सन्ततिनिरोध
वर्तमान समयमें कई कारणोंसे सन्ततिनिरोधका भी प्रश्न छिड़ा हुआ है जो कुछ दृष्टियोंसे आवश्यक भी जान पड़ता है। यह सत्य है कि भारतके समान गरीब देशमें इस महान् महँगीके युगमें अधिक सन्तान माता-पिताके लिये बड़े ही सन्तापका हेतु होती है और उसका निरोध या सीमित होना अवश्य ही लाभप्रद माना जा सकता है; परंतु किया क्या जाय; यह तो विधिका विधान है। पूर्वकर्म भी कोई वस्तु है, उसका फल सहज ही टल नहीं सकता। जिस जीवका जहाँ जन्म बदा है, वहाँ होगा ही—यह सिद्धान्त है; परंतु यदि कोई इसे न भी माने तो सन्ततिनिरोधका सबसे बढ़िया तरीका एकमात्र इद्रियसंयम है। सन्ततिनिरोधकी आवश्यकता और साधन बतलानेवाली मिस सेंगर-जैसी विदेशी रमणीके सद्भावोंका अनादर न करते हुए भी यह कहना ही पड़ता है कि उनके बतलाये हुए साधन भारतीय संस्कृतिके अनुसार नीति, सदाचार और धर्म सभी दृष्टियोंसे हानिकर ही नहीं वरं पापपूर्ण हैं। इस प्रकारकी सन्ततिनिरोधकी प्रणालीमें व्यभिचारकी वृद्धि और कामवासनाकी निष्कण्टक चरितार्थताकी सम्भावना ही प्रत्यक्ष रूपसे छिपी है। महात्मा गाँधीने एक लेखमें लिखा था—‘इन कृत्रिम साधनोंसे ऐसे-ऐसे कुपरिणाम आये हैं, जिनसे लोग बहुत कम परिचित हैं। स्कूली लड़के और लड़कियोंके गुप्त व्यभिचारने क्या तूफान मचाया है, यह मैं जानता हूँ ......। मैं जानता हूँ, स्कूलोंमें, कॉलेजोंमें ऐसी अविवाहिता जवान लड़कियाँ भी हैं, जो अपनी पढ़ाईके साथ-साथ कृत्रिम सन्तति-निग्रहका साहित्य और मासिक पत्र बड़े चावसे पढ़ती रहती हैं और कृत्रिम साधनोंको अपने पास रखती हैं। इन साधनोंको विवाहित स्त्रियोंतक ही सीमित रखना असम्भव है और विवाहकी पवित्रता तो तभी लोप हो जाती है जब कि उसके स्वाभाविक परिणाम सन्तानोत्पत्तिको छोड़कर महज अपनी पाशविक विषय-वासनाकी पूर्ति ही उसका सबसे बड़ा उपयोग मान लिया जाता है।’
इससे यह सिद्ध हो जाता है कि मनुष्योंके हृदयमें कृत्रिम सन्ततिनिग्रहके इस आन्दोलनसे पवित्रताके स्थानपर किस प्रकार घृणित पाशविक कामका आधिपत्य हो रहा है और किस प्रकार हमारे अपरिपक्वमति बालक और बालिकाएँ इसके शिकार होकर अपना सर्वनाश कर रहे हैं!
सन्ततिनिरोधके लिये संयमकी आवश्यकता है। एक प्रसवके बाद दूसरे प्रसवके बीचमें पाँच सालका समय रहे तो सन्ततिनिरोध अपने-आप ही हो जायगा।