नारीके भूषण

सौन्दर्य—(१) सुन्दर वर्ण, सुडौल अंग-प्रत्यंग, मनोहर चाल, दृष्टि, भाव-भंगी तथा तोड़-मरोड़ आदिमें सुहावनापन और वाणीमें माधुर्य—यह बाहरी सौन्दर्य है।

(२) क्षमा, प्रेम, उदारता, निरभिमानता, विनय, सहिष्णुता, समता, शान्ति, धीरता, वीरता, परदु:खकातरता, सत्य, सेवा, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, शील और प्रभुभक्ति आदि सद‍्गुण तथा सद्भाव भीतरी सौन्दर्य है।

बाहरी तथा भीतरी दोनों ही आवश्यक हैं; परन्तु बाहरीकी अपेक्षा भीतरीका महत्त्व अधिक है। रूपवती नारियोंको रूपका गर्व न करके अपने अन्दर सद‍्गुणों तथा सद्भावोंके सौन्दर्यको बढ़ाना चाहिये।

लज्जा—धर्मविरुद्ध, शीलके विरुद्ध और समाजकी पवित्र प्रथाओंके विरुद्ध कुछ भी करनेमें महान् संकोच और पुरुष-समाजके संसर्गसे बचनेके लिये होनेवाले दृष्टि-संकोच, अंग-संकोच और वाणी-संकोचका नाम ‘लज्जा’ है। लज्जा नारीका भूषण है और यह शीलभरी आँखोंमें रहता है। बीमार एवं बड़ोंकी सेवामें तथा कर्तव्य-पालनमें लज्जाके नामपर तत्पर न होना लज्जाका दुरुपयोग एवं मूर्खता है। साथ ही अबाध पुरुष-संसर्गमें नि:संकोच जाना-आना लज्जाका निरंकुश नाश है, जो नारीके शीलके लिये अत्यन्त घातक है।

विनय—वाणीमें, व्यवहारमें तथा शरीर-संचालनमें गर्व, उग्रता, कठोरता तथा टेढ़ेपनका त्याग करके नम्र, सरल, स्नेहपूर्ण आदरभावयुक्त और मधुर होना ‘विनय’ है। विनयका अर्थ न तो चापलूसी है, न कायरता। दुष्टोंके दमनमें कठोरता और उग्रता आवश्यक है, पर घर-परिवार तथा संसारके अन्य सभी व्यवहारोंमें नारीको विनयरूप भूषण सदैव धारण किये रहना चाहिये।

संयम-तप—शरीर, मन और वाणीको विषयोंकी ओरसे यथासाध्य हटाये रखना तथा उनको कभी भी अवैध तथा अकल्याणकारी कार्यमें न लगने देनेका नाम ‘संयम’ है। इसीको ‘तप’ भी कह सकते हैं। गीतामें भगवान‍्ने बतलाया है—(१) देव, द्विज, गुरुजन और ज्ञानीजनोंकी पूजा, शरीरकी शुद्धि, सरलता (शरीरकी सौम्यता), ब्रह्मचर्य (पर-पुरुष अथवा पर-स्त्रीका सर्वथा त्याग एवं पति-पत्नीमें शास्त्रोक्त सीमित संसर्ग) तथा अहिंसा (किसीको भी चोट न पहुँचाना)—यह शारीरिक तप है; (२) किसीको घबराहट न पैदा करे ऐसी सच्ची, प्रिय और हितकारी वाणी बोलना तथा भगवन्नामका उच्चारण करना एवं परमार्थ-ग्रन्थोंको पढ़ना—यह वाणीका तप है और (३) मनकी प्रसन्नता, मनकी सौम्यता, मनका मौन (अन्य चिन्तनसे रहित केवल भगवच्चिन्तनपरायण होना), मनका वशमें रहना और मनका पवित्र भावोंसे युक्त रहना—यह मनका तप है। शरीर, वचन और मनसे होनेवाली तमाम कुप्रवृत्तियोंसे उनको हटाकर इन सत्प्रवृत्तियोंमें लगाये रखना ही संयम है।

सन्तोष—परश्रीकातरता, असहिष्णुता, लोभ और तृष्णाके वशमें न होकर भगवान‍्की दी हुई अपनी स्थितिमें सन्तुष्ट रहना ‘सन्तोष’ है। सन्तोषसे चित्तकी जलन मिटती है। द्वेष, विषाद और क्रोधसे रक्षा होती है एवं परम सुखकी प्राप्ति होती है।

क्षमा—अपना अहित करनेवालेके व्यवहारको सह लेना अक्रोध है और उसको अपने तथा दूसरे किसीके द्वारा भी बदलेमें दु:ख न मिले एवं उसकी बुद्धि सुधर जाय, इस प्रकारके सद्भावका नाम ‘क्षमा’ है। अक्रोध अक्रिय है, क्षमा सक्रिय। क्षमा कायरोंका नहीं, वरं वीरोंका धर्म है।

धीरता-वीरता—दु:ख, विपत्ति, कष्ट और भयके समय भगवान‍्के मंगलमय विधानपर भरोसा रखकर तथा ‘विपत्ति सदा नहीं रहती बादल आते हैं, आकाश काला हो जाता है, फिर बादल हटते हैं और सर्वत्र प्रकाश फैल जाता है’। इस प्रकार समझकर अपने कर्तव्यका पालन करते हुए मैदानमें डटे रहना ‘धीरता’ है और इसीके साथ-साथ विरोधी शक्तियोंको निर्मूल करनेका साहस तथा बुद्धिमानीसे युक्त प्रयत्न करना ‘वीरता’ है।

गम्भीरता—समझकर मधुर थोड़े शब्दोंमें बोलना, व्यर्थ न बोलना, हँसी-मजाक न करना, विवाद न करना, छिछोरपन न करना, चपलता-चंचलता न करना, प्रत्येक कार्यको खूब सोच-विचारकर दृढ़ निश्चयके साथ करना, शान्त और शिष्ट व्यवहार करना, झगड़े-टंटेमें न पड़ना, जरा-सी विपत्ति या घरमें कोई काम आ पड़नेपर विचलित न हो जाना और बड़ी-से-बड़ी बातको जिसके प्रकट होनेसे कोई हानि होती हो अथवा किसीको दु:ख होता हो, किसीका अहित होता हो, उसे पचा जाना ‘गम्भीरता’ है। गम्भीर स्त्रीका तेज सब मानते हैं तथा उसका आदर करते हैं और वह भी बहुत ही व्यर्थकी कठिनाइयोंसे बच जाती है।

समता—सबमें एक ही आत्मा है, अथवा प्राणिमात्र सब एक ही प्रभुकी अभिव्यक्ति या सन्तान हैं, यह समझकर मनमें सबके प्रति समान भाव रखना, सबके दु:खको अपना दु:ख समझना, सबके हितमें अपना हित मानना ‘समता’ है। व्यवहारमें तो प्रसंगानुसार कहीं-कहीं विषमता करनी पड़ती है, जो अनिवार्य है; पर मनमें आत्मदृष्टि अथवा परमात्म-दृष्टिसे सबमें समता रखनी चाहिये। विषमता इस रूपमें हो तो वह गुण है—जैसे अपने तथा अपनी सन्तानके हिस्सेमें कम परिमाणमें, कम संख्यामें और अपेक्षाकृत घटिया चीज ली जाय और अपने देवर-ननद एवं जेठानी-देवरानी तथा उनकी सन्तानके हिस्सेमें अधिक परिमाण, अधिक संख्यामें और अपेक्षाकृत बढ़िया चीजें प्रसन्नतापूर्वक दी जायँ।

सहिष्णुता—दु:ख, कष्ट और प्रतिकूलताके सहन करनेका नाम ‘सहिष्णुता’ है। यह नारी-जातिका स्वाभाविक गुण है। नारी पुरुषकी अपेक्षा बहुत अधिक सहती है और सहनेकी शक्ति रखती है। साधारणत: सहिष्णुता गुणकी तुलना वृक्षोंके साथ की जाती है। ‘तरोरिव सहिष्णुता।’ लोग पत्थर मारते हैं तो फलका वृक्ष सुन्दर सुपक्व मधुर फल देता है। लोग काटकर जलाते हैं तो वह स्वयं जलकर उनका यज्ञकार्य सम्पादन करता है, भोजन पकाता है और शीतसे ठिठुरते हुए शरीरमें गरमी पहुँचाकर जीवनदान देता है। फलवान् वृक्ष बनता भी है अनेकों आँधी, पानी, झाड़-बिजली आदि बाधा-विपत्तियोंको झेलकर। यदि किसी नारीको प्रतिकूल भावोंके पति और सास प्राप्त हुए हों तो उसे सहिष्णु बनकर प्रेमके द्वारा उनको सन्मार्गपर लाना चाहिये। सहना, कलह न करके प्रेम करना, प्रतिवाद न करके सेवा करना—ऐसा अमोघ मन्त्र है कि इससे शीघ्र ही अशान्तिसे भरा उजड़ता हुआ घर पुन: बस जाता है और उसमें शान्ति तथा सुखकी लहरें उछलने लगती हैं।

सुव्यवस्था तथा सफाई—घरकी वस्तुएँ, आवश्यक सामग्री तथा कार्योंको सुशृंखलाबद्ध रखनेका नाम ‘सुव्यवस्था’ है। नारी घरकी लक्ष्मी है, घरके सौन्दर्य एवं ऐश्वर्यकी देवी है। सुव्यवस्थाके बिना घरमें लक्ष्मीका स्वरूप बिगड़ जाता है। इधर-उधर बेतरतीब बिखरी चीजें, कूड़े-कर्कटसे भरा आँगन, मकड़ीके जालोंसे छायी हुई दीवारें, कपड़े तथा बरतन आदिका मैलापन, खोजनेपर घण्टोंतक जरूरी चीजोंका नहीं मिलना, आवश्यकता होनेपर इधर-उधर दौड़-धूप करना, झुँझलाना और दूसरोंपर दोषारोपण करना, हिसाब-किताबका पता नहीं—ये सब अव्यवस्थाके रूप हैं। इनसे घर बरबाद होता है और तकलीफ तो कभी मिटती ही नहीं। थोड़ी-सी सावधानी रखके नियत स्थानपर प्रत्येक वस्तु सँभालकर रखी जाय, घर-दीवारोंको झाड़-बुहार लिया जाय और कपड़े-बरतन आदिको धो-माँजकर साफ रखा जाय तो सहज ही सुव्यवस्था हो सकती है। आवश्यकता होते ही चीज मिल जाती है। न समय व्यर्थ जाता है, न झुँझलाहट और किसीपर दोष लगानेकी नौबत आती है। गन्दगी तथा कूड़ा-कर्कट न रहनेसे रोग तथा रोगके कीटाणु भी नहीं पैदा होते और व्यर्थकी सारी तकलीफें भी मिट जाती हैं।

श्रमशीलता—नारी घरमें रहती है, उसके स्वास्थ्यके लिये घरके काम ही सुन्दर व्यायाम हैं। जो नारी शारीरिक परिश्रम करती है, आलस्य तो उसके पास फटकता ही नहीं, रोग तथा बुढ़ापा भी उससे दूर-दूर ही रहते हैं। खाया हुआ भोजन हजम होता है। रक्तमें शक्ति तथा शुद्धि होती है। मन प्रफुल्लित रहता है। आजकल कुछ नारियाँ कहती हैं कि ‘घरमें पैसा है; नौकर-नौकरानियाँ काम कर सकती हैं; फिर हम मेहनत क्यों करें।’ पर यह बड़ी भूल है। नौकर-नौकरानियाँ काम कर देंगी; पर आपका खाया हुआ वे कैसे पचा देंगी। आपको स्वस्थ तथा शुद्ध रक्त वे कहाँसे देंगी। फिर बिना सँभालके नौकरोंसे कराये हुए काम भी तो ठीक नहीं होते। चोरी शुरू होती है। खर्च बढ़ता है और सबसे बड़ी हानि यह होती है कि घरमें आलस्य और रोगोंकी उत्पत्ति होती है। नौकर रहनेपर भी घरकी सफाई, आटा पीसना, चर्खा कातना, दही बिलोना, रसोई बनाना आदि काम तो हाथसे करनेमें ही सब तरहका लाभ है। भोजनमें भावके अनुसार अमृत भी हो सकता है और विष भी। माता तथा पत्नीकी बनायी रसोईमें अमृत होगा। खर्च भी बचेगा और विशुद्धि भी रहेगी। चक्‍की चलानेवाली स्त्रियोंको रज-सम्बन्धी रोग बहुत कम होते हैं। खेतोंमें काम करनेवाली नारियाँ बहुत कम बीमार होती हैं। अतएव नारीको शारीरिक परिश्रम अवश्य करना चाहिये।

निरभिमानता—रूप, धन, पुत्र, विद्या, बुद्धि तथा अधिकार आदिका गर्व न करना और सबके साथ नम्रता तथा सौजन्यपूर्ण व्यवहार करना ‘निरभिमानता’ है। स्त्रियोंमें गर्व बहुत जल्दी आता है और वे उसके आवेशमें गाँव और पड़ोसियोंका तथा नौकर-चाकरोंका ही नहीं, आत्मीय स्वजनोंका—यहाँतक कि सास-ससुर, जेठ-जेठानी आदि गुरुजनोंका तथा कन्या-जामाता, पुत्र-पुत्रवधू आदिका भी तिरस्कार कर बैठती हैं, जिसके परिणामस्वरूप जीवनभरके लिये क्लेश पैदा हो जाते हैं। इसलिये सदा-सर्वदा सावधानीसे निरभिमानताका अत्यन्त विनम्र बर्ताव करना चाहिये। नम्र व्यवहारसे वैरी भी मित्र हो जाते हैं और कठोर व्यवहारसे मित्र भी शत्रु बन जाते हैं।

मितव्ययिता—सीमित खर्च करनेको ‘मितव्ययिता’ कहते हैं। मितव्ययिता केवल रुपये-पैसोंकी ही नहीं, घरकी वस्तुमात्रको ही समझदारीके साथ यथासम्भव कम खर्च करना चाहिये। कम आमदनीवाले गृहस्थको सम्भव हो तो आमदनीका तीसरा या चौथा हिस्सा आकस्मिक विपदापद्के समय खर्चके तथा बच्चोंके ब्याह-शादीके लिये जमा रखना चाहिये। जिनके पास बहुत पैसा तथा बहुत आमदनी है, उनको भी व्यर्थ व्यय नहीं करना चाहिये। इससे आदत बिगड़ती है, कभी पैसा न रहा तो स्थिति बहुत दु:खदायिनी होती है एवं व्यर्थ अधिक व्यय हो जानेके कारण धर्म तथा लोकसेवाके आवश्यक कार्यमें खर्चनेकी प्रवृत्ति घट जाती है, जो मनुष्यकी एक उच्च वृत्तिका नाश करनेवाली होनेके कारण सबसे बड़ी हानि है। स्त्रियोंमें फिजूलखर्चीका दोष प्राय: अधिक होता है। थोड़ी आमदनीवाले पति-पुत्र तो बेचारे तंग आ जाते हैं। घरमें सदा अशान्ति रहती है। नारियाँ यदि चाहें तो सहज ही मनका संयम करके कम खर्चकी आदत डालकर घरमें पति-पुत्रोंको सुख-शान्ति, आदतका सुधार तथा धर्म-पुण्यके लिये सुअवसर प्रदान कर सकती हैं।

उदारता—जिस प्रकार फिजूलखर्ची दोष है, उसी प्रकार पैसा होनेपर भी आवश्यक धार्मिक तथा सामाजिक कार्योंमें कंजूसी करना भी दोष है। बच्चोंकी बीमारीमें, उनके लिये दूध-फल आदिमें, श्राद्धादि धार्मिक कृत्योंमें, भगवान‍्की पूजा तथा पर्वोत्सवोंमें, गो-ब्राह्मण तथा देवसेवामें, बेटी-बहिनको देनेमें, बच्चोंकी शिक्षा-दीक्षामें, सास-ससुरकी सेवामें, परिवारके अन्य लोगोंकी सेवामें, विधवा तथा आश्रितोंके सत्कारपूर्ण भरण-पोषणमें, गरीबोंकी सेवामें तथा अपने स्वास्थ्यके लिये भोजन-औषध आदिमें जो नारी कंजूसी करती है और पैसा बटोरकर रखना चाहती है, उसका अपना नैतिक पतन तो होता ही है, उसके आदर्शसे उसके बाल-बच्चे भी बुरी शिक्षा ग्रहण करके पतित हो जाते हैं। अतएव आवश्यक कामोंमें कंजूसी न करके उदारतासे बरते। किसीकी सहायता-सेवा करके न अभिमान करे, न अहसान करे और न उसका बदला चाहे।

परदु:ख-कातरता—दूसरेको दु:खमें पड़े देखकर बिना किसी भेदभाव या पक्षपातके उसका दु:ख दूर करनेके लिये मनमें जो तीव्र भावना उत्पन्न होती है, उसका नाम ‘परदु:ख-कातरता’ है। इसीको दया भी कहते हैं। नारीमें इस गुणका विशेष विकास हो और दु:खी प्राणियोंका दु:ख हरण करनेके लिये वह भी अन्नपूर्णा बन जाय, यह बहुत ही आवश्यक है।

सेवा-शुश्रूषा—१. पतिकी सेवा, २. सास-ससुरकी सेवा,३. बच्चोंकी सेवा, ४. अतिथिसेवा, ५. देवसेवा, ६. देशसेवा और ७. रोगियोंकी तथा पीड़ितोंकी सेवा—ये सभी सेवाके अंग हैं। नारीमें सेवाभाव स्वाभाविक होता है; पर उसे सेवा करनी चाहिये केवल पतिसेवाके लिये या परमपति परमात्मा प्रभुकी सेवाके लिये ही। सेवामें उसका अन्य उद्देश्य नहीं होना चाहिये। सेवा वशीकरण-मन्त्र है। सेवासे सभीको वशमें किया जा सकता है। असलमें जीवन सेवामय ही होना चाहिये। जैसे धनमें ईर्ष्या होती है, वैसे ही शुद्ध सेवामें भी सबसे आगे बढ़नेकी ईर्ष्या तथा सेवाका अधिक-से-अधिक सुअवसर प्राप्त करनेकी तीव्र अभिलाषा एवं भगवान‍्से प्रार्थना होनी चाहिये। सेवा शुद्ध सेवाके भावसे ही होनी चाहिये। न तो सेवामें किसीका उपकार करनेका अभिमान होना चाहिये, न सेवाका विज्ञापन करनेकी कल्पना और न सेवाके बदलेमें कुछ पानेकी आकांक्षा ही। सेवा करनेपर जो गर्वहीन सहज आत्मसन्तोष होता है, वही परम धन है। सेवाके संक्षिप्त प्रकार ये हैं—

(१) तन-मन—सर्वस्व अर्पण करके सब प्रकारसे पतिको सुख पहुँचाने एवं उन्हें प्रसन्न करनेके लिये तथा उनका सदा-सर्वदा सर्वत्र कल्याण हो, इस कामनासे उनकी हर तरहकी सेवा करे।

(२) सास-ससुरकी सेवा करनेका सुअवसर मिला है, इसमें अपना सौभाग्य मानकर और वे सेवा स्वीकार करते हैं, इसलिये उनका उपकार मानकर—मधुर, आदरयुक्त वाणीसे उनकी रुचि तथा पसन्दके अनुसार भोजन, वस्त्र, आज्ञापालन, उनके इच्छानुसार धर्म-कार्य-सम्पादन या दान आदिके द्वारा तथा सासके और वृद्ध हों तो ससुरके भी चरण दबाकर, रोगादिकी अवस्थामें उनकी हर तरहकी सेवा करके, उनके मतानुसार उनकी कन्याओंको, जो ननद लगती हैं, सम्मानपूर्वक देकर बल्कि वे कम कहें और अपनी हैसियत अधिक देनेकी हो तो प्रार्थना करके—उनसे आज्ञा प्राप्त करके उन्हें अधिक देना चाहिये। इसमें वे प्रसन्न ही होंगे। उन्हें रामायण, भागवत, गीता, भगवन्नाम-कीर्तनादि सुनाकर सुख पहुँचावे।

(३) बच्चोंका स्वास्थ्य सुधरे, वे तन-मनसे विकसित हों, उनकी बुद्धिका विकास हो, उनके आचरणोंमें स्फूर्तियुक्त सात्त्विक गुणोंका प्रकाश हो, वे कुल, जाति, देश तथा धर्मका गौरव बढ़ानेवाले सुशिक्षित तथा सदाचारी हों एवं त्यागकी पवित्र भावनासे युक्त ईश्वरभक्त हों—इस प्रकारसे उनका लालन-पालन, शिक्षण-संवर्धन आदि करे।

(४) अतिथिको भगवान् समझकर उनकी यथाशक्ति तथा यथाविधि निर्दोष तथा निष्काम सेवा करे।

(५) घरमें इष्टदेवकी धातु अथवा पाषाणकी या चित्रमय मूर्ति रखकर श्रद्धा तथा विधिपूर्वक भक्तिके साथ उसकी नित्य विविध उपचारोंसे पूजा करे।

(६) देशकी सेवाके लिये उत्तम-से-उत्तम सन्तान निर्माण करे और उसे अपने-अपने कर्तव्यके द्वारा देशके रूपमें भगवान‍्की सेवाका सक्रिय पाठ सिखावे। देशकी नारियोंमें अपने आदर्श सदाचार, पातिव्रत्य तथा धर्मभावनाके द्वारा सत्-शिक्षा और सद्भावनाका विस्तार करे।

(७) घरमें तथा अवसर आनेपर आवश्यकता और अपनी सुविधाके अनुसार रोगियों और पीड़ितोंकी तन-मन-वचन तथा धनसे निर्दोष और निष्काम सेवा आदर तथा सत्कारपूर्वक करे। कभी सेवाका अभिमान न करे, न अहसान जनावे।

संयुक्त परिवार—जहाँतक हो, सहकर तथा उदारताके साथ विनम्र व्यवहार करके घरको संयुक्त रखे। भाइयोंको तथा परिवारको पृथक्-पृथक् न होने दे। पता नहीं, किसके भाग्यसे सुख तथा ऐश्वर्य मिलता है। कभी ऐसा न समझे कि मेरा पति या पुत्र कमाता है और दूसरे सब मुफ्तमें खाते हैं। सबका हिस्सा है और सब अपने-अपने भाग्यका ही खाते हैं। तुम जो इनमें निमित्त बन रहे हो, यह तुम्हारा सौभाग्य है। नारियोंपर यह एक कलंक है कि उनके आते ही सहोदर भाइयोंमें विद्वेष हो जाता है, घरमें फूट पड़ जाती है और फलत: घर बर्बाद हो जाता है। इस कलंकको धोना चाहिये और पति-पुत्रोंको समझाकर यथासाध्य संयुक्त परिवार तथा संयुक्त भोजन रहे, ऐसी चेष्टा करनी चाहिये। सेवाभाव तथा प्रेम जितना ही अधिक होगा, उतना ही त्याग अधिक होगा। प्रेमकी भित्ति त्याग है। जहाँ प्रेम होगा, वहाँ पृथक्-पृथक् होनेका प्रश्न ही नहीं उठेगा।

भक्ति—जीवनके प्रत्येक कर्मके द्वारा भगवान‍्की सेवा करना, मनके प्रत्येक संकल्पके द्वारा प्रभुका चिन्तन, प्रभुके प्रति आत्मसमर्पण, प्रभुको प्राप्त करनेकी उत्कण्ठा—ये भक्तिके मुख्य रूप हैं। इसके विभिन्न विधान हैं। उनको जानकर यथासाध्य प्रतिदिन नियमितरूपसे भगवान‍्के नामका जप, चिन्तन, उनकी लीला-कथाओंका वाचन-श्रवण-मनन, उनके दिव्य स्वरूपका ध्यान, उनकी आज्ञाओंका पालन एवं उनकी वाणी श्रीमद्भगवद‍्गीता तथा उनके पवित्र चरित्र श्रीरामायण तथा भागवत आदिका अध्ययन करना चाहिये।

सादगी—तनमें, मनमें तथा वचनमें कहीं भी दिखावट, दम्भ, बाहरी शृंगार, शौकीनी, कुटिलता नहीं हो। भड़कीले, चमकीले तथा विदेशी ढंगके वस्त्रादि, गहने तथा सेंट वगैरह, जिनसे लोगोंका आकर्षण होता हो, न हों। सभी वस्तुओंमें सादगी और सिधाई हो।

सतीत्व—यह नारीका सर्वोत्तम और अनिवार्य आवश्यक गुण है। इसके बिना नारी प्राणरहित शवकी भाँति दोषमयी है।