एक प्रसवसे दूसरे प्रसवके बीच का समय कितना हो?
आजकल जो जवान स्त्रियों और बच्चोंको लगातार बीमारियाँ भोगनी पड़ती हैं और उनकी मृत्यु भी अधिक होती है, इसमें ‘असंयम’ एक प्रधान कारण है। विषयभोगकी अतिशयता जैसे पुरुषके लिये घातक है, वैसे ही स्त्रीके लिये भी अत्यन्त हानिकारक है। अधिक विषय-सेवनसे स्त्रियोंको कब्ज, उदरपीड़ा, प्रदर, दुर्बलता, योनिभ्रंश, सिरपीड़ा, क्षय और प्रसूतिके विविध रोग हो जाते हैं। कम उम्रकी वधुएँ तो रात-दिन सिर दुखने, भूख न लगने, जी मचलाने, सफेद रस बहने और पेट तथा पेड़ूमें दर्द होने आदि रोगोंके कारण अनवरत यन्त्रणा भोगती रहती हैं, इसका प्रधान कारण ‘अतिशय विषयभोग’ ही है। अधिक विषय-भोगसे गर्भस्राव तो होता ही है; सन्तान भी दुर्बल, अल्पजीवी, रोगी, मन्द-बुद्धि, चरित्रहीन और अधार्मिक होती है। उनमें विकास और संवर्धनकी शक्ति भी बहुत कम पायी जाती है।
अतिशय विषयभोगसे स्त्रियोंको विविध रोग लग जाते हैं, उनका यौवन अकालमें ही नष्ट हो जाता है, कुछ ही वर्षोंमें जवान उम्रमें ही वे बूढ़ी हो जाती हैं। धर्मसे रुचि हट जाती है। शरीरपर आलस्य छाया रहता है। अग्निमें घी डालनेसे जैसे अग्नि बढ़ती है, वैसे ही अतिरिक्त भोगसे भोगकामना उत्तरोत्तर बढ़ती रहती है। दाम्पत्य सुखमें कमी आ जाती है, आयु घट जाती है और सदा-सर्वदा रोगिणी रहनेसे घरमें पति आदिके द्वारा असत्कार प्राप्त होनेके कारण उसकी मानस-पीड़ा भी बढ़ जाती है। अतएव दम्पतिको चाहिये कि वे नीरोगता, धार्मिकता, उत्तम स्वस्थ सन्तान और दीर्घ आयुकी प्राप्तिके लिये अधिक-से-अधिक संयम करें।
यह स्मरण रखना चाहिये कि विषय-सेवन विषय-सुखके लिये नहीं है, सन्तानोत्पत्तिरूप धर्मपालनके लिये है। अतएव धर्मानुकूल विषय-सेवन ही कर्तव्य है। भगवान्ने कहा है—
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।
‘हे अर्जुन! प्राणियोंमें धर्मसे अविरुद्ध काम मैं हूँ।’ इसी दृष्टिसे शास्त्रानुसार ऋतुकालमें कम-से-कम विषय-संसर्ग करना चाहिये। गर्भाधान हो जानेपर विषय-संसर्ग सर्वथा बन्द कर देना चाहिये।
प्रसवके बाद बच्चा जबतक स्तनपान करता रहे, तबतक तो विषयभोग करना ही नहीं चाहिये। लगभग पौने दो वर्षतक स्तनपान कराना उचित है। जिन बच्चोंको स्वस्थ माताका स्नेहपरिपूर्ण दूध मिलता है, उनका जीवन सब प्रकारसे सुखी होता है। असंयमजनित विघ्न नहीं होगा तथा माताका शरीर स्वस्थ रहेगा तो पौने दो वर्षतक स्तनोंमें पर्याप्त दूध आता रहेगा। स्तनपान बन्द करानेके पश्चात् उतने ही कालतक माताके शरीरको आराम पहुँचे, इस निमित्तसे सम्भोग नहीं करना चाहिये। इसके बाद डेढ़ सालका अवकाश पुष्ट और दीर्घजीवी सन्तानके निर्माणयोग्य स्थिति प्राप्त करनेके लिये और मिलना चाहिये। इस प्रकार सन्तानोत्पत्तिके बाद लगभग पाँच सालतक संयमसे रहना उचित है।
शिशुके स्तनपान छोड़ते ही सम्भोग करना ‘अधम’ है। स्तनपान छोड़नेके बाद उतने ही समयके बाद सम्भोग करना ‘मध्यम’ है और पूरे पाँच साल बीतनेपर सम्भोग करना सर्वश्रेष्ठ है। इतना न हो सके तो कम-से-कम पहली सन्तानके बाद दूसरी सन्तान उत्पन्न होनेमें बीचका समय पाँच सालका तो होना ही चाहिये। ऐसा करनेसे दस महीने पूर्व ही विषय-सम्भोग किया जा सकता है।
संयमशील माता-पिताके पवित्र उद्देश्यसे प्रेरित संसर्गसे ही सत् सन्तानकी उत्पत्ति सम्भव है। सोलह वर्षसे पैंतीस वर्षकी उम्रतक संयमका पालन करते हुए तीन-चार सन्तान हो जायँ तो पर्याप्त है। इससे सन्तान भी श्रेष्ठ होगी और उसके माता-पिता भी सुखसे रहेंगे। जितनी ही कमजोर सन्तान अधिक होगी, उतना ही उनके पालनमें श्रम, व्यय, क्लेश, उनके लगातार रोगी रहने तथा अकालमें ही मरनेका सन्ताप भी अधिक होगा। अधिक सन्तान होनेसे उनका लालन-पालन भी सावधानी तथा प्यारसे नहीं हो पायेगा और सारा समय इसीमें लग जायगा; किसी भी शुभकर्म, लोकसेवा, देशसेवा और मानव-जीवनके परम ध्येय भगवत्प्राप्तिके लिये सत्संग, तीर्थसेवन, भजन आदिके लिये समय ही नहीं मिलेगा। यह बहुत बड़ी हानि है; क्योंकि मानव-जीवन इससे सर्वथा असफल हो जाता है।
फिर, बहुत-सी अयोग्य सन्तान होनेकी अपेक्षा सुयोग्य एक-दो सन्तानका होना भी बहुत महत्त्व रखता है। बरसाती कीड़े एक ही साथ लाखोंकी संख्यामें पैदा होते हैं, सर्पिणी दो-ढाई सौतक बच्चे एक साथ पैदा करती है और उनमेंसे अधिकांशको आप ही खा जाती है। कुतियोंके पाँच-सात पिल्ले एक साथ होते हैं; परंतु उनका क्या महत्त्व है? महाराज राघवेन्द्र श्रीरामचन्द्र अपनी माँके एक ही थे, भीष्म एक ही थे, शंकराचार्य एक ही थे, पर उनका कितना महत्त्व है। महत्ता गुणोंमें है, संख्यामें नहीं। वस्तुत: महत्त्वपूर्ण और सफल सन्तान तो वही है जो भगवान्का भक्त हो। नहीं तो पशुमादाकी तरह मानव-स्त्री भी पशु-सन्तान ही ब्याती है—सुपुत्र नहीं जनती।
पुत्रवती जुबती जग सोई।
रघुपति भगतु जासु सुत होई॥
नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी।
राम बिमुख सुत तें हित जानी॥