किसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये?
सास-ससुर—हिन्दू-शास्त्रानुसार सास-ससुर वस्तुत: माता-पिताकी अपेक्षा भी अधिक पूजनीय और श्रद्धाके पात्र हैं; क्योंकि वे आत्माकी अपेक्षा भी अधिक प्रियतम पतिको जन्म देनेवाले उनके पूजनीय माता-पिता हैं। अपने हाथों उनकी सेवा करना, आज्ञा मानना, उन्हें प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करना, उनकी अनुचित बातको भी सह लेना तुम्हारा धर्म है। सास-ससुर असलमें मानके भूखे होते हैं। जिन सास-ससुरने पाल-पोसकर तुम्हारे स्वामीको आदमी बनाया है, वे स्वाभाविक ही यह चाहते हैं कि बहू-बेटे हमारी आज्ञा माननेवाले हों और हमारे मनके विरुद्ध कुछ भी न करें। तुम्हें ऐसा कोई भी काम या आचरण नहीं करना चाहिये, जो उनको बुरा लगता हो। कहीं जाना हो तो पहले साससे पूछ लो। कपड़ा-लत्ता मँगाना हो तो पतिसे सीधा न मँगवाकर सासकी मारफत मँगवाओ। साससे बिना पूछे या उनके मना करनेपर कोई काम मत करो। रुपये-पैसेका हिसाब-किताब सासके पास रहने दो। रोज कुछ समयतक सासके पाँव दबा दिया करो और पतिको भी ऐसा कोई काम करनेसे सम्मानपूर्वक समझाकर रोक दो, जो उनके माता-पिताके मनके विरुद्ध हो। बस, तुम्हारे इन आचरणोंसे वे प्रसन्न हो जायँगे। वस्तुत: सास-ससुरको साक्षात् भगवान् लक्ष्मीनारायण समझकर उनकी श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सेवा करनी चाहिये। तुम सेवा तथा सद्व्यवहार करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करोगी तो तुम्हारा परम कल्याण होगा।
जेठ—भगवान्ने जिनको तुम्हारे स्वामीसे बड़ा और उनका भी पूजनीय बनाकर भेजा है, वे चाहे विद्या-बुद्धिमें हीन हों, तुम्हारे लिये सदा ही आदर, सम्मान तथा सेवाके पात्र हैं। उनका हित करना, सेवा करना और उन्हें सुख पहुँचाना तुम्हारा धर्म है।
देवर—देवरको छोटा भाई मानकर उसका हित करना तथा उससे पवित्र सद्व्यवहार करना चाहिये। देवरसे हँसी-मजाक नहीं करना चाहिये और अपने पतिसे समय-समयपर कहकर देवरके मनकी बात करानी चाहिये, जिससे प्रेम बढ़े।
जेठानी-देवरानी—जेठानीको बड़ी बहिन और देवरानीको छोटी बहिन मानकर उनके प्रति यथायोग्य आदर-श्रद्धा, स्नेह और प्रेम रखना चाहिये। अपना स्वार्थ छोड़कर उन्हें सुख पहुँचानेकी चेष्टा करनी चाहिये तथा उनके बच्चोंको अपने बच्चोंकी अपेक्षा अधिक प्रिय जानकर उन्हें खाने-पीने, पहननेकी चीजें अच्छी और पहले देनी तथा उनका लाड़-प्यार करना चाहिये।
ननद—ननद तुम्हारी सासकी पुत्री और तुम्हारे स्वामीकी सगी बहिन है। उसका आदर-सत्कार सच्चे मनसे करना चाहिये और विवाहित हो तो अपनी शक्तिभर उसे खूब देना चाहिये। मातापर लड़कीका विशेष अधिकार होता है और माताका भी स्वाभाविक ही विशेष प्यार उसपर होता है। इसलिये माताके बलपर वह (ननद) तथा पुत्री—स्नेहके कारण उसकी माँ (तुम्हारी सास) तुम्हें कुछ कह ले या बर्तावमें कभी रूखापन करे तो भी तुम्हें परिस्थिति समझकर उनसे प्रेम ही करना चाहिये तथा सदा सद्व्यवहार ही करना चाहिये।
नौकर-नौकरानी—इनके प्रति विशेष प्यार और आदर रखना चाहिये। बेचारे तुम्हारी सेवा करते हैं, तुम्हारे सामने बोलनेमें संकोच करते हैं। इनको समयपर अच्छा खाना-पीना देना चाहिये। रोग-क्लेशमें पूरी सार-सँभाल रखनी चाहिये। अपने बर्तावसे इनके मनमें यह जँचा देना चाहिये कि ये इस घरके ही सदस्य हैं, पराये नहीं। जब यह तुम्हारे घरको अपना घर तथा तुम्हारे हानि-लाभको अपना हनि-लाभ मानने लगेंगे, तब तुम्हारे जीवनका भार बहुत कुछ हलका हो जायगा। कभी भूल होनेपर कुछ डाँटोगी तो ये समझेंगे कि हमारी माँ हमारे भलेके लिये हमें डाँट रही है। नौकरोंसे दिनभर चख-चख करना बहुत बुरा है और गाली-गलौज करना तो बहुत बड़ी नीचता है।
अतिथि-अभ्यागत—सेवा तो नारी-जातिका स्वाभाविक गुण है। अतिथि-अभ्यागतकी शास्त्रसम्मत सेवा करनेसे महान् पुण्य तथा निष्काम सेवा होनेपर भगवत्प्राप्ति और लोकमें यश होता है। अवश्य ही लुच्चे-लफंगोंसे सदा बचना चाहिये तथा अकेलेमें तो किसी पुरुषसे कभी मिलना ही नहीं चाहिये।
आत्मीय स्वजन—परिवारके कोई सगे-सम्बन्धी कुछ दिनके लिये घरमें आ जायँ तो भार न समझकर उनका आदर-सत्कार करना चाहिये। ऐसा व्यवहार करना चाहिये, जिससे वे बहुत सुन्दर भाव लेकर अपने घर लौटें। उनको ऐसी एक आदर्श शिक्षा मिले कि दूर-सम्पर्कीय आत्मीय स्वजनोंके साथ गृहस्थको कैसा सुन्दर आदरपूर्ण तथा मधुर बर्ताव करना चाहिये। जरा-सा भी उनका असत्कार हो जायगा तो तुम्हारे लिये कलंककी बात होगी।
विपत्तिग्रस्त स्वजन—ऐसा अवसर भी आता है कि जब कोई असहाय, अभागा व्यक्ति दरिद्रताका शिकार होकर या किसी विपत्तिमें पड़कर अपने किसी आत्मीय स्वजनके घर पहुँच जाता है तो देखा गया है कि ऐसी अवस्थामें लोग उसका जरा भी सत्कार नहीं करते और लापरवाही दिखाते हैं। यह बड़ा ही निष्ठुर व्यवहार है और महान् अधर्म है। याद रखना चाहिये कि दिन पलटनेपर तुम्हारी भी यही दशा हो सकती है। ऐसा समझकर उसका विशेष आदर-सत्कार करना तथा अपनी शक्तिभर नम्रभावसे उसकी सहायता करनी चाहिये, अहसान जताकर नहीं।
बिपतिकाल कर सतगुन नेहा।
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥
पड़ोसी—पड़ोसियोंको अपने सद्व्यवहारसे अपना सच्चा मित्र बना लेना धर्म तो है ही, स्वार्थ भी है। बुरे समयमें मित्र पड़ोसियोंसे बड़ी सहायता मिलती है और वैरी पड़ोसियोंसे विपत्ति बढ़ जाया करती है। अतएव उनके प्रति सदा सम्मान, सत्य, प्रेम तथा उदारताका व्यवहार करना चाहिये। सम्मान, सत्य, प्रेम तथा हित करनेपर वैरी भी अपने हो जाया करते हैं।