सास-ननदका बहू तथा भौजाईके प्रति बर्ताव

प्राय: देखा गया है कि दूसरोंके साथ अच्छा बर्ताव करनेवाली सद‍्गुणवती सास भी बहुओंके साथ बुरा बर्ताव कर बैठती है। पहले-पहल जब बहू ससुराल जाती है, तब उसे लज्जाके कारण बड़ी असुविधाएँ होती हैं। ससुरालमें किसका कैसा स्वभाव है, वह जानती नहीं। मनमें बड़ा संकोच रहता है। बीमार होती है, सिर-पेटमें दर्द होता है तो भी संकोचसे कुछ कहती नहीं। नया घर है। स्नेहसे पालनेवाले माता-पिता नहीं। ऐसी अवस्थामें उससे गलती भी हो जाती है। इसलिये सासका कर्तव्य और धर्म होता है कि वह उस अबोध बच्चीपर दया करे और उसके सुख-दु:खका विशेष ध्यान रखे। बहूकी किसी भूलपर रणचण्डी न बन जाय, उसको तथा उसके माँ-बापको जली-कटी न सुनावे। विचार करना चाहिये कि तुम्हारी बेटीको ससुरालमें ऐसा ही व्यवहार प्राप्त हो तो उसको कितना दु:ख होगा और तुम सुनोगी तो तुम्हें भी कितना कष्ट होगा। इसी प्रकार इसको और पता लगनेपर इसके माता-पिताको भी दु:ख होगा। यहाँ इसका कोई सहायक नहीं है। यह अपने मनकी बात किससे कहे। सासकी देखा-देखी यदि उसकी लड़की (ननद) भी अपनी भावजसे बुरा बर्ताव करने लगती है, तब तो उस बेचारीका दु:ख बहुत ही बढ़ जाता है। कहीं-कहीं तो माताके कहनेसे उसका पुत्र (बहूका पति) भी अपनी पत्नीको मारने-डाँटने लगता है। ऐसी अवस्थामें वह बेचारी मन-ही-मन रोती-कलपती है। कहीं-कहीं तो इसी दु:खसे बहुएँ आत्महत्यातक करनेको मजबूर होती हैं!!

अतएव सासको चाहिये कि बहूको अपनी बेटीसे अधिक प्रिय समझकर उससे प्यार करे। अपने सद्‍व्यवहारसे उसके मनमें यह बैठा दे कि मेरी सास साक्षात् लक्ष्मी है और मेरी मातासे भी बढ़कर मुझसे प्रेम करती है। सासको समझना चाहिये कि बहू ही उसके कुलकी रक्षा करनेवाली, उत्तम सन्तान उत्पन्न करके उसके पतिका नाम अमर करनेवाली है।

ननदको समझना चाहिये कि अपने पीहरके कुलदीपक—भाईकी पत्नी होनेके कारण भावज उसके लिये अत्यन्त आदरकी पात्री है। उससे ईर्ष्या-डाह कभी नहीं करनी चाहिये। वह साससे कुछ कहनेमें तो सकुचाती है, इसलिये सगी बहनकी भाँति उससे प्यार करके उसके मनकी सुख-दु:खकी बात पूछनी चाहिये। उससे कभी भूल हो जाय तो अपनी मातासे उसको छिपा लेना चाहिये और माता कभी नाराज हो तो उसे समझाकर शान्त करना चाहिये। ननदको विचार करना चाहिये कि मेरी ससुरालमें मैं अपनी ननदसे जैसा सुन्दर बर्ताव चाहती हूँ, वैसा ही मुझे भी यहाँ अपनी भावजके साथ करना चाहिये।

यह देखा गया है कि सास-ननद अपने बुरे बर्तावसे बहूका मन इतना खिन्न कर देती हैं कि उसके कारण कई जगह तो छोटी उम्रकी बहुएँ ‘हिस्टीरिया’ रोगसे ग्रसित हो जाती हैं और मन-ही-मन सास-ननदको शाप देती हुई अकालमें मर जाती हैं। हिस्टीरिया रोग प्राय: उन नववधुओंको ही अधिक होता है, जिनको अन्दर-ही-अन्दर मन मसोसकर दु:ख-क्लेश सहने पड़ते हैं। इस मानसिक दु:खसे उनकी रज-व्यवस्था बिगड़ जाती है तथा हिस्टीरिया या मन्दाग्नि हो जाती है। और यदि कहीं बहू भी उग्र स्वभावकी हुई—(पहले न होनेपर भी बहुत अधिक असत्कार और दुर्व्यवहार प्राप्त होनेपर उसमें उग्रता जाग्रत् हो जाती है) तो घरमें दिन-रात कलह मचा रहता है। एक तरफ सास रोती है, दूसरी तरफ बहू। ऐसी हालतमें बेचारे पतिकी दुर्गति होती है। वह यदि माँकी तरफ होकर पत्नीको कुछ कहता-सुनता है तो वह आत्महत्याको तैयार होती है और माताको कुछ कहता है तो माता नाराज होती है और पत्नीमें लड़नेका साहस बढ़ता है। मतलब यह कि घरकी सुख-शान्ति नष्ट हो जाती है। अतएव सास-ननदको बहू-भावजके साथ बहुत ही उत्तम बर्ताव करना चाहिये। सच्चा धर्म वही है कि जैसा बर्ताव आदमी दूसरोंसे चाहता है वैसा ही दूसरोंके साथ पहले स्वयं करे। ‘आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्’ जो बर्ताव अपने मनके प्रतिकूल हों, वे दूसरोंके प्रति कभी न करे।