हिन्दू-शास्त्रों में नारीका महान् आदर
कुछ लोग ऐसा कहते हैं और आजकल हमारी कुछ हिन्दू-देवियाँ भी अज्ञानवश ऐसा मानने तथा कहने लगी हैं, ‘हिन्दू-शास्त्रोंमें नारीका बड़ा तिरस्कार किया गया है।’ परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। हिन्दू-विवाह पवित्र धार्मिक संस्कार है, हिन्दू-नारी पतिकी अर्धांगिनी है, पतिपर उसका पूर्ण अधिकार है, वह भोग-सामग्री नहीं है, वह तो पवित्र संस्कारवती संसार-सागरसे तरकर मोक्षको प्राप्त करनेवाली और पतिको भी अपने पवित्र भावोंसे परमधाममें पहुँचानेवाली देवी है। असलमें नारीको भोगकी सामग्री तो भारतेतर देशोंने ही माना है। इसीसे वहाँ बाहरी सौन्दर्यका मूल्य है और इसीसे जरा-सी अनबनमें पवित्र विवाह-बन्धन टूट जाता है। इस पाशविकताको वहाँ ‘स्वतन्त्र प्रेम’ कहा गया है। वह प्रेम केवल भोगतक ही सीमित है; इसीलिये वह कभी किसीसे और कभी किसीसे हो सकता है। इसीसे भारतेतर देशोंमें नारी न तो घरकी सम्राज्ञी है और न वह पतिकी अर्धांगिनी ही है। नारीके प्रति हिन्दू-शास्त्रोंके विचार बड़े ही ऊँचे, आदरणीय तथा नारी-जातिके गौरवको बढ़ानेवाले हैं। मनुमहाराजके नारी-जातिके सम्बन्धमें जो उदार तथा आदरपूर्ण उद्गार हैं, वे तो बड़े ही प्रभावशाली हैं। मनुके उन पवित्र उद्गारोंको पढ़कर यूरोपके नामी विद्वान् ‘नीत्से’ महोदय चकित हो गये थे और उन्होंने लिखा था—
अर्थात् ‘मनुस्मृतिको छोड़कर मेरे देखनेमें ऐसी कोई भी दूसरी कानूनी पुस्तक नहीं आयी; जिसमें स्त्रियोंके प्रति इतने अधिक ममतापूर्ण और दयापूर्ण उद्गार हों। इन प्राचीन सफेद बालोंवाले ऋषियों-सन्तोंका स्त्रियोंके प्रति सम्मानका ऐसा ढंग है कि उसका कदाचित् अतिक्रमण नहीं हो सकता।’
यहाँ हिन्दू-शास्त्रोंके नारी-सम्मान-सम्बन्धी विचारोंके कुछ श्लोक नमूनेके तौरपर दिये जाते हैं—
ऋग्वेद दशम मण्डलके पचासी सूत्रकी ऋषिका सूर्याने भगवान्से स्त्रियोंके सौभाग्यवती रहनेकी अभ्यर्थना की है और स्त्रीके प्रति कहा है—
सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्रवां भव।
ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु॥
‘वधू! तू ससुरालमें जाकर (अपने सद्व्यवहारसे) सास, ससुर, ननद (देवरानी-जेठानियों) के ऊपर आधिपत्य जमाकर सबकी सम्राज्ञी (महारानी) होकर रह।’
मनुमहाराजने कहा है—
पितृभिर्भ्रातृभिश्चैता: पतिभिर्देवरैस्तथा।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभि:॥
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:॥
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा॥
जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिता:।
तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्तत:॥
तस्मादेता: सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनै:।
भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च॥
(३। ५५—५९)
परम कल्याण चाहनेवाले पिता, भाई, पति, देवर—इन सभीको चाहिये कि वे स्त्रियोंका सत्कार करें और उन्हें भूषण-वस्त्रादिसे अलंकृत करें। जिस परिवारमें स्त्रियोंका पूजन-सत्कार किया जाता है, वहाँ सम्पूर्ण देवता प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं (उस कुलको देवताओंका आशीर्वाद प्राप्त होता है) और जिस कुलमें स्त्रियोंका आदर-सत्कार नहीं होता, उस कुलकी सम्पूर्ण क्रियाएँ, सारे धर्म-कर्म निष्फल हो जाते हैं। जिस कुलमें बहिन, बेटी, बहू और माता आदि स्त्रियाँ दु:खी रहती हैं, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जिस कुलमें ये दु:खी नहीं रहतीं वह सदा वृद्धिको प्राप्त—उन्नत होता है। स्त्रियाँ उचित सम्मान न मिलनेके कारण जिन घरोंको शाप दे देती हैं, वे घर कृत्यासे सताये हुएकी भाँति सब ओर (धन-धान्य, सुख-सम्पत्ति, मान-प्रतिष्ठा, धर्म-कर्म) से नष्ट हो जाते हैं। इसलिये कल्याणकामी पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा वस्त्र, आभूषण और उत्तम भोजनादिसे—अर्थात् इन सभी चीजोंकी इन्हें स्वामिनी बनाकर—इनका समादर करें और प्रत्येक शुभ अवसरों—उत्सवोंपर उनका भलीभाँति (विशेषरूपसे) सत्कार करें।
स्त्रीधनानि तु ये मोहादुपजीवन्ति बान्धवा:।
नारीयानानि वस्त्रं वा ते पापा यान्त्यधोगतिम्॥*
(३। ५२)
‘जो सगे-सम्बन्धी (पिता, भाई, ससुर और देवर आदि) मोहमें पड़कर नारीकी धन-सम्पत्ति, उसके बैल-घोड़े, गाड़ी आदि सवारियाँ और उसके गहने-कपड़े अपहरण करके स्वयं भोगते हैं, उससे अपनी आजीविका चलाते हैं, वे पापबुद्धि मनुष्य भयानक अधोगतिको—नरकोंको प्राप्त होते हैं।’
जीवन्तीनां तु तासां ये तद्धरेयु: स्वबान्धवा:।
ताञ्छिष्याच्चौरदण्डेन धार्मिक: पृथिवीपति:॥
(मनु० ८। २९)
‘जो सगे-सम्बन्धी नारीके जीवित कालमें ही उसका धन हरण कर लें, उनको धार्मिक राजा चोरके समान दण्ड दे।’
सद्वृत्तचारिणीं पत्नीं त्यक्त्वा पतति धर्मत:॥
(व्यास० २। ४७)
‘सदाचारिणी पत्नीका त्याग करके पुरुष धर्मसे पतित होता है।’
मान्या चेन्म्रियते पूर्वं भार्या पतिविमानिता।
त्रीणि जन्मानि सा पुंस्त्वं पुरुष: स्त्रीत्वमर्हति॥
(कात्यायनस्मृति ३। १३)
‘मान पानेयोग्य स्त्री यदि पतिके द्वारा अपमानित होकर पहले मर जाती है तो वह स्त्री तीन जन्मोंतक पुरुष बनती है और वह पुरुष तीन जन्मोंतक स्त्री।’
स्त्रियो वृद्धाश्च बालाश्च न दुष्यन्ति कदाचन।
(पराशरस्मृति ७। ३७)
‘स्त्री’ वृद्ध और बालक—ये कभी दूषित नहीं होते।’
पतयोऽर्धेन चार्धेन पत्नॺोऽभूवन्निति श्रुति:।
यावन्न विन्दते जायां तावदर्धो भवेत् पुमान्॥
(व्यासस्मृति २। १३)
‘आधे देहसे पति और आधेसे पत्नी हुई है, यह श्रुति कहती है। जबतक पुरुष स्त्रीसे विवाह नहीं करता, तबतक वह आधा ही होता है।’
कर्म कुर्यात् प्रतिदिनं विधिवत् प्रीतिपूर्वत:।
सम्यग्धर्मार्थकामेषु दम्पतिभ्यामहर्निशम्॥
एकचित्ततया भाव्यं समानव्रतवृत्तित:।
न पृथग्विद्यते स्त्रीणां त्रिवर्गविधिसाधनम्॥
(व्यासस्मृति २। १७-१८)
‘प्रतिदिन विधि और प्रीतिके साथ वैध कर्मोंको करे। स्त्री-पुरुष दोनों धर्म, अर्थ, कामोंमें रात-दिन भलीभाँति एकमन, एकव्रत और एकवृत्तिसे लगे रहें। स्त्रियोंके लिये पतिसे पृथक् धर्म, अर्थ, कामका कोई भी विधान नहीं है।’
प्रजनार्थं महाभागा: पूजार्हा गृहदीप्तय:।
श्रिय: स्त्रियश्च लोकेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन॥
(मनु० ९। २६)
‘सन्तानको जन्म देनेवाली होनेके कारण स्त्रियाँ महान् भाग्यशालिनी हैं, वे घरकी दीप्ति हैं, उनका वस्त्राभूषणोंसे सम्मान करना चाहिये। स्त्री और लक्ष्मीमें कोई भेद नहीं है।’
भर्तृभ्रातृपितृज्ञातिश्वश्रूश्वशुरदेवरै: ।
बन्धुभिश्च स्त्रिय: पूज्या भूषणाच्छादनाशनै:॥
(याज्ञवल्क्यस्मृति १। ८२)
‘पति, भ्राता, पिता, कुटुम्बी, सास, श्वशुर, देवर, बन्धु-बान्धव इस प्रकार स्त्रीके सभी सम्बन्धियोंका कर्तव्य है कि वे वस्त्राभूषणादिके द्वारा उसका पूजन-सत्कार करें।’*
उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।
सहस्रं तु पितॄन् माता गौरवेणातिरिच्यते॥
(मनु० २। १४५)
‘दस उपाध्यायोंकी अपेक्षा आचार्य, सौ आचार्योंकी अपेक्षा पिता और हजार पिताओंकी अपेक्षा माताका गौरव अधिक होता है।’
सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता।
मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्॥
(पद्मपु०, सू० ७४।११)
‘माता सर्वतीर्थमयी है और पिता समस्त देवताओंका स्वरूप है, इसलिये सब प्रकारसे यत्नपूर्वक माता-पिताका पूजन करना चाहिये।’
जनको जन्मदातृत्वात् पालनाच्च पिता स्मृत:।
गरीयान् जन्मदातुश्च योऽन्नदाता पिता मुने॥
तयो: शतगुणं माता पूज्या मान्या च वन्दिता।
गर्भधारणपोषाभ्यां सा च ताभ्यां गरीयसी॥
(ब्रह्मवैवर्तपु०, गणेश० ४०)
‘जन्मदाता तथा पालनकर्ता होनेके कारण सब पूज्योंमें पूज्यतम जनक और पिता कहलाता है। जन्मदातासे भी अन्नदाता पिता श्रेष्ठ है। इनसे भी सौगुनी श्रेष्ठा और वन्दनीया माता है; क्योंकि वह गर्भधारण और पोषण करती है।’
पुरुषाणां सहस्रं च सती स्त्री हि समुद्धरेत्।
पति: पतिव्रतानां च मुच्यते सर्वपातकात्॥
नास्ति तेषां कर्मभोग: सतीनां व्रततेजसा।
तया सार्धं च निष्कर्मी मोदते हरिमन्दिरे॥
(स्कन्दपुराण)
‘सती नारी अपने सतीत्वबलसे सहस्रों मनुष्योंका उद्धार कर देतीहै। पतिव्रताका पति सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है। पतिव्रताके तेजसे सतीके स्वामीको कर्मफलभोग नहीं करना पड़ता है। वह सारे कर्मबन्धनसे छूटकर सतीके साथ भगवान्के परमधाममें आनन्दलाभ करता है।’
विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा:
स्त्रिय: समस्ता: सकलाजगत्सु।
(मार्कण्डेयपुराण)
‘समस्त विद्या और समस्त स्त्रियाँ देवीके ही विभिन्न रूप हैं।’
या याश्च ग्राम्यदेव्य: स्युस्ता: सर्वा: प्रकृते: कला:।
कलांशांशसमुद्भूता: प्रतिविश्वेषु योषित:॥
(देवीभागवत)
‘सभी ग्राम्यदेवियाँ और विश्वकी समस्त स्त्रियाँ प्रकृतिमाताकी ही अंशरूपिणी हैं।’
कृकल नामक एक वैश्य अपनी साध्वी पत्नी सुकलाको घरपर असहाय छोड़कर तीर्थयात्रा करने चले गये थे। उन्होंने अनेकों तीर्थोंमें भ्रमण किया। वहाँ श्राद्धादि सत्कर्म किये और यह समझा कि मैंने बड़े पुण्यकर्म किये हैं और मेरे सब पितरोंको दिव्य गति प्राप्त हो गयी है। इधर कृकलके पीछेसे सती सुकलापर बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आयीं, उसकी बहुत कड़ी-कड़ी परीक्षाएँ हुईं; पर वह अपने सतीत्वके बलसे सारी विपत्तियोंसे तर गयी तथा सभी परीक्षाओंमें सफलता प्राप्त की। कोई भी न तो उसका बाल बाँका कर सका और न उसके सतीत्वपर जरा भी आँच आ सकी। बड़े-बड़े देवताओंकी शक्ति कुण्ठित हो गयी। उधर जब कृकल अपनी तीर्थयात्राकी सफलताका गर्व करते हुए लौटे, तब उन्होंने अपने पिता-पितामहोंको एक विशालकाय पुरुषके द्वारा बँधे हुए देखा। पूछनेपर उस पुरुषने—जो साक्षात् धर्म थे—बतलाया कि ‘पत्नीका त्याग करके तुमने यह सब किया, इसीसे ये तुम्हारे पूर्वज बाँधे गये और इसीसे तुम्हारी तीर्थयात्रा सफल नहीं हुई।’ धर्मने जो कुछ कहा उसका संक्षिप्त यह है—
पूतां पुण्यसमां स्वीयां भार्यां त्यक्त्वा प्रयाति य:।
तस्य पुण्यफलं सर्वं वृथा भवति नान्यथा॥
धर्माचारपरां पुण्यां साधुव्रतपरायणाम्।
पतिव्रतरतां भार्यां सुगुणां पुण्यवत्सलाम्॥
तामेवापि परित्यज्य धर्मकार्यं प्रयाति य:।
वृथा तस्य कृतं सर्वो धर्मो भवति नान्यथा॥
सर्वाचारपरा भव्या धर्मसाधनतत्परा।
पतिव्रतरता नित्यं सर्वदा ज्ञानवत्सला॥
एवंगुणा भवेद् भार्या यस्य पुण्या महासती।
तस्य गेहे सदा देवास्तिष्ठन्ति च महौजस:॥
पितरो गेहमध्यस्था: श्रेयो वाञ्छन्ति तस्य च।
गंगाद्या: सरित: पुण्या: सागरास्तत्र नान्यथा॥
पुण्या सती यस्य गेहे वर्तते सत्यतत्परा।
तत्र यज्ञाश्च गावश्च ऋषयस्तत्र नान्यथा॥
तत्र सर्वाणि तीर्थानि पुण्यानि विविधानि च।
भार्यायोगेन तिष्ठन्ति सर्वाण्येतानि नान्यथा॥
पुण्यभार्याप्रयोगेण गार्हस्थ्यं सम्प्रजायते।
गार्हस्थ्यात् परमो धर्मो द्वितीयो नास्ति भूतले॥
मन्त्राग्निहोत्रं वेदाश्च सर्वे धर्मा: सनातना:।
दानाचारा: प्रवर्तन्ते यस्य पुंसश्च वै गृहे॥
एवं यो भार्यया हीनस्तस्य गेहं वनायते।
यज्ञाश्चैव न सिद्धॺन्ति दानानि विविधानि च॥
नास्ति भार्यासमं तीर्थं नास्ति भार्यासमं सुखम्।
नास्ति भार्यासमं पुण्यं तारणाय हिताय च॥
धर्मयुक्तां सतीं भार्यां त्यक्त्वा यासि नराधम।
गृहधर्मं परित्यज्य क्वास्ते धर्मस्य ते फलम्॥
तया विना यदा तीर्थे श्राद्धदानं कृतं त्वया।
तेन दोषेण वै बद्धास्तव पूर्वपितामहा:॥
भवांश्चौरस्त्वमी चौरा यैश्च भुक्तं सुलोलुपै:।
त्वया दत्तस्य श्राद्धस्य अन्नमेवं तया विना॥
सुपुत्र: श्रद्धयोपेत: श्राद्धदानं ददाति य:।
भार्यादत्तेन पिण्डेन तस्य पुण्यं वदाम्यहम्॥
यथामृतस्य पानेन नॄणां तृप्तिर्हि जायते।
तथा पितॄणां श्राद्धेन सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥
गार्हस्थ्यस्य च धर्मस्य भार्या भवति स्वामिनी।
त्वयैषा वञ्चिता मूढ चौरकर्म कृतं वृथा॥
अमी पितामहाश्चौरा यैश्च भुक्तं तया विना।
भार्या पचति चेदन्नं स्वहस्तेनामृतोपमम्॥
यदन्नमेव भुञ्जन्ति पितरो हृष्टमानसा:।
तेनैव तृप्तिमायान्ति संतुष्टाश्च भवन्ति ते।
भार्यां विना हि यो धर्म: स एव विफलो भवेत् ॥
(पद्मपुराण, भूमिखण्ड अ० ५९)
‘जो पुरुष धार्मिक आचार और श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाली सद्गुणोंसे विभूषित, पुण्यमें अनुराग रखनेवाली तथा पवित्रहृदया पतिव्रता पत्नीको अकेली छोड़कर धर्म करनेके लिये बाहर जाता है; उसका किया हुआ सारा धर्म व्यर्थ हो जाता है—इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जो सब प्रकारके सदाचारमें संलग्न रहनेवाली, प्रशंसाके योग्य आचरणवाली, धर्मसाधनमें तत्पर, सदा पातिव्रत्यका पालन करनेवाली, सब बातोंको जाननेवाली तथा ज्ञानकी अनुरागिणी है, ऐसी गुणवती, पुण्यवती और महासती नारी जिसकी पत्नी हो, उसके घरमें सर्वदा देवता निवास करते हैं। पितर भी उसके घरमें रहकर निरन्तर उसके कल्याणकी कामना करते रहते हैं। गंगा आदि पवित्र नदियाँ, सागर, यज्ञ, गौ, ऋषि तथा विविध तीर्थ भी उस घरमें मौजूद रहते हैं। पुण्यमयी पत्नीके सहयोगमें गृहस्थधर्मका पालन अच्छे ढंगसे होता है। इस भूमण्डलमें गृहस्थधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। जिसके घरमें साध्वी स्त्री होती है, उसके यहाँ मन्त्र, अग्निहोत्र, सम्पूर्ण वेद, सनातन धर्म तथा दान एवं आचार सब मौजूद रहते हैं। इसी प्रकार जो पत्नीसे रहित है, उसका घर जंगलके समान है। उसके किये हुए यज्ञ तथा भाँति-भाँतिके दान सिद्धिदायक नहीं होते। साध्वी पत्नीके समान कोई तीर्थ नहीं है, पत्नीके समान कोई सुख नहीं है तथा संसारसे तारनेके लिये और कल्याण-साधनके लिये पत्नीके समान कोई पुण्य नहीं है। जो अपनी धर्मपरायणा सती नारीको छोड़कर चला जाता है, वह मनुष्योंमें अधम है। गृह-धर्मका परित्याग करके तुम्हें धर्मका फल कहाँ मिलेगा? अपनी पत्नीको साथ लिये बिना जो तुमने तीर्थमें श्राद्ध और दान किया है, उसी दोषसे तुम्हारे पूर्वज बाँधे गये हैं। तुम चोर हो और तुम्हारे ये पितर भी चोर हैं; क्योंकि इन्होंने लोलुपतावश तुम्हारा दिया हुआ श्राद्धका अन्न खाया है। तुमने श्राद्ध करते समय अपनी पत्नीको साथ नहीं रखा था। इसीसे तुम्हारा यह कार्य व्यर्थ हुआ है। जो सुयोग्य पुत्र श्रद्धासे युक्त हो अपनी पत्नीके दिये हुए पिण्डसे श्राद्ध करता है, उससे पितरोंको वैसी ही तृप्ति होती है, जैसी अमृत पीनेसे—यह मैं सत्य-सत्य कह रहा हूँ। पत्नी ही गार्हस्थ्यधर्मकी स्वामिनी है; उसके बिना ही जो तुमने शुभ कर्मोंका अनुष्ठान किया है, यह स्पष्ट ही तुम्हारी चोरी है। जब पत्नी अपने हाथसे अन्न तैयार करके देती है, तब वह अमृतके समान मधुर होता है। उसी अन्नको पितर प्रसन्न होकर भोजन करते हैं तथा उसीसे उन्हें विशेष सन्तोष और तृप्ति होती है। अत: पत्नीके बिना जो धर्म किया जाता है, वह निष्फल होता है।’
इन कुछ अवतरणोंसे सिद्ध है कि हिन्दू-शास्त्रोंने नारीका जैसा आदर किया है, वैसा जगत्में कहीं किसी धर्मने नहीं किया है। देवी तथा जननीके रूपमें कुमारी-अवस्थासे ही नारीकी पूजा हिन्दू-शास्त्रोंमें ही है। हिन्दू-शास्त्रका मर्म न समझकर अथवा शास्त्रानभिज्ञ मनमानी करनेवाले कुछ हिन्दू-पुरुषोंका नारियोंके प्रति असद्-व्यवहार देखकर हिन्दूधर्म तथा शास्त्रोंपर दोषारोपण करना सर्वथा अज्ञानमूलक है।