बच्चोंका जीवन-निर्माण माताके हाथमें है
कोमल वस्तुपर प्रभाव अत्यन्त शीघ्र किन्तु स्थायी पड़ता है। छोटे कोमल पौधेको माली जैसे चाहता है, वैसे झुका देता है; कच्चे मिट्टीके बर्तनको कुम्भकार अपने इच्छानुसार आकृति दे डालता है। ठीक यही दशा बालकोंकी है। उनकी प्रकृति, उनकी बुद्धि, उनका स्वभाव, मस्तिष्क, हृदय आदि इतने सरल और कोमल होते हैं कि उनपर आप जो संस्कार डालना चाहें, डाल दीजिये; आपको किसी प्रकारका परिश्रम नहीं करना पड़ेगा। बालकोंका हृदय उस स्वच्छ एवं सफेद वस्त्रके समान है, जिसपर किसी प्रकारका रंग नहीं चढ़ा है। अतएव इस अवस्थामें बालकोंकी शिक्षा-दीक्षापर ध्यान देना परम आवश्यक है।
अनुकरणकी प्रवृत्तिसे ही बच्चेकी शिक्षा प्रारम्भ होती है, यह शक्ति बालकोंमें जन्मजात होती है। बच्चेका बाल्यकाल प्रधानत: माताकी गोदीमें बीतता है। वह खाता है तो माँकी गोदीमें; खेलता है तो माँकी गोदीमें और सोता है तो माँकी गोदीमें। अतएव उसके जीवनका निर्माण माँके हाथमें है। माता चाहे तो अपने आचरणद्वारा बच्चोंको सदाचारी, ईश्वरभक्त, कर्तव्यपरायण, शान्त, धीर, वीर एवं गम्भीर बना सकती है और वह चाहे तो उसे चोर, लबार, पाखण्डी, कामी, क्रोधी, डरपोक आदिके रूपमें परिणत कर सकती है। विश्वके इतिहासमें आजतक जितने भी महापुरुष हुए हैं, सब माताओंकी देन हैं।
माताका हृदय स्नेहमय है। वह अपने सात्त्विक स्नेहके द्वारा बच्चेके जीवनमें सरसता उत्पन्न करती है; किन्तु अच्छी-बुरी सभी वस्तुओंकी एक सीमा है। स्नेह भी जब विवेककी सीमाको लाँघकर आगे बढ़ता है तो वह घातक हो जाता है। बच्चोंके बिगड़नेमें अधिकतर यही बात होती है। देखा गया है कि विवाहके बहुत वर्षोंके बाद सन्तान उत्पन्न हुई या कई सन्तान मरनेके बाद पुत्रका जन्म हुआ या कई लड़कियोंके पश्चात् लड़केके जन्मका सौभाग्य प्राप्त हुआ अथवा एक पुत्र होनेके बाद और सन्तान न हुई, धनका प्राबल्य हुआ—आदि-आदि अनेक स्थितियाँ ऐसी हैं, जिनमें स्वभावत: माता-पिता (विशेषतया माता) बच्चेको इतना स्नेह करने लगते हैं कि दिन-रात बच्चा उनकी गोदमें ही झूलता रहता है। धरती छूनेका अवसरतक नहीं मिलता। परिणामत: उसका स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है, कभी-कभी तो उसके नीचेके अंग एकदम बेकार हो जाते हैं और वह पंगु बन जाता है। लड़कोंको जिद्दी बनानेमें भी यही स्नेह हेतु होता है। कुछ माताएँ स्नेहके कारण बच्चोंको शिक्षाके लिये अपनेसे पृथक् नहीं करतीं। वे सोचती रहती हैं—‘मेरे लालकी उम्र ही क्या है, अभी तो दूधके दाँत भी नहीं टूटे। सारी उम्र पड़ी है, पढ़ लेगा। न पढ़ेगा तो भी क्या है? किसीसे भीख थोड़े ही माँगने जाना है। ईश्वरने दे रखा है, इसीसे काम चल जायगा।’ इससे बच्चा शिक्षासे वंचित रह जाता है और भविष्यमें बड़ा कष्ट उठाता है। बहुत बार यह भी देखनेमें आता है कि लड़का कुसंगसे अथवा बालचपलतासे भाँति-भाँतिके अनुचित कार्य करने लगता है—जैसे घरसे बाहर आवारा घूमना, पतंग उड़ाना, ताश-चौपड़-गोली आदि खेलना, जूआ खेलना, लड़कोंके साथ मिलकर राह जाते हुए व्यक्तियोंको, पशुओंको तंग करना, पक्षियों-जन्तुओं आदिपर पत्थर फेंकना, चींटी आदिको हाथसे या पैरसे नोच डालना, बीड़ी पीना, अश्लील शब्द बोलना, घरसे चुपचाप रुपये-पैसे आदि निकालकर बाजारमें उनके बदले चीजें खरीदना आदि-आदि और माता-पिताको इनका पूर्ण ज्ञान भी होता है, किंतु बच्चेके स्नेहके कारण वे उसे कुछ भी नहीं कहते; उलटे उसके नटखटपनपर प्रसन्न होते हैं, यह बहुत ही घातक है। यह बच्चेके प्रति स्नेह नहीं, अन्याय है। इससे बच्चेका जीवन नष्टप्राय हो जाता है।
प्रकृतिभेदके अनुसार आजकल कुछ माताओंमें वात्सल्य-स्नेहका अभाव पाया जाता है। वे अज्ञानतावश अथवा फैशनकी गुलाम होकर अपने व्यक्तिगत सुख-आरामको प्रधानता देती हैं और बच्चोंके कार्यको गौणता। फैशनकी पुतलियाँ आजकी कुछ शिक्षिता कहलानेवाली नारियाँ, जो स्त्री-पुरुषके सम्बन्धको पाशविक मनोविकारकी पूर्तिका साधनमात्र समझती हैं; जन्म देते ही बालकको अपनेसे पृथक् कर डालती हैं। बच्चेको दूध पिलाना, पालना, शिक्षित करना आदि सब काम धायपर पड़ जाता है। बालकका जीवन किस प्रकार बीत रहा है, इसकी भी माँको कुछ चिन्ता नहीं रहती। फलत: दास-दासियोंके भरोसे रहनेसे उन लोगोंके सब प्रकारके अवगुण उस अनुकरणशील बच्चेमें आ जाते हैं और बेचारेका जीवन नष्ट हो जाता है। अमीरोंके लड़कोंके बिगड़नेमें यह एक बड़ा कारण है।
कितनी ही माताएँ खिला-पिलाकर बच्चेको स्कूल भेज देनेमें ही अपने कर्तव्यकी इतिश्री मान लेती हैं। वे यह जाननेका कभी कष्ट भी नहीं उठातीं कि बच्चा स्कूलमें क्या पढ़ता है, किनके सम्पर्कमें रहता है, कैसे लड़कोंके साथ स्कूल आता-जाता है और क्या करता है। इससे माताओंको अवश्य कुछ अवकाश मिल जाता है; दिनभर लड़का घरपर रहकर भाँति-भाँतिके उपद्रव करता था, उससे माताको राहत मिल जाती है। किन्तु बच्चेकी जीवन-धारा किस ओर बह रही है, इससे माँ बेखबर रहती है। माँ बच्चेको सुधारनेके लिये स्कूलमें भेजती है, अतएव समझती है उसका सुधार हो रहा है, पर होता है उसका और भी पतन। आजकलकी स्कूली शिक्षाका जो दुष्परिणाम दिखायी दे रहा है, स्कूलोंमें बालकोंका जिस प्रकार चारित्रिक पतन हो रहा है, उसे देखते हुए तो यह कहना पड़ता है कि बच्चेको स्कूलमें भेज देनेके बाद तो माता-पिताका दायित्व और भी बढ़ जाता है; क्योंकि विपत्तिकी सम्भावना भी उस समय बहुत बढ़ जाती है। अतएव माता-पिताको बालकोंको स्कूलमें भेजना प्रारम्भ करनेके बाद अपनेको दायित्वसे मुक्त नहीं समझ लेना चाहिये, प्रत्युत बालककी ओरसे और भी सतर्क रहना चाहिये।
बालकोंके पतनका तीसरा कारण है माता-पिताका उन्हें अधिक अनुशासनमें रखना। बड़े पेड़के नीचे छोटा पौधा नहीं पनपता, यदि पनपता भी है तो उस हिसाबसे नहीं, जिस हिसाबसे खुले स्थानमें। बस, बालकोंके लिये भी यही बात है। अधिक अनुशासन जहाँ हुआ, छोटी-छोटी बातपर जहाँ डाँट-फटकार होने लगी, वहीं बच्चेका जीवन मुरझा जाता है, वहीं उसकी विकासोन्मुख प्रतिभा नष्ट हो जाती है। कली खिलनेके पूर्व ही सूख जाती है, परिणाम यह होता है कि बच्चा या तो कायर और कमजोर हो जाता है तथा अपने चरित्रबलको खो बैठता है या ढीठ हो जाता है और किसीके कहने-सुननेकी कुछ भी परवा नहीं करता। अतएव माता-पिताको चाहिये कि वे बालकको संयममें तो रखें, पर अधिक डाँट-फटकार न दें; बाल-प्रकृतिकी स्वाभाविकता एवं सरलताको कुचल न डालें। जो बात जिस समय आवश्यक हो, उसी समय प्रेमसे समझाकर, यदि आवश्यक हो तो प्रेमपूर्वक साधारण डाँट-फटकार देकर कह देनी चाहिये। नहीं तो घातसे प्रतिघात होना स्वाभाविक ही है। पौधेकी रक्षाके लिये बाड़की आवश्यकता होती ही है, दीपक बिना आवरण ठीक प्रकाश नहीं देता तथा बहुत बार बुझ भी जाता है, ठीक उसी प्रकार प्रेमपूर्ण तथा विवेकमय अनुशासनकी आवश्यकता है। विवेकपूर्ण अनुशासनमें यदि बालकको स्वतन्त्र छोड़ा जाय तो उससे उसकी प्राकृतिक गुप्त शक्तियोंका इतना विकास होता है कि वैसा अन्य किसी प्रकारसे सम्भव नहीं।
आचरणकी शक्ति अपार है। आचरणके ‘मौनव्याख्यान’ से वह कार्य हो जाता है, जो बड़े-बड़े सुधारक विद्वान् दिन-रात उपदेश देकर, गम्भीर-विवेचनात्मक लेख लिखकर तथा अन्य प्रकारकी शिक्षा-सम्बन्धी चेष्टा करके भी नहीं कर पाते। आचरणमें एक ऐसी दिव्य शक्ति है, जो दूसरेको स्वत: कर्तव्यकी ओर प्रेरित कर देती है। फिर बच्चे तो स्वभावसे ही नकल करनेवाले होते हैं। अतएव माता-पिताको अपना जीवन ठीक वैसा ही बनाना चाहिये, जैसा कि वे अपनी सन्तानको बनाना चाहते हैं। धातुकी मूर्तियाँ बनानेके लिये साँचेकी आवश्यकता होती है। बच्चोंके जीवनको ढालनेके लिये माता-पिताका जीवन ही साँचा है। माता-पिताको याद रखना चाहिये कि ‘बच्चोंको मारकर, उनपर खीझकर उन्हें सदाचारी नहीं बनाया जा सकता। पहले खुद सदाचारी बननेसे ही वे सदाचारी बनेंगे। असंयमशील माता-पिताका यह आशा करना कि उनकी सन्तान पूर्ण सदाचारी बनेगी, दुराशामात्र है। इसलिये माता-पिताको शरीर, मन और वाणी—तीनोंमें संयम रखना चाहिये एवं सावधानीके साथ सदाचार-परायण रहना चाहिये।’
सन्ततिको योग्य बनानेके लिये माताका सुशिक्षित होना परम आवश्यक है। प्राय: देखा गया है कि जिस घरमें माता चतुर होती है, उसकी सन्तान भी बड़ी चतुर एवं गुणवान् होती है। लड़कियोंका जीवन तो पूर्णरूपसे मातापर ही निर्भर है।
जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, बच्चोंके हृदयपर छोटी-छोटी बातोंका प्रभाव बहुत शीघ्र होता है। प्राय: देखा गया है कि माताएँ बालकोंमें डरनेकी आदत डाल देती हैं। जब कभी बच्चा दूध नहीं पीता, कपड़े नहीं पहनता, रातमें अधिक देरतक जगता रहता है, बिना कारण रोने लगता है अथवा इसी प्रकारकी कोई अन्य बात करता है तो माता-पिता उसे ‘भूत’, ‘हौवा’, ‘चोर’ आदिका डर दिखाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बच्चेकी प्रकृति डरपोक हो जाती है। कहीं-कहीं तो यह भय जन्मभर बना रहता है।
बच्चेके लिखने-पढ़नेकी शिक्षाका भार भी मातापर ही रहना चाहिये। देखनेमें आया है कि स्कूलमें भर्ती होनेतक बच्चे खेलते ही रहते हैं, उन्हें कुछ भी शब्दज्ञान नहीं हो पाता। यह बहुत बुरा है। माता-पिताको चाहिये कि वे बच्चेको होश सँभालते ही मौखिक शिक्षा देना आरम्भ कर दें। यूरोपमें वस्तुपाठद्वारा बच्चोंको शिक्षा दी जाती है। बच्चे खिलौनेके शौकीन तो होते ही हैं अतएव सुन्दर-सुन्दर खिलौनोंके रूपमें काठ या किसी धातुके मोटे-मोटे अक्षर बना लिये जाते हैं और उन्हींको दिखाकर बालकोंको वर्ण-परिचय करा दिया जाता है। भारतमें भी इस प्रणालीका शीघ्र ही प्रचार होना चाहिये।
प्राय: देखा गया है कि हमारे देशके लड़के व्यावहारिक शिक्षामें एकदम शून्य रहते हैं। बड़े होने तथा शिक्षा प्राप्त करनेपर भी उनमें इस शिक्षाकी बड़ी कमी बनी रहती है। इसका दायित्व एकमात्र माता-पितापर है। वे स्नेहवश बच्चेमें खराब आदतको घर करने देते हैं। माता-पिता देखते रहते हैं कि बच्चा देरतक सोता रहता है, मैले-कुचैले कपड़े रखता है, पुस्तकोंको फाड़ डालता है, इच्छा आती है वहीं थूक देता है, अशिष्टतासे बोलता है, दस आदमियोंके बीच जानेमें संकोच करता है, कोई बात पूछी जाय तो नाकमें अँगुली देने लगता है तथा जैसे-तैसे भागनेका प्रयत्न करता है अथवा बड़ोंका अनादर करता है, बेमतलब बकता है, बात करते हुए बड़े-बूढ़ोंके बीचसे निकल जाता है, कहनेपर भी बात नहीं मानता और मुँह बनाता है—आदि-आदि, पर वे उसे कुछ भी नहीं कहते। परिणाम यह होता है कि उसका स्वभाव वैसा ही बन जाता है और वह जन्मभर बुद्धू या उद्दण्ड बना रहता है, अतएव माता-पिताको चाहिये कि वे निरन्तर ऐसी चेष्टा करें कि उनके बच्चे सदा-सर्वदा सदाचार और शिष्टाचारकी शिक्षा प्राप्त करते रहें।
माता-पिताको चाहिये कि धार्मिक शिक्षाका बीज भी अपनी सन्तानमें बाल्यकालमें ही बो दें। इसका सबसे सीधा उपाय यही है कि प्रतिदिन सुबह-शाम बच्चोंको साथ लेकर कीर्तन करें, भगवद्भक्तिसम्बन्धी ललित पद गायें तथा भगवान्के दर्शनके लिये मन्दिरोंमें जायँ। बच्चोंको कहानी सुननेका शौक होता ही है, अतएव उन्हें भक्तोंके सुन्दर-सुन्दर चरित्र सुनाकर उनमें वैसा ही बननेकी इच्छा जाग्रत् करनी चाहिये। दीन-दु:खियोंको तथा पशु-पक्षियोंको बच्चोंके हाथसे अन्न, जल, रोटी आदि दिलानेसे उनके हृदयमें दयाभाव उत्पन्न हो सकता है। इसी प्रकार आचरणद्वारा तथा मौखिकरूपसे स्पष्ट भाषण करने, किसी प्रकारका छिपाव न रखने, किसीकी कोई वस्तु बिना दिये न लेने, व्यर्थका झगड़ा न करने, सबका आदर करने, प्रेमसे हँसकर बोलने आदिकी शिक्षा भी बच्चोंको बाल्यकालसे ही माता-पिताद्वारा मिलनी चाहिये।
बालकोंपर ही परिवारका, समाजका, देशका तथा विश्वका भविष्य निर्भर करता है। अत: उनको शिक्षित करना कितना आवश्यक है, यह बतानेकी आवश्यकता नहीं। माताओंको चाहिये कि वे अपने स्वरूपको समझें और अपने कर्तव्य-पालनमें लग जायँ। एक विद्वान्के इन वचनोंपर माताओंको सदा ध्यान देना चाहिये—‘एक अच्छी माता सैकड़ों शिक्षकोंके बराबर है। वह परिजनोंके मनको खींचनेके लिये चुम्बक-पत्थर तथा उनकी आँखोंके लिये ध्रुवतारा है।’