स्त्री-शिक्षा और सहशिक्षा
प्राय: सभी धार्मिक तथा विद्वान् महानुभावोंका यह मत है कि वर्तमान धर्महीन शिक्षाप्रणाली हिन्दू-नारियोंके आदर्शके सर्वथा प्रतिकूल है; फिर जवान लड़के-लड़कियोंका एक साथ पढ़ना तो और भी अधिक हानिकर है। इस सहशिक्षाका भीषण परिणाम प्रत्यक्ष देखनेपर भी मोहवश आज उसी मार्गपर चलनेका आग्रह किया जा रहा है। इसका कारण प्रत्यक्ष है।
जिन बातोंको हमारे यहाँ पतन समझा जाता है, वही बातें आजके जगत्की दृष्टिमें उत्थान या उन्नतिके चिह्न मानी जाती हैं। पश्चिमीय सभ्यताका आदर्श आज हमारे हृदयोंमें सबसे ऊँचा आसन प्राप्त कर चुका है, अतएव अन्धे होकर उसकी ओर स्वयं अग्रसर होना और दूसरोंको ले जानेकी चेष्टा करना स्वाभाविक ही है।
पहले ‘समानशिक्षा’ पर कुछ विचार करें। शिक्षाका साधारण उद्देश्य है मनुष्यके अन्दर छिपी हुई पवित्र तथा अभ्युदयकारिणी शक्तियोंका उचित विकास करना। परंतु क्या पुरुष और स्त्रीमें शक्ति एक-सी है? क्या पुरुष और स्त्रीकी शक्तिके विकासका क्षेत्र एक ही है? क्या सब बातोंमें पुरुषके समान ही स्त्रीको शिक्षा ग्रहण करनेकी आवश्यकता है? गहराईसे विचार करनेपर स्पष्ट उत्तर मिलता है ‘नहीं’। दोनोंकी शरीर-रचनामें भेद है, दोनोंके कार्योंमें भेद है, दोनोंके हृदयोंमें भेद है और दोनोंके कर्मक्षेत्र भी विभिन्न हैं। अत: इस भेदको ध्यानमें रखकर ही शिक्षाकी व्यवस्था करनी चाहिये। इस प्रकृति-वैचित्र्यको मिटाकर आज हम प्रमादवश स्त्री-पुरुषको सभी कार्योंमें समान देखना चाहते हैं। इस असम्भव साम्यवादकी मोहिनी आशाने हमारी मतिको तमसाच्छन्न कर दिया है, इसीसे हमें आज प्रत्यक्ष भी अप्रत्यक्ष हो रहा है। ध्यानसे देखनेपर दोनोंमें दो प्रकारकी शक्तियाँ माननी पड़ती हैं और दोनोंके दो क्षेत्र भी साबित होते हैं। स्त्रियोंका क्षेत्र है घर, पुरुषका क्षेत्र है बाहर। स्त्री घरकी स्वामिनी है, पुरुष बाहरका मालिक है। ‘घर’ और ‘बाहर’ से यह मतलब नहीं कि स्त्री सदा घरके अन्दर बन्द रहे और पुरुष सदा बाहर ही रहे। स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर ही एक सच्चा ‘घर’ है। पति बाहर जाता है, उसी ‘घर’ के लिये और स्त्री घरमें रहती है, उसी ‘घर’ के लिये। इसी प्रकार आवश्यक होनेपर धार्मिक या सामाजिक कार्यके निमित्त स्त्री घरकी मर्यादाके अनुसार पति-पुत्रादिके साथ बाहर जाती है उसी ‘घर’ के लिये—‘घर’ को भूलकर स्वतन्त्र शौकसे नहीं। पति घरमें आता है ‘घर’ के लिये—‘घर’ को भूलकर बाहरकी सफलतामें फूलकर, अभिमानमें डूबकर, हुकूमत करनेके लिये नहीं। घर-बाहरकी यह व्यवस्था, जाना-आना, मिलना-जुलना, कमाना-खाना, पाठ-पूजन, दान-पुण्य, आचार-व्यवहार—सब इस एक ही ‘घर’ को सुरक्षित और समुन्नत बनानेके लिये है।
स्त्रीको मातृत्वमें जो सुख है, घरकी स्वतन्त्रतामें जो आनन्द है, वह दफ्तरकी क्लर्कीमें कहाँसे मिलेगा? स्त्रीका खास क्षेत्र मातृत्व है। उसके सारे अंग आरम्भसे इस मातृत्वके लिये ही सचेष्ट हैं। वह मातृत्वका पोषण करनेवाले गुणोंसे ही महान् बनी है। वह माता बनकर ही बड़े-बड़े यशस्वी पुरुषोंको अवतरित करती है। सब प्रकारके पुरुषोचित बड़े-से-बड़े प्रलोभनोंपर लात मारकर—बहुत बड़ा त्याग करके ही नारी इस मातृत्वके गौरवपूर्ण पदको प्राप्त करती और सुखी होती है। जिस शिक्षासे इस मातृत्वमें बाधा पहुँचती है, जिस शिक्षामें स्त्रीके पवित्र मातृत्वके आधारस्वरूप सतीत्वपर कुठाराघात होता है, वह तो शिक्षा नहीं है, कुशिक्षा है।
एक पत्रमें प्रकाशित हुआ था कि एक फैशनेबल पाश्चात्य युवतीने अपने बालकको इसलिये मार डाला कि उसको रात्रिके समय खाँसी अधिक आती थी, इस कारण वह बहुत रोता और इससे युवतीके सुख-शयनमें विघ्न होता था। एक युवतीने बच्चेके पालन-पोषणसे पिण्ड छुड़ानेके लिये आत्महत्या कर ली थी। मातृत्वका यह विनाश कितना भयंकर है? परंतु जिस उच्च शिक्षाके पीछे आज हम व्याकुल हैं, जिस सभ्यताका प्रभाव आजकी हमारी स्त्री-शिक्षाको संचालित कर रहा है, उस सभ्यताके मातृत्व-नाशका तो यही नमूना है। आज हम स्त्रियोंके मातृत्वका विनाशकर उन्हें नेतृत्व करना सिखाते हैं, परंतु यह भूल जाते हैं कि यदि मातृत्व या सतीत्वका आदर्श न रहा, यदि स्त्री अपने स्वाभाविक त्यागके आदर्शको भूल गयी—वह स्नेहमयी माँ, प्रेममयी पत्नी या त्यागमयी देवी न रही, तो उसका नेतृत्व किसपर होगा?
याद रखना चाहिये कि विदेशी भाषामें बी०ए०, एम०ए० हो जाना कोई खास शिक्षा नहीं है। परायी भाषा सीखकर ही कोई स्त्री विदुषी नहीं हो जाती, इसीसे उसमें कोई दिव्य गुण नहीं आ जाते। विदेशी भाषा सीखनेमें भी आपत्ति नहीं, यदि उससे कोई हानि न हो तो; परंतु अपनी शुद्ध संस्कृतिका बलिदानकर उसके बदले विदेशी भाषा सीखकर शिक्षिता कहलाना तो बहुत ही घाटेका सौदा है। इस शिक्षाके फलस्वरूप स्त्रियोंमें आजतक जो नवीन सामाजिक प्रयोग शुरू हुए हैं, उनसे भी उनकी और समाजकी नैतिक और धार्मिक दोनों ही दृष्टियोंसे यथेष्ट हानि हो रही है। इससे हमारा यह अभिप्राय नहीं है कि स्त्रियोंको पढ़ना-पढ़ाना नहीं चाहिये। द्रौपदी बहुत बड़ी विदुषी थी, राज्य-संचालन कर सकती थी और महाभारत-युद्धकी मन्त्रणा सभामें भी वह अपने पतियोंके साथ रहती थी; परंतु वह आदर्श सद्गृहिणी भी थी। अहल्याबाई विदुषी और धर्मशीला थी। अतएव सद्गृहिणी होकर ही स्त्रियाँ विदुषी बनें, ऐसी ही पढ़ाईकी आवश्यकता है। इस दृष्टिसे आजकी युनिवर्सिटियोंकी शिक्षा नारी-जातिके लिये निरर्थक ही नहीं, वरं अत्यन्त हानिकर है। जो शिक्षा स्त्रियोंके स्वाभाविक गुण मातृत्व, सतीत्व, सद्गृहिणीपन, शिष्टाचार और स्त्रियोचित हार्दिक उपयोगी सौन्दर्य-माधुर्यको नष्ट कर देती है, उसे उच्च शिक्षा कहना सचमुच बड़े ही आश्चर्यकी बात है। जिस विद्यासे सद्गुण रह सकें और बढ़ सकें उसी विद्याको पढ़ाकर नारियोंको विदुषी बनाना चाहिये और इसीकी आवश्यकता भी है। शिक्षा यथार्थ वही है, जिससे संस्कृतिकी रक्षा तथा सद्गुणोंका विकास हो। यह जिसमें हो वही सुशिक्षिता है। इसलिये वर्तमान स्त्री-शिक्षामें आमूल परिवर्तन होना चाहिये और ऐसी शिक्षा-पद्धति बननी चाहिये जिससे नारीको अपने स्वरूपका तथा कर्तव्यका यथार्थ ज्ञान हो।
अब सहशिक्षापर विचार कीजिये। स्त्रियोंमें बहुत-से स्वाभाविक गुण हैं। उन्हीं गुणोंके कारण वे महान् पुरुषोंकी माताएँ बनती हैं। उन्हीं गुणोंका विकास करना स्त्री-शिक्षाका उद्देश्य होना चाहिये। परंतु साथ ही यह भी याद रखना चाहिये कि जो चीज जितनी बढ़ी-चढ़ी होती है, वह उलटे मार्गपर चले तो उससे हानि भी उतनी ही अधिक होती है। स्त्रीको उन्नत बनानेवाले त्याग, सहनशीलता, सरलता, तप, सेवा आदि अनेक आदर्श गुण हैं। परंतु स्त्री यदि चरित्रसे गिर जाती है तो फिर उसके यही गुण विपरीत दशामें पलटकर उसे अत्यन्त भयंकर बना देते हैं।
स्त्री और पुरुषके शरीरकी रचना ही ऐसी है कि उनमें एक-दूसरेको आकर्षित करनेकी विलक्षण शक्ति मौजूद है। नित्य समीप रहकर संयम रखना असम्भव-सा है। प्राचीन कालके तपोवनमें निर्मल वातावरणमें रहनेवाले जैमिनि, सौभरि, पराशर-सरीखे महर्षि और न्यूटन और मिल्टन-जैसे विवेकी पुरुष और वर्तमान कालके बड़े-बड़े साधक पुरुष भी जब संसर्ग-दोषसे इन्द्रिय-संयम नहीं कर सकते, तब विलास-भवनरूप सिनेमाओंमें जानेवाले, गन्दे उपन्यास पढ़नेवाले, तन-मन और वाणीसे सदा शृंगारका मनन करनेवाले, भोगवादको प्रश्रय देनेवाली केवल अर्थकरी विद्याके क्षेत्र-कॉलेजोंमें पढ़नेवाले और यथेच्छ आचरणके केन्द्रस्थान छात्रावासोंमें निवास करनेवाले, विलासिताके पुतले युवक-युवतियोंसे शुकदेवके सदृश इन्द्रिय-संयमकी आशा करना तो जान-बूझकर अपने-आपको धोखा देना है। परंतु क्या किया जाय, आज बड़े-बड़े दिग्गज विद्वान् भी यूरोपका उदाहरण देकर सहशिक्षाका समर्थन कर रहे हैं, मतिवैचित्र्य है।
कुछ लोग संस्कृत नाटकोंके आधारपर प्राचीन गुरुकुलोंमें सहशिक्षाका होना सिद्ध करते हैं। परंतु उन्हें यह जानना चाहिये कि प्राचीन ग्रन्थोंमें कहीं भी कन्याओं और स्त्रियोंका ऋषियोंके आश्रमोंमें जाकर एक साथ पढ़नेका प्रमाण नहीं मिलता, गुरु-कन्याओंके साथ भाई-बहिनके नाते ब्रह्मचारी गुरुकुलमें अवश्य रहते थे। परंतु गुरुकुलोंमें अत्यन्त कठोर नियम थे। सभी बातोंमें संयम था और आजकलके कॉलेज-होस्टलोंकी तरह विलासिता और स्त्री-पुरुषकी परस्पर कामवृत्ति जगानेवाले साधन वहाँ नहीं थे। इतनेपर भी कच-देवयानीके इतिहासके अनुसार कहीं-कहीं आकर्षण होनेकी सम्भावना थी ही। अतएव आजकलकी सहशिक्षाका समर्थन इससे कदापि नहीं हो सकता।
कुछ वर्षों पूर्व लाहौरके एक सुधारक पत्रमें लड़के-लड़कियोंकी सहशिक्षाके विरोधमें एक जिम्मेदार सज्जनका लिखा एक लेख निकला था, जिसमें लिखा था कि........की लेडी हेल्थ आफीसरकी घोषणाका स्वाध्याय किया जाय तो उन्होंने........के विद्यालयोंमें पढ़नेवाली विद्यार्थिनियोंके स्वास्थ्यकी देखभाल करके की है कि बारह वर्षसे ऊपरकी आयुवाली क्वाँरी लड़कियोंमेंसे ९० प्रतिशतके लगभग आसवती (गर्भवती) और गर्भपात करनेवाली पायी जाती हैं। यदि निष्पक्षतासे देखा जाय तो सब ओर यही आग लगी हुई है; परंतु माता-पिता और देशके नेता क्या सोच रहे हैं, यह हमारी समझसे बाहर है।
९० प्रतिशत तो बहुत दूरकी बात है, १० प्रतिशत भी हो तो बहुत ही भयानक है। विश्वास नहीं होता कि यह संख्या सत्य है। सम्भव है छपनेमें भूल हुई हो, परंतु इतना तो अवश्य ही मानना पड़ेगा कि आजकल स्कूल-कॉलेजोंमें पढ़नेवाली कुमारी कन्याओंके चरित्रोंके बिगड़नेकी सम्भावना बहुत अधिक है और इसीलिये ऐसी घटनाओंकी संख्या दिनोदिन बड़े वेगसे बढ़ रही है और इसीसे आजकी ये लड़कियाँ सती सीता-सावित्रीके नामसे भी चिढ़ने लगी हैं*।
जब लड़कियोंका यह हाल है तब स्वेच्छाचारको ही आदर्श माननेवाली शिक्षिता वयस्का स्त्रीका क्या हाल हो सकता है, यह सोचते ही हृदय काँप उठता है। पाश्चात्य देशोंमें तो ऐसा होता था, पर अब यहाँ भी वैसा ही होने लगा। यही हमारी उन्नति है, यही हमारा जागरण है। इसलिये इस विषयपर गम्भीरतासे विचार करना चाहिये और प्रगतिके नामपर इस बढ़ती हुई पतनकी धाराको रोकनेका प्रयत्न करना चाहिये।