लज्जा नारीका भूषण है

असन्तुष्टा द्विजा नष्टा: सन्तुष्टा एव पार्थिवा:।

सलज्जा गणिका नष्टा लज्जाहीना: कुलस्त्रिय:॥

‘सन्तोषहीन ब्राह्मण, सन्तोषी राजा, लजवन्ती वेश्या और लज्जाहीन कुलवधूका नाश निश्चित है।’

जिस प्रकार स्त्रियोंका जेलकी काल-कोठरीकी तरह बन्द रहना उनके लिये हानिकर है, उसी प्रकार—वरं उससे भी कहीं बढ़कर हानिकर उनका स्त्रियोचित लज्जाको छोड़कर पुरुषोंके साथ निरंकुशरूपसे घूमना-फिरना, पार्टियोंमें शामिल होना, पर-पुरुषोंसे नि:संकोच मिलना, सिनेमा तथा गन्दे खेल-तमाशोंमें जाना, सिनेमामें नटी बनना, पर-पुरुषोंके साथ खान-पान तथा नृत्य-गीतादि करना आदि है। नारीके पास सबसे मूल्यवान् तथा आदरणीय सम्पत्ति है उसका सतीत्व। सतीत्वकी रक्षा ही उसके जीवनका सर्वोच्च ध्येय है। इसीलिये वह बाहर न घूमकर घरकी रानी बनी घरमें रहती है। इसी कारणसे उसके लिये अवरोध-प्रथाका विधान है। जो लोग स्त्री-जातिपर सहानुभूति एवं दया करनेके भावसे उनको घरसे निकालकर बाहर खड़ी करना अपना कर्तव्य समझते हैं, वे या तो नीयत शुद्ध होनेपर भी भ्रममें हैं, उन्होंने इसके तत्त्वको समझा नहीं है या वे अपनी उच्छृंखल वासनाके अनुसार ही दया तथा सहानुभूतिके नामपर यह पाप कर रहे हैं।

लज्जाशीलतासे सतीत्व और पातिव्रत्यका पोषण और संरक्षण होता है। इसीलिये लज्जाको स्त्रीका भूषण* बतलाया गया है।

पुरुषमें पुरुष-भाव तथा नारीमें प्रकृति (देवी) भावकी प्रधानता स्वाभाविक होती है। लज्जा देवी-भाव है। इसी नैसर्गिक कारणसे नारीमें लज्जा भी नैसर्गिक होती है। पुरुष-प्रकृतिके साथ नारी-प्रकृतिका यह भेद स्वभावसिद्ध है। यों तो मनुष्यमात्रमें उसके विवेकसम्पन्न प्राणी होनेके कारण पशु-प्राणीकी भाँति आहार, निद्रा और खास करके स्त्री-पुरुषोंकी काम-चेष्टा और मैथुनादिमें निर्लज्ज भाव नहीं होता, फिर मनुष्योंमें नारी तो विशेषरूपसे लज्जाशीला होती है। नारीकी शोभा इसीमें है। लज्जाका परित्याग करना नारीके लिये गुणगौरवकी बात नहीं; बल्कि इससे उसके गौरवकी, सतीत्वकी, मानस-स्वास्थ्यकी, देवी-भावकी तथा स्वाभाविक पवित्रताकी हानि होती है। इसीसे वेदोंमें भी नारीके लिये लज्जाका विधान मिलता है। ऋग्वेद ८। ४। २६ में है—‘यो वां यज्ञेभिरावृतोऽधिवस्त्रा वधूरिव’।

‘वस्त्रद्वारा आवृत वधूकी भाँति जो यज्ञके द्वारा आवृत है,’ इसमें नारीके लिये अपने अंगोंको ढके रखनेका स्पष्ट निर्देश है। इसके अतिरिक्त अन्यान्य स्थलोंमें भी तथा रामायण, महाभारत एवं पुराणादि ग्रन्थोंमें इसके प्रचुर प्रमाण मिलते हैं। सीता, सावित्री, दमयन्ती आदि सतियोंका जो घरोंसे बाहर निकलनेका इतिहास मिलता है, वह विशेष परिस्थितिकी बात है और ऐसी विशेष परिस्थितियोंमें हिन्दूशास्त्र भी बाहर निकलनेकी आज्ञा देते हैं।

स्त्रियोंका गौरव लज्जाशीलतामें है, इसके विषयमें कुछ दूरदर्शी पाश्चात्य विद्वानोंके मत भी देखिये—

The reputation of a woman is as a crystal mirror shining and bright but liable to be sullied by every breath that comes near it. (Carvantes)

नारीकी कीर्ति स्फटिक दर्पणके सदृश है, जो अत्यन्त उज्ज्वल एवं चमकीला होनेपर भी दूसरेके एक श्वाससे भी मलिन होने लगता है। (सरवांटेस)

She is not made to be the admiration of every body but the happines of one (her husband). (Burke)

नारीकी सृष्टि, हरेकको मुग्ध करनेके लिये नहीं है वह तो एकमात्र (अपने पतिदेवता) को सुख देनेके लिये ही हुई है। (बर्क)

A woman smells sweetest, when she smells not at all. (Plantus)

सबसे अधिक सुगन्धवाली स्त्री वही है, जिसकी गन्ध किसीको नहीं मिलती। (प्लेंटस)

A women is a flower that breathes its perfume in the shade only. (Lameneis)

नारी एक ऐसा पुष्प है जो छाया (घर) से ही अपनी सुगन्ध फैलाती है। (लेमेनिस)

The flower of sweetest smell is shy and lovely. (Wordsworth)

श्रेष्ठ गन्धवाला पुष्प लजीला और चित्ताकर्षक होता है। (वर्डसवर्थ)

जो वस्तु जितनी ही मूल्यवान् तथा प्रिय होती है वह उतनी ही अधिक सावधानी, सम्मान तथा संरक्षणके साथ रखी जाती है। धन-रत्नादि अमूल्य पदार्थोंको लोग इसीलिये छिपाकर रखते हैं। हमारे यहाँ स्त्री पुरुषके विषय-विलासकी सामग्री नहीं है, वह सम्पूर्ण गार्हस्थ्य-धर्ममें सहधर्मिणी है। उसका शरीर कामका यन्त्र नहीं है वरं वह जगदम्बाके मंगल-विग्रहकी भाँति पूजनीया है। कन्यारूपमें तथा पति-पुत्रवती सतीके रूपमें वन्दनीया है। हिन्दू-शास्त्रानुसार गौरी या कुमारी-पूजनसे तथा सती-पूजनसे गृहस्थके दु:ख-दारिद्रॺ तथा शत्रु-संकटादिका नाश होता है और उसके धर्म, धन, आयु एवं बलकी वृद्धि होती है। इसलिये ससम्मान स्त्री-संरक्षणका विधान है। यह उसके साथ निर्दय व्यवहार नहीं, बल्कि उसके प्रति महान् सम्मानका निदर्शन है, साथ ही उसके सतीत्व-धर्मकी रक्षाका मंगलसाधन भी।

लज्जा छोड़कर पुरुषालयोंमें नि:संकोच घूमने-फिरनेसे पवित्र पातिव्रत्यमें क्षति पहुँचती है; क्योंकि इस स्थितिमें नारीको हजारों पुरुषोंकी विकृत दूषित दृष्टिका शिकार होना पड़ता है। श्रीदेवीभागवतमें एक कथा आती है कि शशिकला नामकी एक राजकन्याने स्वयंवरमें जानेसे इसीलिये इ‍न्कार किया था कि वहाँ अनेक राजाओंकी काम-दृष्टि मुझपर पड़ेगी और इससे मेरे पातिव्रत्यपर आघात लगेगा। यह एक वैज्ञानिक रहस्य है कि जिस नारीको बहुत-से पुरुष कामदृष्टिसे देखते हैं और खास करके जिसके नेत्रोंपर दृष्टि पड़ती है एवं परस्पर नेत्र मिलते हैं, (इसीलिये लज्जाशीला स्त्रियाँ स्वाभाविक आँखोंको नीचेकी ओर रखती हैं) उसके पातिव्रत्यमें निश्चित हानि होती है। मनुष्यके मानसिक भावोंका विद्युत्-प्रवाह उसके शरीरसे निरन्तर निकलता रहता है और वह शब्द, स्पर्श एवं दृष्टिपात आदिके द्वारा (किसी अंशमें तो बिना किसी बाहरी साधनके अपने-आप ही) दूसरेके मन और साथ ही शरीरपर असर करता है। जहाँ उसके अनुकूल सजातीय भाव पहलेसे होते हैं, वहाँ विशेष असर होता है; पर जहाँ वैसा सजातीय भाव नहीं होता, वहाँ भी कुछ-न-कुछ प्रभाव तो पड़ता ही है और यदि बार-बार ऐसा होता रहे तो क्रमश: भाव भी सजातीय बन जाते हैं। इससे यह सिद्ध है कि जिस स्त्रीके प्रति कामुक पुरुषोंकी कामशक्तिके द्वारा प्रेरित काम-भावपूर्ण कामदृष्टि बार-बार पड़ती रहेगी, यदि घनघोर पातिव्रत्यका प्रबल भाव उक्त कामदृष्टिके विकारी भावको नष्ट या परास्त करनेमें समर्थ नहीं होगा तो उस नारीके मनमें निश्चय ही चंचलता होगी, कामविकार उत्पन्न होगा और यदि उस विकारकी स्थितिमें अवसर प्राप्त हुआ तो पतन भी हो जायगा।

जिन स्त्रियोंने घर छोड़कर स्वच्छन्द पुरुषवर्गमें विचरण किया है, वे अन्यान्य बाहरी कार्योंमें चाहे कितनी ही सुख्याति प्राप्त क्यों न कर लें; पर यदि वे अन्तर्मुखी होकर अपने चरित्रपर दृष्टिपात करेंगी तो उनमेंसे अधिकांशको यह अनुभव होगा कि उनके मनमें बहुत बार विकार आया है और किसी-किसीका तो पतन भी हो गया है। बताइये, पतिव्रता स्त्रीके लिये यह कितनी बड़ी हानि है?

कुसंगके कारण कदाचित् पुरुषोंकी भाँति नारी भी कामदृष्टिसे पुरुषोंको देखने लगे, तब तो पुरुषके मनोभाव बहुत ही जल्दी बदलते हैं और दोनोंका पतन निश्चित-सा होता है। इस विज्ञानके अनुभवी पाश्चात्य विद्वान् स्टेनली रेड महोदय कहते हैं—

‘It was discovered that certain subjects, more especially woman, could produce changes in the aura by an effort of will causing rays to issue from the body or the colour of the aura to alter.’ (Stanley Red)

‘‘यह पाया गया है कि कई वस्तुएँ, खास करके स्त्रियाँ, अपनी इच्छाशक्तिसे पुरुषके ‘औरा’ को बदल देती हैं। पुरुषके शरीरसे उसके मनोभावोंकी जो विद्युत्-लहरियाँ निकलती हैं, उनके बदल जानेसे ‘औरा’ के वर्णमें भी परिवर्तन हो जाता है।’’

मनुष्यके शरीरसे उनके मानसिक काम-क्रोधादि दुर्भावोंके तथा त्याग-क्षमादि सद्भावोंके विद्युत्-कण निरन्तर निकलते रहते हैं और उसके शरीरके चारों ओर विविध रंगोंकी लहरियोंके रूपमें प्रकट होते हैं। सूक्ष्म-दृष्टिसे इनको देखा भी जा सकता है। इन्हींको ‘औरा’ (Aura) कहते हैं।

विभिन्न पुरुषोंकी दृष्टि स्त्रियोंपर न पड़े और उससे विकृत होनेपर स्त्रियोंकी दृष्टि पुरुषोंपर न पड़े—क्योंकि ऐसा होनेपर स्त्रियोंके पवित्र पातिव्रत्यका नाश होता है—इसीसे स्त्रियोंके लिये पुरुषालयोंमें, बाजारोंमें न घूमकर अलग घरमें रहनेका विधान है। यहाँतक कहा गया है कि आहार—निद्राके समयमें भी पुरुष स्त्रियोंको न देखें।*

आजकल जो स्त्रियोंको साथ लेकर घूमने-फिरने तथा एक ही टेबलपर एक साथ खाने-पीनेकी प्रथा बढ़ रही है, यह वस्तुत: दोषयुक्त न दीखनेपर भी महान् दोष उत्पन्न करनेवाली है। ऐसा करनेवाले स्त्री-पुरुषोंको ईमानदारीके साथ अपनी मनोदशाका चित्र देखना चाहिये और भलीभाँति सोच-समझकर सबको ऐसी व्यवस्था करनी चाहिये, जिसमें नारीके भूषण लज्जाकी रक्षा हो और उसका पातिव्रत्य धर्म अक्षुण्ण बना रहे।