हिन्दू-विवाहकी विशेषता

आर्यसंस्कृतिमें विवाह एक पवित्र संस्कार है। नर-नारीकी बलवती इन्द्रिय-लालसाको संयमित करके—प्रवृत्तिमें ही निवृत्तिका भाव रखकर जीवनको भगवान‍्की ओर लगा देनेके लिये यह संस्कार है। अन्यान्य धर्मोंमें विवाह एक प्रकारका सौदा-शर्तनामा (Contract) है, इसीलिये उसकी कानूनसे रजिस्ट्री आवश्यक होती है और वह शर्त टूटनेपर चाहे जब टूट सकता है, वैसे ही जैसे किसी व्यापारमें दो हिस्सेदार अनबन होनेपर चाहे जब अलग-अलग हो सकते हैं। पर हिन्दू-विवाह ऐसा नहीं है, वह धार्मिक कृत्य है, वह आध्यात्मिक साधना है, जिसमें न तो रजिस्ट्रीकी आवश्यकता है और न उसके कभी टूटनेका प्रश्न है। उसमें शास्त्रसंयमित उपभोग है, पितृ-ऋणकी मुक्तिके लिये सच्चरित्र पुत्रका उत्पादन है और यज्ञ-दान-पुण्यादिके द्वारा तथा पितृतर्पण-श्राद्धादि सत् कर्मोंके द्वारा शुभ धर्मका संग्रह है और संयमपूर्ण साधनाके द्वारा भगवत्प्राप्तिका परम लाभ प्राप्त करना है। इसलिये हिन्दू नर-नारीका यह पवित्र सम्बन्ध केवल जीवनभरके लिये ही नहीं, मृत्युके उपरान्त भी रहता है। हमारी विवाहकी वैदिक विधि ऐसी है कि उससे दो मिलकर एक-दूसरेके अर्द्धांग हो जाते हैं और दोनों ही त्यागपूर्वक जीवनको प्रेममय बनाकर परस्पर सुख पहुँचाते रहते हैं। दोनोंका सुख मिलकर ही एकका सुख होता है। नारी पतिकी ‘अर्द्धांगिनी’ और घरकी ‘सम्राज्ञी’ होती है। सदा दोनोंका साथ है—दोनोंका नि:संकोच व्यवहार है, पर वह मालिक और गुलामकी तरह नहीं है। वह है अभिन्नात्माकी भाँति। मानो दो देह हैं; आत्मा एक ही है। आचरणमें कहीं सख्य-भाव है, कहीं स्वामी-सेवकभाव है, कहीं प्रिया-प्रियतमभाव है तो कहीं माता-पुत्रका-सा भाव भी है, पर सर्वत्र है—केवल एकात्मभाव। यह एकात्मभाव ही हिन्दू-विवाहकी विशेषता है।