भारतीय नारीका स्वरूप और उसका दायित्व

वर्तमान युगमें सब ओर स्वतन्त्रताकी आकांक्षा जाग्रत् हो गयी है। नारीके हृदयमें भी इसका होना स्वाभाविक है। इसमें सन्देह नहीं कि स्वतन्त्रता परम श्रेष्ठ धर्म है और नर तथा नारी दोनोंको ही स्वतन्त्र होना भी चाहिये। यह भी परम सत्य है कि दोनों जबतक स्वतन्त्र नहीं होंगे, तबतक यथार्थ प्रेम होगा भी नहीं, परन्तु विचारणीय प्रश्न यह है कि दोनोंकी स्वतन्त्रताके क्षेत्र तथा मार्ग दो हैं या एक ही? सच्ची बात यह है कि नर और नारीका शारीरिक और मानसिक संघटन नैसर्गिक दृष्टिसे कदापि एक-सा नहीं है। अतएव दोनोंकी स्वतन्त्रताके क्षेत्र और मार्ग भी निश्चय ही दो हैं। दोनों अपने-अपने क्षेत्रमें अपने-अपने मार्गसे चलकर ही स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते हैं। यही स्वधर्म है। जबतक स्वधर्मको नहीं समझा जायगा तबतक कल्याणकी आशा नहीं है। स्त्री घरकी रानी है, सम्राज्ञी है, घरमें उसका एकच्छत्र राज्य है, पर वह घरकी रानी है स्नेहमयी माता और आदर्श गृहिणीके ही रूपमें। यही उसका नैसर्गिक स्वातन्त्रॺ है। इसीसे कहा गया है कि दस शिक्षकोंसे श्रेष्ठ आचार्य है, सौ आचार्योंसे श्रेष्ठ पिता है और हजार पिताओंकी अपेक्षा अधिक श्रेष्ठा, वन्दनीया और आदरणीया माता है।

नारीका यह सनातन मातृत्व ही उसका स्वरूप है। वह मानवताकी नित्यमाता है। भगवान् राम-कृष्ण, भीष्म-युधिष्ठिर, कर्ण, अर्जुन, बुद्ध, महावीर, शंकर, रामानुज, गाँधी, मालवीय आदि जगत‍्के सभी बड़े-बड़े पुरुषोंको नारीने ही सृजन किया और बनाया है। उसका जीवन क्षणिक वैषयिक आनन्दके लिये नहीं; वह तो जगत‍्को प्रतिक्षण आनन्द प्रदान करनेवाली स्नेहमयी जननी है। उसमें प्रधानता है प्राणोंकी—हृदयकी और पुरुषमें प्रधानता है शरीरकी। इसीलिये पुरुषकी स्वतन्त्रताका क्षेत्र है शरीर और नारीकी स्वतन्त्रताका क्षेत्र है प्राण—हृदय! नारी शरीरसे चाहे दुर्बल हो, परन्तु प्राणसे वह पुरुषकी अपेक्षा सदा ही अत्यन्त सबल है। इसीलिये पुरुष उतने त्यागकी कल्पना नहीं कर सकता, जितना त्याग नारी सहज ही कर सकती है। अतएव पुरुष और स्त्री सभी क्षेत्रोंमें समान भावसे स्वतन्त्र नहीं हैं।

कोई जोशमें आकर चाहे यह न स्वीकार करे, परन्तु होशमें आनेपर तो यह मानना ही पड़ेगा कि नारी देहके क्षेत्रमें कभी पूर्णतया स्वाधीन नहीं हो सकती। प्रकृतिने उसके मन, प्राण और अवयवोंकी रचना ही ऐसी की है। वह स्वस्थ मानव-शिशुको जन्म देकर अपने हृदयके अमीरससे उसे पाल-पोसकर पूर्ण मानव बनाती है। इस नैसर्गिक दायित्वकी पूर्तिके लिये ही उसकी शारीरिक और मानसिक शक्तियोंका स्वाभाविक सद्‍व्यय होता रहा है। जगत‍्के अन्यान्य क्षेत्रोंमें जो नारीका स्थान संकुचित या सीमित दीख पड़ता है, उसका कारण यही है कि नारी बहुक्षेत्रव्यापी कुशल पुरुषका उत्पादन और निर्माण करनेके लिये अपने एक विशिष्ट क्षेत्रमें रहकर ही प्रकारान्तरसे सारे जगत‍्की सेवा करती रहती है। यदि नारी अपनी इस विशिष्टताको भूल जाय तो जगत‍्का विनाश बहुत शीघ्र होने लगे। आज यही हो रहा है!!

स्त्रीको बाल, युवा और वृद्धावस्थामें जो स्वतन्त्र न रहनेके लिये कहा गया है, वह इसी दृष्टिसे कि उसके शरीरका नैसर्गिक संघटन ही ऐसा है कि उसे सदा एक सावधान पहरेदारकी जरूरत है। यह उसका पद-गौरव है न कि पारतन्त्रॺ। जिन पाश्चात्य देशोंमें नारी-स्वातन्त्रॺका अत्यधिक विस्तार है, वहाँ भी स्त्रियाँ पुरुषोंकी भाँति निर्भीकरूपसे विचरण नहीं कर पातीं। नारीमें मातृत्व है, उसे गर्भ-धारण करना ही पड़ता है। प्रकृतिने पुरुषको इस दायित्वसे मुक्त रखा है और नारीपर इसका भार दिया है। अतएव उसकी शारीरिक स्वाधीनता सर्वत्र सुरक्षित नहीं है, परन्तु इस दैहिक परतन्त्रतामें भी वह हृदयसे स्वतन्त्र है; क्योंकि तपस्या, त्याग, धैर्य, सहिष्णुता, सेवा आदि सद‍्गुण सत्-स्त्रीकी सेवामें सदा लगे ही रहे हैं। पुरुषमें इन गुणोंको लाना पड़ता है, सो भी पूरे नहीं आते। स्त्रीमें स्वभावसे ही इन गुणोंका विकास रहता है। इसीसे नारी देहसे परतन्त्र होते हुए भी प्राणसे स्वतन्त्र है। नारीकी यह सेवा महान् है और केवल नारी ही इसे कर सकती है एवं इसी महत्सेवाके लिये स्रष्टाने नारीका सृजन किया है।

नारी अपने इस प्राकृतिक उत्तरदायित्वसे बच नहीं सकती। जो बचना चाहती है, उसमें विकृतरूपसे इसका उदय होता है। विकृतरूपसे होनेवाले कार्यका परिणाम बड़ा भयानक होता है। यूरोपमें नारी-स्वातन्त्रॺ है, पर वहाँकी स्त्रियाँ क्या इस प्राकृतिक दायित्वसे बचती हैं? क्या वासनाओंपर उनका नियन्त्रण है? वे चाहे विवाह न करें या सामाजिक विघटन होनेके कारण चाहे उनके विवाह योग्य उम्रमें न होने पावें, परन्तु पुरुष-संसर्ग तो हुए बिना रहता नहीं। कुछ दिनों पूर्व, इंग्लैंडकी पार्लामेण्टकी साधारण सभामें एक प्रश्नके उत्तरमें मजदूरसदस्य श्रीयुत लेजने बतलाया था कि ‘इंग्लैंडमें बीस वर्षकी आयुवाली कुमारियोंमें चालीस प्रतिशत विवाहके पहले ही गर्भवती पायी जाती हैं और विवाहित स्त्रियोंके प्रथम संतानमें चारमें एक अर्थात् पचीस प्रतिशत नाजायज (व्यभिचारजन्य) होती हैं।’ आपने यह भी कहा कि ‘देशका ऐसा नैतिक पतन कभी देखनेमें नहीं आया।’ कहते हैं, अमेरिकाकी स्थिति इनसे भी कहीं अधिक भयानक है। क्या ऐसा स्त्री-स्वातन्त्रॺ भारतीय स्त्री कभी सहन कर सकती है?

विदेशियोंका पारिवारिक जीवन प्राय: नष्ट हो गया है। सम्मिलित कुटुम्ब—जो दया, प्रेम, स्नेह, परोपकार, सेवा-संयम और शुद्ध अर्थवितरणकी एक महती संस्था है, जिसमें दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, भाई-भौजाई, देवर-जेठ, सास-पतोहू, मामा-मामी, बुआ-बहिन, मौसी-मौसे, भानजे-भानजी, भतीजे-भतीजी आदिका एक महान् सुशृंखल कुटुम्ब है और जिसके भरण-पोषण तथा पालनमें गृहस्थ अपनेको धन्य और कृतार्थ समझता है—का तो नामो-निशान भी वहाँ नहीं मिलेगा। स्वतन्त्रता तथा समानाधिकारके युद्धने वहाँके सुन्दर घरको मिटा दिया है। इसीसे वहाँ जरा-जरा-सी बातमें कलह, अशान्ति, विवाह-विच्छेद या आत्महत्या हो जाती है। वहाँ स्त्री अब घरकी रानी नहीं है, घरमें उसका शासन नहीं चलता, गृहस्थ-जीवनका परम शोभनीय आदर्श उसकी कल्पनासे बाहरकी वस्तु हो गया है। घरको सुशोभित करनेवाली श्रेष्ठ गृहिणी, पतिके प्रत्येक कार्यमें हृदयसे सहयोग देनेवाली सहधर्मिणी और बच्चोंको हृदयका अमृतरस पिलाकर पालनेवाली माताका आदर्श वहाँ नष्ट हुआ जा रहा है। ‘व्यक्तिगत स्वातन्त्रॺ’ और ‘स्वतन्त्र’ प्रेमके मोहमें वहाँकी नारी आज इतनी अधिक पराधीन हो गयी है कि उसे दर-दर भटककर विभिन्न पुरुषोंकी ठोकरें खानी पड़ती हैं। जगह-जगह प्रेम बेचना पड़ता है, नौकरीके लिये नये-नये मालिकोंके दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं और No vacancy की सूचना पढ़कर निराश लौटना पड़ता है। यह कैसी स्वतन्त्रता है और कैसा सुख है? और खेद तथा आश्चर्य है कि आज भारतीय महिलाएँ भी इसी स्वतन्त्रता और सुखकी ओर मोहवश अग्रसर हो रही हैं!!

लोग कहते हैं ‘वहाँकी शिक्षिता स्त्रियोंमें बहुमुखी विकास हुआ है। इसमें इतना तो सत्य है कि वहाँ स्त्रियोंमें अक्षर-ज्ञानका पर्याप्त विस्तार है; परन्तु इतने ही मात्रसे कोई सुशिक्षित और विकसित हो जाय, ऐसा नहीं माना जा सकता। वास्तवमें शिक्षा वह है, जो मनुष्यमें उसके स्वधर्मानुकूल कर्तव्यको जाग्रत् करके उसे उस कर्तव्यका पूरा पालन करनेयोग्य बना दे! यूरोपकी स्त्री-शिक्षाने यह काम नहीं किया। स्त्रियोंको उनके नैसर्गिक धर्मके अनुकूल शिक्षा मिलती तो बड़ा लाभ होता। प्रकृतिके विरुद्ध शिक्षासे इसी प्रकार बड़ी हानि हुई है। इस युगमें स्त्रियोंको जो शिक्षा दी जाती है, क्या उससे सचमुच उनका स्वधर्मोचित विकास हुआ है? क्या इस शिक्षासे स्त्रियाँ अपने कार्यक्षेत्रमें कुशल बन सकी हैं? क्या अपने क्षेत्रमें जो उनकी नैसर्गिक स्वतन्त्रता थी, उसकी पूरी रक्षा हुई है? उसका अपहरण तो नहीं हो गया है? सच पूछिये तो सैकड़ों वर्षोंसे चली आती हुई यूरोपकी शिक्षाने वहाँ कितनी महान् प्रतिभाशालिनी स्वधर्मपरायणा जगत‍्की नैसर्गिक रक्षा करनेवाली महिलाओंको उत्पन्न किया है? बल्कि यह प्रत्यक्ष है कि इस शिक्षासे वहाँकी नारियोंमें गृहिणीत्व तथा मातृत्वका ह्रास हुआ है। अमेरिकामें ७७ प्रतिशत स्त्रियाँ घरके कामोंमें असफल साबित हुई हैं। ६० प्रतिशत स्त्रियोंने विवाहोचित उम्र बीत जानेके कारण विवाहकी योग्यता खो दी है। विवाहकी उम्र वहाँ साधारणत: १६ से २० वर्षतककी ही मानी जाती है, इसके बाद ज्यों-ज्यों उम्र बड़ी होती है, त्यों-ही-त्यों विवाहकी योग्यता घटती जाती है। इसीका परिणाम है कि वहाँ स्वेच्छाचार, अनाचार, व्यभिचार और अत्याचार उत्तरोत्तर बढ़ गये हैं। अविवाहिता माताओंकी संख्या क्रमश: बढ़ती जा रही है। घरका सुख किसीको नहीं। बीमारी तथा बुढ़ापेमें कौन किसकी सेवा करे? वहाँकी शिक्षिता स्त्रियोंमें लगभग ५० प्रतिशतको कुमारी रहना पड़ता है और बिना ब्याहे ही उनको वैधव्यका-सा दु:ख भोगना पड़ता है। यही क्या बहुमुखी विकास है?

इसके सिवा वर्तमान शिक्षाका एक बड़ा दोष यह है कि स्त्रियोंमें नारीत्व और मातृत्वका नाश होकर उनमें पुरुषत्व बढ़ रहा है और उधर पुरुषोंमें स्त्रीत्वकी वृद्धि हो रही है। नारी नियमित व्यायाम करके और भाँति-भाँतिके अन्यान्य साधनोंके द्वारा ‘मर्दाना’ बनती जा रही है, तो पुरुष अंगलालित्य, भाव-भंगिमा केश-विन्यास और स्वर-माधुर्य आदिके द्वारा ‘जनाना’ बनने जा रहे हैं। स्त्रियोंमें मर्दानगी अवश्य आनी चाहिये। उनको रणचण्डी और दशप्रहरण-धारिणी दुर्गा बनना चाहिये; परन्तु बनना चाहिये पति-पुत्रका अहित करनेकी इच्छा रखनेवाले दुष्ट आततायीको दण्ड देनेके लिये ही। यह तभी होगा, जब उनमें पत्नीत्व और मातृत्वका अक्षुण्ण भाव स्थिर रहेगा। भारतवर्षमें तो नारीकी रणरंगिणी मुण्डमालिनी कराली कालीके रूपमें और सिंहवाहिनी महिषमर्दिनी दुर्गाके रूपमें पूजा की है; परन्तु वहाँ भी वह है माँ ही। स्नेहमयी माता, प्रेममयी पत्नी यदि वीरांगना बनकर रणसज्जा-सुसज्जित होकर मैदानमें आवेगी तो वह आततायियोंके हाथसे अपनी तथा अपने पति-पुत्रकी रक्षा करके समाज और देशका अपरिमित मंगल एवं मुख उज्ज्वल करेगी; परन्तु इस हृदय-धनको खोकर, मनकी इस परम मूल्यवान् सम्पत्तिको गँवाकर केवल देहके क्षेत्रमें स्वतन्त्र होनेके लिये यदि नारी तलवार हाथमें लेगी तो निश्चय समझिये उस तलवारसे प्यारी सन्तानोंके ही सिर धड़से अलग होंगे, प्राण-प्रियतम पतियोंके ही हृदय बेधे जायँगे और सबके मुखोंपर कालिमा लगेगी!! स्त्रियोंको रणरंगिणी बननेके पहले इस बातको अच्छी तरह सोच रखना चाहिये। अत्याचारी, अनाचारीका दमन करनेके लिये हमारी माँ-बहिनें रणचण्डी बनें, परन्तु हमारी रक्षा और हमारे पालनके लिये उनके हृदयसे सदा अमीरस बहता रहे। वहाँ तलवार हाथमें रहे ही नहीं।

अतएव इस भ्रमको छोड़ देना चाहिये कि ‘वर्तमान यूरोप-अमेरिकामें स्त्रियाँ स्वतन्त्र होनेके कारण सुखी हैं और उन्हें वर्तमान शिक्षासे सच्चा लाभ हुआ है।’ फिर यदि मान भी लें कि किसी अंशमें लाभ हुआ भी हो तो वहाँका वातावरण, वहाँकी परिस्थिति, वहाँके रस्मोरिवाज, वहाँकी संस्कृति और वहाँका लक्ष्य दूसरा है तथा हमारा बिलकुल दूसरा। वहाँ केवल भौतिक उन्नति ही जीवनका लक्ष्य है; हमारा लक्ष्य है परमात्माकी प्राप्ति। परमात्माकी प्राप्तिमें सर्वोत्तम साधन है विलास-वासनाका त्याग और इन्द्रियसंयम। इसका खयाल रखकर ही हमें अपनी शिक्षा-पद्धति बनानी चाहिये। तभी हमारी नारियाँ आदर्श माता और आदर्श गृहिणी बनकर जगत‍्का मंगल कर सकेंगी।

कहा जा सकता है कि ‘क्या स्त्रियाँ देशका, समाजका कोई काम करें ही नहीं?’ ऐसी बात नहीं है, करें क्यों नहीं, करें पर करें अपने स्वधर्मको बचाकर। अपने स्वधर्मकी जितनी भी शिक्षा अशिक्षित बहिनोंको दी जा सके उतना अपने उपदेश और आचरणोंके द्वारा वे अवश्य दें। सच्ची बात तो यह है कि यदि पति, पुत्र, पुत्रियाँ सब ठीक रहें, अपने-अपने कर्तव्य-पालनमें ईमानदारीसे संलग्न रहें तो फिर देशमें, समाजमें ऐसी बुराई ही कौन-सी रह जाय, जिसे सुधारनेके लिये माताओंको घरसे बाहर निकलकर कुछ करना पड़े? और पुरुषोंको सत्पुरुष बनानेका यह काम है माताओंका। माताएँ यदि अपने स्त्रीधर्ममें तत्पर रहें तो पुरुषोंमें उच्छृंखलता आवेगी ही नहीं। अत: भारतकी आदरणीय देवियोंसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि वे अपने स्वरूपको सँभालें। अपने महान् दायित्वकी ओर ध्यान दें और पुरुषोंको वास्तविक स्वधर्मपरायण पुरुष बनावें। पुरुषोंकी प्रतिमाका वैसा ही निर्माण होगा, जैसा सर्वशक्तिमयी माताएँ करना चाहेंगी। आज जो पुरुष बिगड़े हैं, इसका उत्तरदायित्व माताओंपर ही है। वे उन्हें बना सकती हैं। यदि माताएँ पुरुषोंकी परवा न कर सकें, अपने पति-पुत्रोंकी कल्याण-कामना न करके अपनी स्वतन्त्र व्यक्तिगत कल्याण-कामना करने लगेंगी, तो पुरुषोंका पतन अवश्यम्भावी है और जब पति-पुत्र बिगड़ गये तो गृहिणी और माता भी किसके बलपर अपने सुन्दर स्वरूपकी रक्षा कर सकेंगी। पुरुषोंको बचाकर अपनेको बचाना—पुरुषोंको पुरुष बनाकर अपने नारीत्वका अभ्युदय करना—इसीमें सच्चा कल्याणकारी नारी-उद्धार है। पुरुषको बेलगाम छोड़कर नारीका उसका प्रतिद्वन्द्वी होकर अपनी स्वतन्त्र उन्नति करने जाना तो पुरुषको निरंकुश, अत्याचारी, स्वेच्छाचारी बनाकर उसकी गुलामीको ही निमन्त्रण देना है और फलत: समाजमें दु:खका ऐसा दावानल धधकाना है, जिसमें पुरुष और स्त्री दोनोंके ही सुख जलकर खाक हो जायँगे!! भगवान‍्की कृपासे नारीमें सुबुद्धि जाग्रत् हो, जिसमें वह अपने उत्तरदायित्वको समझे और स्वधर्मपरायण होकर जगत‍्का परम मंगल करे।