प्रसूति-घर कैसा हो?

प्रसूति-घर साफ सुन्दर हो, उसमें सूर्यकी किरणें तथा हलकी हवा आती हो, धरतीमें नमी न हो, आस-पासमें गन्दे नाले न हों, पाखानेकी दुर्गन्ध न आती हो, ताजा चूना पुता हुआ हो। कमरेमें सामान हो तो उसे वहाँसे हटा देना चाहिये। जाड़ेका मौसम हो तो उसे आवश्यकतानुसार गरम कर लेना चाहिये, पर उसमें रात-दिन अँगीठी नहीं जलानी चाहिये। स्त्रियाँ प्राय: रात-दिन अँगीठी रखती हैं और उसमें लकड़ी-कंडे जलाती रहती हैं। कई जगह ऐसा भी देखा गया है कि एक ओर अँगीठीमें आग धधकती रहती है, दूसरी ओर मिट्टीके तेलकी लालटेन जलती रहती है और किवाड़ बन्द कर दिये जाते हैं। परिणाम यह होता है कि आगका और लालटेनका धुआँ मिलनेसे जहरीली गैस पैदा हो जाती है और कमरेके अन्दरके सब लोग दम घुटकर मर जाते हैं। यह बहुत ही बुरी चीज है, इससे बचना चाहिये। प्रसूति-घरमें मिट्टीके तेलकी लालटेन न जलाकर तिलके तेलका दीपक जलाना चाहिये। इसकी ज्योति ठण्डी रहती है और जच्चा-बच्चाकी आँखोंको स्वस्थ रखती है। प्रसूति-घरको धूप, चन्दन आदिसे सुगन्धित रखना चाहिये। प्रसवके पहले उसमें शान्ति-पाठ, हवन, गौ, ब्राह्मणका आवाहन-पूजन,अग्नि और वरुणकी पूजा करायी जाय तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको मांगलिक वस्तु देकर स्वस्तिवाचन कराया जाय तो बहुत उत्तम है।

बुद्धिमती, अनुभववाली, साध्वी तथा सदाचारिणी स्त्रियाँ वहाँ रहें जो गर्भिणीको मधुर वचनोंसे सान्त्वना दें, हर्ष बढ़ानेवाली बातें करें और उसे आशीर्वाद दें तथा मधुर स्वरसे भगवान‍्का नाम-कीर्तन करें तो प्रसूति-घर कल्याणकारी होता है। प्रसव-स्थानपर काकजंघा, मकोय, कोषातकी, बृहती और मुलैठी—इन सबकी जड़ोंको पीसकर लेप देना चाहिये। इससे बालककी रक्षा होती है और रोगादिका सहज ही प्रवेश नहीं होता।

जच्चाके लिये अच्छी कसी हुई चारपाई या तख्ता हो, उसमें जूँ, खटमल आदि जीव बिलकुल न रहें। स्वच्छ गुदगुदा बिछौना हो। साफ धुली हुई चद्दर हो। चारपाई या तख्तेका सिरहाना ऊँचा हो। प्रसव होनेसे पहले ही गर्भिणीको अच्छी अनुभवी दाई देख ले और उचित व्यवस्था कर दे तो बहुत उत्तम है, प्रसूति-घरमें नीचे लिखी चीजें पहलेसे होनी चाहिये—

(१) अच्छा पलंग या तख्ता,

(२) मोमजामा,

(३) प्रसूतिके लिये दो मोटे सोख्ते (Absorbent pads)

(४) पेटपर लपेटनेके लिये गरम तथा मोटा कपड़ा,

(५) एक या दो साफ अँगोछे,

(६) पानी सोखनेवाली रूई (साधारण रूईको बाईकारबोनेट आफ सोडा और पानीमें उबालनेसे यह घरपर भी बनायी जा सकती है),

(७) पोंछनेके लिये धुले हुए कपड़े,

(८) साफ रूईके पहल,

(९) मीठा तेल,

(१०) शुद्ध देशी साबुन,

(११) पेटपर पट्टी लपेटकर अटकानेके लिये कुछ आलपीनें,

(१२) बच्चेको लपेटनेके लिये फलालैन, कम्बल या अन्य किसी गर्म कपड़ेका टुकड़ा,

(१३) तेज और साफ गरम पानीमें उबाला हुआ कैंची या चाकू,

(१४) नालके लिये गरम पानीमें उबाला हुआ रेशमी धागा,

(१५) डिट्टोल (Dettol) जन्तुनाशक दवाकी शीशी,

(१६) अरगट मिक्श्चर एक ड्राम,

(१७) बोरिक एसिड एक पाउण्ड,

(१८) तीन-चार रकाबी या प्याले,

(१९) गरम और ठण्डा पानी अलग-अलग पर्याप्त परिमाणमें और

(२०) बच्चेकी आँखके लिये दवाका पानी (बोरिक लोशन)।

प्रसवके समय बड़ी सावधानीसे काम किया जाय। जरा-सी भूलमें जच्चा-बच्चाके प्राणोंपर विपत्ति आ सकती है। उस समय मन-ही-मन भगवन्नाम-जप, भगवान‍्की प्रार्थना करते रहना चाहिये। प्रसूति-घरमें इस समय ऐसी स्त्री नहीं रहनी चाहिये जिससे प्रसूतिका मन न मिलता हो या परस्परमें द्वेष हो, नहीं तो बच्चेकी हानि तथा जच्चाको हिस्टीरिया अथवा प्रेत-बाधा-जैसा रोग हो सकता है।

प्रसवके बाद माता और बच्चा—दोनोंके स्वास्थ्यकी सावधानीसे रक्षा करनी चाहिये। इस समय माताको मानसिक और शारीरिक खूब आराम मिलना चाहिये। प्रसवके प्राय: दस दिन बादतक रक्तस्राव या अन्यान्य प्रवाही द्रव्योंका स्राव होता रहता है, इसलिये जन्तुनाशक डिट्टोल आदि दवाका व्यवहार किया जाना चाहिये। इससे दुर्गन्ध नहीं पैदा होगी। जन्तुनाशक दवामें उबाला हुआ छोटे तौलियेसे अथवा शुद्ध रूईके पहलसे योनिको ढकना और उसे बार-बार बदलना चाहिये। माता बच्चेको दूध पिलाती होगी तो गर्भाशय तुरन्त अपनी साधारण स्थितिमें आ जाता है। उसके सामान्य स्थितिमें आनेमें प्राय: डेढ़ महीना लगता है; परंतु पेड़ूमें सामान्य स्थिति दस दिनमें आ जाती है। इसलिये माताको कई सप्ताह आरामकी आवश्यकता है, परंतु बिछौनेपर पड़े ही नहीं रहना चाहिये। बैठना चाहिये। तैल आदि मालिश कराना चाहिये। इससे स्नायु शीघ्र सामान्य स्थितिमें आ जाते हैं।

कमरेको साफ स्वच्छ रखना चाहिये। उसमें मल-मूत्र न पड़ा रहे। पात्र धोकर सदा साफ रखे जायँ । जच्चा-बच्चाके कपड़े खून, मल, मूत्र आदिमें न सनने पावें। घरका आँगन साफ रहे। प्रात:-सायं नीम, गुग्गुल, धूप आदि सुगन्धित द्रव्योंकी धूप दी जाय। कमरेमें दुपहरको धूप आने दी जाय। वहाँ सात्त्विक शुद्ध अच्छी बातें हों। वातावरण सर्वथा सात्त्विक रहे। ऐसा करनेसे जच्चा-बच्चा स्वस्थ रहते हैं और उनके मनपर बड़ा सुन्दर प्रभाव पड़ता है।

प्रसवके बाद दूसरे दिनसे लेकर कम-से-कम एक सप्ताहतक माताको दशमूलका क्वाथ पिलाया जाय तो माता और बच्चेके स्वास्थ्यपर बहुत अच्छा असर पड़ता है।

प्रसवके समय बहुत पीड़ा होती हो और बच्चा न होता हो तो कैमोमिला १२ (होमियोपैथिक) दवा एक खुराक दे दें तो सुखपूर्वक बच्चा हो जायगा। एक खुराकसे न हो तो आधे घंटे बाद एक खुराक और दे दें। कण्टकारीकी जड़ हाथ-पैरमें बाँध देनेसे शीघ्र प्रसव होता है। फूल न आये हों ऐसे इमलीकी छोटे वृक्षकी जड़ सिरके सामनेसे बालोंसे बाँध दी जाय, इससे सहज प्रसव हो जाता है, परंतु सन्तान प्रसव होते ही तुरन्त उसी क्षण बालोंसमेत उसे कैंचीसे काट डालना चाहिये। बंगालमें सादा माकाल नामक एक पौधा होता है, उसकी जड़ कमरमें बाँध देनेसे भी तुरन्त प्रसव होता है, पर उसे भी बच्चा होते ही उसी क्षण अवश्य खोल देना चाहिये।

वटके पत्तेपर नीचे लिखा यन्त्र तथा मन्त्र लिखकर गर्भिणीके मस्तकपर रख देनेसे भी सुखपूर्वक प्रसव होता देखा गया है।

मन्त्र—

अस्ति गोदावरीतीरे जम्भला नाम राक्षसी।

तस्या: स्मरणमात्रेण विशल्या गर्भिणी भवेत् ॥

[यन्त्र]

निम्नलिखित मन्त्रसे अभिमन्त्रित जल पिलानेसे भी सारी बाधाएँ दूर होकर सुख-प्रसव होता है और जच्चा-बच्चाका कल्याण होता है।

अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात्।

नश्यन्ति सकला रोगा: सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥