गर्भिणीके लिये आहार-विहार
जननीकी शारीरिक और मानसिक स्थिति—खास करके उसके गर्भावस्थाके आहार-विहार और मानसिक स्थितिके ऊपर ही होनेवाली सन्तानका स्वास्थ्य और स्वभाव अधिकांशमें निर्भर करता है। गर्भधारणके बाद स्त्रीको बहुत सावधानीसे आवश्यक नियमोंका पालन करना चाहिये। आजकल इस सम्बन्धमें स्त्रियाँ बहुत असावधान रहती हैं। इसीसे गर्भपातकी संख्या बढ़ रही है और साथ ही स्त्रियोंके रोगोंकी भी। माता जो कुछ खाती है, उसीका परिपाक होनेपर उसके सारसे जो रस बनता है उसका एक अंश स्तन-दुग्धके रूपमें परिणत होता है और दूसरा अंश रक्तके रूपमें परिणत होकर गर्भका पोषण करता है। माताके इस आहार-रसके द्वारा ही गर्भस्थ शिशु बढ़ता और पुष्ट होता है। अतएव माता यदि सुपथ्यका सेवन तथा गर्भिणीके नियमोंका पालन करती है तो सन्तान सहज ही हृष्ट-पुष्ट होती है और ठीक समयपर उसका प्रसव भी सुखपूर्वक होता है। ऐसा न करनेपर माताको कष्ट होनेके साथ ही सन्तान भी जीवनभर रोगोंसे घिरी रहती है।
आहार
गर्भिणीको रुचिकारक, स्निग्ध, हलका, अधिक हिस्सा मधुर और अग्निदीपक (सोंठ, पीपल, काली मिर्च, अजवायन आदि) द्रव्योंके संयोगसे बना हुआ भोजन करना चाहिये। चबानेमें कष्ट हो, ऐसी चीज नहीं खानी चाहिये। चरक-सुश्रुतमें गर्भिणीको मीठे पदार्थ खानेकी सम्मति दी गयी है। मीठे पदार्थोंमें दूध, घी, मक्खन, चावल, जौ, गेहूँ, मूँग आदि अन्न; खीरा, नारियल, पपीता, कसेरू, पके टमाटर आदि फल; किसमिस, खजूर आदि मेवा और लौकी, कुम्हड़ा आदि साग समझने चाहिये। इनका पचनेयोग्य मात्रामें सेवन करना चाहिये।
गर्भिणीके लिये दूध सर्वोत्तम खाद्य है। पहले और दूसरे महीने सुबह-शाम अन्न और अन्य समय परिमित मात्रामें गुनगुना दूध लेना चाहिये। तीन-चार बारमें प्रतिदिन कम-से-कम एक सेर दूध पीना उचित है। तीसरे महीने शहद और घी मिलाकर और चौथे महीने दूध और मक्खनके साथ अन्न लेना चाहिये। पाँचवें महीने भी दूध-घीके साथ भोजन करना चाहिये। छठे और सातवें महीने गोखुरूके साथ घीको पकाकर उपयुक्त मात्रामें पीना चाहिये। चरकमें कहा गया है कि सातवें महीने पेटकी चमड़ी फट जाती है और शरीरपर खुजलाहट होती है। इस समय बेरके क्वाथ और शतावरी तथा विदारीकन्द आदिको मक्खनके साथ पकाकर उसकी दो तोला.......मात्रा गर्भिणीको पिलानी चाहिये और पेट तथा छातीपर चन्दनका लेप करना अथवा कवरी वृक्षके पत्तोंको तिलके तेलमें पकाकर वह तेल शरीरपर लगाना चाहिये। शरीर अधिक फट जाय और खुजली बहुत ज्यादा हो तो मालती-पुष्प और मुलहठीको जलमें पकाकर उस जलसे शरीर धोना चाहिये। आठवें महीने दूधमें पकाकर जौ (बारली) और साबूदाने आदि कुछ घी मिलाकर देना चाहिये। गर्भिणीकी मलशुद्धि हो और वायु सरल रहे, इसके लिये उसे दूधके साथ शतावरी देनी चाहिये तथा आवश्यक हो तो शतावरी, विदारीकन्द, गोखुरू आदिको तिलके तेलमें पकाकर उस तेलकी पिचकारी भी दी जा सकती है। गर्भिणीको उपवास नहीं करना चाहिये। चरक-सुश्रुतके इस मतसे ऐसा जान पड़ता है कि गर्भिणीके लिये दूध, हलका अन्न ही उत्तम भोजन है।
गर्भिणीका कोठा साफ रहे और पेशाब सरलतासे होता रहे, इस ओर विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। पके पपीते, टमाटर, खीरे, सन्तरे और सेब तथा हरी सब्जी आदि खानेसे कब्ज मिटता है और खून भी साफ होता है। दिन-रातमें कम-से-कम चार-पाँच बार पेशाब हो जाना चाहिये, नहीं तो समझना चाहिये, पेशाब कम होता है और वैसी हालतमें जल तथा दूधकी मात्रा बढ़ा देनी चाहिये। कच्चे दूधके साथ समान मात्रामें जल मिलाकर सुबह-शाम एक-एक कटोरी पी लेनेसे पेशाब साफ होने लगता है।
गर्भिणीको गुरुपाक (भारी) भोजन, अधिक मसाले, लाल मिर्च और ज्यादा गरम चीजें नहीं खानी चाहिये। सड़ी-बासी और रूखी चीजें तो बिलकुल ही नहीं! भोजन खूब चबा-चबाकर करना चाहिये और सन्ध्याका भोजन सात बजेसे पहले ही कर लेना चाहिये। आजकल चाय खूब चल रही है। स्त्रियोंमें भी इसकी लत बढ़ रही है, पर गर्भावस्थामें चाय बहुत हानिकारक है। किसी भी तरह न रहा जाय तो चाय बहुत ही थोड़ी और दूध अधिक मिलाकर लेना चाहिये। पान भी न खाया जाय तो अच्छा है। पानके साथ सुरती या जर्दा तो खाना ही नहीं चाहिये। कोयला, ठीकरी, मिट्टी आदि चीजें बिलकुल नहीं खानी चाहिये। इन चीजोंके खानेसे प्रसवमें पीड़ा होती है, रतौंधी हो जाती है, गर्भको नुकसान पहुँचता है और बहुधा बच्चे दुर्बल, नेत्ररोगी और अन्धेतक पैदा होते हैं।
अनुभवी लोगोंके द्वारा कहा जाता है कि गर्भधारणके बाद पहलेसे दूसरे महीनेतक ५ से १० ग्रेनतक सोडा-बाईकार्ब (Soda-bicarb) दिनमें दो बार खानेसे गर्भस्थ सन्तान पुत्र होती है। जर्मनीमें इसका प्रयोग किया गया था।
विहार
सुश्रुतमें कहा गया है कि गर्भिणीको पहले दिनसे ही सदा प्रफुल्लितचित्त, पवित्र अलंकारों और साफ-सफेद वस्त्रोंसे भूषित, शान्ति और मंगल-कार्योंमें निरत तथा देवता और बड़ोंकी भक्ति करते रहना चाहिये। इस अवस्थामें बड़ी सावधानीसे चलना-फिरना चाहिये; क्योंकि अकस्मात् पैर फिसलकर गिर जानेसे गर्भपात हो सकता है। सदा शुद्धाचारसे रहना चाहिये। गर्भिणीको भक्तों, महापुरुषों, सन्तों और शूरवीरोंके जीवन-चरित्र तथा श्रीहरि-कथा आदि सुननी चाहिये। इनसे बहुत लाभ है।
गर्भिणीको ज्यादा मोटा कपड़ा नहीं पहनना चाहिये। साड़ी तथा अंगका वस्त्र चुस्त न होकर कुछ ढीला रहे। कपड़ा, बिछौना तथा बैठनेका आसन साफ-सुथरा और कोमल हो। बिछौना बहुत ऊँचेपर न हो, बिछौनेपर नरम तकिया रहे, गर्भिणीको शरीर सह सके, जैसे ठण्डे या गरम जलसे नहाना चाहिये। शरीरको साफ रखना चाहिये, जिससे रोमावलियोंके छेद खुले रहें। आजकल पढ़ी-लिखी स्त्रियोंमें ऊँची एड़ीके जूतोंका प्रचार बढ़ रहा है। यह बड़ा हानिकारक है। इससे स्नायुओंपर दबाव पड़ता है, पैर खिंचने लगते हैं और चलते समय कुछ टेढ़े भी हो जाते हैं। ये कभी न पहनने चाहिये और गर्भावस्थामें तो बिलकुल नहीं । नरम सपाट देशी जूती या चप्पल अथवा बिना एड़ीकी स्लीपरका व्यवहार करना चाहिये।
गर्भिणीको भोजनके बाद कुछ देर आराम करना चाहिये, परंतु दिनमें सोना नहीं चाहिये। न दिनभर लगातार बैठे ही रहना चाहिये। थोड़ी मेहनतके घरके काम करते रहना चाहिये। प्रतिदिन हलकी चक्कीसे थोड़ा पीसना चाहिये। कुछ देर रोज शुद्ध वायुमें टहलना बहुत हितकर है, चाहे घरके आँगन या छतपर ही घूम लिया जाय। नौकर-नौकरानियाँ होनेपर भी प्रतिदिन कुछ शारीरिक परिश्रम अवश्य करना चाहिये।
न करनेकी आठ बातें
(१) मैथुन बिलकुल न करना, (२) टट्टी-पेशाबकी हाजत न रोकना, (३) बहुत तेज चलनेवाली सवारियोंपर न चढ़ना, (४) कूद-फाँद या दौड़-भाग न करना, बहुत टेढ़ा-मेढ़ा न होना, टेढ़ी करवट न लेना, (५) बोझ न उठाना, (६) परिश्रम करना; परंतु ऐसा काम न करना जिससे थकावट हो, (७) दिनमें न सोना और रातको न जागना और (८) मन खिन्न हो, ऐसा कोई काम न करना। गर्भके अन्तिम दो महीने गर्भिणीको विशेष आरामकी आवश्यकता है; क्योंकि इस समय बच्चेका वजन ३.५ से ७.५ पाउण्डतक होता है।
ये तो प्रधान हैं। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित कार्य भी नहीं करने चाहिये—जैसे सदा चित होकर सोना, बहुत जोरोंसे बोलना या हँसना, उकड़ू बैठना, बहुत सीढ़ियाँ चढ़ना, अकेले कहीं जाना या सोना, क्रोध-शोक-भय आदि करना, मैले, विकलांग या विकट आकृतिके व्यक्तियोंका स्पर्श करना, दुर्गन्ध, बीभत्स दृश्य या पदार्थका सूँघना, देखना, जनशून्य घरमें रहना, अधिक तेल मसलना या हल्दी-उबटन आदिसे शरीर मलना, लाल रंगकी साड़ी पहनना और किसी दूसरी स्त्रीके प्रसवके समय उसके पास रहना। इनके करनेसे भी गर्भको हानि पहुँचनेकी सम्भावना है।
गर्भ-धारणके बाद सातवें महीनेसे लेकर बालकके प्रसव होनेके समयतक स्तनोंकी भलीभाँति देख-रेख करनी चाहिये। स्तनोंको अच्छी तरह धोना चाहिये और उनकी बोंटीके चारों ओर घी लगाना चाहिये तथा उन्हें दिनमें दो-तीन बार हलके हाथसे खींचना चाहिये जिससे बोंटी बच्चेके स्तन पीनेके लिये काफी बड़ी हो जाय।