गर्भाधानके श्रेष्ठ नियम

‘गर्भाधान-संस्कार’ सबसे आवश्यक संस्कार है; परंतु आजकल उसका सर्वथा विलोप ही हो गया है। स्त्री-पुरुषके शरीर और मनकी स्वस्थता, पवित्रता, आनन्द तथा शास्त्रानुकूल तिथि, वार, समय आदिके संयोगसे ही श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न होती है। जैसे फोटोमें हूबहू वही चित्र आता है, जैसा फोटो लेनेके समय रहता है, उसी प्रकार गर्भाधानके समय दम्पतिका जैसा तन-मन होता है; वैसे ही तन-मनवाली सन्तान होती है। मनुष्यका प्रधानलक्ष्य भगवत्प्राप्ति है। अत: उसी लक्ष्यको ध्यानमें रखकर उसीके लिये जगत‍्के सारे काम करने चाहिये। गर्भाधानका उद्देश्य, गर्भ-ग्रहणकी योग्यता, तदुपयोगी मन और स्वास्थ्य एवं तदुपयोगी काल—इन सब बातोंको सोच-समझकर विवाहित पति-पत्नीके संसर्ग करनेसे उत्तम सन्तान होती है। मनमाने रूपमें अथवा स्त्रीके ऋतुमती होते ही शास्त्रकी दुहाई देकर पशुवत् आचरण करनेसे तो हानि ही होती है।

जिनको सन्तान न होती हो, उन्हें पहले तो पति-पत्नी दोनोंके शरीरकी परीक्षा करवा लेनी चाहिये और गर्भाधानमें रुकावट डालनेवाला कोई रोग हो तो उसकी चिकित्सा करानी चाहिये। रोग न हो और पुत्रकी इच्छा प्रबल हो—(यद्यपि संसार-बन्धनसे मुक्तिके लिये पुत्रकी जरा भी आवश्यकता नहीं है। सन्तानके मोहसे तो बन्धन बढ़ता ही है) तो ‘हरिवंशपुराण’ का श्रद्धा-भक्तिके साथ मनोयोगपूर्वक श्रवण करना चाहिये। यथाशक्ति दक्षिणा देकर सात्त्विक प्रकृतिके वयोवृद्ध, सदाचारी तथा भगवद्विश्वासी पवित्र ब्राह्मणके द्वारा कथा सुननेपर भगवत्कृपासे सुपुत्रकी प्राप्ति होना कोई बड़ी बात नहीं है। इसके लिये ‘सन्तान-गोपाल’ मन्त्रका जप भी किया जाता है। वह मन्त्र है—

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:॥

इस मन्त्रका जप हो सके तो विश्वास तथा श्रद्धापूर्वक पति-पत्नी दोनोंको करना चाहिये। प्रात:काल स्नान करके नित्यकर्म (पुरुष सन्ध्या-वन्दनादि तथा स्त्री नियमित दैनिक जप-पाठ आदि) करनेके बाद तुलसीकी मालासे उक्त मन्त्रका जप करना चाहिये। जपके समय सामने किसी धोयी हुई पवित्र चौकीपर या दीवालपर भगवान् श्रीकृष्णका सुन्दर चित्रपट (मढ़ाई हुई तस्वीर) रख लेना चाहिये और भगवद्भावसे उसकी पूजा करनी चाहिये। पूजामें चन्दन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाकर जलसे आचमन कराना चाहिये। फिर मुखशुद्धिके लिये पान या इलायची चढ़ाकर कपूरसे आरती करनी चाहिये। फिर फूल चढ़ाकर प्रणाम करना चाहिये। पूजाकी सामग्री शुद्ध होनी चाहिये। यों पूजा-प्रणाम करनेके बाद भगवान‍्से कातरभावयुक्त प्रार्थना करनी चाहिये तथा यह विश्वास करना चाहिये कि भगवान‍्के कृपा-प्रसादसे हमें अवश्य सत्पुत्रकी प्राप्ति होगी—प्रार्थनाका यह भाव है—‘दयामय श्रीभगवन्! हमें पुत्र देनेकी कृपा करें। वह पुत्र सुयोग्य, दीर्घजीवी, सुन्दर, सच्चरित्र, मेधावी, सुखी-जीवन और भगवद्भक्त हो।’

इस प्रार्थनाके पश्चात् तुलसीकी मालापर जप आरम्भ करना चाहिये। पत्नी न कर सके तो पति ही करे। प्रतिदिन ५५ मालाका जप अवश्य करें। इस प्रकार पूरा एक मास जप करनेपर मन्त्र सिद्ध हो जाता है। इसके बाद यथासाध्य प्रतिदिन विश्वासके साथ नियमित जप चालू रखना चाहिये। मन्त्र-सिद्धि होनेके बाद जब पत्नी ऋतुस्नाता हो, तब पुत्रकी प्राप्तिके लिये ही—काम-विकारके वश होकर नहीं, युग्म रात्रिमें गर्भाधान करना चाहिये।

यहाँ गर्भाधानके कालके सम्बन्धमें शास्त्रकी जो व्यवस्था है, उसे संक्षेपमें लिखा जाता है—

लग्न, सूर्य और चन्द्रके पापयुक्त और पापमध्यगत न होनेपर, सप्तम स्थानमें पापग्रह न रहनेपर और अष्टम स्थानमें मंगल एवं चतुर्थमें पापग्रह न रहनेपर तथा राशि, लग्न और लग्नके चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम और दशम स्थान शुभग्रहयुक्त होनेपर एवं तृतीय, षष्ठ और एकादश स्थान पापयुक्त होनेपर ‘गण्ड’ समयका त्याग करके युग्म रात्रिमें पुरुषके चन्द्रादि शुद्ध होनेपर उसे गर्भाधान करना चाहिये।*

ऋतुके पहले दिनसे सोलहवें दिनतक ऋतुकाल माना गया है, इसमें पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रिको छोड़कर युग्म रात्रियोंमेंसे किसी रात्रिको गर्भाधान करना चाहिये। ज्येष्ठा, मूल, मघा, अश्लेषा, रेवती, कृत्तिका, अश्विनी, उत्तरा-फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र तथा पर्व, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी, एकादशी, व्यतिपात, संक्रान्ति, इष्टजयन्ती आदि पर्वोंका त्याग करके गर्भाधान करना चाहिये।

मनुमहाराजके कथनानुसार सोलह रात्रियाँ ऋतुकालकी हैं। इनमें रक्तस्रावकी पहली चार रात्रियाँ अत्यन्त निन्दित हैं। ये चार तथा ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि—इस प्रकार छ: रात्रियोंमें संसर्ग निषिद्ध है। शेष दस रात्रियोंमें छठी, आठवीं और दसवीं आदि युग्म रात्रिमें गर्भाधान होनेपर पुत्र एवं पाँचवीं, सातवीं आदि अयुग्म रात्रियोंमें होनेपर कन्या होती है। ऋतुकालकी निन्दित छ: रात्रि और अनिन्दित दस रात्रियोंमें कोई-सी भी आठ रात्रि—यों चौदह रात्रियोंको छोड़कर शेष पर्ववर्जित दो रात्रियोंमें स्त्री-संसर्ग करनेवालेके ब्रह्मचर्यकी हानि नहीं होती। वह गृहस्थाश्रममें रहते हुए ही ब्रह्मचारी है।

इसमें रजोदर्शनके निकटकी रात्रियोंमें उत्तर-उत्तर रात्रियाँ अधिक प्रशस्त हैं। सत्रहवीं रात्रिसे पुन: रजोदर्शनकी चौथी रात्रितक सर्वथा संयमसे रहना चाहिये। भोगकी संख्या जितनी ही कम होगी उतनी ही शुक्रकी नीरोगता, पवित्रता और शक्तिमत्ता बढ़ेगी। भोग-सुख भी उसीमें अधिक प्राप्त होगा और सन्तान भी स्वस्थ, पुष्ट, धर्मशील, मेधावी तथा संवर्धनशील होगी।

इसी प्रकार कालका भी बड़ा महत्त्व है। दिनमें गर्भाधान सर्वथा निषिद्ध है। दिनके गर्भाधानसे उत्पन्न सन्तान दुराचारी और अधम होती है। सन्ध्याकी राक्षसीवेलामें घोरदर्शन विकटाकार राक्षस तथा भूत-प्रेत-पिशाचादि विचरण करते रहते हैं। इसी समय भगवान् भवानीपति भी भूतोंसे घिरे हुए घूमते रहते हैं। दितिके गर्भसे हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु-सरीखे महान् दानव इसीलिये उत्पन्न हुए थे कि उन्होंने आग्रहपूर्वक सन्ध्याकालमें अपने स्वामी महात्मा कश्यपजीके द्वारा गर्भाधान करवाया था। रात्रिके तृतीय प्रहरकी सन्तान हरिभक्त और धर्मपरायण हुआ करती है।

गर्भाधानके समय शुद्ध सात्त्विक विचार होने चाहिये। चरकसंहिता शरीर अष्टम-अध्यायमें बताया गया है कि ‘गर्भाधानके समय रजवीर्यके मिश्रणकालमें माता-पिताके मनमें जैसे भाव होते हैं, वे ही भाव पूर्वकर्मके फलका समन्वय करते हुए गर्भस्थ बालकमें प्रकट होते हैं।’

जैसी धार्मिक, शूर, विद्वान्, तेजस्वी सन्तान चाहिये, वैसा ही भाव रखना चाहिये और ऋतुस्नानके बाद प्रतिदिन वैसी ही वस्तुओंको देखना और चिन्तन करना चाहिये। महर्षि चरकने लिखा है कि ‘जो स्त्री पुष्ट, बलवान् और पराक्रमी पुत्र चाहती हो उसे ऋतुस्नानके पश्चात् प्रतिदिन प्रात:काल सफेद रंगके बड़े भारी साँड़को देखना चाहिये।’ ‘हमारे शास्त्रोंमें कहा गया है और यह विज्ञानसिद्ध है कि ऋतुस्नानके पश्चात् स्त्री पहले-पहल जिसको देखती है, उसीका संस्कार उसके चित्तपर पड़ जाता है और वैसी ही सन्तान बनती है। एक अमेरिकन स्त्रीके कमरेमें एक हब्शीकी तस्वीर टँगी थी। उसने ऋतुस्नानके बाद पहले उसीको देखा था और गर्भकालमें भी प्रतिदिन उसीको देखा करती थी। उसका गर्भस्थ बालकपर इतना प्रभाव पड़ा कि उस बालकका चेहरा ठीक हब्शीका-सा हो गया। एक ब्राह्मण-स्त्रीने ऋतुस्नानके बाद एक दुष्ट प्रकृतिके पठानको अचानक देख लिया था, इससे उसका वह बालक ब्राह्मणोंके आचरणसे हीन पठान-प्रकृतिका हुआ। सुश्रुत-शारीरस्थानके द्वितीय अध्यायमें लिखा है कि ऋतुस्नान करनेके बाद स्त्रीको पति न मिलनेपर वह कभी-कभी कामवश स्वप्नमें पुरुष-समागम करती है। उस समय अपना ही वीर्य रजसे मिलकर जरायुमें पहुँच जाता है और वह गर्भवती हो जाती है। परंतु उस गर्भमें पति-वीर्यके अभावमें अस्थि आदि नहीं होते, वह केवल मांसपिण्डका कुम्हड़ा-जैसा होता है या साँप, बिच्छू, भेड़िया आदिके आकारके विकृत जीव ऐसे गर्भसे उत्पन्न होते हैं। ऋतुकालमें कुत्ते, भेड़िये, बकरे, आदिके मैथुन देखनेपर भी उसी भावके अनुसार रातको स्वप्न आते हैं और ऐसे विकृत जीव गर्भमें निर्माण हो जाते हैं।’

इसके अतिरिक्त गर्भवती स्त्रीको गर्भकालमें बहुत सावधानीके साथ सद्विचार, सत्संग, सत्-आलोचन, सद‍्ग्रन्थोंका अध्ययन और सत् तथा शुभ दृश्योंको देखना चाहिये। गर्भकालमें प्रह्लादकी माता कयाधू देवर्षि नारदजीके आश्रममें रहकर नित्य हरिचर्चा सुनती थीं, इससे उनके पुत्र प्रह्लाद महान् भक्त हुए। सुभद्राके गर्भमें ही अभिमन्युने अपने पिता अर्जुनके साथ माताकी बातचीतमें ही चक्रव्यूह-भेदन करनेकी कला सीख ली थी।