नारी और नरका परस्पर संबंध

पुरुष और प्रकृतिके संयोगसे ही जगत् बना है और जबतक जगत् रहेगा, तबतक पुरुष और प्रकृतिका यह संयोग भी बना रहेगा। पुरुष और प्रकृति दोनों अनादि हैं। पुरुष-संसर्गसे प्रकृति ही सम्पूर्ण जीव-जगत् को, समस्त विकारोंको और निखिल गुणोंको उत्पन्न करती है (गीता १३। १९; १४। ३-४)। प्रकृति शक्ति है और पुरुष शक्तिमान्। शक्तिके बिना शक्तिमान‍्का अस्तित्व नहीं और शक्तिमान‍्के बिना शक्तिके लिये कोई स्थान नहीं। इनका परस्पर अविनाभाव सम्बन्ध है। इसी प्रकार नर-नारीका सम्बन्ध है। नर पुरुषका और नारी प्रकृतिका प्रतीक है। नारीका नाम ही ‘प्रकृति’ है। एकके बिना दूसरा अधूरा है। इसी तत्त्वपर हिन्दू-शास्त्रोंने नर और नारीके कर्तव्य-कर्मोंका निर्देश किया है। दोनोंके कर्तव्य पृथक्-पृथक् होनेपर भी वे एक ही शरीरके दाहिने और बायें अंगोंके कार्योंकी भाँति एक ही शरीरके पूरक हैं और एक ही शरीरकी स्थिति, समृद्धि, पुष्टि और तुष्टिके कारण हैं। एकके बिना दूसरेका काम नहीं चल सकता। अपने-अपने क्षेत्रमें दोनोंकी ही प्रधानता और श्रेष्ठता है, पर दोनोंकी श्रेष्ठता एक ही परम ‘श्रेष्ठ’ की पूर्तिमें संलग्न है। दोनों मिलकर अपने-अपने पृथक् कर्तव्योंका पालन करते हुए ही जीवनके परम और चरम लक्ष्य भगवान‍्को प्राप्त कर सकते हैं। नर भगवान‍्की प्राप्ति करता है—पतिव्रता नारीके दिव्य त्यागमय आदर्शको सामने रखकर भगवान‍्के प्रति सम्पूर्णतया आत्मसमर्पण करके; और नारी उसी भगवान‍्की सहज ही प्राप्ति करती है—अपने अभिन्नस्वरूप स्वामीका सर्वांगपूर्ण अनुगमन करके—उसके जीवित रहते और प्राण त्याग करके चले जानेपर भी। यह सीधा-सादा नर और नारीका स्वरूप तथा कर्तव्य है। नारी अपने क्षेत्रमें रहकर अपने ही दृष्टिकोणसे नरकी सेवा करती है भगवत्प्राप्तिके लिये और नर भी अपने क्षेत्रमें रहकर नारीकी सेवा स्वीकार करके अपने क्षेत्रके अनुकूल कार्योंद्वारा उसकी सेवा करता है भगवत्प्राप्तिके लिये ही। दोनोंके ही स्थान और कर्तव्य एक-दूसरेके लिये महत्त्वपूर्ण, आदरणीय और अनिवार्य अभिनन्दनीय हैं तथा दोनों ही अपने-अपने लिये परम आदर्श हैं।

यही भारतीय नर-नारीका स्वरूप है। नर नारीका सेवक, सखा और स्वामी है। इसी प्रकार नारी भी नरकी सेविका, सखी और स्वामिनी है। इसीलिये नारी पतिव्रता है। यह पातिव्रत्य है—वस्तुत: परम पति परमात्माकी प्राप्ति और प्रीतिके उद्देश्यसे ही। इसीलिये प्राचीन और अर्वाचीन कुछ ब्रह्मवादिनी और भक्तिमती (गार्गी आदि और मीरा) आदि नारियाँ सबसे सम्बन्ध तोड़कर और एकमात्र भगवान‍्से ही सम्बन्ध जोड़कर भगवान‍्को प्राप्त कर चुकी हैं। आज भी ऐसी पवित्रहृदया नारियाँ हैं और आगे भी होंगी। पर जगच्चक्रके भलीभाँति संचालनके लिये नारीके इस आदर्शकी अपेक्षा उसके ‘पातिव्रत्य’ का आदर्श विशेष उपयोगी और आवश्यक है। इसीलिये शास्त्रोंमें स्त्री-धर्मके नामसे ‘पातिव्रत्य’ का ही निर्देश है। इस पातिव्रत्यके द्वारा नारी नरको पूर्ण बनाती है और मातृरूपसे जगत‍्को परम पवित्र चरित्रवान् पुरुषरत्न प्रदानकर भगवान‍्के मंगल उद्देश्यकी पूर्ति करती है।