सती-माहात्म्य

(१)

अनुव्रजन्ती भर्तारं गृहात् पितृवनं मुदा।

पदे पदेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम्॥

व्यालग्राही यथा व्यालं बलादुद्धरते विलात् ।

एवमुत्क्रम्य दूतेभ्य: पतिं स्वर्गं व्रजेत् सती॥

यमदूता: पलायन्ते तामालोक्य पतिव्रताम्।

तपनस्तप्यते नूनं दहनोऽपि च दह्यते॥

कम्पन्ते सर्वतेजांसि दृष्ट्वा पातिव्रतं मह:।

यावत्स्वलोमसंख्यास्ति तावत्कोट्ययुतानि च॥

भर्त्रा स्वर्गसुखं भुङ्‍क्ते रममाणा पतिव्रता।

धन्या सा जननी लोके धन्योऽसौ जनक: पुन:॥

धन्य: स च पति: श्रीमान् येषां गेहे पतिव्रता।

पितृवंश्या मातृवंश्या: पतिवंश्यास्त्रयस्त्रय:॥

पतिव्रताया: पुण्येन स्वर्गसौख्यानि भुञ्जते।

पतिव्रतायाश्चरणो यत्र यत्र स्पृशेद् भुवम्॥

सा तीर्थभूमिर्मान्येति नात्र भारोऽस्ति पावन:।

बिभ्यत् पतिव्रतास्पर्शं कुरुते भानुमानपि॥

सोमो गन्धर्व एवापि स्वपावित्रॺाय नान्यथा।

आप: पतिव्रतास्पर्शमभिलष्यन्ति सर्वदा॥

गायत्रॺाघविनाशो न: पातिव्रत्येन साधनुत् ।

गृहे गृहे न किं नार्यो रूपलावण्यगर्विता:॥

परं विश्वेशभक्त्यैव लभ्यते स्त्री पतिव्रता।

भार्या मूलं गृहस्थस्य भार्या मूलं सुखस्य च॥

भार्या धर्मफलायैव भार्या संतानवृद्धये।

परलोकस्त्वयं लोको जीर्यते भार्यया द्वयम्॥

देवपित्रतिथीनां च तृप्ति: स्याद् भार्यया गृहे।

गृहस्थ: स तु विज्ञेयो गृहे यस्य पतिव्रता॥

यथा गंगावगाहेन शरीरं पावनं भवेत् ।

तथा पतिव्रतां दृष्ट्वा सदनं पावनं भवेत् ॥

[स्कन्दपु०, ब्रह्मखण्ड (धर्मारण्यखण्ड), अ० ७]

‘जो नारी अपने मृत पतिका अनुसरण करती हुई घरसे श्मशानकी ओर प्रसन्नताके साथ जाती है, वह पद-पदपर अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करती है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जैसे सर्प पकड़नेवाला सँपेरा साँपको उसके बिलसे बलपूर्वक निकाल लेता है, उसी प्रकार सती स्त्री अपने पतिको यमदूतोंके हाथसे छीनकर स्वर्गलोकमें जाती है। उस पतिव्रता देवीको देखकर यमदूत स्वयं भाग जाते हैं। पतिव्रताके तेजका अवलोकन करके सबको तपानेवाले सूर्यदेव स्वयं सन्तप्त हो उठते हैं, दूसरोंको जलानेवाले अग्निदेव भी स्वयं ही जलने लगते हैं तथा त्रिभुवनके सम्पूर्ण तेज काँप उठते हैं। अपने शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने अयुतकोटि (उतने ही खर्व) वर्षोंतक पतिव्रता स्त्री स्वर्गमें पतिके साथ विहार करती हुई सुख भोगती है। संसारमें वह माता धन्य है, वह पिता धन्य है तथा वह भाग्यवान् पति धन्य है, जिसके घरमें पतिव्रता स्त्री विराजती है। पतिव्रता स्त्रीके पुण्यसे उसके पिता, माता और पति—इन तीनोंके कुलोंकी तीन-तीन पीढ़ियाँ स्वर्गलोकमें जाकर सुख भोगती हैं। पतिव्रताका चरण जहाँ-जहाँ धरतीका स्पर्श करता है, वह स्थान तीर्थभूमिकी भाँति मान्य है। वहाँ भूमिपर कोई भार नहीं रहता, वह स्थान परम पावन हो जाता है। सूर्य भी डरते-डरते ही अपनी किरणोंसे पतिव्रताका स्पर्श करते हैं। चन्द्रमा और गन्धर्व आदि अपनेको पवित्र करनेके लिये ही उसका स्पर्श करते हैं और किसी भावसे नहीं। जल सदा पतिव्रता देवीके चरण-स्पर्शकी अभिलाषा रखता है। वह जानता है कि ‘गायत्रीके द्वारा जो हमारे पापका नाश होता है, उसमें उस देवीका पातिव्रत्य ही कारण है। पातिव्रत्यके बलसे ही वह हमारे पापोंका नाश करती है। क्या घर-घरमें अपने रूप और लावण्यपर गर्व करनेवाली नारियाँ नहीं हैं। परन्तु पतिव्रता स्त्री भगवान् विश्वेश्वरकी भक्तिसे ही प्राप्त होती है। गृहस्थ-आश्रमका मूल भार्या है, सुखका मूल कारण भार्या है। धर्म-फलकी प्राप्ति तथा सन्तानकी वृद्धिका भी भार्या ही कारण है। भार्यासे लोक और परलोक दोनोंपर विजय प्राप्त होती है। घरमें भार्याके होनेसे ही देवताओं, पितरों और अतिथियोंकी तृप्ति होती है। वास्तवमें गृहस्थ उसीको समझना चाहिये जिसके घरमें पतिव्रता स्त्री है। जैसे गंगामें स्नान करनेसे शरीर पवित्र होता है, उसी प्रकार पतिव्रताका दर्शन करके सम्पूर्ण गृह पवित्र हो जाता है।’

(२)

पुरुषाणां सहस्रं च सती स्त्री च समुद्धरेत्।

पति: पतिव्रतानां च मुच्यते सर्वपातकात् ॥

नास्ति तेषां कर्मभोग: सतीनां व्रततेजसा।

तया सार्धं च निष्कर्मा मोदते हरिमन्दिरे॥

पृथिव्यां यानि तीर्थानि सतीपादेषु तान्यपि।

तेजश्च सर्वदेवानां मुनीनां च सतीषु तत्॥

तपस्विनां तप: सर्वं व्रतिनां यत् फलं व्रते।

दाने फलं च दातॄणां तत् सर्वं तासु सन्ततम्॥

स्वयं नारायण: शम्भुर्विधाता जगतामपि।

सुरा: सर्वे च मुनयो भीतास्ताभ्यश्च सन्ततम्॥

सतीनां पादरजसा सद्य: पूता वसुन्धरा।

पतिव्रतां नमस्कृत्य मुच्यते पातकान्नर:॥

त्रैलोक्यं भस्मसात्कर्तुं क्षणेनैव पतिव्रता।

स्वतेजसा समर्था सा महापुण्यवती सदा॥

सतीनां च पति: साध्वी पुत्रो नि:शङ्क एव च।

न हि तस्य भयं किञ्चिद् देवेभ्यश्च यमादपि॥

शतजन्मसुपुण्यानां गेहे जाता पतिव्रता।

पतिव्रताप्रसू: पूता जीवन्मुक्त: पिता तथा॥

श्रुतं दृष्टं स्पृष्टं

स्मृतमपि नृणां ह्लादजननं

न रत्नं स्त्रीभ्योऽन्यत्

क्वचिदपि कृतं लोकपतिना।

तदर्थं धर्मार्थौ

सुतविषयसौख्यानि च ततो

गृहे लक्ष्म्यो मान्या:

सततमबला मानविभवै:॥

ये ह्यंगनानां प्रवदन्ति दोषान्

वैराग्यमार्गेण गुणान् विहाय।

ते दुर्जना मे मनसो वितर्क:

सद्भाववाक्यानि न तानि तेषाम्॥

(वाराहमिहिरकृत बृहत्संहिता)

‘सती स्त्री सहस्रों पुरुषोंका उद्धार कर देती है। पतिव्रताका पति सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। सतियोंके व्रतके प्रभावसे उनके पतिको कर्मका भोग नहीं भोगना पड़ता। वह सब कर्मोंके बन्धनसे रहित हो सती पत्नीके साथ भगवान् विष्णुके धाममें आनन्दका अनुभव करता है। पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सब सती-साध्वी स्त्रीके चरणोंमें लोटते हैं। सम्पूर्ण देवताओं और मुनियोंका जो तेज है, वह सब सती नारियोंमें स्वभावत: रहता है। तपस्वी जनोंका सारा तप, व्रत करनेवालोंके व्रतका सम्पूर्ण फल तथा दाताओंके दानका भी समस्त फल मिलकर जितना होता है, वह सब पतिव्रता देवियोंमें व्याप्त रहता है। साक्षात् भगवान् नारायण, भगवान् शिव, जगद्विधाता ब्रह्माजी तथा सम्पूर्ण देवता और महर्षि भी पतिव्रताओंसे सदा डरते रहते हैं। सतीकी चरणधूलि पड़नेसे पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। पतिव्रताको मस्तक झुकानेसे मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है। महापुण्यवती पतिव्रता स्त्री सदा अपने तेजसे तीनों लोकोंको क्षणभरमें भस्म कर डालनेकी शक्ति रखती है। पतिव्रताका पति तथा उसका पुत्र—ये दोनों सदा निर्भय रहते हैं। उन्हें देवताओं और यमसे भी किंचित् भय नहीं होता। जो सौ जन्मोंसे उत्तम पुण्यका संचय करते आ रहे हैं, उन्हींके घरमें पतिव्रता कन्या जन्म लेती है। पतिव्रताको जन्म देनेवाली माता परम पवित्र है तथा उसके पिता भी जीवन्मुक्त हैं। समस्त लोकोंकी रचना करनेवाले विधाताने कहीं भी स्त्रियोंके सिवा दूसरा कोई ऐसा रत्न नहीं उत्पन्न किया है, जो देखने, सुनने तथा स्पर्श और स्मरण करनेपर भी मनुष्योंको आनन्द प्रदान करनेवाला हो। उन्हींके लिये धर्म और अर्थका संग्रह होता है। पुत्रविषयक सुख उन्हींसे प्राप्त होता है। अत: मान ही जिनका धन है, ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंको उचित है कि वे घरमें अबलाओंको गृह-लक्ष्मी समझकर सदा उनका आदर करें। जो लोग केवल वैराग्यमार्गका सहारा ले स्त्रियोंके गुणोंको छोड़कर सिर्फ उनके दोषोंका वर्णन करते हैं, वे दुर्जन हैं—ऐसा मेरे मनका अनुमान है। वे दोष-वाक्य उनके मुखसे सद्भावनासे प्रेरित होकर नहीं निकले हैं।’