भारतीय नारी और राज्यशासन
भारतीय साहित्यके अनुशीलनसे यह पता लगता है कि प्राय: राजकुलकी स्त्रियाँ ज्ञान-विज्ञान और ललित-कलामें प्रवीण होनेके साथ ही राजनीति और युद्ध-कलाकी भी शिक्षा पाती थीं। कालिदासके शब्दोंमें नारी गृहिणी होनेके साथ पतिकी सचिवा भी थी। यह साचिव्य-कर्म तभी हो सकता है, जब उसे सभी तरहकी आवश्यक शिक्षा प्राप्त हो। भारतीय नारी अपने पातिव्रतको अक्षुण्ण रखकर ही अन्य विषयोंमें यथासाध्य पतिकी सहायता करती थी। उसमें पतिसे आगे बढ़कर अपनी शक्ति दिखानेकी स्पर्धा नहीं थी। उसका सम्पूर्ण ज्ञान पतिके कार्योंमें सहयोग देनेके लिये ही था। इस प्रकार जिस राजाका शासन बहुत उत्तम और न्यायानुकूल होता था, उसकी उस शासन-व्यवस्थामें राजमहिषीका भी सुन्दर परामर्श काम करता था। कितनी ही स्त्रियाँ अपने सहयोगसे पतिकी अयोग्यताको भी दूर करके उसे योग्य शासक बनाती थीं। रानी चूड़ालाका जीवन इसके लिये आदर्श है। भारतीय नारीको देवांगनाओंसे यह प्रेरणा प्राप्त होती थी। देवी दुर्गा तथा इन्द्र, वरुण आदिकी पत्नियोंमें नारीजनोचित गुणोंके साथ-साथ युद्ध और शासनकी भी पूर्ण क्षमता भारतीय स्त्रियोंको सदा वैसी बनानेके लिये प्रोत्साहन देती रही है। महारानी कैकेयीने महाराज दशरथके साथ युद्धमें जाकर जिस साहस और धैर्यका परिचय दिया, उससे केवल राजाको विजय ही नहीं मिली, समस्त नारी-जातिका भी गौरव बढ़ गया।
कहते हैं, महाभारत-युद्धमें जो राजा मारे गये थे, उनमेंसे जिन-जिनके कोई पुत्र नहीं था, उनके राज्य उनकी पुत्रियोंको दिये जायँ—ऐसा आदेश भीष्मपितामहने धर्मराज युधिष्ठिरको दिया था। नवीं शताब्दीमें उत्कलके राजा ललिताभरणदेवका देहान्त होनेपर उनकी महारानी त्रिभुवनदेवीने ही राज्यका भार सँभाला और बड़ी योग्यताके साथ उसका निर्वाह किया। चन्द्रगुप्त प्रथम अपनी लिच्छिविवंशीया महारानी कुमारदेवीके साथ ही राज्यका शासन करते थे। उनके सिक्केपर दोनोंके नाम भी पाये जाते हैं। कौशाम्बीके राजा उदयन जब बन्दी बना लिये गये थे, उस समय उनकी माताने ही राज्यका पालन किया था। ‘मसग’ के नरेश जब समर-भूमिमें मारे गये उस समय उनकी रानीने सेनाका संचालन करके युद्धमें आक्रमणकारी सिकन्दरका सामना किया था। ईसवी सन्से दो-सौ वर्ष पूर्व दक्षिणके शातवाहन साम्राज्यकी रानी नयनिकाने अपने बालक राजकुमारके वयस्क होनेतक स्वयं ही राज्यकी देखभाल और शासन किया। चौथी शताब्दीमें विधवा रानी प्रभावती गुप्तने भी दस वर्षोंतक अपने राज्यकी रक्षा की थी। उस समय राजकुमार अभी बालिग नहीं हुए थे। काश्मीरकी रानी सुगन्धा और दिद्दाने भी वैधव्य-दशामें वर्षोंतक अपने देशका शासन किया था। सन् ११९३ई० में जब पृथ्वीराजके साथ समरसिंह युद्धमें मारे गये उस समय कर्मदेवीने मेवाड़का शासनसूत्र अपने हाथमें लिया और कुतुबुद्दीनके आक्रमण करनेपर बड़ी योग्यतासे सैन्य-संचालन करते हुए उसका सामना किया था। गुजरातके सुलतान बहादुरशाहने जब चित्तौड़पर आक्रमण किया, उस समय राणा साँगाके मारे जानेपर उनकी प्रथम विधवा रानी कर्णवतीने घमासान युद्ध किया था। राणा साँगाकी द्वितीय पत्नी जवाहरबाईने भी दुर्गकी रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की।
मराठोंके इतिहाससे सिद्ध होता है कि कोल्हापुरकी रानी ताराबाई, इछलकरनजीकी अनुबाई, इन्दौरकी अहल्याबाई तथा झाँसीकी विख्यात वीरांगना रानी लक्ष्मीबाईने बड़ी कुशलता, नीति और बहादुरीके साथ राज्य-शासन और युद्ध भी किया था। ताराबाईने कूटनीतिज्ञ औरंगजेबको पीछे खदेड़ा था। अनुबाईने अनेक बार शत्रुओंके दाँत खट्टे किये और लक्ष्मीबाईने तो संहारकारिणी दुर्गाकी भाँति शत्रुसेनाका संहार किया था। उसने फिरंगियोंके छक्के छुड़ा दिये थे। दक्षिण भारतमें अनेकों ऐसे शिलालेख मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि नारियाँ शासन-कार्यमें क्रियात्मक भाग लेती थीं। सातवीं शताब्दीके मध्यभागमें चालुक्यवंशके राजा आदित्यकी महिषी विजय मदारिका बम्बईके दक्षिणमें राज्य करती थीं। उनका एक घोषणापत्र भी प्राप्त हुआ है। ७८६ ई० में राष्ट्रकूटोंके राजा ध्रुवकी रानी शील महादेवीने राज्यसिंहासनपर आरूढ़ होनेके बाद एक भूमिखण्ड पुरस्काररूपमें अर्पण किया था। १०५३ ई० में चालुक्य राजा सोमेश्वरकी महारानी मैलादेवी ‘वनवासी’ प्रान्तपर राज्य करती थीं। सोमेश्वरकी दूसरी रानी केटलादेवी पोनवदके अग्रहारकी शासिका थीं। जयसिंह तृतीयकी बड़ी बहिन अक्कादेवी १०२२ ई० में किसुकद जिलेपर राज्य करती थीं। १०७९ ई० में विजयादित्यकी बहिन कुंकुमदेवी कर्नाटकके धारवाड़ जिलेके अधिकांश भागपर शासन करती थीं। विक्रमादित्य षष्ठकी प्रधान महारानी लक्ष्मीदेवीके हाथमें १८ धर्मार्थ दातव्य संस्थाओंका शासनभार था। १३ वीं सदीमें प्रसिद्ध यात्री मार्कोपोलोने गुंटूर जिलेपर एक रानीको राज्य करते देखा था।
ऋग्वेदमें नारीके गृह, सास-ससुर, पति-ननद और देवरकी ‘सम्राज्ञी’ होनेका आशीर्वाद दिया गया है। यह साम्राज्य शासनके लिये नहीं, प्रेम और सद्व्यवहारके लिये है। इसीके द्वारा नारी सम्राट्के हृदयकी भी सम्राज्ञी बन जाती हैं।