लक्ष्मी-रुक्मिणी-संवाद

एक दिन रुक्मिणीदेवी श्रीलक्ष्मीजीसे मिलने वैकुण्ठमें गयीं। परस्पर अनेक विषयोंमें चर्चा होने लगी। बातों-ही-बातोंमें रुक्मिणीजीने पूछा—‘देवि! तुम किन स्त्रियोंके पास सदा रहती हो, तुम्हें कैसी स्त्रियाँ प्यारी हैं; किन उपायोंसे स्त्रियाँ तुम्हारी प्रीतिभाजन बन सकती हैं?’ लक्ष्मीजी हँसकर कहने लगीं—

जिस स्त्रीकी अपने स्वामीमें अचल भक्ति है, वह मुझको सबसे ज्यादा प्यारी है, मैं उसे पलभर भी अपनेसे अलग नहीं कर सकती। ऐसी स्त्रियोंके पास रहनेसे मुझे हर्ष होता है। मैं उनके सत्संगकी इच्छा करती हूँ और सदा उनके साथ रहती हूँ और सब गुण होनेपर भी जिस स्त्रीकी अपने पतिमें श्रद्धा नहीं है, उसे मैं धिक्‍कारती हूँ और अपने पास नहीं आने देती।

‘जो स्त्री क्षमाशील है यानी अपराध करनेवालोंको भी क्षमा कर देती है, उसके घरमें मैं रहती हूँ।’

सदा सच बोलनेवाली स्त्री मुझे विशेष प्यारी है, सरल स्वभावकी स्त्री ही मुझे पा सकती है। जो स्त्री छल-कपट-चालाकीसे दूसरोंको ठगती है, जो झूठ बोलती है, उसे मैं धिक्‍कारती हूँ और कभी दर्शन भी नहीं देती। जो स्त्रियाँ पवित्र रहती हैं, शुद्ध आचरणवाली हैं, देवता और विद्वान् ब्राह्मणोंमें भक्ति रखती हैं, पतिव्रतधर्मका पालन करती हैं, अतिथि-सेवाके लिये सदा तैयार रहती हैं, वे मुझको जल्दी पाती हैं।

जो स्त्रियाँ इन्द्रियोंको जीत चुकी हैं, अपने पतिको छोड़कर दूसरे पुरुषका मुँह देखना भी जिन्हें नहीं सुहाता, उनके घरसे मैं कभी नहीं निकलती, ऐसी स्त्रियाँ मुझे अपने वशमें कर लेती हैं।

इसके बाद लक्ष्मीजीने कहा—‘बहिन रुक्मिणी! अब मैं उन स्त्रियोंको बतलाती हूँ, जिनसे मैं अप्रसन्न रहती हूँ और जिनको धिक्‍कारती हूँ।’

जो स्त्रियाँ सदा अपने पतिके विरुद्ध काम करती हैं, पतिको तरह-तरहसे सताती हैं, उसे कड़वे वचन सुनाती हैं, ऐसी स्त्रियोंपर मैं बहुत नाराज रहती हूँ, मैं कभी उनका मुँह भी नहीं देखती।

जो स्त्रियाँ अपने पतिका घर छोड़कर दूसरेके घरमें रहनेको आतुर हैं, दूसरे पुरुषपर प्रेम रखती हैं, ऐसी स्त्रियाँ नरकके कीड़े बनती हैं। मैं सपनेमें भी ऐसी स्त्रियोंके पास नहीं जाती।

जो स्त्रियाँ बेशरम हैं, झगड़ालू, लड़ाईखोर हैं, कड़वी बोलती हैं, बहुत बोलती हैं, चाहे जिसके साथ बातचीत करती हैं, चाहे जिससे लड़ बैठती हैं, क्रोधी स्वभावकी हैं, बात-बातमें चिढ़ती हैं, जिनमें स्नेह और दया नहीं है, ऐसी स्त्रियोंको मैं त्याग देती हूँ।

जो अपवित्रतासे रहती हैं, बहुत सोती हैं, आलस्यके वश रहती हैं; बड़ोंका कहा नहीं मानतीं, काम करते समय परिणामका विचार नहीं करतीं, घरमें अच्छी तरह व्यवस्था नहीं रखतीं, घरकी चीजोंको चाहे जहाँ फेंक देती हैं, ऐसी स्त्रियाँ मुझे कभी अपनी नहीं बना सकतीं।