विधवा-जीवनको पवित्र रखनेका साधन

विधवाका दु:ख अकथनीय है, उसका अनुमान दूसरा कोई भी नहीं कर सकता; परंतु यह भी परम सिद्ध है कि विधवाकी कामवासनाको जगाकर उसे कामोपभोगमें लगानेसे, उसे विषयसेविका बनानेसे, उसके पुनर्विवाहकी व्यवस्था कर देनेसे उसका दु:ख नहीं मिट सकता। दु:खका कारण है—हमारे अपने ही कर्म। और भविष्यमें यदि हम सुख चाहते हैं तो हमें वैसे ही संयमपूर्ण सत्कर्म करने चाहिये, जिनका परिणाम सुख हो। विषयसेवनकी सुविधाका परिणाम सुख नहीं होगा। स्त्री विधवा क्यों होती है? इसका कारण है—स्त्रीके पूर्वजन्मका असदाचार। यदि यहाँ भी यह पुन: असदाचारमें प्रवृत्त होगी तो उसका भविष्य और भी संकटपूर्ण होगा। सती अनसूयाजीने कहा है—

बिनु श्रम नारि परम गति लहई।

पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥

पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई।

बिधवा होइ पाइ तरुनाई॥

स्कन्दपुराणमें कहा गया है—

या नारी तु पतिं त्यक्त्वा मनोवाक्‍कायकर्मभि:॥

रह: करोति वै जारं गत्वा वा पुरुषान्तरम्।

तेन कर्मविपाकेन सा नारी विधवा भवेत् ॥

‘जो नारी अपने पतिको त्यागकर मन, वचन, शरीर तथा कर्मसे जारका सेवन करती है; दूसरे पुरुषके पास जाती है, वह उस कर्मके फलस्वरूप जन्मान्तरमें विधवा होती है।’

यहाँतक कि पापोंके कारण पुरुषोंको भी अगले जन्ममें स्त्री-योनिमें जन्म लेकर विधवा होना पड़ता है—

य: स्वनारीं परित्यज्य निर्दोषां कुलसम्भवाम्।

परदाररतो हि स्यादन्यां वा कुरुते स्त्रियम्॥

सोऽन्यजन्मनि देवेशि स्त्री भूत्वा विधवा भवेत् ।

(स्कन्दपुराण)

श्रीशंकरजी उमादेवीसे कहते हैं—‘देवेश्वरी! जो पुरुष अपनी निर्दोष तथा कुलीन पत्नीको छोड़कर परस्त्रीमें आसक्त होता है या दूसरी स्त्रीको पत्नी बनाता है, वह जन्मान्तरमें स्त्री-योनिमें जन्म लेकर विधवा होता है।’

इससे यह सिद्ध है कि विधवापन पूर्वकर्मके फलस्वरूप ही मिलता है। इसका नाश शुभकर्म, तपस्या या भगवद्भजनसे ही होगा। पुनर्विवाह या विषय-सेवनसे यह दोष दूर नहीं हो सकता वरं उससे तो दोष और भी बढ़ जायगा, जो जन्मान्तरमें विशेष दु:खका कारण होगा। मुक्ति तो प्राप्त होगी ही नहीं, मानव-जीवन भावी दु:खोंकी विशाल भूमिका बन जायगा। इसीलिये विधवा स्त्रीको पतिके अभावमें तन्मय होकर परमपति भगवान‍्में मन लगानेका आदेश दिया गया है।

हिन्दू-स्त्रीका विवाह कोई सौदा नहीं है, जो तोड़ा जा सके। वह तो सदा अटूट रहता है। पतिके परलोकगमन करनेपर भी वह ज्यों-का-त्यों बना रहता है।

आज हिन्दू-विधवाकी ओरसे समाजमें जो एक ओर उदासीनता और दूसरी ओर उत्साह देखा जाता है, वह दोनों ही उसके लिये वस्तुत: महान् विपत्तिस्वरूप है। एक ओर तो समाजके पुरुष विधवाको भाँति-भाँतिसे दु:ख देकर उसे धर्मच्युत करके पथ-भ्रष्ट करते हैं और दूसरी ओर उसपर दया दिखाकर उसे कामकी विषबेलिका सेवन करनेको उत्साहित करके पथ-भ्रष्ट करते हैं। ऐसी अवस्थामें विधवाके जीवनका दु:खमय होना स्वाभाविक है और विधवाकी दु:खभरी आहसे समाजका अमंगल भी अवश्यम्भावी है। इस विनाशसे समाजको बचाना हो तो विधवाके साथ बहुत सुन्दर, पवित्र और आदर्शपूर्ण व्यवहार करना चाहिये और साथ ही उसका जीवन पवित्र संन्यासीके जीवनकी भाँति त्यागमय रह सके, इसकी व्यवस्था तथा इसीका प्रचार करना चाहिये। विधवा-जीवनको पवित्र तथा सुखी बनानेके कुछ उपाय ये हैं—

(१) विधवा-जीवनके गौरवका ज्ञान विधवाको कराना—उसको यह हृदयंगम करा देना कि विधवा-जीवन घृणित और दु:खमय नहीं है, बल्कि पवित्र दैवी जीवन है, जिससे भोग-जीवनकी समाप्तिके साथ ही आत्यन्तिक सुख और परमानन्दकी प्राप्ति करानेवाले आध्यात्मिक जीवनका आरम्भ होता है। उसे समझाना चाहिये कि मनुष्य-जीवनका लक्ष्य भगवत्प्राप्ति है। विषयसेवनसे विषयोंमें आसक्ति-कामनादि बढ़ते हैं। अत: विषयसेवन करनेवाली सधवा स्त्रियोंको भगवत्प्राप्तिकी साधनाका जो सुअवसर न मालूम कितने जन्मोंके बाद मिल सकेगा, वह उसको इसी जन्ममें अनायास मिल गया है। इसलिये वस्तुत: वह पुण्यशालिनी और भाग्यवती है; और जैसे विषय-विरागी त्यागी-संन्यासी सबके पूज्य, आदरणीय और श्रद्धास्पद होते हैं, वैसे ही वह भी पूजनीय और श्रद्धाकी पात्र है। सुख-दु:ख किसी घटनामें नहीं, बल्कि मनके अनुकूल तथा प्रतिकूल भावोंमें हैं। एक संन्यासी स्वेच्छासे विषयोंका त्याग करके निवृत्तिमय जीवन बिताता है, इससे उसको सुखका अनुभव होता है और दूसरे एक आदमीको उसका सब कुछ छीनकर कोई जबरदस्ती घरसे निकाल देता है, उसको बड़ा दु:ख होता है। दोनोंकी विषयहीनताकी बाहरी स्थिति एक-सी है; फिर एकको सुख, दूसरेको दु:ख क्यों होता है? इसीलिये कि एक इस स्थितिमें अनुकूलताका अनुभव करता है और दूसरा प्रतिकूलताका। संसारीके लिये कामिनी-कांचन, विषय-भोगादि सुखरूप हैं; वही मनोभावना बदल जानेसे विरक्त संन्यासीके लिये दु:खरूप हो जाते हैं और संन्यासीके लिये जो त्याग सुखरूप है, उसमें संसारीको दु:खकी अनुभूति होती है। अत: विधवामें यदि ऐसी आस्था पैदा कर दी जाय कि विधवाका विषयविरहित जीवन उसके लिये परम गौरवकी वस्तु है तथा मानव-जीवनके परम लक्ष्य भगवत्प्राप्तिका श्रेष्ठ साधन है—इससे उसका जीवन अनादरणीय तथा कलंकमय नहीं हो गया है, वरं आदरणीय और गौरवमय हो गया है और सबको उसके साथ वस्तुत: ऐसा ही आदर, श्रद्धा तथा पूज्यभावका बर्ताव भी करना चाहिये—इससे विधवा अपने जीवनमें सुखका अनुभव करेगी। उसका जीवन पवित्र तथा संयमपूर्ण बना रहेगा।

(२) विधवा ससुरालमें हो तो सास-ससुरको और पीहरमें हो तो माता-पिताको विलासक्रियाका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये तथा अपने जीवनको सादा-सीधा संयमपूर्ण वानप्रस्थके सदृश तपोमय बनानेकी चेष्टा करनी चाहिये। इससे विधवाको बड़ा सन्तोष होगा, उसका विषयोंकी ओर आकर्षण नहीं होगा और उसके धर्मच्युत होनेका भी डर नहीं रहेगा। उसके सामने घरवालोंका जो पवित्र आदर्श रहेगा, वह उसके कर्तव्य-पालनमें बल और उत्साह प्रदान करेगा। कार्य कठिन है, परंतु है बहुत ही लाभदायक और अवश्य-कर्तव्य।

इसीके साथ घरके अन्यान्य स्त्री-पुरुषोंको भी विषय-सम्बन्ध बहुत सावधानीसे करना चाहिये, जिससे विधवाका ध्यान उधर न जाय।

(३) विधवाका कभी तिरस्कार या अपमान नहीं करना चाहिये। उसे कटुवाक्य कभी नहीं कहना चाहिये। उसे घरका देवता समझना चाहिये। ऐसा मानना चाहिये कि उसका स्थान सधवा माता और सासकी अपेक्षा भी ऊँचा है। विधवा कोई सत्कार्य, दान, व्रतोत्सव, उद्यापन आदि करना चाहे तो अपने घरकी शक्तिके अनुसार विशेष उत्साह, धनव्यय और सहयोगके साथ उसको कराना चाहिये। उसमें जरा भी कृपणता नहीं करनी चाहिये, उसके पास सात्त्विक कार्य अधिक-से-अधिक बने रहने चाहिये, जिससे उसके मनको विषय-भोगोंकी ओर जानेका अवसर ही न मिले।

(४) विधवाके हृदयकी प्रेमधारा परिवारभरके सभी बालकोंके प्रति बहने लगे—इसके लिये उसे सुअवसर, सुविधा तथा उत्साह प्रदान करना चाहिये। उसके प्रेम, परोपकार तथा सेवावृत्तिको आदर तथा गौरवके साथ जगाना चाहिये। वह घरमें सब बच्चोंकी स्नेहमयी माँ बन जाय तो उसको अपना जीवन पवित्रतासे बितानेमें बड़ी सहायता मिल सकती है।

(५) विधवाको तिरस्कार या अपमानके भावसे नहीं, किंतु उसके स्वरूपके गौरवके लिये, सादा जीवन बितानेके लिये प्रोत्साहित करना चाहिये। विधवा सदाचारिणी हो, खान-पानादिमें संयम-नियमका पालन करे, तामसी-राजसी वस्तुओंका खान-पान-सेवन त्याग दे, अलंकार तथा रंगीन कपड़े न पहने* (इससे स्वाभाविक उत्तेजना होकर ब्रह्मचर्यव्रतको हानि पहुँचती है, यह वैज्ञानिक रहस्य है)।

इधर-उधर लाज छोड़कर न घूमे, शारीरिक परिश्रम अवश्य करे, नाटक-सिनेमा कभी न देखे, गन्दे चित्रों और पुस्तकोंका अवलोकन न करे, स्त्रियोंसे परस्पर विषयसम्बन्धी चर्चा न करे, पुरुषोंके संसर्गसे सदा बचे, अकेली पुरुषोंके साथ न रहे, किसी भी पुरुषको गुरु बनाकर उसके चरण छूने, उसके अंगोंका स्पर्श करने,पैर दबाने, एकान्तमें उसके पास रहने आदिसे सावधानीके साथ अवश्य बचती रहे, फिर चाहे वह कितना ही बड़ा भक्त, महात्मा या त्यागी-संन्यासी ही क्यों न हो, विधवा स्त्री एकमात्र भगवान‍्को ही परम पति और परम गुरु माने, रातको कमरेमें अकेली या अन्य स्त्रियाँ हों तो उनके पास सोवे, घरमें शिशु हों तो एक-दो शिशुओंको अपने पास जरूर सुलावे; शृंगार न करे; नित्य भगवन्नाम-जप, इष्टपूजन, गीता-रामायणादि पाठका नियम रखे; सद‍्ग्रन्थोंका स्वाध्याय करे और हो सके तथा शरीर माने तो बीच-बीचमें चान्द्रायणादि व्रत भी करे। शारीरिक, वाचिक और मानसिक तपोंका आचरण करे,* संन्यासी तथा ब्रह्मचारीके लिये सात्त्विक भोजन, मन-वाणीके संयम और सदाचारके जो नियम शास्त्रोंमें वर्णित हैं, विधवादेवी उनका पालन करे।

इस प्रकार संयमित जीवन रखकर भगवद्भजन, शास्त्रचर्चा, हरिकथा, वैराग्य, त्याग तथा पातिव्रत्यकी महिमा बतलानेवाले ग्रन्थोंका पठन-अध्ययन, आध्यात्मिक सदुपदेशोंका श्रवण-मनन, भगवान‍्के विग्रहकी उपासना आदि करनेसे विधवाका जीवन साधनामय हो जायगा। उसे यहाँ सुख-शान्ति मिलेगी और अन्तमें मुक्ति।

(६) बाल-विवाह और वृद्ध-विवाहकी प्रथा बन्द कर देनी चाहिये। लड़कियोंका विवाह बहुत छोटी अवस्थामें नहीं करके अपने-अपने प्रान्तकी स्थितिके अनुसार रजस्वलासे पूर्व करना चाहिये और लड़कियोंमें धार्मिक शिक्षाका प्रसार अवश्य होना चाहिये, जिससे उनके जीवनमें सतीत्वका गौरव जाग्रत् होकर अक्षुण्ण बना रहे।

(७) विधवाओंकी धन-सम्पत्तिको देव-सम्पत्ति मानकर बड़ी ईमानदारीसे इसका संरक्षण करना चाहिये। विधवाके हकको मारना तथा उसकी सम्पत्तिपर मन चलाना और हड़पना महापाप है।

विधवा नारीके सम्बन्धमें मनुमहाराज कहते हैं—

कामं तु क्षपयेद् देहं पुष्पमूलफलै: शुभै:।

न तु नामापि गृह्णीयात् पत्यौ प्रेते परस्य तु॥

आसीतामरणात् क्षान्ता नियता ब्रह्मचारिणी।

यो धर्म एकपत्नीनां काङ्क्षन्ती तमनुत्तमम्॥

मृते भर्तरि साध्वी स्त्री ब्रह्मचर्ये व्यवस्थिता।

स्वर्गं गच्छत्यपुत्रापि यथा ते ब्रह्मचारिण:॥

(मनु० ५।१५७-१५८, १६०)

‘पतिकी मृत्यु हो जानेपर पवित्र पुष्प, फल और मूलादि अल्पाहारके द्वारा शरीरको क्षीण करे, परंतु व्यभिचारबुद्धिसे परपुरुषका नाम भी न ले।’

‘साध्वी स्त्री एकमात्र पतिपरायणा (सावित्री आदि) नारियोंके अत्युत्तम (पातिव्रत) धर्मको चाहनेवाली होकर विधवा होनेके अनन्तर मनकी कामनाको त्याग दे और मृत्यु-कालपर्यन्त नियमोंका पालन करती हुई ब्रह्मचर्यसे रहे।’

‘पतिके मरणके अनन्तर जो साध्वी स्त्री ब्रह्मचर्यका पालन करती है, वह पुत्रहीन होनेपर भी ब्रह्मचारियोंके सदृश स्वर्ग (दिव्य) लोकमें जाती है।’

जो स्त्रियाँ इस प्रकार अपने धर्मका पालन न करके क्षणिक विषयसुखके लोभसे अपनेको इन्द्रियोंकी गुलाम बना लेती हैं, उनका भविष्य बिगड़ जाता है और वे महान् दु:खोंको भोगती हैं। उनका जीवन यहाँ तो दु:खमय हो ही जाता है, परलोकमें भी उन्हें महान् क्लेशोंका भोग करना पड़ता है। वे महापापी हैं, जो पवित्र विधवाओंको सतीधर्मसे च्युत करके पाप-पंकमें फँसाते हैं और उन बेचारी असहाय देवियोंको दु:खकी ज्वालामें जलानेके लिये बाध्य करते हैं।