स्त्रीके लिये पति ही गुरु है
यह सत्य है कि स्त्रियोंमें श्रद्धा-विश्वास अधिक है, धार्मिक भावना विशेष है और यह भी सत्य है कि आज भी धर्मको बहुत कुछ स्त्रियोंने बचा रखा है। पढ़े-लिखे बाबुओंको जहाँ न तो अवकाश है और न श्रद्धा है, वहाँ उनकी माता और पत्नियाँ, पुत्र और पतिकी मंगलकामनासे, परलोकके विश्वाससे और आत्मोद्धारके उद्देश्यसे धर्मका आचरण, भगवान्का भजन, दान-पुण्य, अतिथि-सत्कार, पूजा-पाठ और व्रतोपवास करती हैं, कथा-कीर्तन सुनती हैं, मन्दिरोंमें देवदर्शनको जाती हैं और तीर्थोंमें जाकर सन्त-महात्माओंके दर्शन-सत्संग करती हैं। यह सभी कुछ मंगलमय है और इससे लोक-परलोक—दोनोंमें अतुलित लाभ होता है, परंतु साथ ही यह भी सत्य है कि आजकल जैसे प्राय: सभी क्षेत्रोंमें दम्भ, धोखा, भ्रष्टाचार, अनाचार तथा ठगी चलती है, वैसे ही धर्म तथा अध्यात्मके क्षेत्रमें अनाचार और धोखाधड़ी बेशुमार चलती है। बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि इस क्षेत्रमें आजकल अनाचारका विशेष प्राबल्य है। कई तीर्थोंमें तो खास तौरपर अनाचार तथा व्यभिचारके अड्डे बने हुए हैं। गुरुओंकी चारों ओर बाढ़ आ गयी है और लोगोंके मनोंमें, खास करके सरलहृदया स्त्रियोंके मनोंमें ये संस्कार बद्धमूल कर दिये गये हैं कि ‘गुरुसे दीक्षा लिये (कानमें मन्त्र फुँकाये) बिना आत्मोद्धारकी कोई आशा ही नहीं है। गुरुका दर्जा भगवान्से भी ऊँचा है तथा गुरुको सर्वस्व अर्पण कर देना ही शिष्य या शिष्याका एकमात्र कर्तव्य है।’ सिद्धान्त यह सत्य है कि परमार्थ-मार्गमें सद्गुरुकी आवश्यकता है और गुरुके प्रति समर्पणभाव भी अवश्य होना चाहिये परंतु आजकल न तो प्राय: वैसे सद्गुरु ही दृष्टिगोचर होते हैं और न विशुद्ध आत्म-समर्पणका भाव ही। फिर स्त्रियोंके लिये तो एकमात्र पति ही परम गति, परम देवता और परम गुरु माने गये हैं। उन्हें अन्य गुरु करनेकी आवश्यकता नहीं है*।
यह ठीक है कि देवदासीप्रथा जैसे आरम्भमें देवताके प्रति शुद्ध समर्पण-भावकी द्योतक थी, परंतु पीछेसे उसमें महान् पाप आ गया, उसी प्रकार गुरुकरण-प्रथाका मूल भी पवित्र था, परंतु आजकल तो इसका बहुत बड़ा दुरुपयोग हो रहा है।
असलमें स्त्रियोंको पर-पुरुषमात्रसे ही दूर रहना चाहिये। स्त्री-पुरुषको पास-पास रहकर धर्मको बचाये रखना बहुत ही कठिन है। ऐसे सैकड़ों-हजारों उदाहरण हैं जिनसे सिद्ध है कि महात्मा, भक्त, आचार्य और पण्डित, पुजारी आदि कहलानेवाले लोगोंके द्वारा सरलहृदया स्त्रियोंका बहुत तरहसे पतन हुआ है और हो रहा है। कहीं भगवान् श्रीकृष्णकी महान् पवित्र लोकोत्तर व्रजलीला और गोपीप्रेमके नामपर पाप किये जाते हैं। कहीं मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराघवेन्द्रके नामपर रामविवाह आदिके प्रसंगसे स्त्री-समाजके सामने गन्दे पद, गन्दी गालियाँ गायी जाती हैं और नारी-समाजको पतनके गर्तमें ढकेला जाता है, तो कहीं गुरुदेव स्वयं भगवान्का स्वरूप बनकर शिष्याओंसे आत्मसमर्पण करवाते हैं। कहाँतक कहा जाय, अभी उस दिन हमें एक बहुत लम्बा पत्र मिला है, जिसमें एक सज्जनने उनके गुरु भगवान्के द्वारा उनकी धर्मपत्नीको किस प्रकार धर्मच्युत किया गया—इसका बड़ा ही रोमांचकारी वर्णन किया है। भगवान् और धर्मके नामपर भगवान्के मन्दिरमें, भगवद्विग्रहके सम्मुख ऐसे-ऐसे दुराचरण किये जाते हैं जिनकी कल्पनासे भी महान् दु:ख होता है। पर जब वस्तुत: ऐसा होता है, तब क्या कहा जाय। अतएव हमारी सरलहृदया श्रद्धासम्पन्ना देवियोंको चाहिये कि वे अपने सतीत्वको ही सबसे बढ़कर मूल्यवान् धन समझें और किसी भी सन्त-महात्मा, गुरु, आचार्य, भक्त, प्रेमी, रसिक, देशसेवक, समाजसेवक आदिके कुसंगमें कभी न पड़ें। न तो एकान्तमें किसी भी पर-पुरुषसे मिलना चाहिये, न किसीका कभी स्पर्श ही करना चाहिये और न किसीको गुरु बनाकर या प्रेमी महात्मा मानकर गन्दी चर्चामें अकेले या अन्यान्य स्त्रियोंके साथ सम्मिलित ही होना चाहिये; फिर वह चर्चा चाहे भगवान्की पवित्र लीलाके नामपर ही क्यों न की जाती हो। सच्चे सन्त-महात्मा, भक्त, प्रेमीजन ऐसा दुराचार कभी नहीं कर सकते। जो ऐसा करते हैं, वे सन्त-महात्माओंके वेशमें छिपे हुए पापी हैं, जो अपनी कुत्सित कामनाकी पूर्तिके लिये स्वाँग धारण करके इन पवित्र वेषोंको कलंकित कर रहे हैं और सच तो यह है कि इस घोर कलियुगमें ऐसे लोग बहुत हो गये हैं। इनसे बचना ही चाहिये।
जैसे धर्मके क्षेत्रमें यह बुराई है, वैसे ही राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रमें भी यह बुराई कम नहीं है। ‘बहिनजी’ कहकर पुकारनेवाले अनेकों दुष्ट व्यक्ति देशभक्त और समाज-सेवकका पवित्र बाना धारण किये हुए और स्त्री-समाजके दु:खोंके प्रति सहानुभूतिके आँसू बहाते हुए इसी प्रकारके कुकर्मोंमें रत रहते हैं। इसी दुराचारके लिये आज बहुत-से विधवाश्रम और महिलाश्रम चलाये जा रहे हैं। यह हमारा महान् पतन है, पर है नग्न सत्य! सावधान!