चाहिये। जो चेतन-विभाग है, वह परमात्माका है और जो जड़-विभाग है, वह प्रकृतिका है। गीतामें आया है—
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यानादी उभावपि।
(१३। १९)
प्रकृति और पुरुष—दोनों अनादि तो हैं, पर दोनोंमें पुरुष (चेतन) अनादि तथा अनन्त है, और प्रकृति अनादि तथा सान्त है। कई विद्वान् प्रकृतिको भी अनन्त मानते हैं, पर यह दार्शनिक मतभेद है। यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि जो अपनेको भी नहीं जानता और दूसरेको भी नहीं जानता, उसका नाम ‘जड़’ है। जो अपनेको भी जानता है और दूसरेको भी जानता है, उसका नाम ‘चेतन’ है। जाननेकी शक्ति चेतनता है। यह शक्ति जड़में नहीं है।
मन-बुद्धि चेतनमें दीखते हैं, पर हैं ये जड़ ही। ये चेतनके प्रकाशसे प्रकाशित होते हैं। हम (स्वयं) शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको जाननेवाले हैं। इन्द्रियोंके दो विभाग हैं—कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ। कर्मेन्द्रियाँ तो सर्वथा जड़ हैं और ज्ञानेन्द्रियोंमें चेतनका आभास है। उस आभासको लेकर ही श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना और घ्राण—ये पाँचों इन्द्रियाँ ‘ज्ञानेन्द्रियाँ’ कहलाती हैं। ज्ञानेन्द्रियोंको लेकर जीवात्मा विषयोंका सेवन करता है—
श्रोत्रं चक्षु: स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥
(गीता १५। ९)
ज्ञानेन्द्रियोंमें और अन्त:करणमें जो ज्ञान दीखता है, वह उनका खुदका नहीं है, प्रत्युत चेतनके द्वारा आया हुआ है। खुद तो वे जड़ ही हैं। जैसे दर्पणको सूर्यके सामने कर दिया जाय तो सूर्यका प्रकाश दर्पणमें आ जाता है। उस प्रकाशको अँधेरी कोठरीमें डाला जाय तो वहाँ प्रकाश हो जाता है। वह प्रकाश मूलमें सूर्यका है, दर्पणका नहीं। ऐसे ही इन्द्रियोंमें और अन्त:करणमें चेतनसे प्रकाश आता है। चेतनके प्रकाशसे प्रकाशित होनेपर भी इन्द्रियाँ और अन्त:करण जड़ हैं। हम स्वयं चेतन हैं और परमात्माके अंश हैं। गीतामें भगवान् कहते हैं—‘ममैवांशो जीवलोके’ (१५। ७)। जैसे शरीर माँ और बाप दोनोंसे बना हुआ है, ऐसे स्वयं प्रकृति और परमात्मा दोनोंसे बना हुआ नहीं है। यह केवल परमात्माका ही अंश है। भगवान्ने कहा है—
मम योनिर्महद्बु्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्।
(गीता १४। ३)
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता॥
(गीता १४। ४)
अर्थात् प्रकृति माता है और मैं उसमें बीज-स्थापन करनेवाला पिता हूँ, जिससे सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं। अत: प्राणियोंमें प्रकृतिका अंश भी है और परमात्माका भी। परन्तु जो जीवात्मा है, उसमें केवल परमात्माका ही अंश है—‘ममैवांश:’ (मम एव अंश:)। देवता, भूत-प्रेत, पिशाच आदि जितने भी शरीर हैं, उन सबमें जड़ और चेतन—दोनों रहते हैं। देवताओंके शरीरमें तैजस-तत्त्वकी प्रधानता है, भूत-प्रेतोंके शरीरमें वायु-तत्त्वकी प्रधानता है, मनुष्योंके शरीरमें पृथ्वी-तत्त्वकी प्रधानता है, आदि। भिन्न-भिन्न शरीरोंमें भिन्न-भिन्न तत्त्वकी प्रधानता रहती है। यद्यपि सभी शरीरोंमें मुख्यता चेतनकी ही है, पर वह शरीरमें मैं-मेरापन करके उसीको मुख्य मान लेता है। जड़ शरीरकी मुख्यता मानना ही जन्म-मरणका कारण है—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)। गुणोंका संग होनेसे ही जीवकी तीन गतियाँ होती हैं। जो सत्त्वगुणमें स्थित होते हैं, वे ऊर्ध्वगतिमें जाते हैं। जो रजोगुणमें स्थित होते हैं, वे मध्यलोकमें जाते हैं। जो तमोगुणमें स्थित होते हैं, वे अधोगतिमें जाते हैं—
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा:।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा:॥
(गीता 14। 18)
इस प्रकार जड़-चेतनके विभागको ठीक तरहसे समझना चाहिये। जड़-अंश (शरीर) छूट जाता है, हम रह जाते हैं। जबतक मुक्ति नहीं होती, तबतक जड़ता साथमें रहती है। इसलिये एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जानेपर स्थूलशरीर तो छूट जाता है, पर सूक्ष्म और कारणशरीर साथमें रहते हैं। मुक्ति होनेपर केवल चेतनता रहती है, जड़ता साथमें नहीं रहती अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर साथमें नहीं रहते। परन्तु इसमें एक बहुत सूक्ष्म बात है कि मुक्ति होनेपर भी जड़ताका संस्कार रहता है। वह संस्कार जन्म-मरण देनेवाला तो नहीं होता, पर मतभेद करनेवाला होता है। जैसे द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत और अचिन्त्यभेदाभेद—ये पाँच मुख्य मतभेद हैं, जो शैव और वैष्णव आचार्योंमें रहते हैं। जबतक मतभेद है, तबतक जड़ताका संस्कार है। परन्तु मुक्तिके बाद जब भक्ति होती है, तब जड़ताका यह सूक्ष्म संस्कार भी मिट जाता है। भगवान्के प्रेमी भक्तोंमें जड़ता सर्वथा नहीं रहती, केवल चेतनता रहती है। जैसे, राधाजी सर्वथा चिन्मय हैं।
मनुष्योंके कल्याणके लिये तीन योग बताये गये हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग*।
कर्मयोग जड़को लेकर चलता है, ज्ञानयोग चेतनको लेकर चलता है और भक्तियोग भगवान्को लेकर चलता है। कर्मयोग तथा ज्ञानयोग तो लौकिक साधन हैं—‘लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा’ (गीता ३।३), पर भक्तियोग अलौकिक निष्ठा है। कारण कि जगत् (क्षर) तथा जीव (अक्षर)—दोनों लौकिक हैं—‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ (गीता १५। १६)। परन्तु भगवान् क्षर और अक्षर दोनोंसे विलक्षण अर्थात् अलौकिक हैं—‘उत्तम: पुरुषस्त्वन्य:’ (गीता १५। १७)। जिसकी संसारमें ही आसक्ति है, जो संसारको मुख्य मानते हैं, जिनका आत्माकी तरफ इतना विचार नहीं है, पर जो अपना कल्याण चाहते हैं, उनके लिये कर्मयोग मुख्य है। अपने-अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार निष्कामभावसे अर्थात् केवल दूसरोंके हितके लिये कर्तव्य-कर्म करना कर्मयोग है। सकामभावमें जड़ता आती है, पर निष्कामभावमें चेतनता रहती है। निष्कामभाव होनेके कारण कर्मयोगी जड़-अंशसे ऊँचा उठ जाता है। अगर निष्कामभाव नहीं हो कर्म होंगे, कर्मयोग नहीं होगा। कर्मोंसे मनुष्य बँधता है—‘कर्मणा बध्यते जन्तु:’।
निष्कामभाव होनेसे मनुष्यमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वोंका नाश हो जाता है और समता आ जाती है। समता आनेसे योग हो जाता है; क्योंकि योग नाम समताका ही है—‘समत्वं योग उच्यते’ (गीता २। ४८)। निष्कामभाव आनेसे चेतनताकी मुख्यता और जड़ताकी गौणता हो जाती है। मनुष्यमें जितना-जितना निष्कामभाव आता है, उतना-उतना वह संसारसे ऊँचा उठता है और जितना-जितना सकामभाव आता है, उतना-उतना वह संसारमें बँधता है।
गीतामें आया है—
इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्बु्रह्मणि ते स्थिता:॥
(५। १९)
जिनका मन साम्यावस्थामें स्थित हो गया, उन लोगोंने संसारको जीत लिया अर्थात् वे जन्म-मरणसे ऊँचे उठ गये। ब्रह्म निर्दोष और सम है और उनका अन्त:करण भी निर्दोष और सम हो गया, इसलिये वे ब्रह्ममें ही स्थित हो गये। वास्तवमें परमात्मामें स्थिति सबकी है; क्योंकि परमात्मा सर्वव्यापक हैं। एक सुईकी नोक-जितनी जगह भी परमात्मासे खाली नहीं है। परमात्मा सब जगह समानरूपसे परिपूर्ण हैं। परन्तु परमात्मामें स्थित होते हुए भी संसारमें राग-द्वेषके कारण मनुष्य परमात्मामें स्थित नहीं हैं, प्रत्युत संसारमें स्थित हैं। वे परमात्मामें स्थित तभी होंगे, जब उनके मनमें राग-द्वेष मिट जायँगे। जबतक मनमें राग-द्वेष रहेंगे, तबतक भले ही चारों वेद और छ: शास्त्र पढ़ लो, पर मुक्ति नहीं होगी। राग-द्वेषको हटानेके लिये क्या करें? इसके लिये भगवान् कहते हैं—
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥
(गीता ३। ३४)
‘इन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें (प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें) मनुष्यके राग-द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमें विघ्न डालनेवाले) शत्रु हैं।’
अनुकूलताको लेकर राग और प्रतिकूलताको लेकर द्वेष होता है। साधकको चाहिये कि वह इनके वशीभूत न हो। वशीभूत होनेसे राग-द्वेष बढ़ते हैं। जबतक राग-द्वेष हैं, तबतक जन्म-मरण है। राग-द्वेषसे ऊँचा उठनेपर मुक्ति होती है और परमात्मामें प्रेम होनेपर भक्ति होती है। पहले कर्मयोग और ज्ञानयोग करके भी भक्ति कर सकते हैं और आरम्भसे भी भक्ति कर सकते हैं।
कर्मयोग और ज्ञानयोग—ये दोनों साधन हैं और भक्तियोग साध्य है। कई व्यक्ति ऐसा नहीं मानते, प्रत्युत कर्मयोग तथा भक्तियोगको साधन और ज्ञानयोगको साध्य मानते हैं। परन्तु गीता भक्तियोगको ही साध्य मानती है। गीताके अनुसार कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों निष्ठाएँ समकक्ष हैं, पर भक्ति दोनोंसे विलक्षण है।
कर्मयोगमें दो बातें हैं—कर्म और योग। ऐसे ही ज्ञानयोगमें भी दो बातें हैं—ज्ञान और योग। परन्तु भक्तियोगमें दो बातें नहीं होतीं। हाँ, भक्तियोगके प्रकार दो हैं—साधन-भक्ति और साध्य-भक्ति।
श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥
(श्रीमद्भा० ७। ५। २३)
—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—यह नौ प्रकारकी साधन-भक्ति है और प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमाभक्ति साध्य-भक्ति है—‘मद्भक्तिं लभते पराम्’ (गीता १८। ५४)। इसलिये श्रीमद्भागवतमें आया है—‘भक्त्या सञ्जातया भक्त्या’ (११। ३। ३१) ‘भक्तिसे भक्ति पैदा होती है’ अर्थात् साधनभक्तिसे साध्यभक्तिकी प्राप्ति होती है। इस तरह साधक चाहे तो आरम्भसे ही भक्ति कर सकता है। भक्तिका आरम्भ कब होता है? जब भगवान् प्यारे लगते हैं, भगवान्में मन खिंच जाता है। संसारके भोग और रुपये प्यारे लगते हैं—यह सांसारिक (बन्धनमें पड़े हुए) आदमीकी पहचान है। भगवान् प्यारे लगते हैं—यह भक्तकी पहचान है। इसलिये जब रुपये और पदार्थ अच्छे नहीं लगेंगे, इनसे चित्त हट जायगा और भगवान्में लग जायगा, तब भक्ति आरम्भ हो जायगी। जबतक भोगोंमें और रुपयोंमें आकर्षण है, तबतक ज्ञानकी बड़ी ऊँची-ऊँची बातें कर लो, बन्धन ज्यों-का-त्यों रहेगा। जैसे गीध बहुत ऊँचा उड़ता है, पर उसकी दृष्टि मुर्देपर रहती है। मांस देखते ही उसकी ऊँची उड़ान खत्म हो जाती है और वह वहीं नीचे गिर पड़ता है। ऐसे ही बड़ी ऊँची-ऊँची बातें करनेवाले, व्याख्यान देनेवाले रुपयोंको और भोगोंको देखते ही उनपर गिर पड़ते हैं! जैसे गीधको सड़े-गले एवं दुर्गन्धित मांसमें ही रस (आनन्द) आता है, ऐसे ही उनको रुपयोंमें और भोगोंमें ही रस आता है। इसलिये गीताने कहा है—
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते॥
(२। ४४)
‘उस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीसे जिसका अन्त:करण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें एक निश्चयवाली बुद्धि नहीं होती।’
जो मान, आदर, बड़ाई, रुपये, भोग आदिमें ही रचे-पचे हैं, वे मुक्त नहीं हो सकते। मुक्त अर्थात् बन्धनसे रहित तभी हो सकते हैं, जब इनसे ऊँचे उठेंगे। ‘भोगैश्वर्य’ का अर्थ है—भोग भोगना और भोग-सामग्री (रुपये, सोना-चाँदी, जमीन, मकान आदि)-का संग्रह करना। इन दोनोंमें लगे हुए मनुष्य परमात्मप्राप्ति करना तो दूर रहा, ‘हमें परमात्माको प्राप्त करना है’—ऐसा निश्चय भी नहीं कर सकते। सत्संग करनेवालोंका अनुभव है कि भोग और संग्रहकी आसक्ति कम होती है और मिटती है। जैसे, हमारी वृत्तिमें क्रोध ज्यादा था। अत: थोड़ी-सी बातमें क्रोध आ जाता था, बड़े जोरसे आता था और काफी देरतक रहता था। परन्तु सत्संग करते-करते वह क्रोध कम होता है, थोड़ी-सी बातमें नहीं आता, जोरसे नहीं आता और कम देर ठहरता है। जब छोटी-छोटी कई बातें इकट्ठी हो जाती हैं, तब सहसा किसी बातपर जोरसे क्रोधका भभका आता है। परन्तु सत्संग करते-करते वह भी मिट जाता है। क्रोधका स्वरूप है कि जिसपर क्रोध आता है, उसका अनिष्ट चाहता है। सत्संग करते-करते किसीका अनिष्ट करनेकी चाहना मिट जाती है। सत्संग करनेवालेको कभी क्रोध आ जाय तो उसमें होश रहता है और वह नरक देनेवाला नहीं होता। काम, क्रोध और लोभ—ये तीनों नरकोंके दरवाजे हैं।*
इनमें फँसे हुए मनुष्य सीधे नरकोंमें जाते हैं। उनको नरकोंमें जानेसे कोई अटकानेवाला नहीं है। परन्तु सत्संग करनेवालोंमें काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दोष कम हो जाते हैं। वह काम-क्रोधादिके वशीभूत नहीं होता। वह अन्यायपूर्वक, झूठ, कपट, जालसाजी, बेईमानीसे धन इकट्ठा नहीं करता। वह उतना ही लेता है, जितनेपर उसका हक लगता है। पराये हककी चीज नहीं लेता। काम-क्रोधादिके वशीभूत होनेसे अन्याय-मार्गमें प्रवेश हो जाता है, जिसके फलस्वरूप नरकोंकी प्राप्ति होती है। परन्तु सत्संग करनेसे ये काम-क्रोधादि दोष क्रमश: पत्थर, बालू, जल और आकाशकी लकीरकी तरह कम होते-होते मिट जाते हैं। पत्थरपर जो लकीर पड़ जाती है, वह कभी मिटती नहीं। बालूकी लकीर जब हवा चलती है, तब बालूसे ढककर मिट जाती है। जलपर लकीर खिंचती हुई तो दीखती है, पर जलपर लकीर बनती नहीं। परन्तु आकाशमें लकीर खींचें तो केवल अँगुली ही दीखती है, लकीर बनती ही नहीं। इस प्रकार जब काम-क्रोधादि दोष किंचिन्मात्र भी नहीं रहते, तब बन्धन मिट जाता है और परमात्मामें स्थिति हो जाती है।
इस प्रकार सत्संग करनेसे दोष कम होते हैं। अगर दोष कम नहीं होते तो असली सत्संग नहीं मिला है। भगवान्की कथा तो किसीसे भी सुनें, सुननेसे लाभ होता है। अगर कथा कहनेवाला प्रेमी भक्त हो तो बहुत विलक्षणता आती है। परन्तु तात्त्विक विवेचन जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुषसे सुननेपर ही लाभ होता है। जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ सन्त-महात्माओंके संगसे बहुत विलक्षण एवं ठोस लाभ होता है। प्रेमी भक्तके विषयमें आया है—
वाग् गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं
रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च
मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥
(श्रीमद्भा० ११। १४। २४)
‘जिसकी वाणी मेरे नाम, गुण और लीलाका वर्णन करती-करती गद्गद हो जाती है, जिसका चित्त मेरे रूप, गुण, प्रभाव और लीलाओंको याद करते-करते द्रवित हो जाता है, जो बार-बार रोता रहता है, कभी-कभी हँसने लग जाता है, कभी लज्जा छोड़कर ऊँचे स्वरसे गाने लगता है, तो कभी नाचने लग जाता है, ऐसा मेरा भक्त सारे संसारको पवित्र कर देता है।’
य: सेवते मामगुणं गुणात्परं
हृदा कदा वा यदि वा गुणात्मकम्।
सोऽहं स्वपादाञ्चितरेणुभि: स्पृशन्
पुनाति लोकत्रितयं यथा रवि:॥
(अध्यात्म० उत्तर० ५। ६१)
‘चाहे मेरे निर्गुण स्वरूपका चित्तसे उपासना करनेवाला हो अथवा मायिक गुणोंसे अतीत मेरे सगुण स्वरूपकी सेवा-अर्चना करनेवाला हो, वह भक्त मेरा ही स्वरूप है। वह सूर्यकी भाँति विचरण करता हुआ अपनी चरण-रजके स्पर्शसे तीनों लोकोंको पवित्र कर देता है।’
तात्पर्य है कि चाहे भक्त हो या ज्ञानी, उसके चरणोंके स्पर्शसे पृथ्वी पवित्र हो जाती है। जैसे सूर्य जहाँ जाता है, वहाँ प्रकाश हो जाता है, ऐसे ही वह महात्मा जहाँ जाता है, वहाँ ज्ञानका प्रकाश हो जाता है, आनन्द हो जाता है। कारण कि उसके भीतर राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि बिलकुल नहीं होते। इसलिये हमारी यही चेष्टा होनी चाहिये कि राग-द्वेष, काम-क्रोध आदिसे पिण्ड छूट जाय। हमारे हृदयमें राग-द्वेषादि विकार न रहें। जबतक ये कम न हों, तबतक समझे कि असली सत्संग मिला नहीं है। जबतक मनुष्यमें गुण-अवगुण दोनों रहते हैं, तबतक वह साधक नहीं होता। साधक तभी होता है, जब अवगुण मिट जाते हैं। दूसरा उसके साथ वैर करे तो भी उसके हृदयमें वैर नहीं होता, उलटे हँसी आती है, प्रसन्नता होती है। वह अनिष्ट-से-अनिष्ट चाहनेवालेका भी बुरा नहीं चाहता। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों मार्गोंमें राग-द्वेष मिट जाते हैं। अत: साधकको देखते रहना चाहिये कि मेरे राग-द्वेष कम हो रहे हैं या नहीं। अगर कम हो रहे हैं तो समझे कि साधन ठीक चल रहा है।
साधकमें तीन बातें रहनी चाहिये। वह किसीको बुरा मत समझे, किसीका बुरा मत चाहे और किसीका बुरा मत करे। इन तीन बातोंका वह नियम ले ले तो उसका साधन बहुत तेज और बढ़िया होगा। इन तीन बातोंको धारण करनेसे वह कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनोंका अधिकारी बन जाता है। इसलिये मेरी साधकोंसे प्रार्थना है कि वे कम-से-कम इन तीन बातोंको धारण कर लें। वे सबकी सेवा करें, सबको सुख पहुँचायें। सुख भी न पहुँचा सकें तो कम-से-कम किसीको दु:ख मत पहुँचायें। जो दूसरोंको दु:ख पहुँचाता है, वह साधन नहीं कर सकता।
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
(मानस०, उत्तर ४१। १)
मनुष्यशरीर साधन करनेके लिये मिला है। यह साधनयोनि है। इसलिये सच्चे साधक बनो। सच्चे सत्संगी बनो। योगारूढ़ हो जाओ। जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ हो जाओ। भगवान्के प्रेमी हो जाओ। यह मौका मनुष्यजन्ममें ही है।