नर-नारीके जीवनका लक्ष्य और कर्तव्य
नर हो या नारी—मनुष्य-जीवनका परम और चरम लक्ष्य है भगवत्प्राप्ति* या मुक्ति।
समस्त दु:ख, क्लेश, समस्त बन्धन और सब प्रकारके अभावोंकी आत्यन्तिक निवृत्तिका नाम ही मुक्ति है। इस मुक्तिको लक्ष्यमें रखकर ही मनुष्यको मुक्ति प्राप्त करनेके उपायस्वरूप धर्मका साधन करना चाहिये। जो कार्य भगवत्प्राप्तिके अनुकूल है, वही धर्म है और जो प्रतिकूल है, वही अधर्म है। धर्म कर्तव्य है और अधर्म त्याज्य। इस धर्मका साधन होता है बुद्धि, मन और इन्द्रियोंके सम्यक् शास्त्रीय व्यवहारसे। अतएव इसमें शारीरिक स्वास्थ्य, शारीरिक और मानसिक समृद्धि और जीवन-निर्वाहके योग्य कार्योंकी उपेक्षा नहीं है; वरं जीवनोपयोगी समस्त कार्योंको मोक्षोपयोगी बनाकर ही मुक्ति-पथपर अग्रसर होना है। इसलिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चतुर्विध पुरुषार्थ हैं। मोक्षके अनुकूल धर्म हो, धर्मसम्मत अर्थ हो और जीवन-धारणोपयोगी धर्मसम्मत ही कामोपभोग हो। धर्मसम्मत अर्थ और काम वही होगा, जो मोक्षके अनुकूल हो और वह अपने साथ ही समस्त परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व—किसीका भी परिणाममें अहित करनेवाला न होकर सबका हित करनेवाला हो।
इसी दृष्टिसे वर्णाश्रमका निर्माण और प्रत्येक व्यक्तिके लिये शास्त्रोंमें तदनुकूल कर्तव्य-कर्मका आदेश है। उद्देश्य—एकमात्र भगवत्प्राप्ति अर्थात् ऐहिक-पारलौकिक सात्त्विक सुख-सम्पत्ति तथा शान्तिका उपभोग करते हुए अन्तमें समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर सच्चिदानन्दघन परमात्मस्वरूपमें अखण्ड स्थिति और साधन है। एकमात्र इसी उद्देश्यकी सिद्धिके लिये भीतरी-बाहरी जीवनका सम्यक् नियन्त्रण और नियोजन करते हुए श्रद्धा तथा निष्ठापूर्वक स्वधर्मका पालन।
नरकी भाँति नारीको भी भगवत्प्राप्ति करनी है, परंतु उसके लिये साधनका स्वरूप नरके साधनकी अपेक्षा विलक्षण है। नारीका स्वधर्म नरके स्वधर्मसे पृथक् है। पृथक् न हो तो वह परिवार, समाज और राष्ट्रमें विशृंखलता उत्पन्न करनेवाला हो जाय एवं परिणाममें उनका अहितकारी होनेसे धर्म न रहकर ‘अधर्म’ बन जाय। इसलिये नरका निर्माण, संरक्षण और संवर्धन नारी ही करती है। नारी यदि इस स्वधर्मसे च्युत हो जाय और नरके धर्मको ग्रहण करने लगे तो नरका अस्तित्व ही नहीं रहे। फलत: नारीका अस्तित्व भी संकटापन्न हो जाय। नर-नारी दोनोंको लेकर ही विश्व और विश्वके समस्त धर्मोंका अस्तित्व है। ये न रहें तो विश्व ही न रहे। अतएव नारीको स्वधर्ममें स्थित रहकर ही अपने लक्ष्यकी ओर अग्रसर होना है। इसीलिये नरकी जननी, नरकी सहधर्मिणी, नरकी संरक्षिका नारी घरमें रहती है और इसीलिये वह पतिमें भगवद्बुद्धि करके अपनी चित्तवृत्तिको सर्वथा भगवत्स्वरूपाकार बनाकर अन्तमें समस्त बन्धनोंसे छूटकर पतिलोकको अर्थात् भगवान्के दिव्यधामस्वरूप मुक्तिको सहज ही प्राप्त हो जाती है।
पतिको परमेश्वररूपसे माननेका यही अभिप्राय है कि नारी घरमें रहकर नरका निर्माण, संरक्षण और संवर्धन करती हुई भगवत्संकल्परूप विश्वकी सेवाके द्वारा भगवान्की सेवा करे और ‘पति परमेश्वर है,’ ‘पतिसे विवाह परमेश्वरसे विवाह है,’ ‘पतिका सान्निध्य परमेश्वरका सान्निध्य है,’ ‘पतिका घर परमेश्वरका मन्दिर है,’ ‘पतिकी सेवा परमेश्वरकी सेवा है,’ ‘पतिका आज्ञापालन परमेश्वरका आज्ञापालन है,’ ‘पतिको सुख पहुँचानेकी चेष्टा परमेश्वरकी प्रसन्नताका हेतु है’ और ‘पतिको सर्वस्व-समर्पण परमेश्वरको सर्वार्पण है’—इस प्रकार बार-बार चित्तकी वृत्तिको पतिके व्याजसे परमेश्वरमें लगाती हुई तद्गतचित्त, तद्गतबुद्धि और तदात्मा होकर अन्तमें परमेश्वरको प्राप्त कर ले। नियम यही है। श्रीभगवान्ने गीतामें कहा है—
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा:।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा:॥
(५।१७)
‘जिनकी बुद्धि और जिनका मन तद्रूप (परमात्मरूप) हो गया है, जिनकी निष्ठा उन परमात्मामें ही है, ऐसे तत् (परमात्म) परायण पुरुष ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्तिरूप मुक्तिको प्राप्त करते हैं।’
पतिव्रताकी ठीक यही स्थिति होती है। वह एक पतिके सिवा अन्य किसीको जानती ही नहीं और सब प्रकारसे पतिके साथ घुल-मिलकर एक हो जाती है। इसीसे पतिव्रताका आदर्श ही भक्तिका सर्वोत्तम आदर्श माना गया है और इसीसे पतिव्रताके सामने समस्त देवता सिर झुकाते हैं।
पतिव्रता स्त्री पतिसे अभिन्न होती है। मनुमहाराजने कहा है—‘‘जो भर्ता है, वही भार्या है,—‘यो भर्ता सा स्मृतांगना’ (९। ४५) और दोनोंको मरणपर्यन्त परस्पर अनुकूल रहकर अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप चतुर्वर्गको प्राप्त करना चाहिये—स्त्री-पुरुषोंका संक्षेपमें यही परम धर्म है।’’
अन्योन्यस्याव्यभिचारो भवेदामरणान्तिक:।
एष धर्म: समासेन ज्ञेय: स्त्रीपुंसयो: पर:॥
(९। १०१)
शिशुपालन, गृहरक्षण आदि छोटे काम हैं और लेख लिखना, व्याख्यान देना, दफ्तरोंमें नौकरी करना बड़ा काम है—ऐसा मानना भूल है। वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो जितने महत्त्वका काम पहला है, उतना दूसरा है ही नहीं। फिर कामकी लघुता-महत्ता तो मनकी भावनाके अनुसार हुआ करती है। चर्खा कातनेको लोग बहुत छोटा काम समझते थे और बड़ी-बूढ़ी स्त्रियाँ ही फुरसतसे इस कामको किया करती थीं; परंतु पिछले दिनों जब श्रीगाँधीजीने इसके महत्त्वकी घोषणा की तब पण्डित मोतीलाल नेहरू, पण्डित मदनमोहन मालवीय, लाला लाजपतराय और श्रीचित्तरंजनदास-सरीखे आजीवन कलम चलानेवाले लोगोंने भी चर्खा चलाया और उनकी बड़ाई हुई। इस प्रकार स्वधर्ममें निष्ठा और उपादेय बुद्धि होनेपर स्वत: ही वह महत्त्वपूर्ण बन जाता है।
इस समय जो स्वधर्म-पालनमें शिथिलता और परधर्म-पालनमें उत्साह दिखायी देता है, इसका कारण है भारतीय ऋषि-मुनिप्रणीत शिक्षासे पराङ्मुखता। आजका भारत अपनी पुनीत प्राचीन शिक्षासे वंचित है और नवीन विपरीत ज्ञान उत्पन्न करनेवाली पर-शिक्षासे अभिभूत है। वह सीखा है—
(१) संसारमें क्रम-विकास होता है अर्थात् संसारकी सभी बातोंमें उत्तरोत्तर उन्नति होती है, (२) कुछ ही हजार वर्ष पहलेका कोई इतिहास नहीं प्राप्त होता, (३) आर्य इस देशके निवासी नहीं थे और (४) धर्म समयानुसार बदलनेवाली चीज है। इसका परिणाम स्वाभाविक ही यह हुआ कि उसकी अपने गौरवमय अतीतसे, अपने त्रिकालज्ञ, सर्वविद्या-विशारद, अलौकिक बुद्धिसम्पन्न, महान् तेजस्वी, सर्वविधसम्पन्न, पूर्व पुरुषोंसे अपने प्राचीन सुख-समृद्धि और ज्ञानैश्वर्यपूर्ण स्वदेशसे और त्रिकालाबाधित धर्मसे श्रद्धा उठ गयी। वह समझने लगा कि ‘पहले सर्वथा अवनति थी , क्रम-क्रमसे उन्नति हुई है। इस समय जैसी उन्नति है, वैसी पहले कभी नहीं थी। अतएव सुख-समृद्धिमें, ज्ञान-विज्ञानमें, विद्या-बुद्धिमें, प्रभाव-ऐश्वर्यमें आजका मानव जितना उन्नत है, उतने न तो कभी हमारे पूर्वपुरुष उन्नत थे, न देश उन्नत था और न संस्कृति उन्नत थी। बल्कि जितना ही पुराना काल था, उतनी ही अधिक अवनति थी; वेद, पुराण, महाभारत, रामायण आदि जितने ग्रन्थ हैं, वे सब इतिहास-युगके अर्थात् चार हजार वर्षसे इधर-उधरके लिखे हुए हैं और वे सभी प्राय: काव्य हैं—कविके मस्तिष्ककी उपज हैं, अतएव उनमें जो लाखों-करोड़ों वर्षों पहलेका गौरवमय वर्णन है वह मिथ्या है। (बल्कि कई विद्वान् कहलानेवाले लोग तो चार हजार वर्ष पहलेके कालको वेदकाल और पन्द्रह सौ वर्ष पहलेके कालको रामायण-काल या रामराज्यका काल मानते हैं।) धर्म सामाजिक नियम है और समाजकी परिस्थितिके अनुसार बदलनेवाला है। धर्मशास्त्रोंमें जो विधि-निषेधका वर्णन करके उनका पारलौकिक फल बतलाया है, वह लोगोंको नियन्त्रणमें रखनेके लिये कहा गया है। वस्तुत: वैसा होता नहीं है और इस देशमें आर्य कभी रहते ही नहीं थे। अतएव लाखों, करोड़ों वर्षोंका जो यहाँका वर्णन है एवं उसमें जो आर्यगाथाएँ हैं, वे सभी कल्पित हैं।
जब भारतने इस प्रकार समझा, तब उसकी अपनी संस्कृतिसे, अपने पूर्वपुरुषोंसे, अपने धर्मसे और अपने यथार्थ देशसे अनास्था हो गयी और वर्तमान उन्नत कहलानेवाले देशों और राष्ट्रोंको ही आदर्श मानकर वह तदनुकूल अपने जीवनका निर्माण करनेमें लग गया। जहाँ-जहाँ वर्तमान आदर्शसे उसको अपना आचरण या अपना आदर्श प्रतिकूल दिखायी दिया, वहीं-वहीं उसने सुधारकी आवश्यकता समझी, अर्थात् उस अपने आचरण और आदर्शको समूल नष्ट करके उसकी जगह वर्तमान उन्नत कहलानेवाले आचरण और आदर्शके स्थापनकी आवश्यकता समझी और तदनुसार प्रयत्नमें लग गया। इसी प्रयत्नको उसने देश-सेवा, मानव-सेवा और धर्मपालन समझ लिया; एवं इस प्रकार वह अपने सर्वनाशमें ही संरक्षण, अपने सांस्कृतिक रूपके आमूल परिवर्तनमें ही उन्नति या विकास समझकर उसीमें लग गया और उत्तरोत्तर उन्नतिकी धारणाके कारण आज भी उसीमें लग रहा है। आज प्राचीनका संहार और नवीनका स्थापन इसीलिये आँखें मूँदकर चल रहा है और इसीलिये नव-युग, नव-भारत, नव-जीवन, नव-धर्म और नव-निर्माणके नारे लग रहे हैं। आज सारा देश इसी प्रवाहमें प्रवाहित है और इसीसे भारतीय नारीके स्वरूपमें भी परिवर्तन हो रहा है; क्योंकि इस प्राचीन आदर्शके संहाररूप परिवर्तनमें ही मोहवश आजका नर और उसीके सदृश शिक्षा-प्राप्त नारी सच्चे हृदयसे अपनी तथा देशकी उन्नति मान रही है। नैतिक और सांस्कृतिक दिशामें जिस नारीका स्थान सबसे ऊँचा था, उसीके लिये आज ये कहा जा रहा है कि ‘भारतीय शास्त्रों, आचारों और प्रथाओंने नारीकी शक्तिको दबाया, उसे कुचला और उसका सर्वनाश कर दिया। अब नारी इस ‘सर्वनाश’ के दलदलसे निकलकर स्वतन्त्र और सुखी होगी, वस्तुत: आज उनकी उन्नतिका आदर्श है यूरोप। अत: वे यूरोपकी निन्दा करते हुए भी यूरोपके ही पदानुगामी होकर उसीका अन्धानुकरण कर रहे हैं।*
इसीसे आज सर्वत्र अधिकारकी पुकार है। आज भारत सर्वथा आत्मविस्मृत है, वह मस्तिष्कसे गुलाम हो गया है, शरीर भले ही स्वतन्त्र हो, पर अन्तर तो दूसरोंके दासत्वको भलीभाँति स्वीकार कर चुका है। यही इस युगकी महान् देन है पुराने भारतवर्षको—आर्यावर्तको और सबसे प्रधान और सुसभ्य प्राचीन आर्यजातिको।’
भारतीय आदर्श है—कर्तव्यपालन और यूरोपका आदर्श है अधिकारप्राप्ति। कर्तव्यपालनमें सबके अधिकार अपने-आप ही सुरक्षित रहते हैं और अधिकारकी छीना-झपटीमें किसीका भी अधिकार सुरक्षित नहीं है, क्योंकि अधिकार अन्धा होता है। वह केवल अपना ही स्वार्थ देखता है। उसे दूसरेके हितकी जरा भी परवा नहीं होती। इसके विपरीत कर्तव्य प्रकाशरूप होता है। वह परहितके लिये त्याग करता है। इसलिये सभीको उनके प्राप्य अधिकार अपने-आप मिल जाते हैं। कर्तव्य-त्यागके द्वारा सबकी रक्षा करता है और कर्तव्यशून्य अधिकार प्रहार करके सबका संहार करना चाहता है। इसीसे आज शासक-शासित, पूँजीपति-मजदूर, मालिक-नौकर, ब्राह्मण-अब्राह्मण, पड़ोसी-अड़ोसी, पिता-पुत्र, गुरु-शिष्य और भाई-भाई आदि सभीमें झगड़ा है और वह झगड़ा यहाँतक बढ़ा है कि आज ‘दो देह एक प्राण’ पति-पत्नीमें भी अधिकारका प्रश्न आ गया है। उसीसे यूरोप आदिमें जैसे मजदूरोंके यूनियन (संघ) हैं वैसे ही पत्नियोंके भी यूनियन बने हैं और जैसे मजदूर अपने अधिकारोंके लिये लड़ते हैं, माँगें पेश करते हैं, हड़ताल करते हैं, वैसे ही ‘पत्नी-संघ’ भी सामूहिकरूपसे पतियोंसे अधिकारकी माँग करता है।*
कर्तव्यपालनसे जो नारी घरकी सम्राज्ञी बनती है, घरमें सबपर एकच्छत्र शासन करती है, वही अधिकारकी चिन्तामें पड़कर कर्तव्यशून्य हो आज राजमार्गपर नारे लगाती फिरती है! याद रखना चाहिये कर्तव्यपालनमें त्याग है और त्यागसे ही नारीके अधिकारकी रक्षा होती है। नारों और आन्दोलनोंसे तो अधिकार छिनेगा ही।
पति पत्नीका अर्धांग है और पत्नी पतिका, दोनों मिलकर एक पूरा होता है। जरा विचारिये—यदि प्रत्येक आधा-आधा अपनी-अपनी ओर खींचने लगें और जोर पड़नेपर यदि बीचसे कटकर दोनों आधे अलग-अलग हो जायँ तो क्या दशा होगी? दोनों ही मर जायँगे; पर इसके विपरीत यदि दोनों परस्पर दृढ़तासे सटे रहें, एक-दूसरेके सहायक रहकर परस्पर पुष्टि-तुष्टि करते रहें तो दोनों अत्यन्त सुखी रहेंगे और दोनोंकी एकतामें बड़ा विलक्षण सौन्दर्य और माधुर्य निखर उठेगा। संसारका काम भी तभी सुचारुरूपसे चलेगा।
पति और पत्नी दो पहिये हैं, जो गृहस्थकी गाड़ीको एक-दूसरेको समान बल और सहयोग देते हुए चलाते हैं, पर वे तभी ऐसा कर सकते हैं, जब दोनों पहिये दो ओर लगे हों और स्वस्थ तथा गतिशील हों। किंतु दोनों यदि एक ओर लगा दिये जायँ तो गाड़ी नहीं चल सकती और न एक पहिया कमजोर हो जाय या उसकी चाल रुक जाय तभी गाड़ी चल सकती है! आज लोग कहते हैं कि ‘दोनोंके समान अधिकार हैं, इसलिये दोनोंको समान कार्य करने चाहिये।’ पर वे यह नहीं सोचते कि दोनों समान कार्य करने लगेंगे तो जैसे दोनों पहिये एक ओर लगा दिये जानेपर गाड़ी उलट जाती है, वही दशा गृहस्थीकी होगी और दोनोंके एक ओर लगनेपर एक-दूसरेको समान बल मिलना असम्भव होनेसे दोनोंकी ही चाल बन्द हो जायगी तथा दोनों ही निकम्मे हो जायँगे।
इसीलिये विवाह-संस्कारके द्वारा गृहस्थके संचालनके लिये स्त्री-पुरुषरूपी दोनों पहिये—एक घरकी ओर तथा एक बाहरकी ओर जोड़ दिये जाते हैं। ये पहिये जुड़े कि गृहस्थकी गाड़ी चली और धर्म-सम्पादन आरम्भ हुआ। यही धर्म—दोनों ओर दोनोंके द्वारा अपने-अपने क्षेत्रके अनुकूल कार्य—स्वधर्म है और यही मोक्षोपयोगी है।
कहा जाता है कि पुरुष स्वतन्त्र है और स्त्री परतन्त्र है; परंतु यदि ध्यानसे देखा जाय तो पता लगेगा कि दोनों ही शास्त्र-परतन्त्र हैं। परतन्त्रताका स्वरूप पृथक्-पृथक् है। नारीके बिना पुरुष अधूरा है और पुरुषके बिना नारी अधूरी है। दोनोंका अविनाभाव-सम्बन्ध है। दोनोंको ही एक-दूसरेकी अनिवार्य आवश्यकता है। दोनोंमें ही परस्पर सहकारिता, सहयोग और सौहार्द तथा एकात्मता होनी चाहिये। दोनोंमें जातिगत निन्दनीय दोष भी हैं और दोनोंमें जातिगत श्लाघ्य गुण भी हैं। इसके अतिरिक्त पूर्व-संस्कार तथा वर्तमान वातावरणके अनुसार व्यक्तिविशेषमें व्यक्तिगत दोष-गुण भी होते ही हैं। अतएव न तो सर्वथा निन्दा या प्रशंसाका पात्र पुरुष है और न नारी ही है। जो एककी निन्दा करके दूसरेकी प्रशंसा करते हैं, वे पक्षपात या भ्रमसे ही ऐसा करते हैं। जगत्की रचना ही प्रकृतिको लेकर हुई है। प्रकृति त्रिगुणात्मिका है, अतएव जगत्का कोई भी प्राणी त्रिगुणसे रहित नहीं है। विशेष-विशेष कारणोंसे किसीमें सत्त्व अधिक होता है तो किसीमें रजोगुण अथवा किसीमें तमोगुण। कोई भी प्राणी इनसे मुक्त नहीं है। फिर नर या नारी ही इनसे कैसे मुक्त होंगे। व्यवहारमें यदि हार्दिक प्रेम हो तो अपने-आप ही दोष-दर्शन नहीं होगा और फलत: एक-दूसरेके गुण देखनेसे सहज ही एक-दूसरेमें प्रेमकी वृद्धि होगी। यही पति-पत्नीका परम मनोहर प्रेम-सम्बन्ध है।
इन सब बातोंको समझकर ही हिन्दू-गृहस्थ (नर और नारी) अपने-अपने स्वधर्ममें स्थित रहते हैं और सुख-शान्तिपूर्वक जीवन बिताकर अन्तमें परमात्माको प्राप्त हो सकते हैं। यह याद रखना चाहिये कि जहाँ प्रेम है; वहीं आनन्द है; और जहाँ द्वेष है, वहीं दु:ख है। प्रेम रहेगा तो जीवनमें सुख-शान्ति रहेगी ही। सुख-शान्तिमें मन अचंचल रहेगा। चंचलतारहित स्थिर मनसे ही भगवान्का चिन्तन होगा और उसीका परिणाम होगा—परम शान्ति, मुक्ति या भगवान्की प्राप्ति! भारतीय नर-नारी इस मुक्तिपथपर चलकर अपने जीवनको धन्य करें और सारे जगत्के सामने महान् आदर्श उपस्थित करें, तभी उनका और जगत्का कल्याण होगा। कल्याणमय भगवान् सबका कल्याण करें।