ऋतुकालमें स्त्रीको कैसे रहना चाहिए?
स्त्री-शरीरमें जो मलिनता होती है, वह प्रतिमास रज:स्रावके द्वारा निकल जाती है और वह पवित्र होकर गर्भधारणके योग्य बन जाती है। मनुमहाराज भी यही कहते हैं। हिन्दू-शास्त्रोंमें कहा गया है कि रजस्वला स्त्रीको तीन दिनोंतक किसीका स्पर्श नहीं करना चाहिये। उसे सबसे अलग, किसीकी नजर न पड़े ऐसे स्थानमें बैठना चाहिये। चौथे दिन स्नान करके पवित्र होनेके समयतक किसीको न अपना मुख दिखलाना चाहिये, न अपना शब्द सुनाना चाहिये—
स्त्री धर्मिणी त्रिरात्रं तु स्वमुखं नैव दर्शयेत्।
स्ववाक्यं श्रावयेन्नापि यावत् स्नानान्न शुद्धॺति॥
ऋतुकालके समय पुरुषोंको भूलकर भी रजस्वलाके समीप नहीं जाना चाहिये। मनुमहाराज कहते हैं—
नोपगच्छेत् प्रमत्तोऽपि स्त्रियमार्तवदर्शने।
समानशयने चैव न शयीत तया सह॥
रजसाभिप्लुतां नारीं नरस्य ह्युपगच्छत:।
प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रहीयते॥
तां विवर्जयतस्तस्य रजसा समभिप्लुताम्।
प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रवर्धते॥
(मनु० ४।४०—४२ )
‘कामातुर होनेपर भी पुरुष रजोदर्शनके समय स्त्री-समागम न करे और स्त्रीके साथ एक शय्यापर न सोवे। जो पुरुष रजस्वला नारीके साथ समागम करता है उसकी बुद्धि, तेज, बल, नेत्र और आयु नष्ट होती है। और जो पुरुष रजस्वला स्त्रीसे बचा रहता है, उसकी बुद्धि, तेज, बल, नेत्र-ज्योति और आयु बढ़ती है।’
रजस्वला होनेके समय जितना इन्द्रिय-संयम, हलका भोजन तथा विलासिताका अभाव होगा उतनी ही स्त्रीशोणितकी शक्ति कम होगी, जिससे ऋतुस्नानके बाद गर्भाधान होनेपर कन्या न होकर पुत्र उत्पन्न होगा। रजस्वला स्त्रीको तीन दिनोंतक केवल एक बार भोजन करना, जमीनपर सोना, संयत रहना, घी-दूध-दहीका सेवन नहीं करना, पुष्पमाला या गहने नहीं पहनना, अग्निको स्पर्श न करना और चतुर्थ दिन सचैल स्नान करना चाहिये।
ऋतुकालमें स्त्रीका स्पर्श न करनेसे उसका अपमान होता है, ऐसा कभी नहीं मानना चाहिये। उसके अपने स्वास्थ्यके लिये तथा दूसरोंके स्वास्थ्य एवं प्राकृतिक जड वस्तुओंको अपने स्वरूपमें सुरक्षित रहने देनेके लिये भी उसका किसीको न देखना और न स्पर्श करना आवश्यक है। बहुधा यह देखा गया है कि घरमें पापड़ बनते हों और रजस्वला स्त्री उनको देख ले तो पापड़ लाल हो जाते हैं। कुछ लोग इस बातको बहम कहा करते हैं, परंतु यह वैज्ञानिक तथ्य है।
अमेरिकाके प्रो० शीक (Schiek) ने अनुसन्धान करके यह प्रमाणित किया है कि रजस्वला नारीके शरीरमें ऐसा कोई प्रबल विष होता है कि वह जिस बगीचेमें चली जाती है, उस बगीचेके फूल-पत्ते आदि सूख जाते हैं, फूलोंके वृक्ष मर जाते हैं, फल सड़ जाते हैं। यहाँतक कि वृक्षोंमें कीड़े आदि भी पड़ जाते हैं। कभी-कभी मर भी जाते हैं।*
ऋतुकालके समय पालन करनेके नियम
जबतक रक्त बहता है, तबतक ऋतुकाल ही है। साधारणत: तीन दिन ऋतुकालके माने जाते हैं, परंतु तीन दिनके बाद भी यदि रक्त बन्द नहीं होता तो वैसी हालतमें चौथे दिन स्नान करनेसे शुद्धि नहीं होती। अशुद्धिका कारण तो रक्तस्राव है, वह जबतक है, तबतक स्नानमात्रसे शुद्धि कैसे हो सकती है? अतएव जबतक रक्तस्राव है, तबतक नियमोंका पालन भी आवश्यक है।
नियम
(१) ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिये, जिससे तलपेटको अधिक हिलाना पड़े या उसपर जोर देनेका-सा दबाव पड़े। जलका भरा कलसा उठाना, ज्यादा देरतक उकड़ूँ बैठना, दौड़-भाग करना, बहुत जोरसे हँसना, रोना या झगड़ा करना, ज्यादा घूमना-फिरना, गाना-बजाना, शोक, दु:ख या काम बढ़ानेवाले दृश्य देखना या ग्रन्थ पढ़ना—ये सभी हानिकर हैं। खास करके—जो काम अन्दरसे जोर लगाकर करने पड़ते हैं, (जैसे जलका कलसा उठाना या चूल्हेपरसे बहुत वजनदार बर्तनको उतारना आदि ) नहीं करने चाहिये। घरके साधारण काम-काज करनेमें हर्ज नहीं है।
(२) तलपेट और कमरको ठण्ड लगे ऐसा काम नहीं करना चाहिये। रजोदर्शनके समय जो स्नान करना मना है, उसका यही कारण है। इस समय मस्तकमें गरमी मालूम होनेपर ठण्डा तेल लगाना और जलके अँगोछेसे पोंछना हानिकारक नहीं है; परंतु कमर जलमें डुबाकर नहाना या गीली जगहमें खुले बदन सोना बहुत हानिकर है।
(३) मैले-कुचैले कपड़ेके टुकड़ेका व्यवहार नहीं करना चाहिये। एक बार काममें लाया हुआ कपड़ा धो लेनेपर भी फिर उसे काममें लेना हानिकर है। रजस्वला-समयका रक्त एक प्रकारका विष है। इस विषके संसर्गमें आयी हुई चीजको भी विषके समान ही समझकर उसका त्याग करना चाहिये।
(४) जबतक रक्तस्राव होता हो, तबतक पतिका संग तो भूलकर भी न करे। शास्त्रोंमें इन दिनोंमें पतिका दर्शन करना भी निषिद्ध बतलाया गया है।
(५) मांसाहारियोंको भी इन दिनोंमें मांस, मद्य, मछली या प्याज आदि बिलकुल नहीं खाने चाहिये।
साधारण-से नियम हैं। पर इनका पालन करनेवाली स्त्री जैसे स्वस्थ और सुखी रहती है, वैसे ही न पालन करनेवालीको निश्चय ही बीमार तथा दु:खी होना पड़ता है।